Friday, March 20, 2026

अगर मैं काम पर न जाऊँ, तो मेरे बच्चों का पेट कौन भरेगा?

“अगर मैं काम पर न जाऊँ, तो मेरे बच्चों का पेट कौन भरेगा?”

यह बेबसी भरा सवाल 40 वर्षीय आरती दीदी ने मुझसे तब पूछा, जब वे मेरे घर के आँगन में बैठी अपनी आँखों के आँसू पोंछ रही थीं। मेरा नाम ज्योति है और मैं बेगूसराय के नोनपुर गाँव की एडू-लीडर हूँ।

नोनपुर गाँव की आरती दीदी के पति का निधन लगभग एक साल पहले हुआ था। चार बच्चों की ज़िम्मेदारी और सिर पर छत के अलावा उनके पास कुछ नहीं था। घर चलाने के लिए उन्होंने गाँव के ही एक पुरुष के साथ मज़दूरी पर जाना शुरू किया, लेकिन समाज को एक विधवा का बाहर निकलना रास नहीं आया। उनकी सास और पड़ोसियों के तानों ने उन्हें इतना तोड़ दिया कि उन्होंने काम पर जाना बंद कर दिया और अपनी छोटी-सी ज़मीन बेचने का मन बना लिया।

जब मैंने देखा कि आरती दीदी कई दिनों से काम पर नहीं जा रही हैं, तो मुझे चिंता हुई। मैं उनके घर जाना चाहती थी, पर उनकी सास के कड़े व्यवहार के कारण डर लग रहा था।

मैंने अपनी ट्रेनिंग में सीखा था कि एक लीडर को मुश्किल परिस्थितियों में भी 'रास्ता' निकालना होता है। मैंने अपनी माँ को विश्वास में लिया और उनकी मदद से, किसी बहाने आरती दीदी को अपने घर बुलाया ताकि हम बिना किसी डर के बात कर सकें।

मेरे घर के शांत माहौल में, आरती दीदी ने अपना सारा दर्द बयां कर दिया। मैंने उन्हें कोई बड़ा भाषण नहीं दिया, बल्कि उनकी ही ताकत को याद दिलाया। मैंने उनसे साफ़ शब्दों में कहा कि "आज जो लोग बातें बना रहे हैं, कल वे आपके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने नहीं आएंगे। ज़मीन बेच देना समाधान नहीं है।"

हमारी इस बातचीत ने उनके भीतर की माँ को झकझोर दिया। उन्हें समझ आया कि चुप रहकर वे न केवल अपना हक़ खो रही हैं, बल्कि अपने बच्चों का भविष्य भी दांव पर लगा रही हैं।

अगले ही हफ्ते आरती दीदी फिर से काम पर लौटने लगीं। इस बार जब उनकी सास ने टोका, तो उन्होंने पहली बार अपनी आवाज़ उठाई। उन्होंने स्पष्ट कह दिया— “अगर मैं काम नहीं करूँगी तो मेरे बच्चों को कौन खिलाएगा? आपने अपने बच्चों को जैसे संभाला, वैसे ही अब मैं अपने बच्चों को संभालूँगी।”

आज आरती दीदी नियमित रूप से काम पर जाती हैं। उनकी बड़ी बेटी 12वीं की परीक्षा दे रही है और घर का माहौल अब शांत है। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि बदलाव तब आता है जब आप किसी और की आवाज़ को भी इतनी ताकत दे सकें कि वह अपने हक के लिए खड़ी हो सके।


लेखिका परिचय:

  • नाम: ज्योति कुमारी

  • परिचय: ज्योति बेगूसराय के नोनपुर गाँव की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 में i-Saksham से जुड़ीं।

  • लक्ष्य: ज्योति का लक्ष्य एक शिक्षिका बनकर समाज में शिक्षा और आत्मनिर्भरता के प्रति जागरूकता फैलाना है।

Monday, March 9, 2026

लड़का और लड़की: क्या है अलग?

 “लड़की सुनकर आपके मन में सबसे पहला विचार क्या आता है?”

मंसूरचक की तपती दोपहर में जब मैंने (रानी) अपनी किशोरियों के घेरे में यह सवाल उछाला, तो कुछ पल के लिए कमरे में भारी सन्नाटा छा गया। मेरा नाम रानी कुमारी है और मैं i-Saksham की एडू-लीडर हूँ। आज हमारा 12वाँ सत्र था, जिसका विषय था—"लड़का और लड़की: क्या है एक जैसा, और क्या है अलग?"

दोपहर के 2 बज चुके थे, पर कुछ लड़कियाँ अब भी घर के कामों में उलझी थीं। मैंने इंतज़ार करने के बजाय खुद उनके घर जाने का फैसला किया। मैंने उनके माता-पिता को सत्र की अहमियत समझाई और उन दो सहेलियों को साथ लेकर वापस आई।

जब सबने माइंडफुलनेस के साथ अपनी आँखें खोलीं, तो मैंने वही सवाल दोहराया। धीरे-धीरे आवाज़ें उठने लगीं। किसी ने कहा, “चूल्हा-बर्तन,” किसी ने कहा, “घर की चारदीवारी,” तो किसी ने फुसफुसाते हुए कहा, “डर-डर कर जीना।”

वहीं जब मैंने पूछा कि 'लड़का' सुनकर क्या लगता है, तो जवाब थे— “आज़ादी,” “बाहर जाकर पढ़ना,” और “अपनी मर्ज़ी का मालिक होना।”

लड़कियों की आँखों में अपने ही समाज की इस कड़वी हकीकत को देखकर मेरा मन भर आया, पर मुझे उन्हें इस सोच से बाहर निकालना था। मैंने सीधे उपदेश देने के बजाय उन्हें 'जोड़ियों' (Pairs) में बाँटा और उनसे उनकी अपनी 'ताकत' और 'पसंद' पर बात करने को कहा, ठीक वैसे ही जैसे हमने ट्रेनिंग के 'विजनिंग' सत्रों में सीखा था।

असर जादुई था। कुछ देर की चर्चा के बाद एक किशोरी ने हाथ उठाया और बड़ी मज़बूती से कहा, “दीदी, फर्क सिर्फ हमारे शरीर में है, लेकिन सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हक हम दोनों को बराबर है।”

उसकी यह बात सुनते ही मैंने उन्हें एक कविता सुनाई— “मैं लड़की हूँ, इसलिए मुझे पढ़ना है।” कविता खत्म होते ही जैसे कमरे की ऊर्जा बदल गई। जो लड़कियाँ पहले हिचकिचा रही थीं, वे अब चिल्लाकर अपने सपने बता रही थीं। किसी ने कहा, “मुझे पढ़ना है ताकि कोई मुझे अनपढ़ बोलकर नीचा न दिखा सके,” तो किसी ने कहा, “मैं अपनी पहचान खुद बनाना चाहती हूँ।”

सत्र के अंत में जब हम 'क्लोजिंग सर्कल' में खड़े थे, तो मुझे महसूस हुआ कि आज उन्होंने सिर्फ एक विषय नहीं पढ़ा, बल्कि अपनी आवाज़ पर दावा करना सीखा है।  


लेखिका परिचय:

  • नाम: रानी कुमारी

  • परिचय: रानी कुमारी गाँव मस्कान दरगाह, मंसूरचक, बेगूसराय की रहने वाली हैं और बैच-11 की एडू-लीडर हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2024 में जुड़ीं।

  • लक्ष्य: रानी भविष्य में एक शिक्षिका बनकर समाज की रूढ़ियों को शिक्षा के माध्यम से तोड़ना चाहती हैं।

Monday, March 2, 2026

काश मेरे पास भी scooty हो ?

 “मुझे मज़बूत बनना है, एक दिन मैं अपना यह सपना पूरा करके ही रहूँगी।”

यह बात आरती अक्सर आईने के सामने खुद से कहती थीं, जब मॉल में टंगे खूबसूरत कपड़े उन्हें अपनी ओर खींचते थे, पर वे अपनी जेब से हाथ निकालकर खाली हाथ लौट आती थीं।

मेरा नाम मौसम कुमारी है और मैं i-Saksham में एक 'बडी' हूँ। आरती (बैच 11 की एडू-लीडर) की कहानी मेरे लिए किसी मिसाल से कम नहीं है। आरती का एक छोटा सा सपना था—अपनी खुद की कमाई से खरीदी हुई एक गाड़ी, जो उसे बेझिझक कहीं भी आने-जाने की आज़ादी दे सके।

आरती ने 2024 में बड़े उत्साह के साथ फेलोशिप शुरू की थी, लेकिन शुरुआती सफ़र आसान नहीं था। स्कूल में काम करते समय प्रिंसिपल के साथ कुछ मतभेद हुए और आरती को स्कूल इंगेजमेंट से हटना पड़ा। वह एक ऐसा मोड़ था जहाँ कोई भी टूट सकता था, लेकिन आरती ने इसे अंत नहीं माना।

उन्होंने अपनी ट्रेनिंग में सीखे 'प्लेयर बिहेवियर' को अपनाया और तय किया कि अगर स्कूल का दरवाज़ा बंद हुआ है, तो वह समुदाय के घरों तक पहुँचेंगी। उन्होंने कम्युनिटी कॉल्स और होम विज़िट के ज़रिए अपना काम जारी रखा।

असली संघर्ष उनके निजी त्यागों में था। फेलोशिप से मिलने वाला स्टाइपेंड अक्सर घर की ज़रूरतों में खर्च हो जाता। आरती बताती हैं कि जब भी वह बाज़ार जातीं और उन्हें कोई कपड़ा पसंद आता, तो वह अपनी उँगलियों को उस कपड़े से हटा लेती थीं। ताकि एक-एक रुपया जोड़ सकें। कई रातें ऐसी थीं जब उन्हें लगा कि शायद यह नहीं हो पाएगा, और वह अकेले में रो लेती थीं।

लेकिन दिसंबर 2025 की वह सुबह सब कुछ बदल देने वाली थी। शोरूम में खड़ी आरती जब कागज़ों पर दस्तख़त कर रही थीं, तो उनके हाथ काँप रहे थे, पर आँखों में एक चमक थी।

आरती ने अपने दो साल के धैर्य और बचत के दम पर अपनी पहली स्कूटी खरीदी। जब वह उस स्कूटी की चाबी लेकर अपने गाँव की पगडंडियों पर निकलीं, तो वह सिर्फ़ एक सवारी नहीं थी—वह उनके आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की गवाही थी। उनके मायके वालों की आँखों में खुशी थी और ससुराल वालों के चेहरे पर गर्व।

आज आरती सिर्फ़ एक एडू-लीडर नहीं हैं; वह उस बदलाव का चेहरा हैं जो बताता है कि अगर इरादे मज़बूत हों, तो एक ग्रामीण लड़की भी अपने सपनों की रफ़्तार खुद तय कर सकती है। उन्होंने हमें सिखाया कि असली आज़ादी वही है जिसे आप अपनी मेहनत से हासिल करते हैं।


लेखिका परिचय:

  • नाम: मौसम कुमारी

  • परिचय: मौसम मुज़फ्फरपुर के सूतिहारा गाँव की रहने वाली हैं और i-Saksham में एक 'बडी' के रूप में कार्यरत हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2020 में i-Saksham से जुड़ीं।

  • लक्ष्य: मौसम का लक्ष्य सोशल सेक्टर में काम करते हुए और भी लड़कियों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करना है।

Monday, February 23, 2026

अब पढ़ाई की क्या ज़रूरत है?

“अब पढ़ाई की क्या ज़रूरत है?”

यह बात सकरा ब्लॉक के मझौलिया गाँव में सवा प्रवीण के घर में कई बार कहा जा चुका था। सवा हर बार चुप रह जाती थी। वह कभी स्कूल की तेज़ छात्रा थी, लेकिन घर की ज़िम्मेदारियाँ और आर्थिक दबाव उसे धीरे-धीरे स्कूल से दूर ले गए। एक दिन उसकी पढ़ाई छूट गई—और सबने मान लिया कि अब यही उसकी कहानी है।

मैं, शालिना खातून, मझौलिया की एडू-लीडर हूँ। सवा से पहली मुलाक़ात में मैंने उसकी आँखों में एक अनकहा-सा डर, लेकिन उसके पीछे एक सपनों से भरी चमक भी देखी।

मैंने तय किया कि मैं सिर्फ सलाह नहीं दूँगी, बल्कि उसे समझने के लिए कोचिंग कौशल का उपयोग करूँगी। मेरे साथ मेरी मम्मी भी थीं, जिन्होंने अनुभव से बात करने में मदद की।

हम दोनों सवा के घर बैठे। मैंने अपनी ट्रेनिंग में सीखे हुए तरीके से सवा से सवाल करने शुरू किए—सवा क्या चाहती है, उसे किस बात का डर है, और घर में पढ़ाई को लेकर सबसे बड़ी चिंता क्या है। मैंने धीमी गति से बातचीत की ताकि सामने वाला अपनी बात पूरी कर सके, जैसा कि सक्रिय श्रवण (Active Listening) में सिखाया जाता है। मेरी मम्मी ने भी अपने जीवन के अनुभव साझा किए।

सवा के माता-पिता, जो अब तक सिर्फ़ परिस्थितियाँ देख रहे थे, पहली बार अपनी बेटी की बात सुन रहे थे। उन्होंने उसी समय निर्णय नहीं लिया।

कुछ ही दिनों बाद परिवार ने तय किया कि सवा दोबारा पढ़ेगी। उसे 11वीं कक्षा में एडमिशन मिला।

यह सिर्फ़ स्कूल लौटना नहीं था, बल्कि उस सामाजिक सोच को चुनौती देना था जहाँ लड़की की पढ़ाई को गैर-ज़रूरी मान लिया जाता है। आज सवा नियमित स्कूल जाती है, नोट्स बनाती है, और सबसे अहम बात—वह फिर से मुस्कुराने लगी है।

मुझे एहसास हुआ कि बदलाव हमेशा बड़े कदमों से नहीं आता। कई बार ध्यान से सुनना, सही सवाल पूछना और सामने वाले को अपनी बात कहने की जगह देना—यही सबसे असरदार कौशल बन जाता है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: शालिना खातून

  • परिचय: शालिना खातून गाँव मझौलिया, ब्लॉक सकरा, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 में i-Saksham के बैच 12 की एडू-लीडर के रूप में जुड़ीं।

Monday, February 16, 2026

“सर्वर डाउन है, सोमवार को आना।”

“सर्वर डाउन है, सोमवार को आना।”

कॉलेज काउंटर की खिड़की के पीछे बैठे बाबू ने जब यह कहा, तो मेरे पास खड़ी रेखा का चेहरा अचानक उतर गया। उसकी आँखों में वही पुराना डर फिर से दिखने लगा—वही मायूसी जो उसने तब महसूस की थी, जब पैसों की कमी के कारण उसकी 12वीं के बाद की पढ़ाई रुक गई थी और उसकी किताबों पर धूल जमने लगी थी।

मेरा नाम कृति राज है और मैं i-Saksham की एक एडू-लीडर हूँ। रेखा कभी मेरी सहपाठी थी, पर अब वह घर के कामों में सिमट गई थी।

जब मुझे क्लस्टर मीटिंग में अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (APF) की स्कॉलरशिप के बारे में पता चला, तो मुझे लगा कि यह जानकारी सिर्फ कागज़ों पर रहने के लिए नहीं है। मैंने तुरंत उन लड़कियों के नाम लिखे जिन्होंने पैसों की कमी से स्कूल छोड़ा था, और अगले ही दिन रेखा के घर पहुँच गई।

उसके माता-पिता को मनाना आसान नहीं था; उन्हें लगा कि कहीं ये कोई नया खर्चा तो नहीं। मैंने उन्हें सिर्फ फॉर्म के बारे में नहीं बताया, बल्कि अपनी ट्रेनिंग में सीखे गए तरीके से यह समझाया कि कैसे यह स्कॉलरशिप रेखा को वापस क्लासरूम तक पहुँचा सकती है। मेरा हाथ पकड़कर उन्होंने धीरे से कहा, "ठीक है, हम कोशिश करेंगे।"

असली दौड़-भाग कॉलेज में थी। एडमिशन से लेकर रजिस्ट्रेशन तक, मैंने रेखा के साथ खड़े होकर एक-एक कागज़ तैयार करवाया। जब 'बोनाफाइड फॉर्म' के समय सर्वर रुक गया और रेखा को लगा कि सब खत्म हो गया, तो मैंने उसका हाथ दबाकर बस इतना कहा, "घबराओ मत, मैं सोमवार को तुम्हारे साथ फिर आऊँगी।"

मेरा यह कहना रेखा के लिए सिर्फ एक दिलासा नहीं था, बल्कि एक भरोसा था कि इस बार उसे अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा। रेखा की हिम्मत बढ़ी और इसी सक्रियता को लेकर मैं दो और कॉलेजों (BRM और JMS) में पहुँची, जहाँ मैंने 11 और लड़कियों को ढूँढकर उनका फॉर्म भरवाया।

आज जब मैं रेखा को फिर से बैग टाँगे कॉलेज की बस का इंतज़ार करते देखती हूँ, तो मुझे एक सुकून महसूस होता है। उस दिन मैंने सीखा कि लीडर बनने के लिए किसी ओहदे की ज़रूरत नहीं होती। अगर हम किसी रुकी हुई ज़िंदगी को फिर से आगे बढ़ाने के लिए आखिरी कदम तक साथ खड़े रहने की हिम्मत जुटा लें, तो वही हमारा सबसे बड़ा काम है। मैं सिर्फ जानकारी देने वाली एक एडू-लीडर नहीं, बल्कि उन 12 लड़कियों के सपनों का रास्ता साफ़ करने वाली साथी बनी हूँ।


लेखिका परिचय:

  • नाम: कृति राज

  • परिचय: गाँव उदयपुर, ब्लॉक जमालपुर, मुंगेर की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 से i-Saksham से जुड़ी हुई हैं।

  • लक्ष्य: कृति भविष्य में सिविल सर्विस में जाकर उन सामाजिक रुकावटों को खत्म करना चाहती हैं जो लड़कियों की पढ़ाई के बीच में आती हैं।