"पढ़ना चाहती हूँ।"
यह इच्छा थी निशा की, जो समूह में एकदम कोने में बैठी थी।
मेरा नाम चंदा है।
हर महीने मैं अपने किशोरी समूह की माँओं को भी एक साथ बुलाती हूँ। यह कोई औपचारिक बैठक नहीं होती — बस एक जगह जहाँ माँएँ अपनी बेटियों के बारे में खुलकर बात कर सकें, जहाँ कोई जल्दी नहीं होती, कोई दबाव नहीं होता। इसी बैठक में मुझे पहली बार निशा की माँ से उनकी बेटी के बारे में पता चला था ।
जब मैं पहली बार निशा से मिली, तो वो किशोरी समूह की बैठक में एकदम कोने में छुपी हुई थी। बाकी लड़कियाँ बोल रही थीं, हँस रही थीं — निशा बस देख रही थी। जब मैंने उससे पूछा कि उसे क्या पसंद है, क्या करना चाहती है आगे — तो उसने धीरे से - फुसफुसाते हुए अपनी पढ़ने की इच्छा बताई।
जैसे यह इच्छा उसकी अपनी नहीं थी। जैसे इसे ज़ोर से कहने का हक उसे नहीं था।
उसने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। तीन साल पहले। घर के काम थे, परिवार की ज़िम्मेदारियाँ थीं, और गाँव का वो माहौल था जिसमें लड़की का स्कूल छूटना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती। तीन साल में वो इतनी चुप हो गई थी कि खुद को भी भूलने लगी थी कि कभी पढ़ना चाहती थी।
मैंने तय किया कि मैं उसके साथ बैठती रहूँगी। हर बैठक में। चाहे वो बोले या न बोले।
धीरे-धीरे मैंने उससे उसके सपनों के बारे में बात करना शुरू किया — न एक बार, न दो बार, बल्कि हर बार जब भी हम मिलते। मैंने उससे पूछा कि अगर कोई रोक न हो, तो वो क्या करना चाहेगी। उसने पहले कुछ नहीं कहा। फिर धीरे-धीरे बोलने लगी। मैंने सुना — बस सुना, बीच में कुछ नहीं कहा।
एक दिन मैंने उसे एक काम दिया। कागज़ पर लिखो — इस महीने तुम क्या करना चाहती हो। छोटा-सा, जो सच में हो सके। निशा ने काफी देर सोचा। फिर लिखा — "घर में माँ से बात करूँगी पढ़ाई के बारे में।"
उस लाइन में तीन साल की चुप्पी टूट रही थी।
अगली बैठक में मैंने उससे पूछा — "हुआ?" उसने हाँ कहा। और पहली बार उसके चेहरे पर एक अलग भाव था।उसी महीने Mothers Meeting में निशा की माँ आईं। मैंने उन्हें कुछ नहीं बताया। बस उनसे पूछा — "निशा कैसी है? आजकल घर में क्या कर रही है?" उन्होंने बताया कि घर के काम और गाँव का माहौल, इसीलिए पढ़ाई छुड़वाई। बातचीत लंबी चली। उन्होंने सुना। और धीरे-धीरे उनकी सोच में कुछ हिला।
उन्होंने कहा — अगर नामांकन हो जाए तो वो उसे भेजने के लिए तैयार हैं।
किशोरी समूह की बैठकों में मैं लगातार निशा के पास बैठती रही। उसे बोलने की जगह देती रही। एक दिन मैंने उससे कहा — "इस बार का लक्ष्य क्या है?" उसने सोचा और कहा — "घर में खुलकर अपनी बात रखूँगी। और दोबारा स्कूल जाऊँगी।"
उसके बाद निशा ने हर दिन अपनी माँ से एक ही बात कही — "मेरा फिर से स्कूल में दाखिला करवा दीजिए।" एक दिन नहीं, दो दिन नहीं — हर दिन। और उसकी माँ ने एक दिन हाँ कर दी।
अप्रैल में निशा का नौवीं कक्षा में नामांकन हो गया।
जिस दिन वो पहली बार स्कूल गई, मैंने उसे देखा। वही निशा थी — लेकिन वो कोने वाली लड़की नहीं थी अब।
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लेखिका परिचय
नाम: लव्ली सिंह
परिचय: मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं। i-Saksham में Buddy के रूप में कार्यरत हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2022
लक्ष्य: शिक्षिका बनना।