Monday, February 23, 2026

अब पढ़ाई की क्या ज़रूरत है?

“अब पढ़ाई की क्या ज़रूरत है?”

यह बात सकरा ब्लॉक के मझौलिया गाँव में सवा प्रवीण के घर में कई बार कहा जा चुका था। सवा हर बार चुप रह जाती थी। वह कभी स्कूल की तेज़ छात्रा थी, लेकिन घर की ज़िम्मेदारियाँ और आर्थिक दबाव उसे धीरे-धीरे स्कूल से दूर ले गए। एक दिन उसकी पढ़ाई छूट गई—और सबने मान लिया कि अब यही उसकी कहानी है।

मैं, शालिना खातून, मझौलिया की एडू-लीडर हूँ। सवा से पहली मुलाक़ात में मैंने उसकी आँखों में एक अनकहा-सा डर, लेकिन उसके पीछे एक सपनों से भरी चमक भी देखी।

मैंने तय किया कि मैं सिर्फ सलाह नहीं दूँगी, बल्कि उसे समझने के लिए कोचिंग कौशल का उपयोग करूँगी। मेरे साथ मेरी मम्मी भी थीं, जिन्होंने अनुभव से बात करने में मदद की।

हम दोनों सवा के घर बैठे। मैंने अपनी ट्रेनिंग में सीखे हुए तरीके से सवा से सवाल करने शुरू किए—सवा क्या चाहती है, उसे किस बात का डर है, और घर में पढ़ाई को लेकर सबसे बड़ी चिंता क्या है। मैंने धीमी गति से बातचीत की ताकि सामने वाला अपनी बात पूरी कर सके, जैसा कि सक्रिय श्रवण (Active Listening) में सिखाया जाता है। मेरी मम्मी ने भी अपने जीवन के अनुभव साझा किए।

सवा के माता-पिता, जो अब तक सिर्फ़ परिस्थितियाँ देख रहे थे, पहली बार अपनी बेटी की बात सुन रहे थे। उन्होंने उसी समय निर्णय नहीं लिया।

कुछ ही दिनों बाद परिवार ने तय किया कि सवा दोबारा पढ़ेगी। उसे 11वीं कक्षा में एडमिशन मिला।

यह सिर्फ़ स्कूल लौटना नहीं था, बल्कि उस सामाजिक सोच को चुनौती देना था जहाँ लड़की की पढ़ाई को गैर-ज़रूरी मान लिया जाता है। आज सवा नियमित स्कूल जाती है, नोट्स बनाती है, और सबसे अहम बात—वह फिर से मुस्कुराने लगी है।

मुझे एहसास हुआ कि बदलाव हमेशा बड़े कदमों से नहीं आता। कई बार ध्यान से सुनना, सही सवाल पूछना और सामने वाले को अपनी बात कहने की जगह देना—यही सबसे असरदार कौशल बन जाता है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: शालिना खातून

  • परिचय: शालिना खातून गाँव मझौलिया, ब्लॉक सकरा, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 में i-Saksham के बैच 12 की एडू-लीडर के रूप में जुड़ीं।

Monday, February 16, 2026

“सर्वर डाउन है, सोमवार को आना।”

“सर्वर डाउन है, सोमवार को आना।”

कॉलेज काउंटर की खिड़की के पीछे बैठे बाबू ने जब यह कहा, तो मेरे पास खड़ी रेखा का चेहरा अचानक उतर गया। उसकी आँखों में वही पुराना डर फिर से दिखने लगा—वही मायूसी जो उसने तब महसूस की थी, जब पैसों की कमी के कारण उसकी 12वीं के बाद की पढ़ाई रुक गई थी और उसकी किताबों पर धूल जमने लगी थी।

मेरा नाम कृति राज है और मैं i-Saksham की एक एडू-लीडर हूँ। रेखा कभी मेरी सहपाठी थी, पर अब वह घर के कामों में सिमट गई थी।

जब मुझे क्लस्टर मीटिंग में अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (APF) की स्कॉलरशिप के बारे में पता चला, तो मुझे लगा कि यह जानकारी सिर्फ कागज़ों पर रहने के लिए नहीं है। मैंने तुरंत उन लड़कियों के नाम लिखे जिन्होंने पैसों की कमी से स्कूल छोड़ा था, और अगले ही दिन रेखा के घर पहुँच गई।

उसके माता-पिता को मनाना आसान नहीं था; उन्हें लगा कि कहीं ये कोई नया खर्चा तो नहीं। मैंने उन्हें सिर्फ फॉर्म के बारे में नहीं बताया, बल्कि अपनी ट्रेनिंग में सीखे गए तरीके से यह समझाया कि कैसे यह स्कॉलरशिप रेखा को वापस क्लासरूम तक पहुँचा सकती है। मेरा हाथ पकड़कर उन्होंने धीरे से कहा, "ठीक है, हम कोशिश करेंगे।"

असली दौड़-भाग कॉलेज में थी। एडमिशन से लेकर रजिस्ट्रेशन तक, मैंने रेखा के साथ खड़े होकर एक-एक कागज़ तैयार करवाया। जब 'बोनाफाइड फॉर्म' के समय सर्वर रुक गया और रेखा को लगा कि सब खत्म हो गया, तो मैंने उसका हाथ दबाकर बस इतना कहा, "घबराओ मत, मैं सोमवार को तुम्हारे साथ फिर आऊँगी।"

मेरा यह कहना रेखा के लिए सिर्फ एक दिलासा नहीं था, बल्कि एक भरोसा था कि इस बार उसे अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा। रेखा की हिम्मत बढ़ी और इसी सक्रियता को लेकर मैं दो और कॉलेजों (BRM और JMS) में पहुँची, जहाँ मैंने 11 और लड़कियों को ढूँढकर उनका फॉर्म भरवाया।

आज जब मैं रेखा को फिर से बैग टाँगे कॉलेज की बस का इंतज़ार करते देखती हूँ, तो मुझे एक सुकून महसूस होता है। उस दिन मैंने सीखा कि लीडर बनने के लिए किसी ओहदे की ज़रूरत नहीं होती। अगर हम किसी रुकी हुई ज़िंदगी को फिर से आगे बढ़ाने के लिए आखिरी कदम तक साथ खड़े रहने की हिम्मत जुटा लें, तो वही हमारा सबसे बड़ा काम है। मैं सिर्फ जानकारी देने वाली एक एडू-लीडर नहीं, बल्कि उन 12 लड़कियों के सपनों का रास्ता साफ़ करने वाली साथी बनी हूँ।


लेखिका परिचय:

  • नाम: कृति राज

  • परिचय: गाँव उदयपुर, ब्लॉक जमालपुर, मुंगेर की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 से i-Saksham से जुड़ी हुई हैं।

  • लक्ष्य: कृति भविष्य में सिविल सर्विस में जाकर उन सामाजिक रुकावटों को खत्म करना चाहती हैं जो लड़कियों की पढ़ाई के बीच में आती हैं।

Saturday, February 14, 2026

पढ़ाई और घर का काम

“अम्मी, आप भेदभाव कर रही हैं।”

यह वह आवाज़ है जो अब मुज़फ्फरपुर के एक घर में सुनाई देती है। मेरा नाम लाडली खातून है और मैं i-Saksham की एडू-लीडर हूँ।

हम नाजरीन और नाजनी की अम्मी से मिलने गए थे। अम्मी ने बहुत ईमानदारी से अपनी परेशानी रखी: "नाजनी पढ़ाई में बैठती तो है, लेकिन थोड़ी देर में उठ जाती है। ध्यान नहीं टिक पाता, इसलिए मैं उससे घर का काम करवा लेती हूँ।" यह एक आम समस्या थी—पढ़ाई और काम के बीच बेटियों की प्राथमिकता का संघर्ष।

मैंने उनकी बातों को ध्यान से सुना और उनकी ही प्राथमिकता को स्पष्ट करने के लिए सवाल पूछा: 'वो ऐसा क्या कर सकती है जिससे पढ़ाई मे बच्ची का मन ज़्यादा लगे?'

थोड़ी देर सोचने के बाद अम्मी ने खुद फैसला लिया: “अब मैं कोशिश करूँगी कि जब नाजनी पढ़ाई करे, उस समय उससे कोई काम न करवाऊँ। बार काम के लिए उठाने से लय और ध्यान टूटता है”  

बातचीत यहीं नहीं रुकी। अम्मी ने खुद बदलाव की बात कही। उन्होंने बताया कि अब जब भी नाजरीन लंच में स्कूल से घर आती है, वह उसे दुबारा स्कूल भेज देती हैं।


इस बातचीत का सबसे गहरा असर तब सामने आया, जब अम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा कि 
लैंगिक भेदभाव पर होने वाली सत्रों की चर्चाओं का असर अब घर में दिखने लगा है। उन्होंने कहा कि अगर वह बेटे को ज़रा-सा भी ज्यादा महत्व देती हैं, तो उनकी तीनों बेटियाँ उन्हें टोक देती हैं और कहती हैं: “अम्मी, आप भेदभाव कर रही हैं।”

उस पल यह साफ़ हो गया कि हमारा काम सिर्फ किशोरियों तक सीमित नहीं रहा। बेटियाँ अब बराबरी को समझने लगी हैं और घर के भीतर ही अपनी आवाज़ उठाने लगी हैं।


लेखिका परिचय:

  • नाम: लाडली खातून

  • परिचय: लाडली गाँव मझौलिया, ब्लॉक सकरा, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 में i-Saksham के बैच 12 की एडू-लीडर हैं।

Monday, February 2, 2026

विफलता या सीख

 “अगर आप इसे पढ़ने नहीं देंगे, तो इसे कौन पढ़ाएगा?”

यह सवाल मैंने एक ऐसे पिता से पूछा, जो अपनी सौतेली बेटी को घर के कामों में लगाए रखते थे, जबकि उनके अपने बच्चे स्कूल जाते थे। मेरा नाम खुशबू खातून है और मैं i-Saksham की एडू-लीडर हूँ।

मैंने 13 नवंबर से दिसंबर के अंत तक यह लक्ष्य तय किया था कि मैं हर सप्ताह कम से कम 2 अभिभावकों से मिलकर, उन्हें समझाकर 6 किशोरियों को नियमित रूप से स्कूल भेजना सुनिश्चित करूँगी।

समस्या यह थी कि मेरे समुदाय में, विशेष रूप से सौतेली बेटी के साथ, शिक्षा को लेकर स्पष्ट भेदभाव था।

शुरुआत में, मैं एक ऐसे अभिभावक के घर गई। सच कहूँ तो पहले दिन मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि सीधे भेदभाव पर बात कर सकूँ। मैंने बस कहा, "अंकल, मुझे आपसे बात करनी है।" और लगभग दो मिनट तक उनका चेहरा देखती रही और बिना कुछ कहे वहाँ से भाग आई।


यह मेरी पहली विफलता थी। लेकिन अगले दिन मैंने खुद को संभाला। 
मैंने अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा किया और फिर से उनके पास गई।

इस बार मैंने साफ़ शब्दों में कहा: “ये दोनों आपकी ही बेटियाँ हैं और आप उनके पिता हैं। अगर आप इसे पढ़ने नहीं देंगे, तो इसे कौन पढ़ाएगा? क्या आप चाहते हैं कि आपकी एक बेटी पीछे रह जाए और बाकी आगे बढ़ें?”

उन्होंने मेरी बात बहुत ध्यान से सुनी। अगले ही पल उन्होंने कहा, “ठीक है बेटा, हम आज ही इसका दाखिला करवा देंगे।” उस दिन उन्होंने अपनी सभी बच्चों को स्कूल ड्रेस दिलवाई, और आज उनकी सभी बेटियाँ और बेटे नियमित रूप से स्कूल जाते हैं।

यह मेरा पहला लक्ष्य पूरा होने का प्रमाण था।

मेरा दूसरा एक्शन एक और लड़की के लिए था, जिसकी शादी तय हो चुकी थी। मैंने उस लड़की से बात की और उसे समझाया कि अगर वह अभी शादी कर लेगी, तो उसका सपना अधूरा रह जाएगा। उसने मेरी बात सुनी, अपने पिता के पास गई और खुद के जमा किए हुए पैसों से स्कूल में दाखिला करवा लिया। उसके पिता ने बेटी की हिम्मत देखकर शादी रोक दी।

आज मुझे गर्व है कि मैंने अपने क्लस्टर गोल को लगभग 90% तक पूरा किया। मैंने सीखा कि अगर हम डर के बावजूद सही बात कहने की हिम्मत करें, तो बदलाव ज़रूर आता है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: खुशबू खातून

  • परिचय: खुशबू गाँव सिमरा, ब्लॉक बांद्रा, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 में i-Saksham के बैच 12 की एडू-लीडर हैं।

  • लक्ष्य: खुशबू का लक्ष्य है कि वह अपने कार्यों से दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाती रहें।

Friday, January 23, 2026

आइसक्रीम और सजावट: माँ का दुगना संघर्ष

 “मेरी बेटी और बेटे के जो सपने हैं, उन्हें पूरा करने के लिए मैं पूरी कोशिश करूँगी।”

यह संकल्प गुड़िया दीदी की मम्मी का है। मेरा नाम राखी कुमारी है और मैं गुड़िया दीदी (जो बैच 12 की एडू-लीडर हैं) की कहानी बता रही हूँ। उनके पापा के न रहने के कारण, घर की सारी ज़िम्मेदारी उनकी माँ के कंधों पर आ गई थी, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। 

उनके परिवार में लड़के और लड़की, दोनों को पढ़ाई का बराबर अधिकार दिया जाता है। एक समय ऐसा भी आया जब आर्थिक कारणों से गुड़िया के भाई की पढ़ाई 1–2 साल के लिए रुक गई थी। लेकिन माँ ने गुड़िया के साथ मिलकर ज़ोर दिया और भाई को दोबारा पढ़ाई के लिए प्रेरित किया।

गुड़िया घर के काम, पढ़ाई, होम विज़िट और इवेंट—सब कुछ संभालती है। इसकी सबसे बड़ी वजह है उनकी माँ का पूरा सहयोग।

एक बार गुड़िया बीमार थी, और एक ज़रूरी इवेंट होना था। उस समय माँ ने खुद ज़िम्मेदारी ली। उन्होंने किशोरियों के माता-पिता को बुलाया, उनसे बात की और खुद आगे आकर कार्यक्रम को आगे बढ़ाया, ताकि गुड़िया का काम रुके नहीं।

माँ ने घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए भी असाधारण काम किए। उन्होंने कर्ज़ लेकर शादी के डेकोरेशन का छोटा-सा काम शुरू किया, जिससे गुड़िया का भाई आज उसे एक बिज़नेस के रूप में चला रहा है। इसके अलावा, वह सतघरवा स्कूल में रसोइया (खाना बनाने का काम) भी करती हैं और आइसक्रीम बेचने का छोटा व्यवसाय भी संभालती हैं।

उनकी माँ न सिर्फ़ गुड़िया की सुरक्षा को लेकर जागरूक हैं (अक्सर होम विज़िट के दौरान साथ जाती हैं), बल्कि वह दूसरे अभिभावकों से भी खुलकर बात करती हैं और उन्हें आसान भाषा में समझाती हैं कि यह काम किशोरियों के लिए क्यों ज़रूरी है।

गुड़िया दीदी की मम्मी सिर्फ़ एक माँ नहीं हैं; वह एक एक्टिव, मेहनती और प्रेरणादायक महिला हैं, जिन्होंने अपने बच्चों के सपनों के लिए हर मुश्किल का सामना किया है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: राखी कुमारी

  • परिचय: राखी कुमारी गाँव बंगलवा (कठोर), ब्लॉक धरहरा, मुंगेर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2021 में i-Saksham के बैच-7 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।

  • लक्ष्य: राखी का लक्ष्य सोशल सेक्टर में काम करना है।