Monday, February 2, 2026

विफलता या सीख

 “अगर आप इसे पढ़ने नहीं देंगे, तो इसे कौन पढ़ाएगा?”

यह सवाल मैंने एक ऐसे पिता से पूछा, जो अपनी सौतेली बेटी को घर के कामों में लगाए रखते थे, जबकि उनके अपने बच्चे स्कूल जाते थे। मेरा नाम खुशबू खातून है और मैं i-Saksham की एडू-लीडर हूँ।

मैंने 13 नवंबर से दिसंबर के अंत तक यह लक्ष्य तय किया था कि मैं हर सप्ताह कम से कम 2 अभिभावकों से मिलकर, उन्हें समझाकर 6 किशोरियों को नियमित रूप से स्कूल भेजना सुनिश्चित करूँगी।

समस्या यह थी कि मेरे समुदाय में, विशेष रूप से सौतेली बेटी के साथ, शिक्षा को लेकर स्पष्ट भेदभाव था।

शुरुआत में, मैं एक ऐसे अभिभावक के घर गई। सच कहूँ तो पहले दिन मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि सीधे भेदभाव पर बात कर सकूँ। मैंने बस कहा, "अंकल, मुझे आपसे बात करनी है।" और लगभग दो मिनट तक उनका चेहरा देखती रही और बिना कुछ कहे वहाँ से भाग आई।


यह मेरी पहली विफलता थी। लेकिन अगले दिन मैंने खुद को संभाला। 
मैंने अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा किया और फिर से उनके पास गई।

इस बार मैंने साफ़ शब्दों में कहा: “ये दोनों आपकी ही बेटियाँ हैं और आप उनके पिता हैं। अगर आप इसे पढ़ने नहीं देंगे, तो इसे कौन पढ़ाएगा? क्या आप चाहते हैं कि आपकी एक बेटी पीछे रह जाए और बाकी आगे बढ़ें?”

उन्होंने मेरी बात बहुत ध्यान से सुनी। अगले ही पल उन्होंने कहा, “ठीक है बेटा, हम आज ही इसका दाखिला करवा देंगे।” उस दिन उन्होंने अपनी सभी बच्चों को स्कूल ड्रेस दिलवाई, और आज उनकी सभी बेटियाँ और बेटे नियमित रूप से स्कूल जाते हैं।

यह मेरा पहला लक्ष्य पूरा होने का प्रमाण था।

मेरा दूसरा एक्शन एक और लड़की के लिए था, जिसकी शादी तय हो चुकी थी। मैंने उस लड़की से बात की और उसे समझाया कि अगर वह अभी शादी कर लेगी, तो उसका सपना अधूरा रह जाएगा। उसने मेरी बात सुनी, अपने पिता के पास गई और खुद के जमा किए हुए पैसों से स्कूल में दाखिला करवा लिया। उसके पिता ने बेटी की हिम्मत देखकर शादी रोक दी।

आज मुझे गर्व है कि मैंने अपने क्लस्टर गोल को लगभग 90% तक पूरा किया। मैंने सीखा कि अगर हम डर के बावजूद सही बात कहने की हिम्मत करें, तो बदलाव ज़रूर आता है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: खुशबू खातून

  • परिचय: खुशबू गाँव सिमरा, ब्लॉक बांद्रा, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 में i-Saksham के बैच 12 की एडू-लीडर हैं।

  • लक्ष्य: खुशबू का लक्ष्य है कि वह अपने कार्यों से दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाती रहें।

Friday, January 23, 2026

आइसक्रीम और सजावट: माँ का दुगना संघर्ष

 “मेरी बेटी और बेटे के जो सपने हैं, उन्हें पूरा करने के लिए मैं पूरी कोशिश करूँगी।”

यह संकल्प गुड़िया दीदी की मम्मी का है। मेरा नाम राखी कुमारी है और मैं गुड़िया दीदी (जो बैच 12 की एडू-लीडर हैं) की कहानी बता रही हूँ। उनके पापा के न रहने के कारण, घर की सारी ज़िम्मेदारी उनकी माँ के कंधों पर आ गई थी, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। 

उनके परिवार में लड़के और लड़की, दोनों को पढ़ाई का बराबर अधिकार दिया जाता है। एक समय ऐसा भी आया जब आर्थिक कारणों से गुड़िया के भाई की पढ़ाई 1–2 साल के लिए रुक गई थी। लेकिन माँ ने गुड़िया के साथ मिलकर ज़ोर दिया और भाई को दोबारा पढ़ाई के लिए प्रेरित किया।

गुड़िया घर के काम, पढ़ाई, होम विज़िट और इवेंट—सब कुछ संभालती है। इसकी सबसे बड़ी वजह है उनकी माँ का पूरा सहयोग।

एक बार गुड़िया बीमार थी, और एक ज़रूरी इवेंट होना था। उस समय माँ ने खुद ज़िम्मेदारी ली। उन्होंने किशोरियों के माता-पिता को बुलाया, उनसे बात की और खुद आगे आकर कार्यक्रम को आगे बढ़ाया, ताकि गुड़िया का काम रुके नहीं।

माँ ने घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए भी असाधारण काम किए। उन्होंने कर्ज़ लेकर शादी के डेकोरेशन का छोटा-सा काम शुरू किया, जिससे गुड़िया का भाई आज उसे एक बिज़नेस के रूप में चला रहा है। इसके अलावा, वह सतघरवा स्कूल में रसोइया (खाना बनाने का काम) भी करती हैं और आइसक्रीम बेचने का छोटा व्यवसाय भी संभालती हैं।

उनकी माँ न सिर्फ़ गुड़िया की सुरक्षा को लेकर जागरूक हैं (अक्सर होम विज़िट के दौरान साथ जाती हैं), बल्कि वह दूसरे अभिभावकों से भी खुलकर बात करती हैं और उन्हें आसान भाषा में समझाती हैं कि यह काम किशोरियों के लिए क्यों ज़रूरी है।

गुड़िया दीदी की मम्मी सिर्फ़ एक माँ नहीं हैं; वह एक एक्टिव, मेहनती और प्रेरणादायक महिला हैं, जिन्होंने अपने बच्चों के सपनों के लिए हर मुश्किल का सामना किया है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: राखी कुमारी

  • परिचय: राखी कुमारी गाँव बंगलवा (कठोर), ब्लॉक धरहरा, मुंगेर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2021 में i-Saksham के बैच-7 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।

  • लक्ष्य: राखी का लक्ष्य सोशल सेक्टर में काम करना है।

Monday, January 19, 2026

दुपट्टा न हो तो कुछ अधूरा है।

“दुपट्टा न हो तो कुछ अधूरा है।” 

यह बात कोमल ने हल्की मुस्कान के साथ तब कही, जब हमारे सत्र में शरीर में होने वाले बदलावों और पहचान पर बात हो रही थी। मेरा नाम मोनिका है और मैं जमुई से 'बडी' के रूप में जुड़ी हूँ।

कोमल ने कहा था: “मुझे सब ठीक लगता है… जब मैं दुपट्टा ओढ़कर चलती हूँ, तब मुझे बहुत अच्छा लगता है।”

मैंने पूछा कि क्या वह हमेशा से दुपट्टा पहनती थी।

कोमल ने धीरे से कहा: "नहीं। पहले नहीं पहनती थी। जब शरीर में बदलाव आने लगे, तब घर में बार-बार टोका जाने लगा—‘दुपट्टा ठीक से लो।’ शुरू में यह बोझ जैसा लगता था, लेकिन धीरे-धीरे आदत बन गई।"

उसने आगे जोड़ा: "अब ऐसा लगता है कि दुपट्टा न हो तो कुछ अधूरा है। मैं इसमें ही ठीक हूँ।"

उस पल मुझे एहसास हुआ कि यह कहानी सिर्फ कोमल की नहीं, बल्कि समाज के गहरे अनुकूलन की है।

यह मेरे अवलोकन का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु था। मैंने समझा कि समाज छोटी-छोटी हिदायतों के माध्यम से एक विचार को बार-बार दोहराता है, और यह विचार अंततः हमारे मस्तिष्क में बैठ जाता है। यही कारण है कि मजबूरी कब आदत और आदत कब हमारी अपनी 'पसंद' बन जाती है, हमें पता ही नहीं चलता।

कोमल की सहजता दिखाती है कि दुपट्टा अब सिर्फ कपड़ा नहीं रहा, वह 'अच्छी लड़की' होने की शर्त बन गया है।

यह अवलोकन मुझे सिखाता है कि एक लीडर के रूप में हमारा काम सिर्फ़ लड़कियों को बोलना सिखाना नहीं है, बल्कि उन्हें यह जानने में मदद करना है कि जो वे महसूस करती हैं, वह वास्तव में उनकी अपनी 'पसंद' है या समाज का थोपा हुआ नियम। बदलाव वहीं से शुरू होगा, जहाँ वे इन सूक्ष्म रूढ़ियों को पहचानेंगी।


लेखिका परिचय:

  • नाम: मोनिका कुमारी

  • परिचय: मोनिका खैरमा, जमुई की रहने वाली हैं और वर्ष 2022 से ‘आई सक्षम’ संस्था से एक 'बडी' के रूप में जुड़ी हुई हैं। 

  • लक्ष्य: मेरा सपना है कि मैं आगे भी सोशल सेक्टर से जुड़कर, बच्चों की शिक्षा और महिलाओं के सशक्तिकरण में अपना योगदान देती रहूँ।

Friday, January 16, 2026

इतने साल बाद पढ़कर क्या करोगी?

“इतने साल बाद पढ़कर क्या करोगी?”

यह सवाल मुझसे एक महिला शिक्षक ने तब पूछा, जब मैं नेहा का एडमिशन करवाने जमालपुर के एन. सी. घोष स्कूल गई थी। नेहा की शादी को 10 साल हो चुके, वह तीन बेटियों की माँ है, और 9 साल बाद उसने दोबारा पढ़ाई शुरू करने का फैसला किया था।

शुरुआत में, हर दरवाज़े पर रुकावट थी। शिक्षक ठीक से बात करने को तैयार नहीं थे। कभी कहा गया—कल आइए, पहले वाली क्लास टीचर से मिलिए। उस महिला शिक्षक की बात—"इतने साल बाद पढ़कर क्या करोगी?"—सबसे ज़्यादा चुभ गई।

नेहा ने एक पल के लिए हिम्मत हार दी और कहा—“छोड़ दीजिए, अब नहीं होगा।”

लेकिन फिर मैंने और नेहा ने तय किया कि इतनी दूर आकर अब पीछे नहीं हटेंगे।

यह हमारा संयुक्त नेतृत्व था। हमने चुप रहकर बहस करने के बजाय, समस्या को हल करने पर ध्यान केंद्रित किया।

हमने स्कूल के सर से सारी स्थिति खुलकर बताई और मदद माँगी। सर ने मदद की। वकील से संपर्क हुआ। 2018 का रजिस्टर, कोर्ट के कागज़, वकील की फीस—खर्च बढ़ रहा था और हिम्मत टूट रही थी, लेकिन हमने ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स तैयार किए।

आखिरकार, नेहा का एडमिशन हो गया। जब मैम ने कहा “कल से कॉपी-किताब लेकर स्कूल आना,” 

वह सिर्फ़ एक वाक्य नहीं था, वह 9 साल के बाद छँटता अंधेरा था।

नेहा की आँखों में खुशी थी। नेहा ने यह साबित किया कि शिक्षा की कोई उम्र नहीं होती। एक माँ, 3 बच्चों की ज़िम्मेदारी के बाद, 9 साल बाद फिर से स्कूल जा सकती है, तो बदलाव संभव है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: खुशी कुमारी

  • परिचय: खुशी, रामनगर, भागीचक गाँव की रहने वाली हैं। 

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2024 में i-Saksham के बैच-11 की एडू-लीडर हैं।

Monday, December 22, 2025

आपकी बेटी भी यही सहेगी, तो कैसा लगेगा?

“अगर आज जो आप सह रहे हैं, वही कल आपकी बेटी भी सहे, तो आपको कैसा लगेगा?”

यह वह निर्णायक सवाल था जो मैंने कौशल्या की माँ से पूछा। मेरा नाम पूजा है, और मैं अपनी साथी एडू-लीडर के साथ धरहरा प्रखंड के अमारी गाँव में किशोरी कौशल्या के घर गई थी।

कौशल्या की पढ़ाई गरीबी और घर की पाबंदियों के कारण रोक दी गई थी। जब मैं उसकी माँ से मिली, तो उन्होंने साफ़ कह दिया, "जितना पढ़ना था, पढ़ ली, अब नहीं पढ़ेगी।"

बातों-बातों में पता चला कि कौशल्या का 11वीं में नामांकन नहीं हो पाया था। उसकी माँ तो उसे पढ़ाना चाहती थीं, लेकिन कौशल्या के पापा और भाई कहते थे, "ज़्यादा पढ़कर क्या करेगी?"

कौशल्या की माँ ने अपना दुख साझा किया—कि उन्हें भी बचपन में पढ़ने नहीं दिया गया था, और उनके बेटे की हालत (शराब पीकर घूमना) भी ठीक नहीं थी। उनकी बातों में एक अधूरी चाह और दबा हुआ सपना साफ़ झलक रहा था।

मैंने खुद को संभाला और उनसे वह निर्णायक सवाल पूछा: “चाची, अगर आज जो आप सह रही हैं, वही कल आपकी बेटी भी सहे, तो आपको कैसा लगेगा?”

उनकी आँखें नम हो गईं और उन्होंने धीरे से कहा, "बेटा, कोई माँ नहीं चाहती कि उसकी बेटी दुख सहे।"

बस, यही वह क्षण था। मैंने अपनी पूरी कोशिश लगा दी उन्हें यह समझाने में कि बेटी की पढ़ाई उसके आत्मविश्वास और भविष्य की कुंजी है। 

काफी समझाने के बाद, कौशल्या की माँ राज़ी हो गईं। उन्होंने अपनी बेटी को किशोरी सेशन में जाने और उसकी पढ़ाई दोबारा शुरू करने की अनुमति दे दी। यह सुनकर कौशल्या बहुत खुश हुई।


आज कौशल्या न केवल 11वीं कक्षा में नामांकित है, बल्कि वह हर हफ्ते किशोरी सेशन में भी भाग लेती है, जहाँ वह आत्मविश्वास से अपनी बात रखती है और सवाल पूछती है।

मुझे उस दिन एहसास हुआ कि जब हम किसी को उसकी खुशी पाने में मदद करते हैं, तो हम सिर्फ़ एक जीवन नहीं बदलते, बल्कि उस माँ के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं, जो अपनी बेटी की खातिर समाज से लड़ने को तैयार हो जाती है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: पूजा कुमारी

  • परिचय: पूजा जगदीशपुर (जमालपुर), मुंगेर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2023 में i-Saksham के बैच-10 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।

  • लक्ष्य: पूजा का लक्ष्य एक शिक्षिका बनना है।