Monday, December 15, 2025

‘पास बैठने’ का मतलब ही क्रांति है

“मुसहर समुदाय के बच्चों को उनकी जाति के कारण भगा देते हैं।”

यह बात मुझे गौरीपुर गाँव में एक स्थानीय व्यक्ति ने बताई। मेरा नाम साक्षी है, और मैं प्राथमिक विद्यालय, मुसहर टोला में अवलोकन (Observation) के लिए पहुँची थी।

रास्ते में मैंने कई बच्चों को खेलते, चूल्हा बनाते देखा, जिससे मन में सवाल उठा कि स्कूल कौन गया होगा? गाँव के एक अंकल ने बताया कि मुसहर समुदाय के बच्चों को उनकी जाति के कारण कभी-कभी अन्य बच्चे और शिक्षक भी भगा देते हैं। यह जानकारी चिंताजनक थी और मुझे लगा कि यहाँ हमारे काम की सख़्त ज़रूरत है।

कोमल, हमारी एडू-लीडर, यहाँ सामाजिक समावेश का प्रयास कर रही थीं।

कक्षा में शोर और अव्यवस्था तो थी, लेकिन मैंने जो बदलाव देखा, वह मेरे लिए प्रेरणादायक था। कोमल ने छात्रों को मेडिटेशन और समूह चर्चा जैसे जीवन कौशल में शामिल किया। उन्होंने रीता और प्रिया जैसी छात्राओं को मेडिटेशन करवाने का अवसर दिया, जिससे उनमें नेतृत्व की भावना विकसित हो रही थी।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह था कि मुसहर समुदाय के बच्चे, जो पहले अलग बैठकर पढ़ाई करते थे, अब धीरे-धीरे मिलकर रहने की कोशिश कर रहे थे। यह सामाजिक समावेश की दिशा में एक बड़ी सफलता थी।

मैंने देखा कि कक्षा पहले से ज्यादा साफ़ दिख रही थी। यह कोमल के प्रयासों और मेहनत को दर्शाता है।

हालांकि, बच्चों की उपस्थिति और कक्षा प्रबंधन (शोर) में सुधार की ज़रूरत थी, पर उस दिन मैंने महसूस किया कि कोमल सिर्फ़ पढ़ा नहीं रहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव की दीवार तोड़कर एक बेहतर समाज की नींव रख रही थीं।


लेखिका परिचय:

  • नाम: साक्षी कुमारी

  • परिचय: साक्षी कुमारी गाँव सर्वोदय टोला फरदा, जमालपुर, मुंगेर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2019 में i-Saksham के बैच-4 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।

  • लक्ष्य: साक्षी का लक्ष्य सोशल सेक्टर (Social Sector) में काम करना है।

Friday, December 12, 2025

हमसे कुछ नहीं होगा

 “दीदी, ये क्या ही बोलेगा? ये तो हमेशा चुप रहता है!”

यह बात क्लास के बच्चों ने तब कही, जब मैंने नीरज से कुछ पढ़ने को कहा। मेरा नाम निभा कुमारी है और मैं i-Saksham की एडू-लीडर हूँ।

नीरज चौथी कक्षा में पढ़ता था और वह बेहद शांत और डरपोक बच्चा था। उसे सबसे बड़ा डर इस बात का था कि अगर उसने कुछ गलत बोल दिया, तो बाकी बच्चे उस पर हँसेंगे। इसी डर की वजह से वह कोई काम नहीं करता था और हमेशा कहता था, "दीदी, हमसे नहीं होगा।"

मैंने तय किया कि यह डर ही उसके सीखने में सबसे बड़ी रुकावट है। सबसे पहले, मैंने क्लास में नियम बनाया कि कोई भी साथी कुछ बोलेगा तो उस पर हँसना नहीं है।

इसके बाद, मैंने नीरज के डर को खत्म करने के लिए
व्यक्तिगत रूप से उससे बात की। मैंने उसे समझाया कि यहाँ कोई गलत या सही नहीं है—जो मन में आता है, उसे पूरे आत्मविश्वास के साथ बोलना है।

मैंने चार-पाँच दिन तक उसे समूह में छोटे-छोटे काम दिए, और खुद उसके साथ बैठकर किताब पढ़ी, जहाँ वह नहीं बोल पाता था, वहाँ मैंने उसकी मदद की।

धीरे-धीरे, मेरा यह प्रयास रंग लाया। 25 तारीख को जब हम माइंडफुलनेस और रिवीजन कर रहे थे, अचानक नीरज खुद से आगे आया और बोला, “दीदी, आज हम रक्षाबंधन वाला कहानी पढे?”

मैं उसकी ओर देखती रह गई। जो बच्चा दो शब्द बोलने से डरता था, आज वह खुद आगे आकर पढ़ने की इच्छा जता रहा था।

मैंने मुस्कुराकर कहा, "हाँ नीरज, बिल्कुल! जहाँ नहीं समझोगे, हम साथ में सीखेंगे।" नीरज ने कहानी पढ़ना शुरू किया और अब वह आत्मविश्वास के साथ पढ़ता है। वह बीच-बीच में सवाल भी करता है, और जो समझ में नहीं आता, वह खुलकर बोलता है कि "दीदी, हम यह नहीं समझे।"

आज नीरज आत्मविश्वास से बोलता है, समूह में सक्रिय है, और सबसे खास—अब वह "कर सकते हैं" वाला बच्चा बन गया है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: निभा कुमारी

  • परिचय: निभा कुमारी बेगूसराय के तेघड़ा प्रखंड से हैं और वर्तमान में बन्हारा गाँव में i-Saksham की Edu-Leader (बैच-12) के तौर पर काम कर रही हैं।

  • लक्ष्य: निभा का मानना है कि शिक्षा और आत्मनिर्भरता ही समाज में वास्तविक बदलाव ला सकते हैं, और वह इसी दिशा में आगे भी काम करना चाहती हैं।

Monday, December 8, 2025

“नहीं! घर में ही रहकर पढ़ो

 “नहीं! घर में ही रहकर पढ़ो, बाहर नहीं जाना है।”

यह जवाब साक्षी को उसकी नानी से मिला, जब उसने 11वीं कक्षा के एग्जाम पास आने पर पढ़ने की हिम्मत जुटाई। मेरा नाम सरिता है, और मैं अपनी एडू-लीडर साक्षी की कहानी बता रही हूँ—एक ऐसी लड़की जिसने सबसे बड़े संकट में भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाई और अपने सपने को ज़िंदा रखा।

साक्षी ऐसे परिवार से आती है जहाँ लोग पढ़े-लिखे तो थे, पर घर की महिलाओ या लड़कियों को बोलने की आजादी नहीं थी। उसे खुद को असहज महसूस होता था, और वह जानती थी कि उसे अपनी आवाज़ सुनाने के लिए अपने रास्ते खुद चुनने होंगे।

10वीं तक की पढ़ाई ठीक चली, लेकिन 11वीं में उसके पापा को ब्लड कैंसर हो गया। इस बीमारी ने परिवार की आर्थिक हालत बहुत खराब कर दी, और इसी संकट के बीच साक्षी की पढ़ाई रुक गई। उसे मजबूरी में अपने नाना-नानी के घर जाना पड़ा।

वहाँ उसे खुद को पुराने सामाजिक नजरियों मे घिरा पाया —"लड़की बाहर पढ़ने जाएगी तो बिगड़ जाएगी।"

जब एग्जाम पास आए, उसने साहस जुटाकर नानी से कहा कि उसे पढ़ना है। नानी ने मना कर दिया, और घर पर पढ़ाई का माहौल भी नहीं बन पा रहा था।

साक्षी ने उस दबाव को अपनी हार नहीं बनने दिया। उसके पास खुद का फ़ोन नहीं था, तब उसने नाना का फ़ोन इस्तेमाल करना शुरू किया और अपनी पढ़ाई जारी रखी।

इसी मुश्किल दौर में, उसने घर की बेटी बनकर जिम्मेदारी संभाली। उसकी माँ भी मास्टर्स की डिग्री और बीएड की तैयारी में लगी थीं, इसलिए साक्षी ने पूरे घर को संभाला और अपने छोटे भाई-बहनों को एक माँ की तरह देखभाल की, क्योंकि घर की हालत बहुत नाज़ुक थी।

आज, साक्षी अपने संघर्षों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रही है। वह अपनी हर बात और हर फैसला इतने आत्मविश्वास से लेती है। वह उन सभी लड़कियों के लिए प्रेरणा बनती जा रही है जो थोड़ी परेशानियों में भी अपने लिए फैसले करने से डरती है या हार मान जाती है।
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लेखिका का परिचय:

  • नाम: सरिता

  • परिचय: सरिता गाँव फरदा, ब्लॉक जमालपुर, मुंगेर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2022 में i-Saksham के बैच-9 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।

  • लक्ष्य: सरिता का लक्ष्य सामाजिक कार्य (Social Work) करना है।

Friday, December 5, 2025

आज भी मेरे कान से मवाद निकलता है।

“आज भी मेरे कान से मवाद निकलता है।”

यह उस दर्द और शारीरिक प्रताड़ना का नतीजा है जो मैंने अपने पति से झेली थी। यह दर्द आज भी मुझे याद दिलाता है कि मैं अब अपनी ज़िंदगी का नियंत्रण किसी और के हाथ में नहीं दूँगी।

मैं एक सीधी-सादी, लेकिन सपनों से भरी लड़की थी। 12वीं की परीक्षा के तुरंत बाद मेरी शादी हो गई थी। मैं उम्मीदों और नए जीवन के सपनों से ससुराल गई थी। लेकिन बहुत जल्द ही मेरे पति ने मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। जब मैंने आगे पढ़ाई जारी रखने की बात कही, तो मेरी आवाज़ दबा दी गई।

एक दिन तो हालात इतने बिगड़ गए कि उन्होंने मेरे कान पर इतनी ज़ोर से मारा कि आज भी दर्द इतना बढ़ जाता है कि मैं ठीक से खा-पी भी नहीं पाती। मेरे पति मुझ पर मायके की ज़मीन अपने नाम करवाने का दबाव भी बना रहे थे।

लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैंने एक दिन हिम्मत जुटाई और उस घर से निकल आई। मैंने तय किया कि अब मैं अपनी ज़िंदगी खुद बनाऊँगी, अपने दम पर।

यह मेरे जीवन का पहला और सबसे बड़ा नेतृत्व-भरा फैसला था।

आज मैं आगे की पढ़ाई जारी रखकर नर्स बनना चाहती हूँ। मैं रोज़ Duolingo ऐप पर इंग्लिश की प्रैक्टिस करती हूँ और अपनी सिलाई मशीन से काम करके आत्मनिर्भर बन रही हूँ।

जब मैं ‘आई सक्षम’ फेलोशिप से जुड़ी, तो मुझे यहाँ के सेशनों में आत्मविश्वास और खुद की एक नई पहचान मिली। अब मैं अपने समुदाय की किशोरियों को लाइफ स्किल्स सिखाती हूँ। मैं उन्हें प्रेरित करती हूँ ताकि कोई भी लड़की चुपचाप अन्याय न सहे, बल्कि अपने सपनों के लिए डटकर खड़ी हो सके।

मेरी कहानी यह दिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर हिम्मत और उम्मीद बनी रहे, तो कोई भी अपने जीवन की दिशा खुद बदल सकता है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: चंदा कुमारी

  • परिचय: चंदा गाँव बंगाही, ब्लॉक बांद्रा, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 में i-Saksham से जुड़ीं।

  • लक्ष्य: मैं भविष्य में नर्स बनना चाहती हूँ।

Friday, November 28, 2025

मैं i-सक्षम छोड़ना चाहती हूँ।

 “मैं i-सक्षम छोड़ना चाहती हूँ।”

यह सुनकर मैं बहुत चिंतित हो गई। मेरा नाम मोनिका कुमारी है और मैं i-Saksham में 'बडी' के रूप में काम करती हूँ। मेरे पास पूनम नाम की एक एडू-लीडर थीं, जो बहुत समर्पित और उत्साही थीं, लेकिन उनके जीवन में बड़ा संकट आ गया—उनकी दीदी का निधन हो गया।

वह एक महीने की छुट्टी के बाद लौटीं, लेकिन पुरानी वाली पूनम नहीं थीं। पूनम मानसिक और शारीरिक रूप से टूट चुकी थीं। आत्मविश्वास की कमी साफ़ दिखती थी। फिर एक दिन उनका फोन आया: “मैं i-सक्षम छोड़ना चाहती हूँ।”

पूनम की हालत देखकर मुझे लगा कि मेरी सामान्य समझ काम नहीं कर रही है। मुझे सिखाया गया था कि व्यक्तिगत संकट के समय किसी भी लीडर का पहला काम होता है, सही सपोर्ट सिस्टम का उपयोग करना। मैंने अपने मेंटर अमन भैया से सलाह ली और उनकी बात मानते हुए पूनम के ऊपर से काम का दबाव हटा दिया।

मैंने पूनम को एक महीने का समय और व्यक्तिगत स्पेस दिया। उनकी साथी एडू-लीडर्स ने उन्हे कल करके सिर्फ हाल चाल लेते और हौसला बढ़ाते, काम की बात नहीं करते ।

करीब 25 दिन बाद, मैंने पूनम से फिर बात की। इस बार वह सकारात्मक लगीं। सितंबर में उन्होंने फिर से i-सक्षम ज्वाइन किया। उन्हें देखकर मेरा दिल खुश हो गया।

धीरे-धीरे पूनम ने फिर से मुस्कुराना शुरू किया। अक्टूबर में जब हमने 'बडी टॉक' की, तो पूनम आत्मविश्वास से अपनी लर्निंग और एक्शन प्लान साझा कर रही थीं। उन्हें देखकर लगा कि समय और समझदारी दोनों जरूरी है घाव भरने के लिए।

उस दिन मुझे सच्चे अर्थों में "बड़ी" का मतलब समझ आया—बड़ी का मतलब सिर्फ काम की निगरानी नहीं, बल्कि साथी को मुश्किल समय में संभालना, और उसे फिर से खुद पर भरोसा दिलाना है। मेरा काम पूनम को संभालना था, और यह देखकर सुकून मिला कि हमने मिलकर यह कर दिखाया।


लेखिका परिचय:

  • नाम: मोनिका कुमारी

  • परिचय: मोनिका जिला जमुई के खैरमा गाँव की रहने वाली हैं और i-Saksham में 'बडी' के रूप में काम कर रही हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: मोनिका वर्ष 2021 में i-Saksham से जुड़ीं।

  • भविष्य का सपना: मोनिका चाहती है कि वह अपने गाँव की महिलाओं के लिए आवाज़ उठाये और उन्हें उनके अधिकारों और अवसरों के लिए जागरूक करे ।