Wednesday, October 21, 2020

प्रयास और एक बेहतर समाज का सपना - आँचल

यह कहानी एक ऐसे edu leader की है जिनके अंदर कुछ सीखने व करने का जज्बा है| जब आप को किसी को गहराई से जान्ने का मौका मिलता है और आप उनके जज़्बे की समझ बना पाते हैं तो एक अलग ही प्रेरणा मन में जग उठती है| यह कहानी एक ऐसी ही edu-लीडर हीना की है|

आई-सक्षम में हर edu-लीडर को उनके 2 साल की फ़ेलोशिप के दौरान आई-सक्षम टीम से एक बडी (दोस्त) मिलता है| यह बडी फेल्लो को हर तरह का सहयोग प्रदान करता है,जैसे- प्रशिक्षण के दौरान फेलो की समझ को जानना, फेलो के पढ़ाने के तरीके को समझना व् उपयुक्त सुधार के तरीके बताना, फेलो के शेक्षणिक विकास में सहयोग देना व् फ़ेलोशिप में हर उतार चढ़ाव के दौरान उनके साथ खड़े रहना| सभी बडी अपने फेलो के साथ हर माह 2-3 बडी टॉक करते हैं, जिसमे वे फेलो के कार्यों, अनुभव व् उनके प्रदर्शन के ऊपर बात करते हैं व् उन्हें आगे बेहतर करने के सुझाव देते हैं| मैं उन्ही बडी में से एक हूँ और आज अपनी एक फेलो हीना के साथ हुई बडी टॉक के अनुभव को साझा कर रही हूँ|


पहले पहल जब मैंने हिना दीदी से बडी टॉक कि थी तो उनके और उनके घर - परिवार व बच्चे के बारे में जानने को मिला था।मैं कभी-कभी दीदी से बीच में फॉलो -अप कर लेती थी लेकिन उनके अंदर के कारणों को नहीं समझ पाती थी या फिर नहीं जान पाती थी।लेकिन शुरुआत में एक बार दीदी ने बडी टॉक के दौरान मुझे एक समस्या के  के बारे में बताया था कि -“ जब वह अपनी कक्षा में पढ़ाती है तो उन्हें बच्चों को बुलाने उनके घर जाना पड़ता है क्योंकि बच्चे आंगनवाड़ी के हैं और बहुत छोटे हैं| वे पढने नहीं आना चाहते|


हमने पहले भी इस विषय पर बात की थी और समझ बनायीं थी कि बच्चों के अभिभावक व् उनके दोस्तों का सहयोग ले कर बच्चों को पढने बुलाया जाए| परन्तु अभिभावकों की और भी दुसरे ज़रूरी कामों में व्यस्तता के कारण बात कुछ बन नहीं पायी| आज बडी टॉक में फिर वही समस्या सामने आई| दीदी को आज भी बच्चों को पढने बुलाने के लिए उनके घर जाना पड़ता है|


दीदी गर्भ से हैं और यह उनका अपने समाज के बच्चों को शिक्षित करने का जज्बा ही है कि वे इस स्तिथि में भी बच्चों को घर जाकर बुलाती हैं और फिर उन्हें पढ़ाती हैं। भले ही उन्हें इस कार्य में थोड़ी तकलीफ होती होगी परन्तु वे कहती हैं कि बच्चों का पढना बहुत जरूरी हैं|  मैंने जब इन बातों को दीदी के मुह से सुना तो मैं दंग रह गई कि इतनी ताकत हमारे समाज की महिलाओं में कैसे देखने को मिल जाती है| वे घर का काम करती हैं,  बच्चे व परिवार को देखती है और खुद बच्चों को घर जाकर पढने के लिए बुलाती हैं और फिर उन्हें पढाती भी हैं| फिर भी वही समाज के कुछ लोग कह रहे है कि महिला कुछ नहीं करती या कर नहीं सकती है।


परन्तु धीरे धीरे समाज में कुछ लोग महिलाओं के इन प्रयासों व् जज़्बे से सीखने और समझने  का प्रयत्न कर रहे हैं| वे  इसी समाज में रह कर उनके लिए बदलाव कि छवि देखने का प्रयास कर रहे है। इसी सोच के साथ कि एक ना एक दिन बदलाव आएगा। और सभी को समान दर्जा दिया जाएगा| इसी से हमारी आने वाली पीढ़ी भी महिलाओं के सामन दर्जे की समझ बनाएगी| 


इन दीदियों  में काफी कम समय में एक अच्छे बदलाव और एक अच्छी सोच की छवि मुझे नजर आई है।इसी तरह की सोच को लेकर अगर हमारे समाज के लोग आगे बढें तो एक साकारात्मक बदलाव दूर नही|


   कोशिश कर, हल निकलेगा, 

   आज नहीं तो, कल निकलेगा। 

   कोशिशें जारी रख कुछ कर गुजरने की, 

   जो है आज थमा-थमा सा, चल निकलेगा।


 मैं दीदी के प्रयासों से उन्हें बहुत-बहुत आभार देती  हूं कि उन्होंने इन चीजों को किया और आज भी उनके  कथक प्रयास जारी है| वह समाज को बेहतर करने में एक अहम भूमिका निभा रही हैं| 


जज्बा जो छिपाए न छुपे!

हमारे कार्यों के दौरान कई बार ऐसे पल आते हैं जो हमे हमारी ज़िम्मेदारी का अहसास कराने के साथ साथ हमारे दिल के हमेशा करीब रहे जाते हैं| कई बार दूसरों के जीवन की कहानी से हम इतना प्रभावित हो उठते हैं कि हम अपने कर्तव्यों के और नज़दीक हो जाते हैं| कुछ ऐसा ही हुआ इस बार आई-सक्षम फ़ेलोशिप के लिए हो रहे महिलाओं के साक्षात्कार में| आई-सक्षम परिवार से एकता अपने अनुभव को साझा करते हुए कहती हैं: 


मैं बहुत संक्षिप्त में उन बातों को साझा करना चाहूंगी जिसने मुझे प्रभावित किया है और इंटरव्यू के लिए आई महिलाओं ने मुझे सीखने का मौका दिया है | आज हमलोगों ने जमुई में 24-25 महिलाओं का इंटरव्यू लिया | जिसमें से मेरे समूह व् मुझे 13 महिलाओं से बात करने का मौका मिला | इनमें से ज्यादातर महिलाएं शादीशुदा हैं | इंटरव्यू से पहले हमलोग आपस में यही बात कर रहे थे कि "अधिकांश महिलाएं शादीशुदा है | पता नहीं वो परिवार की जिम्मेदारियों के साथ किस तरह हमारे फ़ेलोशिप से सक्रिय रूप से जुड़ी रह पाएंगी ?" अगर मैं अपनी बात कहूँ तो मेरे मन में एक ही सवाल आ रहा था कि "क्या इनमें उतनी उर्जा होगी?"

 

पर जब मैंने इन महिलाओं से बात की तो मैं दंग रह गयी | इनमें से अधिकांशतः महिलाओं की शादी को 8 से 10 साल हो गए थे पर आज भी उनके अन्दर उनके सपनो को लेकर वही जज्बा है जो उनमे शादी से पहले रहा होगा| आज भी उनके मन में खुद के लिए कुछ करने का उतना ही जूनून है जितना शायद उन सपनो को देखने की शुरुआत में रहा होगा|

एक बात जो 5 महिलाओं ने कही वह यह है कि "हमें यहाँ आ कर बहुत अच्छा लग रहा है | हमसे लोग अक्सर हमारे परिवार के बारे में पूछते हैं | बहुत कम ऐसा होता है कि हमें खुद के बारे में बात करने का मौका मिलता है | आपलोग आज इतना धैर्य से मेरे बारे में सुन रहे हैं; हमको बताकर अच्छा लग रहा है | हम तो अपने जीवन में कुछ करना चाहते थे पर कभी इस तरह का मौका नहीं मिला |" जब उनसे यह पूछा गया कि "क्या आप सप्ताह में एक दिन अपने गाँव से ट्रेनिंग के लिए यहाँ जमुई ऑफिस आ पाएंगी? एक महिला ने बहुत प्यार से जवाब दिया, "क्यों नहीं! कम से कम एक दिन तो अपने मन से आने जाने का मौका मिलेगा | फिर यहाँ नए दोस्त भी तो बनेंगे ”| 

इंटरव्यू के दौरान महिलाओं के द्वारा समाज के अनेकों परिवेश को जान्ने का मौका मिला| जहाँ कुछ महिलाओं ने अपने घर से बाहर काम न कर पाने का कारण अपने ससुराल की जिम्मेदारियां बताई तो वहीँ एक महिला ने बताया कि उनकी सास उनके साथ यहाँ इंटरव्यू दिलवाने के लिए आई हैं | वे चाहती हैं कि उनकी बहु आगे बढ़े | 


एक महिला से जब यह पूछा कि “आपके अनुसार आपके गाँव में शिक्षा की स्थिति कैसी है” तो इसका जवाब देते-देते वे भावुक हो गई | उन्होंने बताया कि उनके गाँव में स्कूल नहीं था | किसी तरह से गाँव वालों ने छोटे से जगह में सरकार को अर्जी देकर स्कूल बनवाया था पर फिर भी शिक्षा की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है | उनको इस बात की चिंता है कि अगर उनके बच्चे नहीं पढेंगे तो क्या होगा | पूरा गाँव पिछड़ा ही रह जायेगा साथ-साथ उनका बेटा भी | 


इन महिलाओं से बात करने के बाद मेरा सवाल, सवाल नहीं रहा | मुझे लगता है सपना देखने और उसके पीछे भागने की कोई उम्र नहीं होती| फर्क बस इतना है किसी को सहयोग मिलता है और कोई इसके आभाव में पीछे रह जाता है| परंतु इन महिलाओं में अपने सपनो को जीने का जज्बा आज भी है और उनकी निरंतर कोशिश आज भी ज़ारी है| 


आई-सक्षम टीम के सदस्यों का ऐसा अनुभव हमे समक्ष इस बात को उजागर करता है की हमारे समाज में महिलाओं में अनेकों हुनर छिपे हुए हैं| वे परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ अपने देश व् समाज की बेहतरी की ज़िम्मेदारी भी बखूबी निभा सकती हैं| पिछले 5 साल के सफ़र में लगभग 150 ऐसी ही महिलाओं ने आई-सक्षम फ़ेलोशिप से जुड़ कर अपने समाज की शिक्षा की बेहतरी के लिए कार्य किया है और आज भी शिक्षा से जुडी हुई हैं| यह महिलाएं हमारे लिए एक प्रेरणा हैं और इनका जज़्बा हमारी ताकत| 


Friday, August 21, 2020

Bringing sense to EdTech: 5 pillars of an Edtech intervention

Author: Shravan Jha (Co-founder, i-Saksham)

It was the year 2014. As the Prime Minister’s Rural Development Fellows, we were working with the local district administration in Jamui district, Bihar to improve learning opportunities for students of three residential schools. Our experience of working with government schools over the past two years had reinforced our belief that teachers were simply a resource in the school system; and an easily replaceable one at that.

The answers lie in technology, or so we thought


Our initial belief was that educational technology (EdTech), was the solution, and would work independently of the teacher’s role in ensuring quality education to the students. We saw both the teacher and the tech simply as platforms for disseminating information. So, we designed our programme based on these assumptions. The two were compared on metrics such as the quantity, quality, and delivery of information, and on the way in which a student might benefit from the design advantage that technology offers--variety in type and use of content. For instance, ‘What information should I watch?’ (type of content), and ‘How should I engage with the information?’ (use). 

We pitched this idea to our friends, and though many of them were skeptical, they donated 60 tablets to us. Once the tablets were in place, we searched and partnered with a quality content provider, who provided us content free of cost. Then, we mapped the content with the state government’s syllabus, created groups of students who would be using them, installed apps that would monitor content use, and placed these tablets in three government residential schools. This intervention was designed based on our initial hypothesis that an EdTech platform will function independent of the teacher’s participation, as we thought factors associated with teachers (quality of instruction, lack of interest, absenteeism) were the major reasons that learning was not happening. 

However, once the initial euphoria and the real work set in, we started to realise that our intervention had several loopholes. This resulted in almost 50 percent of the tablets breaking in the first four months of the intervention, and the EdTech platform being used poorly by the students. Our learning from this intervention made us realise how our assumptions stopped us from considering what we now see as the five fundamental pillars of designing an EdTech intervention.

1. Information is not knowledge

The idea was to use technology as a platform for disseminating information which would be of a better quality, and would therefore help overcome the limitations of a teacher and the boredom of a textbook. We thought this would give students a chance to learn better, and at their own pace. However, we failed to realise that information is not knowledge. For information to become knowledge and be valued by the child, it has to go through processes of reasoning, dialogue, questioning, and sharing. A teacher, not technology, is best placed to facilitate this.

2. Forming a learning group doesn’t ensure accountability

Our intervention was built around the idea that a group of five students would share and learn from one tablet. These students were grouped based on their grades, and we assumed that since they shared common spaces, they would be more likely to support one another. This assumption turned out to be wrong. We realised that until a strong common identity, shared purpose, and regular reinforcement of values are built in, merely bringing people together and forming a group doesn’t lead to accountability.

3. Technology doesn’t automatically create agency for users

One of the central ideas of the intervention was that giving tablets to a group of students will ensure agency to all members of the group. This, however, was not how things panned out. In many groups, we found that certain members had emerged as decision makers, and they would decide what content would be watched, when, and how. This created a hierarchy within the group.

While we measured access to tablets at a group level, we ignored lack of access within these groups. We also ignored the importance of reinforcing the common purpose. What we failed to do was envision the influence a peer group leader could have and think of ways to identify and engage them in the intervention.

4. EdTech is a system, not an individual platform for disseminating information

Our intervention was focused on the platform and content, and all our energy was spent putting a tempered glass and a leather cover for protection, coding, and adding quality content to the tablets. We paid very little attention to understand our EdTech intervention as a system, with many components linked to each other.

We failed to ask, for instance: How many charging points were there in the schools? For how many hours did the school get electricity? What were the voltage fluctuations? How could we link speakers and audio splitters, which were necessary for some aspects of the content? This ignorance led to many of the tablets becoming dysfunctional within a short period, mainly due to high voltage fluctuations and using very poor-quality chargers to charge the tablets.

5. Teachers and EdTech are collaborators, not competitors

Throughout our intervention, we ignored the role of a teacher, believing we could circumvent them and link students to what mattered the most—a good content platform. This was our biggest failure. We failed to build on the possibility of bringing teachers and technology together. Doing so would have allowed the teacher to use EdTech as a powerful tool to expand their capabilities, and envision a learning ecosystem that breaks the limitation of textbooks or other resource constraints, creating endless possibilities

We believe the power of EdTech lies in creating and expanding these possibilities, not only for the students or the teacher but for all stakeholders. This is possible only when stakeholders have a stake and a voice in the intervention design.

Tuesday, August 18, 2020

Didis and Mothers taking the baton of education in villages of Bihar during Covid

Sangeeta, a young girl from Daniyalpur village in Munger district of Bihar, is making phone calls for 2 hours every single day, to tell stories to her children, and share learning activities with mothers. These activities are designed using daily objects  and can easily be understood by women, irrespective of their literacy level.

For example,. exploring leaves to learn about different shapes, counting utensils to learn numbers, and so on. 

Sangeeta’s efforts ensure that the children in her community continue their learning during the pandemic. Even though these children have limited access to digital technology.  Following the structured session plans  with learning activities appropriate to the level of each child gives heran  edge against digital solutions, which rely just on dissemination of content. 

 “Education is not only about sharing of information, but also as much about dialogue, debate, and critical analysis of information”, says Sangeeta. The in-person facilitation ensures that her children learn to do that instead of just consuming the animated content on the digital device. 

The disruptions caused by COVID-19 must serve as an inflexion point to recognise the critical role that community initiatives can play in education, especially in rural India.   The challenge to provide education in the deep interior pockets of the country during Covid is a case in point.

“Whom can we rely upon? Who can take the baton of educating our children?”, ask Ravi Dhanuka, Co-founder and CEO of I-Saksham Education And Learning Foundation (i-Saksham), a not-for profit organization working in extremism affected districts of Bihar to transform local youth - mainly females - into community edu-leaders.  

There are 100 edu-leaders like Sangeeta who are trained by i-Saksham go through a 2-year fellowship program. They help in imparting better quality education in remote areas, in partnership with government schools. During normal days, these edu-leaders go to under-resourced primary schools, and assist government school teachers to effectively teach multi-grade classroom through modern-day pedagogy methods. 

They meet school management committees every month, organize learning fairs in villages, and meet parents on an individual basis, to showcase how children have begun to show significant improvement in their learning level.

The forced school closures due to pandemic have affected over 30 crore children, resulting in poor children falling further behind and at risk of dropping out of the system.

In a separate initiative, i-Saksham has formed a collective with 7 educational organizations such as JEEViKA (a World Bank aided Livelihood Project that forms women self-help groups) and Mahila Samakhya (a MHRD run program to create women leaders who work on literacy and gender). The idea is to undertake community-led initiatives related to education in remote villages of the country during Covid-19. 

                                              

   

The project is running as ‘Shiksha Sahelis’ in Bihar, where young mothers, supported by these institutions are coming forward to run community learning centres as long as schools are closed, and undertake project based learning activities.  

“Our core belief has been that the community must demand quality education for any large scale change in the system to sustain”, shares Ravi. This core belief led to the birth of i-Saksham to work with youth, the most active agents of the society and create them into change-makers, the edu-leaders.

Kiran, a young mother, and another edu-leader from Mahgama Panchayat, affected with extremist violence, assists single teacher led schools with 5 grades in 1 classroom. 

“The way she manages her classroom by dividing children into various learning groups, and assigning them activities appropriate to their learning level would make any teacher hold his breath in awe”, shares the headmaster of the school. “She decorates her classroom so well each day based on the theme she is teaching, and uses many child-centric activity-based learning methods… which are generally seen only in training sessions!” 

“My biggest achievement has been that my community members, parents of these kids, have become hopeful of change”, say Sangeeta and Kiran. “They now believe that their children can learn. They have access to the same educational methods that rich kids would pay every month the sum equivalent to our annual income”.

The impact of i-Saksham not only transforms the educational journey of children, but also the lives of youth ie  the edu-leaders. Today, 10 of i-Saksham first batch of edu-leaders are pursuing professional courses in education from prestigious universities of the country like Tata Institute of Social Sciences, Mumbai; and Azim Premji University, Bangalore.

Ravi (director, i-Saksham) shares that the fight against inequity in education is huge and cannot be won unless more and more spaces and capabilities are created to support the mainstream public education system. Solely blaming the system won’t help. We must first become the capable community to support the system and then must also learn to hold it accountable. 

Unless we learn to do it, we can’t expect democratic institutions like schools to perform well. They too respond to the need of their clients, based on how vociferous their customers are. It is high time to revitalize the third pillar-the community, one of the critical building blocks of a good society (as Raghuram Rajan argues in his book-The Third Pillar).


Monday, August 10, 2020

Community’s critical role in education during COVID-19

 Background

Covid-19 crisis is unprecedented and has caused severe damage to health, lives, and livelihoods of billions across the world. In education, while those with resources are able to fill some gaps through the plethora of online content and learning services, children of poor are even more vulnerable. Schools are closed (and may remain closed for months), parents have fewer resources and the opportunities to learn are curtailed because of social distancing and related norms. The situation demands creative solutions to ensure children continue to learn and their life chances are not affected. 

Various models of distance learning are being attempted across the globe to deal with the present crisis. The selection of the right technology and right delivery model is important to ensure that poor people with limited access to the internet, or smartphones do not get excluded widening the prevalent educational inequity.  The involvement of parents/caregivers, elder siblings, and community youths who are closer to children becomes extremely critical to provide the last mile assistance. The delivery mechanisms must provide space for their training and capacity building to facilitate the delivery of learning. 

The article describes the experiences of one of such community based learning models, with the aid of technology, implemented by I-Saksham Education and Learning Foundation (i-Saksham) in Jamui, and Munger, two left-wing extremism affected districts of Bihar. The objective is to evoke discussions on possible models of educational response in such critical times, and partner with like-minded individuals/organizations to collectively fight the crisis.

i-Saksham Fellowship Program

i-Saksham provides quality primary education to children by building community edu-leaders (local youths, mainly females or different-abled)  through a 2-year fellowship program. These edu-leaders provide supplementary education in nearby government primary schools as a fellow volunteer to enrich the educational experiences of children and work with the community to enhance their participation and ownership.

Reaching out to parents to assess the ground situation

After the declaration of lockdown, i-Saksham conducted a telephonic survey with 500 parents to understand the prevailing situation and learning practices during the lockdown. The data, interestingly, revealed that 70% of children were engaged in some sort of learning activities at home and were being helped by parents/caregivers. Further, while all surveyed families had basic phones, 50% of children’s’ families had smartphones/ jio-phones which they were happy to share for a couple of hours for learning.



i-Saksham learning model during Covid-19

The insights helped build a strategy that guides parents/caregivers, leverage technology wherever possible but must not leave the have-nots, and make learning effective for children. 


Capacity building of edu-leaders

i-Saksham conducted a virtual training session with edu-leaders for two weeks initially to acclimatize them to the model of distance learning, and prepare them to lead the sessions with children. Following the training of edu-leaders, session plans were designed to guide them on facilitation with defined learning objectives.

Creative session plans

We have based our interventions on the following principles: 
i. The mere transmission of digital content would not serve the learning need. The sessions must be engaging for children along with learning activities.  
ii. The session should build on what children know and deliver content adapted to their context.
iii. The session design must encourage parental engagement and ensure that the child seeks support from her family.  
iv. The edu-leader should facilitate child-child interactions, parent-child interactions.

Considering the above, storytelling and poems were made key ingredients to facilitate sessions on structured themes. The Mathematics session was rebuilt around different conceptual activities in relation to the real world around the children. Basic information and precautions around COVID-19 were also made part of sessions.

Sonam, a fellowship alumna took the initiative to narrate stories to her students through the phone. After narrating stories to them, she gives writing and drawing based homework to children to express their learning.

The right use of right technology

We strongly believe that while technology has the capacity to empower, its non-availability shouldn’t be a constraint for children’s learning. Thus, we distribute digital content wherever smartphones are available, and deliver sessions daily over con-calls to children with access to only basic phones. The session includes story-telling on specific themes, various learning activities, and engaging home assignments that require parental involvement  

Praveen, an edu-leader from the second batch of fellowship convinced parents to share smartphones with children for at least 2 hours/day. He is now making them solve mathematics exercises through phone/video calls. Parents and children are enjoying it.

Engaging parent/siblings in the child’s education


The edu-leaders involved parents/caregivers to provide onsite learning support to children, facilitate handling of the phone, and assist in completing the planned learning activities/assignments. The homework is designed with a focus on engaging parents- for example, children asking parents about names of various aquatic animals, after listening to the story of an alligator.
In addition, i-Saksham seeks regular feedback of parents and their inputs on learning progress or needs of children through periodic phone calls and incorporates them into the session designs. 

Challenges, Learning and way forward 

There have been challenges of engaging groups of toddlers on phone, as well as phone connectivity in certain areas. However, the children, the parent community, and the edu-leaders are adapting fast and are finding their own ways to make the phone calls an engaging and effective learning experience.

The greatest contribution has come from the parents irrespective of their literacy levels to ensure children's participation, follow up on completion of homework assignments, and grant access to phones.

The active role being played by the community in the education of children in such critical times proves their indispensability. Learning from such experiments should strengthen the model of making the teaching-learning processes easy to do, simple to understand, and fun to participate in the community. It is only when the community participates and takes ownership in the educational outcomes of children that any large scale change becomes sustainable in the long run. 

To get associated with us or know more about the initiative, please write at contact@i-saksham.org
  



Wednesday, July 15, 2020

उत्साह अनुभवों का!

अनुभव जब आपको अलग उत्साह दे तो वो हमेशा आपकी यादों के पन्नों में चिन्हित हो जाता है। हम हमेशा ऐसे अनुभवों से सीखते हैं जो हमे और आगे ले जाते हैं और हमारे मन में कुछ नया सीखने की उमंग भर जाते हैं। ऐसा ही कुछ हमारे स्टूडेंट्स के साथ फ़ोन द्वारा हो रही कक्षा में हुआ| 




मेरा नाम स्मृति है और मैं i-Saksham में एक edu-leader हूँ। मैं और मेरे साथी edu-leaders मिल कर बच्चों को पढ़ाते हैं और उनकी सहायता करते हैं कि वे कुछ नया सीखें और आगे बढ़ें। मार्च के माह में महामारी के कारण सरकार के निर्देशानुसर पूरे देश भर में लॉक डाउन कर दिया गया। इस लॉक डाउन जैसी परिस्थिति में बच्चों को पढ़ाना नामुमकिन-सा ही लग रहा था परन्तु सभी के विचार करने के बाद एक उपाय सूझा -"फोन द्वारा बच्चों को पढ़ाने का"। जब यह तय हुआ कि बच्चों को फोन से पढ़ाया जाएगा तब हम सभी edu-leaders को इसके लिए तैयार किया गया ताकि हम बच्चों को सही से पढ़ा पाएं। जब बच्चों को फोन से पढ़ाना शुरु किया तब शुरुआती दौर में हमें बहुत-सी दिक्कतें हुई क्यूंकि ये सब हम सभी के लिए नया और कुछ अलग था। लेकिन अब हम सभी बच्चों को ठीक तरह से पढ़ा पा रहे हैं।

मैं अभीकस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की कक्षा 7 की 19 छात्राओं को फोन के माध्यम से पढ़ा रही हूँ।आज का सेशन शुरू करने के लिए जब मैंने सभी बच्चियों को कॉल किया तो मैं सभी से सफलतापूर्वक जुड़ पाई और पढ़ाना शुरू किया। इस तरह घर बैठे पढ़ने में अब बच्चियों को भी बहुत मज़ा आता है। 

मुझे याद है जब पहले दिन हमें बच्चियों को फोन से पढ़ाना था तब मैंने अपना लक्ष्य 8 बच्चियों से जुड़ने का रखा था। जब सेशन शुरू किया तब मैं सिर्फ 3 बच्चियों से ही जुड़ पाई थी। जिसमें भी काफी शोर हो रहा था। कुछ ही दिनों में बच्चों की संख्या में भी ब्रद्धी हुई और शोर होना भी बिल्कुल बंद हो गया था। उन्हें पढ़ना और भी ज्यादा अच्छा लगने लगा। एक - दो बच्चियों के जिनका नंबर हमारे पास नही था तो उन्होंने हमें ख़ुद से कॉल किया और बोलीं कि - "दीदी आप बाकी बच्चों को पढ़ाते हो, हमें क्यूं नहीं पढ़ाती हो।" उनकी बात सुन के मुझे उनका पढ़ाई के प्रति निष्ठाभाव दिखा। तीन बच्चियां ऐसी भी हैं जिनके घर के आस-पास की 4-5 अन्य बच्चियों के पास फोन नहीं है जिस कारण वे मास्क लगना  social distancing जैसी बातों को ध्यान में रखते हुए उन बच्चियों के साथ सेशन में जुड़ती हैं। फिर वे सभी के होमवर्क को एक साथ व्हाट्सएप्प ग्रुप पर भी भेजती हैं, क्योंकि उस पूरे ग्रुप में सिर्फ एक ही बच्ची के पास मोबाइल होता है और ये बच्चियां भी पूरी तरह से सहभागिता निभाती हैं ।

हमने जब बच्चियों का एक व्हाट्सएप्प पर ग्रुप बनाया था तब उनका कोई भी रिस्पॉन्स नही आता था और अब वो सभी अपने होमवर्क की फोटो हर दिन ग्रुप में भेजती हैं। हमने बच्चियों की ऐसी भागीदारी को देखते हुए उनकी क्रिएटिविटी को बढ़ावा दिया। उन्होंने घर में रह कर कई अलग- अलग चीज़ों को बनाया था जो उन्होंने हमारे साथ उन्होंने साझा किया। पर्यावरण दिवस पर अपने घरों में और घर के आस- पास पौधे लगाए, किसी ने घर पर मोबाइल से पढ़ने की बात कही, तो किसी ने घर में पढ़ाई के साथ साथ खाना बनाना, सिलाई करना भी सीखा, पुरानी वस्तुओं से नई चीजें बनाई और प्यारी कहानियां भी लिखीं। उनके इन प्रयासों को देखकर बहुत अच्छा लगता है और खुशी होती है जब बच्चियां अपनी द्वारा बनाई गई चीज़ों और नए किये गए कामों को एक उत्साह के साथ बताती हैं। जिस तरह वो हमसे जुड़ पाईं हैं, हमारा यही लगातार प्रयास रहा है कि वो बना रहे। जब कभी किसी ग्रुप में कोई शोर करता है तो बाकी बच्चियां एक दूसरे के सहयोग से उन्हें शोर करने से रोकती हैं। कभी किसी बच्ची को ग्रुप में कुछ समझ नही आता है तो दूसरी बच्चियां उन्हें समझाने की कोशिश करती हैं। हमारे तरफ से सभी बच्चों को पूरी आजादी होती है कि वो एक- दूसरे को समझाएं क्योंकि दोस्तों से बच्चे ज्यादा अच्छे से सीखते और समझते हैं। 

जब कभी कोई बच्ची कॉल पर नही आ पाती है तो सभी एक दूसरे के बारे में पूछते हैं और बाद में भी कॉल कर उनसे जान ने की कोशिश करते हैं कि वे सेशन में क्यूं उपस्थित नहीं थे। कुछ बच्चों के पेरेंट्स का सहयोग भी होता है, कभी अगर किसी के पापा कहीं चले जाते है तो मोबाइल घर पर ही छोड़ कर जाते हैं। एक दो बच्चियों के भाई के साथ थोड़ी समस्या होती है वो उन्हें चिढ़ाने के लिए फ़ोन नही देते हैं तो उनसे भी बात करनी पड़ती है। 

अभी तक हमने बच्चों के साथ गणित, अंग्रेजी, हिंदी, EVS और क्राफ्ट की कुछ गतिविधियाँ की हैं। हम बच्चों को सिर्फ किताब से ही नहीं पढ़ाते बल्कि हर टॉनिक को कहानियों द्वारा या वास्तविक उदाहरण से समझते हैं ताकि उन्हें अच्छे से समझ आए और हमेशा याद भी रहे।

इन सब में हमारी टीम की अच्छी भागीदारी रही है।प्रिया और मोनिका(फैलो मेम्बर) लगातार हर दिन साथ मिलकर सेशन लेती थीं जिसमे मैं सिर्फ सहयोग के लिए उनके साथ रहती थी। सभी बच्चे उन्हें ध्यान से सुनते और समझते हैं ।अच्छे प्रभावी सेशन प्लान बनाने में हमारे साथियों का बहुत सहयोग रहा| सभी ने अपनी ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाया और हम इतना कर पाए और आगे भी करने की कोशिश करते रहेंगे। ये ऑनलाइन क्लास का एक बिल्कुल अलग ही अनुभव रहा, जिसके बारे में हमने कभी सोचा भी नही था परन्तु हम सफलतापूर्वक कर पाए।

Friday, July 3, 2020

प्रयासों की तरंग- आँचल, बच्चे व् अभिभावक



मेरा नाम आंचल है और मैं i-Saksham में एक edu-leader हूं। संस्था में बाकी edu-leaders की तरह मैं भी बच्चों की शिक्षा पर कार्य करती हूं। इस महामारी के चलते बच्चों की शिक्षा पर बड़ा प्रभाव पड़ा। लॉक डाउन होने की वजह से गांव में सभी विद्यालय बंद हो गए जिस कारण बच्चों की शिक्षा रुक सी गई। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए हमारी टीम ने बच्चों को घर बैठे फोन से पढ़ाने का निर्णय लिया। इस निर्णय को निष्पादित करने में बच्चों के अभिभावकों का पूर्ण सहयोग रहा है, परन्तु बच्चों के अनोखे प्रयास तारीफ के काबिल हैं।

मैंने जब कक्षा-८ के बच्चों को घर बैठे फोन के माध्यम से पढ़ाना शुरू किया था तब शुरुआत में बच्चियों की संख्या थोड़ी ज्यादा थी| मुझे पहले तो संदेह हुआ कि मैं फ़ोन पर 10-11 बच्चियों को कैसे पढ़ा पाउंगी पर कुछ  दिनों तक पढ़ाते रहने के बाद यह समस्या भी सामान्य हो गई और मैं लगभग कुछ14 बच्चियों से जुड़ पाई। काफी दिनों तक यूं ही सेशन चलते रहे। परन्तु जून के माह में मैंने देखा कि सेशन में बच्चियों की संख्या कम होती जा रही है। मैं चिंतित थी कि ऐसा क्या हुआ होगा कि बच्चियां पढ़ाई के समय गायब रहती हैं या उन्हें ऐसे फोन द्वारा पढ़ने में कोई समस्या हो रही है? इसीलिए मैंने बच्चों के माता - पिता से इस विषय पर बात की तो कई तरह की समस्याएं निकल कर आईं जैसे - बच्चों के अभिभावकों ने आस-पास में काम करना शुरू कर दिया था जिस कारण घर पर फोन का ना होना, फोन में रिचार्ज ना होने की वजह से कॉल ना लगना, बच्चियों का भी अपने माता-पिता की काम में मदद करना आदि।' इन सभी समस्याओं  को ध्यान में रखते हुए मैंने बच्चियों को सुबह के समय पढ़ाने का निर्णय लिया क्योंकि तब सभी बच्चों के माता-पिता भी घर पर होते हैं और बच्चियों से बात भी हो जाएगी। इस में बच्चियों की सहभागिता अच्छी रहती है। साथ ही बच्चियों के अभिभावकों द्वारा अनोखे प्रयास मेरे दिल को छू गये हैं| 
जब मैं करिश्मा(छात्रा) को कॉल करती हूँ  तो उनके पापा या भाई कॉल उठाते हैं| मैं उन्हें नमस्ते करने के बाद बच्चियों को फोन देने कहती हूँ तो वह बड़े आदर के तौर पर वह बोलते हैं -"दीदी का कॉल आया है चलो पढ़ने आओ”| मुझे भी काफी खुशी होती है यह चीज सुनकर और बच्चों के परिश्रम को देख बड़ा आश्चर्य होता है। संगीता(छात्रा) के घर पर फोन नहीं है जिससे वो हमारे साथ सेशन में जुड़ पाए। परन्तु संगीता की पढ़ाई ना रुके इसलिए उसके पिता ने उसे उसकी नानी के घर पहुंचा दिया। अब वह वहां रहकर अपनी मौसी के फोन से मेरे साथ सेशन में जुड़ती है और पढ़ाई करती है। बच्चों के अभिभावकों का इस तरह का सहयोग हमें बच्चियों तक पहुँचने में काफी मदद कर रहा है| साथ ही मुझे इस बात की ख़ुशी है कि अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक हैं|
ज्यादातर बच्चों के पास छोटा जिओ फोन ही होता है, इसके बावजूद भी वे कोशिश करते हैं कि अपने होमवर्क का वो फोटो लेकर व्हाट्सएप ग्रुप में सभी के साथ साझा करें। जब बच्चे ग्रुप पर फोटो भेजते हैं तो वह फोटो थोड़ी धुंधली होती हैं जिस कारण मुझे कुछ ठीक से समझ नहीं आता है| पर वे निराश न हो इसलिए में उनके प्रयासों की तारीफ कर देती हूं, ताकि उनका मनोबल ना गिरे और वे ऐसे ही मन लगा के अच्छे से पढ़ाई करें।
हमें खुशी है कि लॉक डाउन के समय में भी हम बच्चों को पढ़ा पा रहे हैं, और हमारे और हमारे सभी साथियों के प्रयास भी रंग ला रहे हैं। किसी दिन कोई कारणवश अगर मैं समय पर सेशन नहीं ले पाती हूं तो मैं शाम के समय बच्चों से फ़ॉलो अप कर लेती हूं कि उन्होंने आज क्या पढ़ाई की और क्या सीखा। 

सही में बच्चों के साथ सेशन ले कर एक सकारात्मक ऊर्जा मिलती है और दिन के अंत में मैं अपने कार्य से संतुष्ट हो पाती हूँ| साथ ही इन दो महीनों में बच्चों व् अभिभावकों के प्रयासों से मैं यह समझ पायी हूँ कि जब सभी लोग आपस में मिल कर छोटे-छोटे कदम उठाते हैं, तभी बड़े प्रयास संभव हो पाते हैं|