Wednesday, October 21, 2020

प्रयास और एक बेहतर समाज का सपना - आँचल

यह कहानी एक ऐसे edu leader की है जिनके अंदर कुछ सीखने व करने का जज्बा है| जब आप को किसी को गहराई से जान्ने का मौका मिलता है और आप उनके जज़्बे की समझ बना पाते हैं तो एक अलग ही प्रेरणा मन में जग उठती है| यह कहानी एक ऐसी ही edu-लीडर हीना की है|

आई-सक्षम में हर edu-लीडर को उनके 2 साल की फ़ेलोशिप के दौरान आई-सक्षम टीम से एक बडी (दोस्त) मिलता है| यह बडी फेल्लो को हर तरह का सहयोग प्रदान करता है,जैसे- प्रशिक्षण के दौरान फेलो की समझ को जानना, फेलो के पढ़ाने के तरीके को समझना व् उपयुक्त सुधार के तरीके बताना, फेलो के शेक्षणिक विकास में सहयोग देना व् फ़ेलोशिप में हर उतार चढ़ाव के दौरान उनके साथ खड़े रहना| सभी बडी अपने फेलो के साथ हर माह 2-3 बडी टॉक करते हैं, जिसमे वे फेलो के कार्यों, अनुभव व् उनके प्रदर्शन के ऊपर बात करते हैं व् उन्हें आगे बेहतर करने के सुझाव देते हैं| मैं उन्ही बडी में से एक हूँ और आज अपनी एक फेलो हीना के साथ हुई बडी टॉक के अनुभव को साझा कर रही हूँ|


पहले पहल जब मैंने हिना दीदी से बडी टॉक कि थी तो उनके और उनके घर - परिवार व बच्चे के बारे में जानने को मिला था।मैं कभी-कभी दीदी से बीच में फॉलो -अप कर लेती थी लेकिन उनके अंदर के कारणों को नहीं समझ पाती थी या फिर नहीं जान पाती थी।लेकिन शुरुआत में एक बार दीदी ने बडी टॉक के दौरान मुझे एक समस्या के  के बारे में बताया था कि -“ जब वह अपनी कक्षा में पढ़ाती है तो उन्हें बच्चों को बुलाने उनके घर जाना पड़ता है क्योंकि बच्चे आंगनवाड़ी के हैं और बहुत छोटे हैं| वे पढने नहीं आना चाहते|


हमने पहले भी इस विषय पर बात की थी और समझ बनायीं थी कि बच्चों के अभिभावक व् उनके दोस्तों का सहयोग ले कर बच्चों को पढने बुलाया जाए| परन्तु अभिभावकों की और भी दुसरे ज़रूरी कामों में व्यस्तता के कारण बात कुछ बन नहीं पायी| आज बडी टॉक में फिर वही समस्या सामने आई| दीदी को आज भी बच्चों को पढने बुलाने के लिए उनके घर जाना पड़ता है|


दीदी गर्भ से हैं और यह उनका अपने समाज के बच्चों को शिक्षित करने का जज्बा ही है कि वे इस स्तिथि में भी बच्चों को घर जाकर बुलाती हैं और फिर उन्हें पढ़ाती हैं। भले ही उन्हें इस कार्य में थोड़ी तकलीफ होती होगी परन्तु वे कहती हैं कि बच्चों का पढना बहुत जरूरी हैं|  मैंने जब इन बातों को दीदी के मुह से सुना तो मैं दंग रह गई कि इतनी ताकत हमारे समाज की महिलाओं में कैसे देखने को मिल जाती है| वे घर का काम करती हैं,  बच्चे व परिवार को देखती है और खुद बच्चों को घर जाकर पढने के लिए बुलाती हैं और फिर उन्हें पढाती भी हैं| फिर भी वही समाज के कुछ लोग कह रहे है कि महिला कुछ नहीं करती या कर नहीं सकती है।


परन्तु धीरे धीरे समाज में कुछ लोग महिलाओं के इन प्रयासों व् जज़्बे से सीखने और समझने  का प्रयत्न कर रहे हैं| वे  इसी समाज में रह कर उनके लिए बदलाव कि छवि देखने का प्रयास कर रहे है। इसी सोच के साथ कि एक ना एक दिन बदलाव आएगा। और सभी को समान दर्जा दिया जाएगा| इसी से हमारी आने वाली पीढ़ी भी महिलाओं के सामन दर्जे की समझ बनाएगी| 


इन दीदियों  में काफी कम समय में एक अच्छे बदलाव और एक अच्छी सोच की छवि मुझे नजर आई है।इसी तरह की सोच को लेकर अगर हमारे समाज के लोग आगे बढें तो एक साकारात्मक बदलाव दूर नही|


   कोशिश कर, हल निकलेगा, 

   आज नहीं तो, कल निकलेगा। 

   कोशिशें जारी रख कुछ कर गुजरने की, 

   जो है आज थमा-थमा सा, चल निकलेगा।


 मैं दीदी के प्रयासों से उन्हें बहुत-बहुत आभार देती  हूं कि उन्होंने इन चीजों को किया और आज भी उनके  कथक प्रयास जारी है| वह समाज को बेहतर करने में एक अहम भूमिका निभा रही हैं| 


जज्बा जो छिपाए न छुपे!

हमारे कार्यों के दौरान कई बार ऐसे पल आते हैं जो हमे हमारी ज़िम्मेदारी का अहसास कराने के साथ साथ हमारे दिल के हमेशा करीब रहे जाते हैं| कई बार दूसरों के जीवन की कहानी से हम इतना प्रभावित हो उठते हैं कि हम अपने कर्तव्यों के और नज़दीक हो जाते हैं| कुछ ऐसा ही हुआ इस बार आई-सक्षम फ़ेलोशिप के लिए हो रहे महिलाओं के साक्षात्कार में| आई-सक्षम परिवार से एकता अपने अनुभव को साझा करते हुए कहती हैं: 


मैं बहुत संक्षिप्त में उन बातों को साझा करना चाहूंगी जिसने मुझे प्रभावित किया है और इंटरव्यू के लिए आई महिलाओं ने मुझे सीखने का मौका दिया है | आज हमलोगों ने जमुई में 24-25 महिलाओं का इंटरव्यू लिया | जिसमें से मेरे समूह व् मुझे 13 महिलाओं से बात करने का मौका मिला | इनमें से ज्यादातर महिलाएं शादीशुदा हैं | इंटरव्यू से पहले हमलोग आपस में यही बात कर रहे थे कि "अधिकांश महिलाएं शादीशुदा है | पता नहीं वो परिवार की जिम्मेदारियों के साथ किस तरह हमारे फ़ेलोशिप से सक्रिय रूप से जुड़ी रह पाएंगी ?" अगर मैं अपनी बात कहूँ तो मेरे मन में एक ही सवाल आ रहा था कि "क्या इनमें उतनी उर्जा होगी?"

 

पर जब मैंने इन महिलाओं से बात की तो मैं दंग रह गयी | इनमें से अधिकांशतः महिलाओं की शादी को 8 से 10 साल हो गए थे पर आज भी उनके अन्दर उनके सपनो को लेकर वही जज्बा है जो उनमे शादी से पहले रहा होगा| आज भी उनके मन में खुद के लिए कुछ करने का उतना ही जूनून है जितना शायद उन सपनो को देखने की शुरुआत में रहा होगा|

एक बात जो 5 महिलाओं ने कही वह यह है कि "हमें यहाँ आ कर बहुत अच्छा लग रहा है | हमसे लोग अक्सर हमारे परिवार के बारे में पूछते हैं | बहुत कम ऐसा होता है कि हमें खुद के बारे में बात करने का मौका मिलता है | आपलोग आज इतना धैर्य से मेरे बारे में सुन रहे हैं; हमको बताकर अच्छा लग रहा है | हम तो अपने जीवन में कुछ करना चाहते थे पर कभी इस तरह का मौका नहीं मिला |" जब उनसे यह पूछा गया कि "क्या आप सप्ताह में एक दिन अपने गाँव से ट्रेनिंग के लिए यहाँ जमुई ऑफिस आ पाएंगी? एक महिला ने बहुत प्यार से जवाब दिया, "क्यों नहीं! कम से कम एक दिन तो अपने मन से आने जाने का मौका मिलेगा | फिर यहाँ नए दोस्त भी तो बनेंगे ”| 

इंटरव्यू के दौरान महिलाओं के द्वारा समाज के अनेकों परिवेश को जान्ने का मौका मिला| जहाँ कुछ महिलाओं ने अपने घर से बाहर काम न कर पाने का कारण अपने ससुराल की जिम्मेदारियां बताई तो वहीँ एक महिला ने बताया कि उनकी सास उनके साथ यहाँ इंटरव्यू दिलवाने के लिए आई हैं | वे चाहती हैं कि उनकी बहु आगे बढ़े | 


एक महिला से जब यह पूछा कि “आपके अनुसार आपके गाँव में शिक्षा की स्थिति कैसी है” तो इसका जवाब देते-देते वे भावुक हो गई | उन्होंने बताया कि उनके गाँव में स्कूल नहीं था | किसी तरह से गाँव वालों ने छोटे से जगह में सरकार को अर्जी देकर स्कूल बनवाया था पर फिर भी शिक्षा की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है | उनको इस बात की चिंता है कि अगर उनके बच्चे नहीं पढेंगे तो क्या होगा | पूरा गाँव पिछड़ा ही रह जायेगा साथ-साथ उनका बेटा भी | 


इन महिलाओं से बात करने के बाद मेरा सवाल, सवाल नहीं रहा | मुझे लगता है सपना देखने और उसके पीछे भागने की कोई उम्र नहीं होती| फर्क बस इतना है किसी को सहयोग मिलता है और कोई इसके आभाव में पीछे रह जाता है| परंतु इन महिलाओं में अपने सपनो को जीने का जज्बा आज भी है और उनकी निरंतर कोशिश आज भी ज़ारी है| 


आई-सक्षम टीम के सदस्यों का ऐसा अनुभव हमे समक्ष इस बात को उजागर करता है की हमारे समाज में महिलाओं में अनेकों हुनर छिपे हुए हैं| वे परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ अपने देश व् समाज की बेहतरी की ज़िम्मेदारी भी बखूबी निभा सकती हैं| पिछले 5 साल के सफ़र में लगभग 150 ऐसी ही महिलाओं ने आई-सक्षम फ़ेलोशिप से जुड़ कर अपने समाज की शिक्षा की बेहतरी के लिए कार्य किया है और आज भी शिक्षा से जुडी हुई हैं| यह महिलाएं हमारे लिए एक प्रेरणा हैं और इनका जज़्बा हमारी ताकत|