Monday, January 19, 2026

दुपट्टा न हो तो कुछ अधूरा है।

“दुपट्टा न हो तो कुछ अधूरा है।” 

यह बात कोमल ने हल्की मुस्कान के साथ तब कही, जब हमारे सत्र में शरीर में होने वाले बदलावों और पहचान पर बात हो रही थी। मेरा नाम मोनिका है और मैं जमुई से 'बडी' के रूप में जुड़ी हूँ।

कोमल ने कहा था: “मुझे सब ठीक लगता है… जब मैं दुपट्टा ओढ़कर चलती हूँ, तब मुझे बहुत अच्छा लगता है।”

मैंने पूछा कि क्या वह हमेशा से दुपट्टा पहनती थी।

कोमल ने धीरे से कहा: "नहीं। पहले नहीं पहनती थी। जब शरीर में बदलाव आने लगे, तब घर में बार-बार टोका जाने लगा—‘दुपट्टा ठीक से लो।’ शुरू में यह बोझ जैसा लगता था, लेकिन धीरे-धीरे आदत बन गई।"

उसने आगे जोड़ा: "अब ऐसा लगता है कि दुपट्टा न हो तो कुछ अधूरा है। मैं इसमें ही ठीक हूँ।"

उस पल मुझे एहसास हुआ कि यह कहानी सिर्फ कोमल की नहीं, बल्कि समाज के गहरे अनुकूलन की है।

यह मेरे अवलोकन का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु था। मैंने समझा कि समाज छोटी-छोटी हिदायतों के माध्यम से एक विचार को बार-बार दोहराता है, और यह विचार अंततः हमारे मस्तिष्क में बैठ जाता है। यही कारण है कि मजबूरी कब आदत और आदत कब हमारी अपनी 'पसंद' बन जाती है, हमें पता ही नहीं चलता।

कोमल की सहजता दिखाती है कि दुपट्टा अब सिर्फ कपड़ा नहीं रहा, वह 'अच्छी लड़की' होने की शर्त बन गया है।

यह अवलोकन मुझे सिखाता है कि एक लीडर के रूप में हमारा काम सिर्फ़ लड़कियों को बोलना सिखाना नहीं है, बल्कि उन्हें यह जानने में मदद करना है कि जो वे महसूस करती हैं, वह वास्तव में उनकी अपनी 'पसंद' है या समाज का थोपा हुआ नियम। बदलाव वहीं से शुरू होगा, जहाँ वे इन सूक्ष्म रूढ़ियों को पहचानेंगी।


लेखिका परिचय:

  • नाम: मोनिका कुमारी

  • परिचय: मोनिका खैरमा, जमुई की रहने वाली हैं और वर्ष 2022 से ‘आई सक्षम’ संस्था से एक 'बडी' के रूप में जुड़ी हुई हैं। 

  • लक्ष्य: मेरा सपना है कि मैं आगे भी सोशल सेक्टर से जुड़कर, बच्चों की शिक्षा और महिलाओं के सशक्तिकरण में अपना योगदान देती रहूँ।

Friday, January 16, 2026

इतने साल बाद पढ़कर क्या करोगी?

“इतने साल बाद पढ़कर क्या करोगी?”

यह सवाल मुझसे एक महिला शिक्षक ने तब पूछा, जब मैं अपनी एडू-लीडर नेहा का एडमिशन करवाने जमालपुर के एन. सी. घोष स्कूल गई थी। नेहा की शादी को 10 साल हो चुके, वह तीन बेटियों की माँ है, और 9 साल बाद उसने दोबारा पढ़ाई शुरू करने का फैसला किया था।

शुरुआत में, हर दरवाज़े पर रुकावट थी। शिक्षक ठीक से बात करने को तैयार नहीं थे। कभी कहा गया—कल आइए, पहले वाली क्लास टीचर से मिलिए। उस महिला शिक्षक की बात—"इतने साल बाद पढ़कर क्या करोगी?"—सबसे ज़्यादा चुभ गई।

नेहा ने एक पल के लिए हिम्मत हार दी और कहा—“छोड़ दीजिए, अब नहीं होगा।”

लेकिन फिर मैंने और नेहा ने तय किया कि इतनी दूर आकर अब पीछे नहीं हटेंगे।

यह हमारा संयुक्त नेतृत्व था। हमने चुप रहकर बहस करने के बजाय, समस्या को हल करने पर ध्यान केंद्रित किया।

हमने स्कूल के सर से सारी स्थिति खुलकर बताई और मदद माँगी। सर ने मदद की। वकील से संपर्क हुआ। 2018 का रजिस्टर, कोर्ट के कागज़, वकील की फीस—खर्च बढ़ रहा था और हिम्मत टूट रही थी, लेकिन हमने ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स तैयार किए।

आखिरकार, नेहा का एडमिशन हो गया। जब मैम ने कहा “कल से कॉपी-किताब लेकर स्कूल आना,” 

वह सिर्फ़ एक वाक्य नहीं था, वह 9 साल के बाद छँटता अंधेरा था।

नेहा की आँखों में खुशी थी। नेहा ने यह साबित किया कि शिक्षा की कोई उम्र नहीं होती। एक माँ, 3 बच्चों की ज़िम्मेदारी के बाद, 9 साल बाद फिर से स्कूल जा सकती है, तो बदलाव संभव है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: खुशी कुमारी

  • परिचय: खुशी मुंगेर जिले के भागीचक, जमालपुर गाँव की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2024 में i-Saksham के बैच-11 की एडू-लीडर हैं।

Monday, December 22, 2025

आपकी बेटी भी यही सहेगी, तो कैसा लगेगा?

“अगर आज जो आप सह रहे हैं, वही कल आपकी बेटी भी सहे, तो आपको कैसा लगेगा?”

यह वह निर्णायक सवाल था जो मैंने कौशल्या की माँ से पूछा। मेरा नाम पूजा है, और मैं अपनी साथी एडू-लीडर के साथ धरहरा प्रखंड के अमारी गाँव में किशोरी कौशल्या के घर गई थी।

कौशल्या की पढ़ाई गरीबी और घर की पाबंदियों के कारण रोक दी गई थी। जब मैं उसकी माँ से मिली, तो उन्होंने साफ़ कह दिया, "जितना पढ़ना था, पढ़ ली, अब नहीं पढ़ेगी।"

बातों-बातों में पता चला कि कौशल्या का 11वीं में नामांकन नहीं हो पाया था। उसकी माँ तो उसे पढ़ाना चाहती थीं, लेकिन कौशल्या के पापा और भाई कहते थे, "ज़्यादा पढ़कर क्या करेगी?"

कौशल्या की माँ ने अपना दुख साझा किया—कि उन्हें भी बचपन में पढ़ने नहीं दिया गया था, और उनके बेटे की हालत (शराब पीकर घूमना) भी ठीक नहीं थी। उनकी बातों में एक अधूरी चाह और दबा हुआ सपना साफ़ झलक रहा था।

मैंने खुद को संभाला और उनसे वह निर्णायक सवाल पूछा: “चाची, अगर आज जो आप सह रही हैं, वही कल आपकी बेटी भी सहे, तो आपको कैसा लगेगा?”

उनकी आँखें नम हो गईं और उन्होंने धीरे से कहा, "बेटा, कोई माँ नहीं चाहती कि उसकी बेटी दुख सहे।"

बस, यही वह क्षण था। मैंने अपनी पूरी कोशिश लगा दी उन्हें यह समझाने में कि बेटी की पढ़ाई उसके आत्मविश्वास और भविष्य की कुंजी है। 

काफी समझाने के बाद, कौशल्या की माँ राज़ी हो गईं। उन्होंने अपनी बेटी को किशोरी सेशन में जाने और उसकी पढ़ाई दोबारा शुरू करने की अनुमति दे दी। यह सुनकर कौशल्या बहुत खुश हुई।


आज कौशल्या न केवल 11वीं कक्षा में नामांकित है, बल्कि वह हर हफ्ते किशोरी सेशन में भी भाग लेती है, जहाँ वह आत्मविश्वास से अपनी बात रखती है और सवाल पूछती है।

मुझे उस दिन एहसास हुआ कि जब हम किसी को उसकी खुशी पाने में मदद करते हैं, तो हम सिर्फ़ एक जीवन नहीं बदलते, बल्कि उस माँ के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं, जो अपनी बेटी की खातिर समाज से लड़ने को तैयार हो जाती है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: पूजा कुमारी

  • परिचय: पूजा जगदीशपुर (जमालपुर), मुंगेर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2023 में i-Saksham के बैच-10 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।

  • लक्ष्य: पूजा का लक्ष्य एक शिक्षिका बनना है।

Friday, December 19, 2025

अब महसूस की असली आजादी!

 “मैं अब खुद को आज़ाद महसूस करती हूँ।”

यह आत्मविश्वास मुजज़फ़रपुर की नेहा दीदी का है। जब मैंने, स्वाति (बडी), उनके इस बदलाव को देखा, तो मुझे एहसास हुआ कि छोटे कदम भी जीवन में कितनी बड़ी आज़ादी ला सकते हैं।

नेहा दीदी ने मुझे बताया कि वह पिछले दो सालों से "आई सक्षम" से जुड़ने की कोशिश कर रही थीं। जब वह मायके में थीं, तो कहीं भी बाहर जाने पर उनके साथ हमेशा पापा या भाई होते थे। शादी के बाद भी वह हमेशा अपने पति के साथ ही बाहर जाती थीं। अकेले घर से बाहर निकलना उनके लिए एक असंभव बात थी, और यह डर हमेशा उनके आत्मविश्वास को दबाता रहा।

आखिरकार, उनकी कोशिश सफल हुई और वह "आई सक्षम" का हिस्सा बनीं।

लेकिन असली चुनौती अब शुरू हुई थी। संस्था से जुड़ने के बाद उन्हें अकेले सेशन में आना, विद्यालय जाना, और होम विजिट के लिए निकलना होता था। यह उनके लिए नया और थोड़ा डराने वाला अनुभव था।

नेहा दीदी ने अपनी सारी हिम्मत जुटाई और हर दिन इस डर का सामना किया। उन्होंने हर यात्रा को खुद को मज़बूत करने का एक अवसर बनाया। धीरे-धीरे यह डर खत्म होने लगा।

आज वही नेहा दीदी, जो कभी घर की दहलीज पार करने से डरती थीं, आत्मविश्वास के साथ गाँव के विद्यालयों में जाती हैं, मीटिंग में बोलती हैं और बच्चों के माता-पिता से बात करती हैं।

नेहा दीदी अब खुद यह कहती हैं: “अगर मैं 'आई सक्षम' से नहीं जुड़ती, तो शायद मैं आज भी अपने घर से अकेले बाहर नहीं निकल पाती। मैं अब खुद को आज़ाद महसूस करती हूँ।” उनका यह एहसास दिखाता है कि असली लीडरशिप सीमाओं को नहीं, बल्कि खुद के डर को तोड़ने से आती है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: स्वाति कुमारी

  • परिचय: स्वाति गाँव अघोड़िया बाज़ार, मुशहरी, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं और पिछले 2 वर्षों से i-Saksham में 'बडी' के रूप में कार्यरत हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2023 में i-Saksham से जुड़ीं।

  • लक्ष्य: स्वाति का लक्ष्य एक टीचर बनना है।

Monday, December 15, 2025

‘पास बैठने’ का मतलब ही क्रांति है

“मुसहर समुदाय के बच्चों को उनकी जाति के कारण भगा देते हैं।”

यह बात मुझे गौरीपुर गाँव में एक स्थानीय व्यक्ति ने बताई। मेरा नाम साक्षी है, और मैं प्राथमिक विद्यालय, मुसहर टोला में अवलोकन (Observation) के लिए पहुँची थी।

रास्ते में मैंने कई बच्चों को खेलते, चूल्हा बनाते देखा, जिससे मन में सवाल उठा कि स्कूल कौन गया होगा? गाँव के एक अंकल ने बताया कि मुसहर समुदाय के बच्चों को उनकी जाति के कारण कभी-कभी अन्य बच्चे और शिक्षक भी भगा देते हैं। यह जानकारी चिंताजनक थी और मुझे लगा कि यहाँ हमारे काम की सख़्त ज़रूरत है।

कोमल, हमारी एडू-लीडर, यहाँ सामाजिक समावेश का प्रयास कर रही थीं।

कक्षा में शोर और अव्यवस्था तो थी, लेकिन मैंने जो बदलाव देखा, वह मेरे लिए प्रेरणादायक था। कोमल ने छात्रों को मेडिटेशन और समूह चर्चा जैसे जीवन कौशल में शामिल किया। उन्होंने रीता और प्रिया जैसी छात्राओं को मेडिटेशन करवाने का अवसर दिया, जिससे उनमें नेतृत्व की भावना विकसित हो रही थी।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह था कि मुसहर समुदाय के बच्चे, जो पहले अलग बैठकर पढ़ाई करते थे, अब धीरे-धीरे मिलकर रहने की कोशिश कर रहे थे। यह सामाजिक समावेश की दिशा में एक बड़ी सफलता थी।

मैंने देखा कि कक्षा पहले से ज्यादा साफ़ दिख रही थी। यह कोमल के प्रयासों और मेहनत को दर्शाता है।

हालांकि, बच्चों की उपस्थिति और कक्षा प्रबंधन (शोर) में सुधार की ज़रूरत थी, पर उस दिन मैंने महसूस किया कि कोमल सिर्फ़ पढ़ा नहीं रहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव की दीवार तोड़कर एक बेहतर समाज की नींव रख रही थीं।


लेखिका परिचय:

  • नाम: साक्षी कुमारी

  • परिचय: साक्षी कुमारी गाँव सर्वोदय टोला फरदा, जमालपुर, मुंगेर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2019 में i-Saksham के बैच-4 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।

  • लक्ष्य: साक्षी का लक्ष्य सोशल सेक्टर (Social Sector) में काम करना है।