Friday, August 28, 2026

"इंटर कर ली हो, अब शादी करवा देंगे।"

 "इंटर कर ली हो, अब तुम्हारी शादी करवा देंगे।"

यह बात मैं कई बार सुन चुकी थी। और हर बार चुप हो जाती थी।

मेरा नाम सुप्रिया है। मैं जमुई जिले के काकन गाँव की रहने वाली हूँ। किसान परिवार की सबसे बड़ी बेटी। बारहवीं के बाद रिश्ते आने लगे थे। जब भी शादी की बात होती, मैं कमरे से बाहर निकल जाती या सिर झुका लेती। मुझे आगे पढ़ना था, कुछ करना था - लेकिन अपनी बात रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। रात को सोचती थी कि क्या मेरी पढ़ाई बारहवीं तक ही थी। सुबह उठकर फिर चुप हो जाती थी।

यह चुप्पी मेरी आदत नहीं थी। यह डर था।

इसी दौरान मैं i-Saksham से जुड़ी और एडू-लीडर बनी।


पहले-पहले समुदाय में काम करना भी आसान नहीं था। लोगों के सामने बोलने में हाथ काँपते थे। सवाल पूछना हो तो दो बार सोचती थी। लेकिन बच्चों और किशोरियों के साथ काम करते हुए धीरे-धीरे कुछ बदला। मैंने देखा कि जिन लड़कियों को मैं आगे बढ़ने के लिए कह रही थी, उनके लिए मैं खड़ी हो सकती थी - लेकिन खुद के लिए नहीं।

यह बात मन में अटक गई।

एक दिन सत्र के बाद घर लौटते हुए मैंने तय किया कि शादी की बात जब भी आएगी, इस बार चुप नहीं रहूँगी। माँ के पास गई। डरते-डरते कहा कि मुझे और पढ़ना है, अभी शादी नहीं करनी। माँ ने सुना, कुछ नहीं बोलीं। पापा के पास गई - वो भी चुप रहे। लेकिन उस दिन के बाद घर में शादी की बात थोड़ी धीमी हो गई। एक बार बोलने से सब नहीं बदला, लेकिन एक दरवाज़ा खुला।


समुदाय में काम करने के लिए रोज़ कई किलोमीटर का सफर था। कभी धूप में पैदल, कभी ऑटो का लंबा इंतज़ार। एक दिन समय पर पहुँचने के लिए बहुत दूर तक पैदल चली। घर लौटते वक्त एक ही बात मन में थी - अगर अपनी स्कूटी होती तो।

उस दिन से थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाने लगी।

जब घर में स्कूटी लेने की बात की, तो वही हुआ जो मुझे पता था होगा। माँ ने कहा लड़की अकेले स्कूटी लेकर कहाँ जाएगी। पापा ने कहा ज़रूरत नहीं है, ऑटो से काम चल जाता है। रिश्तेदारों की बातें अलग थीं। एक बार फिर वही दबाव था - चुप हो जाओ, मान लो।

लेकिन इस बार मैंने अलग तरीका अपनाया।

नाराज़ नहीं हुई। माँ से अलग बैठकर बात की, उनकी चिंता सुनी - कि सड़क पर अकेली लड़की, कुछ हो गया तो। पापा को बताया कि यह शौक नहीं है, यह काम का साधन है और इसके लिए मैंने खुद पैसे बचाए हैं। यह बातचीत एक दिन में नहीं हुई। हफ्तों हुई। कई बार लगा कि नहीं होगा। लेकिन हर बार थोड़ा और बोली, थोड़ा और समझाया।

और एक दिन घरवाले मान गए।


जिस दिन शोरूम से स्कूटी घर आई, मैं बार-बार बाहर जाकर उसे देख रही थी। शुरुआत में भाई पीछे बैठकर रास्ता समझाता था। डर लगता था कि कहीं गाड़ी बंद न हो जाए। लेकिन धीरे-धीरे हाथ पक्के होते गए।

और एक दिन मैं पहली बार अकेले स्कूटी चलाकर समुदाय पहुँची।

काम खत्म होने के बाद कुछ देर वहीं खड़ी रही। उसी रास्ते पर जहाँ कभी ऑटो का इंतज़ार किया करती थी।


आज मैं अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाती हूँ। छोटी बहन की ज़रूरतों में मदद कर पाती हूँ। समुदाय में समय पर पहुँचती हूँ।

और उस घर में जहाँ बारहवीं के बाद शादी की बात होती थी, आज मेरी पढ़ाई और काम की चर्चा होती है।

पहले लोग पूछते थे - "इतना बाहर क्यों जाती हो?"

आज कहते हैं - "अच्छा है, लड़की अपने पैरों पर खड़ी हो रही है।"

वही लोग।


लेखिका परिचय

नाम: सुप्रिया कुमारी
परिचय: काकन गाँव, जमुई जिले की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-10 की एडू-लीडर रह चुकी हैं और वर्तमान में Buddy Intern के रूप में कार्यरत हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2023
लक्ष्य: सरकारी नौकरी प्राप्त कर समाज के विकास में योगदान देना।

Friday, August 21, 2026

"देखते हैं।"

"सत्र में टी-शर्ट पहनकर आइए।"

काजल दीदी ने सीधे मना नहीं किया। बस इतना बोलीं - "देखते हैं।"

अगले हफ्ते सलवार-कमीज़ में आईं। उसके अगले हफ्ते भी।

मेरा नाम शिवानी है। मैं मुंगेर के धरहरा ब्लॉक के घटवारी गाँव की रहने वाली हूँ। काजल दीदी उम्र में 29 साल की हैं, दो बच्चे हैं। घर, बच्चे, खाना - बस यही दुनिया है उनकी। जब मैंने एक दिन पूछा कि रुकती क्यों हैं, तो थोड़ी देर चुप रहीं। फिर बोलीं - "ससुर और सास हैं घर में। पहले से ही कहती हैं कि बाहर जाने का क्या फायदा। अगर ऊपर से ये सब दिखा, तो बस बहाना मिल जाएगा।"

यह डर काल्पनिक नहीं था। यह असली था।

उनकी साथी चमनलता दीदी की बात अलग थी।

चमनलता दीदी 34 साल की हैं। बारह साल का बेटा है, एक बेटी नायरा है। उन्हें लगता था कि बेटा इतना बड़ा हो गया है, अब माँ का टी-शर्ट पहनना अच्छा लगेगा क्या। मन था पहनने का, लेकिन घर में टी-शर्ट थी ही नहीं। खरीदने जाना मतलब पैसे खर्च करना, मतलब घर में बताना, मतलब सवाल।

एक दिन उन्होंने बस इतना कहा - "मेरे पास अपने पैसे नहीं हैं कि जो चाहूँ वो लूँ।"

इस एक लाइन में कितनी बड़ी बात थी।


उस दिन सत्र में एक सवाल पूछा गया - "आपको क्या पसंद है, सिर्फ घर को नहीं, आपको खुद को?" और "आखिरी बार कब कुछ आपने अपने लिए चुना था?"

ये सवाल छोटे लगते हैं। लेकिन जिस महिला ने सालों से सिर्फ दूसरों की पसंद के हिसाब से जिया हो, उसके लिए ये सवाल बहुत गहरे होते हैं।

काजल दीदी घर गईं। अपनी बहन की एक पुरानी जींस थी - साइज़ में फिट थी। रात को निकाली, देखती रहीं।

अगले दिन पहनकर आईं।

चेहरे पर हँसी थी, थोड़ी झिझक भी थी। बोलीं - "दीदी, सब देख रहे थे, अच्छा नहीं लग रहा था।"

इतने में चमनलता दीदी आईं और पूछा - "दीदी, मैं कैसी लग रही हूँ आज?"

सबने दोनों को देखा। सराहना हुई। चमनलता दीदी अपने बारह साल के बेटे की जींस पहनकर आई थीं - एकदम फिट। बार-बार खुद को देखकर मुस्कुरा रही थीं।

और जिनका डर था कि घरवाले क्या कहेंगे - किसी ने ज़्यादा कुछ नहीं कहा।

वो जो बड़ा तूफान आने का डर था, वो आया ही नहीं।


उस दिन जब सत्र खत्म हुआ, काजल दीदी जाते-जाते मुड़कर बोलीं - "अगले हफ्ते फिर पहनकर आऊँगी।"

वही काजल दीदी, जिन्होंने पहले दिन कहा था - "देखते हैं।"


लेखिका परिचय

नाम: शिवानी कुमारी
परिचय: घटवारी गाँव, धरहरा ब्लॉक, मुंगेर की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-7 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2021
लक्ष्य: समाज में सकारात्मक बदलाव लाना।

Friday, August 14, 2026

वो सामने भी नहीं आती थी

"इससे क्या फायदा? यह पढ़ नहीं सकती।"

यह सादिया की माँ ने पहली बार मुझसे कहा था। न गुस्से में, न दुख में, बस इतनी सहजता से, जैसे यह कोई तय बात हो। जैसे उन्होंने बहुत पहले ही मान लिया था कि उनकी बेटी की कहानी यहीं खत्म होती है।

मेरा नाम सलिना खातून है। मैं मुजफ्फरपुर के सकरा प्रखंड के मझौलिया गाँव की रहने वाली हूँ और बैच-12 की एडू-लीडर हूँ।

पहली बार जब मैंने सादिया को देखा, तो वो किशोरी सेशन में किसी कोने में खड़ी थी। जैसे ही कोई उसकी तरफ देखता, वो और सिकुड़ जाती। मैंने उससे बात करने की कोशिश की, लेकिन वो डर के कारण बोली ही नहीं। बस खड़ी रही।

सादिया पाँचवीं पास कर चुकी थी, लेकिन पढ़ना-लिखना नहीं आता था। इस वजह से छठी में दाखिला नहीं हुआ था और दो साल से पढ़ाई छूटी हुई थी। घर के बाहर किसी से बात करना तो दूर, वो सामने भी नहीं आती थी।

मैंने तय किया कि पहले उसकी माँ से बात करूँगी।


माँ से पहली बार मिली तो उन्होंने सुना, लेकिन भरोसा नहीं किया। शायद उन्हें लगा कि यह भी एक और आने-जाने वाली लड़की है जो कुछ दिन बाद भूल जाएगी।

लेकिन मैं जाती रही।

दूसरी बार, तीसरी बार, चौथी बार। हर बार उनसे बात की, उनकी बात सुनी, सादिया के बारे में पूछा। धीरे-धीरे उन्होंने महसूस किया कि मेरा आना रुकने वाला नहीं है। और धीरे-धीरे उन्होंने यह भी महसूस किया कि उनकी बेटी की पढ़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, बस रुकी हुई है।

जब माँ का मन बदला, तो सादिया को सेशन में भेजना शुरू किया। पहले जबरदस्ती। फिर खुद से। और जब उन्होंने देखा कि सादिया घर लौटकर कुछ बताती है, कुछ बोलती है, कुछ सीखकर आती है, तो उनका भरोसा और पक्का होता गया।

सादिया की चचेरी बहनें भी उसे साथ लाने लगीं।

महीने बीते। सात-आठ महीने।


और फिर एक दिन सेशन में सादिया ने खुद हाथ उठाया।

वही सादिया, जो कभी सामने नहीं आती थी, अब गतिविधियों में हिस्सा ले रही थी। दूसरों को भी बुला रही थी। AG टॉक में खुद आगे आकर अपनी बात रख रही थी, अपने लक्ष्य बना रही थी।

जो A, B, C नहीं पहचानती थी, अब वर्णमाला लिखती है। किताब से देखकर लिख लेती है।

इस साल उसका छठी कक्षा में दाखिला हो गया। वो अपनी सहेली के साथ रोज़ पैदल स्कूल जाती है।

और जब भी वो मुझे देखती है, तो खुद आगे बढ़कर बात करती है।

उसकी माँ भी अब खुद पूछती हैं कि अगला सेशन कब है।


लेखिका परिचय

नाम: सलिना खातून
परिचय: मझौलिया गाँव, सकरा प्रखंड, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।
लक्ष्य: शिक्षा के माध्यम से समुदाय में बदलाव लाना।

Friday, August 7, 2026

"तुम्हें कोई काम-धाम नहीं है क्या?"

"तुम्हें कोई काम-धाम नहीं है क्या?"

मेरा नाम रिया है। मैं पूर्णा खैरा की रहने वाली हूँ और बैच-11 की एडू-लीडर हूँ।

जब लोग यह कहते थे, तो मैं मुस्कुरा देती थी। लेकिन घर लौटते वक्त मन में एक ही सवाल होता था — क्या यह सब कभी बदलेगा?

शुरुआत में PTM का नाम सुनते ही लोग बहाने बनाने लगते थे। किसी के पास समय नहीं था, किसी को लगता था कि इससे कुछ फायदा नहीं। माइंडफुलनेस की बात करती तो लोग हँस देते — "ये सब करने से क्या होगा?" और कभी-कभी सीधे कह देते — "तुम्हें कोई काम-धाम नहीं है क्या? बार-बार घर बुलाने चली आती हो!"

मैं चुप रहती। मुस्कुराकर कहती — "चलिए ना, थोड़ी देर बैठकर बात करेंगे।" 

और फिर अगली बार फिर जाती।


i-Saksham में एक बात समझ आई थी — लोगों को बदलने से पहले उनसे जुड़ना ज़रूरी है। इसलिए मैंने हार नहीं मानी। घर-घर जाती रही। उनकी चिंताएँ सुनती रही। बच्चों की पढ़ाई पर बात करती रही। हर बार उसी उम्मीद के साथ — "आज की बैठक में ज़रूर आइए।"

धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा।

पहले जो अभिभावक आने से बचते थे, वो खुद पूछने लगे — "मीटिंग आज ही है ना?" और अगर किसी महीने बैठक नहीं हो पाती, तो फोन आता — "इस बार PTM कब होगी?"



उस दिन की PTM में मैंने शुरुआत माइंडफुलनेस से की।

यही गतिविधि जिसे कभी लोग बेकार समझते थे — उस दिन सब शांत होकर उसमें शामिल हुए। गतिविधि के बाद एक अभिभावक ने मुस्कुराते हुए कहा —

"अब इससे मन हल्का लगता है।"

मुझे अपने वो शुरुआती दिन याद आ गए जब यही लोग इसे मज़ाक में उड़ा देते थे।

बातचीत में बच्चों की पढ़ाई, मोबाइल, खान-पान, दिनचर्या — सब पर खुलकर बात हुई। पहले जो कहते थे कि स्कूल बंद है तो पढ़ाई भी बंद है, वो अब खुद बच्चों की आदतों के बारे में पूछ रहे थे। उत्कर्ष की मम्मी ने बताया कि उनका बेटा अब रोज़ स्कूल जाने से पहले उन्हें प्रणाम करके जाता है। यह सुनकर मुझे पता चला कि जो बातें हम बच्चों के साथ करते हैं, वो घर तक पहुँच रही हैं।

बैठक के अंत में एक अभिभावक ने कहा — "आप महीने में दो बार आइए। आपसे बात करके अच्छा लगता है।"

मैं भावुक हो गई। यही वो लोग थे जो कभी कहते थे — "तुम्हें कोई काम-धाम नहीं है क्या?"


दो साल पहले PTM एक बैठक थी जिसमें कोई नहीं आना चाहता था।

आज वही लोग फोन करके पूछते हैं कि अगली बैठक कब है।


लेखिका परिचय

नाम: रिया सिंह
परिचय: पूर्णा खैरा की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हैं। B.A. पूरी की है।
i-Saksham से जुड़ाव: बैच-11
लक्ष्य: सरकारी नौकरी प्राप्त कर आत्मनिर्भर बनना और शिक्षा के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाना।

Friday, July 17, 2026

इस उम्र में बचत करके क्या करना...

अपनी पेंशन भी बेटे को दे देती हैं

मेरा नाम शिवानी है। मैं बेगूसराय के पिढ़ौली गाँव की रहने वाली हूँ और बैच-12 की एडू-लीडर हूँ।

उस दिन मैं गाँव में घर-घर जाकर लोगों से मिल रही थी। एक घर के बाहर एक बुज़ुर्ग महिला बैठी थीं — आशा देवी। मैं उनके पास बैठ गई। पहले उनके स्वास्थ्य की बात की, घर के हालचाल पूछे। धीरे-धीरे बातचीत खुलने लगी। उन्होंने बताया कि दो बेटे हैं, छोटे के साथ रहती हैं। जब भी ज़रूरत होती है, वही पैसे दे देता है।

जब मैंने पूछा कि क्या वो अपनी पेंशन में से कुछ बचाकर रखती हैं, तो वो थोड़ा मुस्कुराईं और बोलीं —

"नहीं बेटी, इस उम्र में बचत करके क्या करना। जब ज़रूरत पड़ती है, बेटा दे देता है।"

और फिर जो बताया उसने मुझे एक पल के लिए रोक दिया — जो पेंशन हर महीने आती है, वो भी बेटे को दे देती हैं।

वो बात बहुत सहज तरीके से कही गई थी। जैसे इसमें कोई सवाल ही नहीं था। जैसे यही सबसे स्वाभाविक बात है — कि एक बुज़ुर्ग औरत के पास अपना एक रुपया भी न हो, और यह ठीक है।

मैं थोड़ी देर चुप रही।


फिर मैंने पूछा —

"दादी, अगर कभी ऐसा वक्त आ जाए कि आपके बेटे के पास भी पैसे न हों और आपके पास भी एक रुपया न हो — उस दिन क्या करेंगी?"

दादी कुछ नहीं बोलीं। बस सोचने लगीं।

उनकी वो चुप्पी देखकर मैंने आगे कहा — "जब आपका बेटा छोटा था, हर ज़रूरत में आप उसके लिए खड़ी रहती थीं। आज वो आपकी मदद करता है — लेकिन अगर आपके पास भी कुछ होगा, तो जब उसे ज़रूरत पड़ेगी, आप उसका सहारा बन सकती हैं।"

मैंने उनसे कहा कि पेंशन के एक हज़ार एक सौ रुपयों में से दो सौ रुपए भी अलग रख दें हर महीने — बस इतना काफी है शुरुआत के लिए।

दादी थोड़ी देर और चुप रहीं। फिर बोलीं — "ठीक है बेटी, कोशिश करूँगी।" मुझे उस वक्त नहीं पता था कि वो सच में करेंगी या नहीं।

लेकिन उस महीने जब मैं दोबारा उनके घर गई, तो उन्होंने बताया कि उन्होंने दो सौ रुपए अलग रख दिए हैं। पहली बार — अपने लिए।


लेखिका परिचय

नाम: शिवानी कुमारी
परिचय: पिढ़ौली गाँव, बेगूसराय की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2025
लक्ष्य: पुलिस विभाग में जाकर देश और समाज की सेवा करना।