Friday, June 12, 2026

"दीदी ने आज क्या पढ़ाया"

मेरा नाम ज़ीनत है। मैं बेगूसराय के रतगाँव की रहने वाली हूँ।

जब गुड़िया पहली बार मंसूरीटोल के उस स्कूल में बच्चों के साथ काम करने गईं, तो जो दिखा वो कुछ ऐसा था जो उन्हें जाना-पहचाना लगा। बच्चे ध्यान नहीं देते थे। होमवर्क अधूरा रहता था। कक्षा में शोर रहता था। समय पर कोई नहीं आता था।

गुड़िया यह सब देखती थीं — और चुपचाप सोचती थीं। क्योंकि यह माहौल उन्हें याद था। यही माहौल उनके अपने स्कूल का भी था। किताब थी, डाँट थी — और बस।

उन्होंने तय किया कि वो इन बच्चों के साथ वैसा नहीं करेंगी।


शुरुआत में बच्चे उनकी बात नहीं मानते थे। गुड़िया ने डाँटा नहीं। उन्होंने कहानियाँ सुनाईं। खेल करवाए। बच्चों को छोटे-छोटे समूहों में बाँटकर एक-दूसरे से सीखने दिया। साफ-सफाई की आदत बनाई। समय पर आने की तरीफ की — डाँट से नहीं, नाम लेकर।

यह एक दिन का काम नहीं था। गुड़िया हर दिन आती थीं। हर दिन कुछ नया लाती थीं। और हर दिन थोड़ा-थोड़ा देखती थीं कि बच्चे बदल रहे हैं।

धीरे-धीरे बच्चे साफ यूनिफॉर्म पहनकर आने लगे। कक्षा में एक-दूसरे की मदद करने लगे। जो बच्चा पहले कोने में बैठता था, वो अब हाथ उठाने लगा था।

स्कूल के HM और दूसरे शिक्षक देख रहे थे। उन्होंने गुड़िया से कहा कि बदलाव सिर्फ उनकी कक्षा में नहीं, दूसरी कक्षाओं में भी दिखने लगा है।


फिर एग्ज़ाम के बाद PTM हुई।

माता-पिता आए। रिज़ल्ट देखा। और कई माँ-बाप ने वो बात कही जो गुड़िया के लिए सबसे बड़ा पल था।

उन्होंने कहा — "अब बच्चे घर आकर बताते हैं — दीदी ने आज क्या पढ़ाया, कौन-सी गतिविधि हुई, स्कूल में क्या हुआ।"

एक माँ ने कहा — "पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। अब बच्चा खुद से स्कूल जाने की ज़िद करता है।"

गुड़िया यह सुन रही थीं। और शायद उस पल वो अपने उस बचपन के बारे में सोच रही थीं — जब स्कूल सिर्फ किताब और डाँट था। जब कोई गतिविधि नहीं थी, कोई कहानी नहीं थी, कोई यह नहीं पूछता था कि आज कैसा लगा।

उन्होंने वो सब इन बच्चों को दिया — जो उन्हें खुद कभी नहीं मिला था।



आज मंसूरीटोल के उस स्कूल में बच्चे जब सुबह आते हैं, तो एक लड़की का इंतज़ार करते हैं जो उनके साथ खेलेगी, पढ़ाएगी और उनकी बात सुनेगी।

गुड़िया ने किसी को नहीं बताया कि वो यहाँ अपनी पहचान बना रही हैं।

लेकिन बच्चों ने बना दी।


लेखिका परिचय

नाम: ज़ीनत परिचय: रतगाँव, बेगूसराय की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-10 की एडू-लीडर हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2023 लक्ष्य: सामाजिक क्षेत्र में कार्य करना।

Monday, June 8, 2026

पापा ने आज खुद चाय बना ली

सुबह का समय था। मैं उस दिन घर पर ही थी। पापा ने सहजता से पूछा — "आज तुम नहीं गई?"

यह वही पापा थे जिन्हें दो साल पहले मेरा घर से बाहर निकलना असुविधाजनक लगता था। जिन्हें लगता था कि मेरे बिना घर का काम नहीं चलेगा। जो पहले मेरे जाने पर बेचैन हो जाते थे — अब खुद चाय बना लेते हैं। और जब मैं किसी दिन घर पर रुकती हूँ, तो बस इतना पूछते हैं — "आज तुम नहीं गई?"

उस एक सवाल में मुझे दो साल की पूरी यात्रा दिखी।


मेरा नाम जुली कुमारी है। मैं सिंगारपुर गाँव की रहने वाली हूँ। दो साल पहले तक मेरी दुनिया घर, बच्चे और परिवार की ज़िम्मेदारियों तक सीमित थी। मन में इच्छा थी — कुछ और करने की, कहीं और जाने की — लेकिन उसे कहने का साहस नहीं था। मुझे लगता था कि घर ही मेरी प्राथमिक जगह है और वहीं रहना सही है।

फिर मैं i-Saksham की फेलोशिप से जुड़ी।

शुरुआत में बैठकों में कम बोलती थी। अपनी बात रखने से पहले कई बार सोचती थी। लेकिन मुझे समझ आने लगा था कि मेरी बात का भी मूल्य  है। कि मैं जो देख रही हूँ, जो सोच रही हूँ — वो कहने लायक है।

और एक दिन मैंने अपने परिवार के साथ बैठकर सीधे कहा — कि मैं शिक्षा के क्षेत्र में काम करना चाहती हूँ। और इसके लिए घर की ज़िम्मेदारियाँ साझा करनी होंगी।

वो बातचीत आसान नहीं थी। और बदलाव धीरे-धीरे आया — एक झटके में नहीं।

पहले बदले मेरे पति। घर के वो काम जो कभी सिर्फ मेरे हिस्से थे — उन्होंने चुपचाप उठाने शुरू किए। कोई बड़ा एलान नहीं हुआ। बस एक दिन मैंने देखा कि वो खुद कर रहे हैं।

फिर बच्चों ने देखा। और बच्चे भी बदले। अपना बिस्तर खुद ठीक करने लगे। छोटे कामों में हाथ बँटाने लगे। घर में जो ज़िम्मेदारी हमेशा से अदृश्य रही थी — सिर्फ एक इंसान की — वो धीरे-धीरे बँटने लगी।

और पापा — जो पहले मेरे बाहर जाने पर असहज होते थे — अब खुद छोटे काम निपटा लेते हैं। चाय बना लेते हैं। और जब मैं किसी दिन घर पर रुकती हूँ तो बस पूछते हैं — "आज तुम नहीं गई?" उनके उस सवाल में अब रोक नहीं होती। सिर्फ जिज्ञासा होती है।



आज मैं समुदाय में अभिभावकों से बात करती हूँ। बच्चों की उपस्थिति और पढ़ाई पर ध्यान देती हूँ। बैठकों में वो जुली नहीं हूँ जो पहले बोलने से पहले कई बार सोचती थी — अब मैं अपनी बात स्पष्ट रखती हूँ।

और जब भी कोई थकान होती है या लगता है कि बहुत मुश्किल है — तो मुझे वो सुबह याद आती है।

पापा का वो सवाल। उसमें रोक नहीं थी।


लेखिका परिचय

नाम: जुली कुमारी परिचय: सिंगारपुर गाँव की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2024–2026 लक्ष्य: सरकारी नौकरी प्राप्त कर समाज के विकास में योगदान देना।

Friday, May 29, 2026

लड़की का स्कूल छूटना कोई बड़ी बात नहीं

"पढ़ना चाहती हूँ।"

यह इच्छा थी निशा की, जो समूह में एकदम कोने में बैठी थी। 

मेरा नाम चंदा है। 

हर महीने मैं अपने किशोरी समूह की माँओं को भी एक साथ बुलाती हूँ। यह कोई औपचारिक बैठक नहीं होती — बस एक जगह जहाँ माँएँ अपनी बेटियों के बारे में खुलकर बात कर सकें, जहाँ कोई जल्दी नहीं होती, कोई दबाव नहीं होता। इसी बैठक में मुझे पहली बार निशा की माँ से उनकी बेटी के बारे में पता चला था ।

जब मैं पहली बार निशा से मिली, तो वो किशोरी समूह की बैठक में एकदम कोने में छुपी हुई थी। बाकी लड़कियाँ बोल रही थीं, हँस रही थीं — निशा बस देख रही थी। जब मैंने उससे पूछा कि उसे क्या पसंद है, क्या करना चाहती है आगे — तो उसने धीरे से - फुसफुसाते हुए अपनी पढ़ने की इच्छा बताई।

जैसे यह इच्छा उसकी अपनी नहीं थी। जैसे इसे ज़ोर से कहने का हक उसे नहीं था।

उसने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। तीन साल पहले। घर के काम थे, परिवार की ज़िम्मेदारियाँ थीं, और गाँव का वो माहौल था जिसमें लड़की का स्कूल छूटना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती। तीन साल में वो इतनी चुप हो गई थी कि खुद को भी भूलने लगी थी कि कभी पढ़ना चाहती थी।

मैंने तय किया कि मैं उसके साथ बैठती रहूँगी। हर बैठक में। चाहे वो बोले या न बोले।

धीरे-धीरे मैंने उससे उसके सपनों के बारे में बात करना शुरू किया — न एक बार, न दो बार, बल्कि हर बार जब भी हम मिलते। मैंने उससे पूछा कि अगर कोई रोक न हो, तो वो क्या करना चाहेगी। उसने पहले कुछ नहीं कहा। फिर धीरे-धीरे बोलने लगी। मैंने सुना — बस सुना, बीच में कुछ नहीं कहा।

एक दिन मैंने उसे एक काम दिया। कागज़ पर लिखो — इस महीने तुम क्या करना चाहती हो। छोटा-सा, जो सच में हो सके। निशा ने काफी देर सोचा। फिर लिखा — "घर में माँ से बात करूँगी पढ़ाई के बारे में।"

उस लाइन में तीन साल की चुप्पी टूट रही थी।

अगली बैठक में मैंने उससे पूछा — "हुआ?" उसने हाँ कहा। और पहली बार उसके चेहरे पर एक अलग भाव था।

उसी महीने Mothers Meeting में निशा की माँ आईं। मैंने उन्हें कुछ नहीं बताया। बस उनसे पूछा — "निशा कैसी है? आजकल घर में क्या कर रही है?" उन्होंने बताया कि घर के काम और गाँव का माहौल, इसीलिए पढ़ाई छुड़वाई। बातचीत लंबी चली। उन्होंने सुना। और धीरे-धीरे उनकी सोच में कुछ हिला।

उन्होंने कहा — अगर नामांकन हो जाए तो वो उसे भेजने के लिए तैयार हैं।

किशोरी समूह की बैठकों में मैं लगातार निशा के पास बैठती रही। उसे बोलने की जगह देती रही। एक दिन मैंने उससे कहा — "इस बार का लक्ष्य क्या है?" उसने सोचा और कहा — "घर में खुलकर अपनी बात रखूँगी। और दोबारा स्कूल जाऊँगी।"

उसके बाद निशा ने हर दिन अपनी माँ से एक ही बात कही — "मेरा फिर से स्कूल में दाखिला करवा दीजिए।" एक दिन नहीं, दो दिन नहीं — हर दिन। और उसकी माँ ने एक दिन हाँ कर दी।

अप्रैल में निशा का नौवीं कक्षा में नामांकन हो गया।

जिस दिन वो पहली बार स्कूल गई, मैंने उसे देखा। वही निशा थी — लेकिन वो कोने वाली लड़की नहीं थी अब।

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लेखिका परिचय

नाम: लव्ली सिंह

परिचय: मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं। i-Saksham में Buddy के रूप में कार्यरत हैं। 

i-Saksham से जुड़ाव: 2022

लक्ष्य: शिक्षिका बनना।

Friday, May 22, 2026

गंगा पार से स्कूल तक

गंगा पार से स्कूल तक

मेरा नाम सपना है। यह कहानी एक ऐसी लड़की की है जिसे मैंने पहली बार एक किशोरी सेशन में देखा था — चुप, सिकुड़ी हुई, कोने में बैठी। लेकिन कुछ था उसमें जो मुझे रुकने पर मजबूर कर गया।

किशोरी सेशन के दौरान मैं एक-एक लड़की के पास बैठकर यह समझने की कोशिश कर रही थी कि किनका स्कूल में नामांकन है और किनका नहीं। तभी रीमा से मुलाकात हुई। 

ग्यारह साल की रीमा मुंगेर के कल्याण टोला गाँव की रहने वाली थी। बातों-बातों में पता चला कि उसकी पढ़ाई बीच में छूट गई थी और स्कूल में उसका नाम नहीं था।

रीमा की दिनचर्या यह थी — सुबह अपने माता-पिता के साथ गंगा नदी के उस पार जाकर सात-आठ बकरियाँ चराना, शाम को घर लौटकर दो छोटे भाई-बहनों की देखभाल करना और घर के बाकी काम निपटाना। माता-पिता मज़दूरी और पशुओं की देखभाल से घर चलाते थे। इतनी ज़िम्मेदारियों के बीच भी रीमा के मन में पढ़ने की इच्छा कहीं बची हुई थी — भले ही वो खुलकर कह नहीं पाती थी।


और यही सबसे बड़ी चुनौती थी।

रीमा बहुत डरी हुई और संकोची थी। जब भी मैं और ऋतु दीदी उससे बात करते, वह सिमट जाती थी। एक दिन जब हम उसे स्कूल के प्रिंसिपल सर के सामने ले गए, तो वह इतनी घबरा गई कि अपने पिता का सही नाम तक नहीं बता पाई — गाँव का नाम भी ठीक से नहीं निकला उसके मुँह से। उस पल मुझे समझ आया कि रीमा को सिर्फ स्कूल से जोड़ना काफी नहीं है — पहले उसके भीतर इतना भरोसा बनाना होगा कि वो बिना डरे एक कमरे में खड़ी होकर अपना नाम कह सके। और यह भरोसा एक दिन में नहीं बनता।

इसलिए मैंने और ऋतु दीदी ने तय किया कि हम लगातार उसके साथ रहेंगे। 

हर किशोरी सेशन में उसके पास बैठना, उसकी बातें सुनना, उसे बोलने की जगह देना — यह सिलसिला जारी रहा। साथ ही होम विज़िट भी शुरू हुए ताकि उसके घर और परिवार को करीब से समझ सकें। लेकिन रीमा की माँ से मुलाकात होना आसान नहीं था। कई बार घर गई, कई बार लौट आई। यह सिलसिला करीब तीन महीने चला। तीन महीने की लगातार कोशिश के बाद आखिरकार उनसे ठीक से बात हो पाई। जब मैंने रीमा की पढ़ने की इच्छा और उसकी काबिलियत उनके सामने रखी, तो उन्होंने कहा — अगर नामांकन हो जाए तो वो उसे भेजने के लिए तैयार हैं।

यह पहली बड़ी जीत थी। लेकिन अभी रास्ता लंबा था।

विद्यालय में नामांकन के लिए कोशिशें शुरू हुईं — छह महीने तक बातचीत चलती रही, प्रयास होते रहे। इसी बीच प्रिंसिपल सर ने कहा कि नामांकन अप्रैल में होगा, लेकिन तब तक रीमा स्कूल आना शुरू कर दे। रीमा जाने लगी। और तब मुझे पहली बार लगा कि वो लड़की जो कभी अपने पिता का नाम नहीं बता पाई थी, अब रोज़ सुबह उठकर स्कूल का रास्ता नाप रही है — यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव था।

लेकिन कक्षा में बैठते-बैठते रीमा को लगने लगा कि वो बाकी बच्चों से पीछे है, कि वो पढ़ाई में कमज़ोर है। वो डर जो धीरे-धीरे कम हो रहा था, फिर से लौटने लगा था। 

जब यह दिखा, तो मैं फिर से उसे लेकर प्रिंसिपल सर के पास गई। इस बार मैंने सिर्फ नामांकन की बात नहीं की — मैंने रीमा की पूरी कहानी उनके सामने रखी। सर ने सब सुना। और फिर उन्होंने रीमा का निशुल्क नामांकन कर दिया। इतना ही नहीं — उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई शिक्षक रीमा की पढ़ाई में सहयोग नहीं करेगा, तो वो खुद उसे पढ़ाएंगे।

जिस दिन नामांकन हुआ, रीमा के चेहरे पर जो भाव था — वो मैं शब्दों में नहीं रख सकती। 

वो लड़की जो कुछ महीने पहले प्रिंसिपल के सामने अपने पिता का नाम नहीं बता पाई थी, उस दिन अपना नामांकन फॉर्म हाथ में थामे खड़ी थी। उसकी माँ की आँखें भरी हुई थीं।

नौ महीने। तीन महीने माँ को ढूँढने में, छह महीने नामांकन के लिए। इस पूरे वक्त में कई बार लगा कि शायद अब नहीं होगा। लेकिन हर बार रीमा की वो आँखें याद आ जाती थीं — जिनमें पढ़ने की इच्छा थी, भले ही शब्द नहीं थे। और मैं फिर निकल पड़ती थी।


लेखिका परिचय

नाम: सपना कुमारी परिचय: उदयपुर, कलारामपुर, जमालपुर ब्लॉक, मुंगेर की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-7 की एडू-लीडर रह चुकी हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2021 लक्ष्य: समाज में सकारात्मक बदलाव लाना।

Friday, May 15, 2026

"फिर लड़की हो गई…"

"फिर लड़की हो गई…"

6 फरवरी 2018 को जब मैं अस्पताल से घर लौटी, तो नायरा मेरी गोद में थी और घर में एक अजीब-सी चुप्पी थी। मेरी सास ने बच्ची को देखा, मुँह फेर लिया और बस इतना कहा — "फिर लड़की हो गई।" मेरे पति कुछ नहीं बोले। उनका चुप रहना ही उनका जवाब था। उस दिन मैं समझ गई कि इस घर में नायरा को अपनी जगह खुद बनानी होगी — और शायद मुझे भी।

दरअसल उस दिन से थोड़ा पहले — जब नायरा आने वाली थी — घर में कोई साथ आने की स्थिति में नहीं था। शौर्य, मेरा सात साल का बेटा, घर पर था। मैं अकेले पैदल निकल गई अस्पताल की तरफ। रास्ते में दर्द था, लेकिन रुकने का कोई मतलब नहीं था। और जब वापस लौटी — तो जो स्वागत मिला, वो आप जान ही चुके हैं।

उसी महीने घर में पैसों की तंगी बढ़ गई। काम कम मिल रहा था, और जब भी कोई मुश्किल आती, बात घूम-फिरकर वहीं आ जाती — कि इस बच्ची के आने से सब बिगड़ा है। मैं सुनती रहती थी, कुछ कहती नहीं थी। जानती थी कि शब्दों से यह नहीं बदलेगा। जो बदलना था, वो सिर्फ मेरे हाथों से होगा।

इसलिए मैंने एक-एक करके रास्ते ढूँढे। पहले आसपास के दो घरों में काम करना शुरू किया — सुबह पाँच बजे उठकर, अपना घर निपटाकर, फिर दूसरों का। थोड़े पैसे आने लगे, लेकिन महीना पूरा नहीं होता था। तो फिर एक पड़ोसन से सिलाई सीखी। शुरुआत में कई बार कपड़ा बर्बाद हुआ, लोगों ने डाँटा भी, लेकिन मैंने जारी रखा क्योंकि रुकने का कोई विकल्प नहीं था। धीरे-धीरे हाथ बैठने लगा। फिर मोहल्ले के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया — पहले एक, फिर दो, फिर पाँच। महीने के आखिर में दो-तीन सौ रुपये आने लगे, जो उस वक्त मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।

इन सब के बीच रात को कभी-कभी थकान इतनी होती थी कि रोना आ जाता था। लेकिन बच्चों के सामने कभी नहीं रोई। दिन में जो भी हो — शाम को बच्चों के पास बैठ जाती थी। नायरा को पढ़ाती थी, शौर्य के साथ बात करती थी।

उन्हीं दिनों एक शाम शौर्य ने अचानक पूछा — "माँ, लोग दीदी के बारे में ऐसा क्यों बोलते हैं?" मैंने उसे कहा — "लोग जो नहीं समझते, वही बोलते हैं। हमें अपना काम करना है।" लेकिन उस रात मैं देर तक सोचती रही। शौर्य उस वक्त आठ-नौ साल का था। उसने देख लिया था — वो सब जो घर के बड़े देखकर भी अनदेखा कर रहे थे। अपनी बहन के साथ जो हो रहा था, वो उसे गलत लगता था। उसके पास इसके लिए शब्द नहीं थे, लेकिन सवाल था। और उस एक सवाल ने मुझे और मज़बूत कर दिया — कि नायरा की पढ़ाई पर जितना हो सके, उतना ध्यान देना है।

चाहे दिन कितना भी भारी रहा हो, रात को उसके साथ बैठकर ज़रूर पढ़ाती थी। और नायरा भी थी — जो लगन से पढ़ती रही, आगे बढ़ती रही। धीरे-धीरे स्कूल में नंबर अच्छे आने लगे। और एक दिन वो स्कूल से इनाम लेकर घर आई।

उस दिन कुछ बदला। मेरी सास ने पहली बार नायरा की तारीफ की। पड़ोस में किसी ने कहा — "लड़की पढ़ने मे तेज है।" वही लोग जो कभी उसके आने को बोझ कहते थे, अब उसके नंबर सुनकर सिर हिला रहे थे। जिन्होंने उसे जन्म के दिन गोद तक नहीं लिया था, वो अब उसके इनाम की बात गाँव में करने लगी थीं। मेरे पति — जो उस दिन चुप रहे थे — अब कभी-कभी बच्चों के स्कूल भी जाने लगे।

यह बदलाव किसी बहस से नहीं आया था, किसी के समझाने से नहीं आया था। नायरा की अपनी मेहनत ने वो काम किया जो शायद मेरे किसी भी शब्द से नहीं होता।

आज सब कुछ एकदम ठीक नहीं है। लेकिन उस घर में अब कोई खुलकर नायरा के बारे में कुछ गलत नहीं कहता। वो पढ़ रही है। शौर्य पढ़ रहा है। और मेरी सास — जिन्होंने उस दिन मुँह फेर लिया था — आज नायरा के इनाम की बात गाँव में करती हैं।


लेखिका परिचय:

  • नाम: चमन लता

  • परिचय: चमन लता मुंगेर के धरहरा गाँव की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2024 में i-Saksham से जुड़ीं।

  • लक्ष्य: चमन लता का लक्ष्य ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और समाज में जेंडर समानता की सोच को मज़बूत करना है।