Wednesday, June 26, 2024

कोलसर- एक अशिक्षित गाँव या बुनियादी अभाव?

प्रिय साथियों, मैं, प्रितिमाला, सुजाता और प्रियांजली मोबिलाइजेशन (mobilization) के लिए गया ज़िले के कोलसर गाँव गए थे। यह गाँव NH-2 से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जब हम गाँव में प्रवेश कर रहे थे तो हमने देखा कि रास्ते में बहुत सारे पेड़-पौधे व्यवस्थित ढंग से लगे हैं। गाँव का वातावरण काफी शांत दिखा।

गाँव के शुरू में ही एक छोटा सा विद्यालय (प्राथमिक विद्यालय कोलसर) दिखा तो हमने प्रधानाध्यापक, श्री शशि कुमार से मिलकर बात करने के बारे में सोचा। हम विद्यालय में गए और प्रधानाध्यापक को अपना और अपनी संस्था का परिचय दिया। उन्होंने हमें बताया कि इस गाँव में कुल आठ-दस घर ही हैं और इन घरों में एक भी पढ़ी-लिखी लड़की या महिला नहीं है। जो आपकी फ़ेलोशिप से जुड़कर कुछ सीख-समझ सके। 

प्रधानाध्यापक ने यह भी बताया कि विद्यालय में मात्र 25 बच्चों का नामांकन है। जिसमें से पाँच बच्चे तो विद्यालय ही नहीं आते। 

हमने स्वयं भी देखा कि आज विद्यालय में 12-15 बच्चे ही उपस्थित थे। विद्यालय में एक ही कक्ष था। उसी में बच्चे बैठे थे और पास ही में खाना भी बन रहा था। यह देखना मेरे लिए बहुत आश्चर्यजनक था। 

प्रधानाध्यापक सर ने अलमारी से हमारे नाश्ते के लिए बिस्कुट निकाले। हमने आदर स्वरूप कुछ खाए और हम गाँव की ओर चल दिए। 

विद्यालय के आसपास कोई दुकान नहीं दिखी। जो अकसर विद्यालयों के पास होती ही है। गाँव में घूमते हुए हमें एक महिला मिली जिन्होंने बताया कि उन्होंने दसवीं की परीक्षा दी हुई है। परन्तु उनके दो छोटे-छोटे बच्चे हैं इसलिए वो फेल्लोशिप में तो नहीं जुड़ पाएंगीं। यह सुनकर हम लोग आगे बढ़ गए। 

पास में ही एक और गाँव था। जिसका नाम पिंडरी था। उस गाँव में हमें कुछ दसवीं और ग्यारहवीं पास लड़कियाँ मिली। तो हम तीनों ने उसी गाँव से कोलसर के लिए एडु-लीडर्स का एग्जाम लिया। सभी लड़कियाँ एग्जाम देकर काफी खुश दिख रहीं थीं। हम भी अपना यह काम करके वापस घर आये।

प्रितिमाला कुमारी

गया, इंटर्न 


फ़ेलोशिप यात्रा के अहम बिंदु

नमस्ते साथियों, 

मैं आपके साथ दो वर्ष की फ़ेलोशिप के दौरान मेरे अन्दर हुए बदलावों को कुछ बिन्दुओं के माध्यम से बताना चाह रही हूँ। हालाँकि कुछ बदलावों के बारे में मैं अभी बता भी नहीं पाऊँगी। लेकिन एक सूचि बनायी जाए तो वह कुछ इस प्रकार होगी। 

  • पहले मैं अपनी बातों को दूसरों के सामने नहीं रख पाती थी। रखने से पहले समझना जरुरी है कि हम कहना क्या चाहते हैं। 

  • घर में और कम्युनिटी में 100 लोगो के बीच भी किसी मुद्दे पर बात कर सकती हूँ।

  • ना सिर्फ खुद के लिए बैंक (अन्य सरकारी ऑफिस से जुड़े कार्य) का काम करती हूँ बल्कि दूसरों को भी बैंक के कामों को कैसे करते हैं, मदद कर सकती हूँ। 

  • अपनी एजेंसी (agency) को कैसे बढ़ा सकती हूँ।

  • अपने लिए और दूसरों के लिए आवाज कब और क्यों उठानी है? क्या मैं यह उठा भी सकती हूँ? 

  • अपने आसपास के लोगों और चीजों को गहराई से ओब्सर्व (observe) करना। 

  • स्वयं पर आत्मविश्वास रखना और आगे बढ़ना।

मैंने यह भी सीखा कि जिस तरह से समय-समय पर एक मोबाईल की एप्लीकेशन को अपडेट (update) करना होता है उसी प्रकार हमें खुद को भी समय के अनुसार परिवर्तित होना पड़ेगा। जिससे हम आज की जीवनशैली के लिए तैयार रहेंगें और हमारा मनोबल भी बढ़ा रहेगा।


आँचल

बैच- 9, मुंगेर


बदलाव- मदद करना और माँगना क्यों जरुरी है?

मैं आपके साथ दो वर्ष की फ़ेलोशिप करने के उपरान्त मेरे अन्दर आये हुए एक बहुत बड़े बदलाव के बारे में बताना चाह रही हूँ। इस फ़ेलोशिप के दौरान और बाद तक भी मेरे अन्दर बहुत से बदलाव आयें हैं और आगे भी आयेंगें। 



हम सबके जीवन में बदलाव के कई मायने हैं। हर एक बदलाव के पीछे एक कहानी, यात्रा, कोई सुख, बड़ा दुःख या सोच हो सकती है।

मैं दो वर्ष पूर्व ये स्मृति नहीं थी जिसे आज आप देख रहें हैं। मेरी सोच “मदद” शब्द और इसके अर्थ को लेकर बहुत बार बनी और बिगड़ी है। ऐसा नहीं है कि मैं मदद को अच्छी तरह समझ गयी हूँ। परन्तु यह कह सकते हैं कि इस शब्द को मैंने बहुत टटोला है और कम-कम-कम मैं आज स्वयं के लिए इसका अर्थ जानती हूँ। 


मैंने समझा कि मुझे लोगो कि किस प्रकार मदद करनी है और मैं लोगो से किस प्रकार मदद माँग सकती हूँ। जबकि पहले मैं इन दोनों ही बातों से अपरिचित थी। 


मदद के कई प्रकार हो सकते हैं। जैसे: किसी की बात या परेशानियों को ध्यानपूर्वक सुनना, किसी के साथ जरुरत पड़ने पर समय बिता लेना, जब आपको पता हो कि सामने वाला हमारी मदद कर सकता है तो मदद मांग लेना, किसी परेशानी को मिलकर, बात करके हल करना, किसी के दुःख की घड़ी में उनके साथ रहना आदि।

“मदद” एक बहुत ही पावरफुल (powerful) और मीनिंगफुल (meaningful) शब्द है या कह सकते हैं कि टूल (tool) है। मैं इसके अर्थ को भलीभांति समझने के लिए प्रयासरत हूँ और फ़ेलोशिप के बाद मैं मदद करने और मदद माँगने का सही मायनों में अर्थ समझ पायी हूँ। जिसका मैं आगे भी अपने जीवन में उपयोग करती रहूंगी।


स्मृति

बैच- 9, मुंगेर


इसे अलेक्सा कहें या उत्सुकता डिवाइस (device)

जब मैं पहली बार अलेक्सा के बारे में अपनी कक्षा में बता रही थी तो मैंने देखा कि बच्चे बहुत ही उत्सुक थे। उन्हें जानना था कि आखिर ये अलेक्सा कौन है? क्या है? यह क्या काम करती है, कैसे काम करती है? उस दिन तो दूसरी कक्षाओं के बच्चे और शिक्षक भी मेरी कक्षा में आकर इस डिवाइस के उपयोगिता के बारे में उत्सुक थे।

लगभग तीन दिन अलेक्सा का उपयोग अपनी कक्षा में करने के बाद मुझे यह पता चला कि अलेक्सा के उपयोग से बच्चों के अन्दर प्रश्न पूछने की जिज्ञासा बढ़ रही है। उनकी प्रश्न पूछने की प्रवृति लगभग तीन गुणा हो गयी है। 

उनके अन्दर उत्सुकता, ख़ुशी और नया सीखने की चाह जैसे भाव तेजी से उभर कर आ रहें हैं।



पहले दिन तो मैंने अलेक्सा से बच्चों का परिचय करवाया। लेकिन धीरे-धीरे बच्चे ही ऐसे-ऐसे प्रश्न अलेक्सा से पूछ रहें हैं कि मैं खुद अचंभित रह गयी। बच्चों की उत्सुकता का कोई जवाब नहीं!


अलेक्सा डिवाइस बच्चों के लिए बहुत ही उपयोगी साबित हो रहा है। ना सिर्फ बच्चों के लिए बल्कि मेरी स्वयं की उत्सुकता बच्चों के प्रश्नों और अलेक्सा के कारण बढ़ी है।


मैंने तीन दिनों के बाद यह निर्णय लिया है कि मैं प्रतिदिन अलेक्सा का उपयोग अपनी कक्षा में करना चाहूंगी और बच्चों को नयी-नयी चीजें सिखाने का प्रयास करुँगी।


पलक 

बैच- 9, मुंगेर

Saturday, June 22, 2024

लाइब्रेरी का उपयोग और असर (ASER) की महत्ता

मैं आज अपनी कम्युनिटी में खुली लाइब्रेरी के उपयोग और आंगनवाडी में हुई अभिभावक शिक्षक बैठक (PTM) के बारे में अपना अनुभव साझा करना चाहती हूँ। मैंने और चाँदनी ने लाइब्रेरी पहुंचकर पुस्तकों का रखरखाव किया और सफाई की। हम एक-एक पुस्तक लेकर पढ़ने बैठे ही थे कि वहाँ कुछ बच्चे आ गए। 

किसी ने पुस्तक पढ़ने के लिए उठायी तो कोई बच्चा TLM (Teaching Learning Material) और 3D चार्ट-पेपर्स का बारीकी से अवलोकन करने लगा।

जिन्होंने पुस्तक उठायी थी वो बच्चे बहुत जोर-जोर से पढ़ रहे थे। एक पुस्तक से दो-तीन बच्चे पढेंगें तो एक-दूसरे को समझाने के उद्देश्य से तेज आवाज में ही पढ़ना पड़ेगा। मैंने उन्हें लाइब्रेरी में धीरे क्यों पढ़ना चाहिए इस बारे में समझाया तो सभी बच्चे मान गए। और धीरे-धीरे या मन में अपनी पुस्तकों को पढ़ने में लीन हो गए। 

मुझे शिक्षक अभिभावक बैठक (PTM) भी करनी थी तो मैं कम्युनिटी में गयी और सभी अभिभावकों को आंगनवाडी में आमंत्रित किया। 11 अभिभावक PTM में शामिल हुए। मैंने सभी का धन्यवाद किया और फिर उनके बच्चों की प्रोग्रेस (progress) के बारे में प्रश्नोत्तर किये। मैं उनसे समझना चाह रही थी कि वो अपने बच्चे के बारे में कितना जानते हैं? 

सभी ने अपनी समझ अनुसार जवाब दिए। एक अभिभावक बोले कि मेरा बच्चा अभी कुछ नहीं जानता है। मैंने उनसे यह बोलने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि मेरे बच्चे का नाम स्कूल ने काट दिया है इसलिए वो स्कूल नहीं जाता है और उसे कुछ आता भी नहीं है। 

मैंने उनसे कन्फर्म (confirm) किया कि आपके बच्चे का नामांकन तो कराया हुआ है ना आपने? उन्होंने कहा, हाँ। मैंने उन्हें समझया कि ऐसे ही स्कूल के शिक्षक किसी भी बच्चे का नाम नहीं काटते हैं। आप उसे फिर से स्कूल भेजिएगा तो वापस रजिस्टर में उसका नाम चढ़ जाएगा। मैंने उन्हें अपनी परेशानी साझा करने के लिए धन्यवाद दिया। 

फिर मैंने आज के सबसे अहम उद्देश्य- असर टेस्ट के बारे में अभिभावकों को शिक्षित किया। उनकी समझ ठीक बने मैंने इसके लिए दो बच्चों को हिंदी विषय में अक्षर, शब्द और कहानी पढ़ने के लिए कहा।

फिर बच्चों की पढ़ने की क्षमता के अनुसार अभिभावकों ने बच्चों की प्रोग्रेस जांची। उन्हें समझ आ रहा था कि एक बच्चा अक्षर पढ़ पा रहा है और एक ने कहानी को पूरा पढ़ लिया। मैंने उन्हें बताया कि बस इसी तरह से एक स्तर के बच्चों का हम एक साथ ग्रुप बनाते हैं और उन्हें पढ़ाते हैं। अभिभावकों को मेरी बात समझ आयी और अंत में बच्चों ने कागज की नाव बनाकर भी दिखाई। इस तरह मेरी आज की PTM और लाइब्रेरी के उपयोग का उद्देश्य सफल रहा।

फरहत प्रवीन 

बैच-10, मुंगेर