Friday, July 17, 2026

इस उम्र में बचत करके क्या करना...

अपनी पेंशन भी बेटे को दे देती हैं

मेरा नाम शिवानी है। मैं बेगूसराय के पिढ़ौली गाँव की रहने वाली हूँ और बैच-12 की एडू-लीडर हूँ।

उस दिन मैं गाँव में घर-घर जाकर लोगों से मिल रही थी। एक घर के बाहर एक बुज़ुर्ग महिला बैठी थीं — आशा देवी। मैं उनके पास बैठ गई। पहले उनके स्वास्थ्य की बात की, घर के हालचाल पूछे। धीरे-धीरे बातचीत खुलने लगी। उन्होंने बताया कि दो बेटे हैं, छोटे के साथ रहती हैं। जब भी ज़रूरत होती है, वही पैसे दे देता है।

जब मैंने पूछा कि क्या वो अपनी पेंशन में से कुछ बचाकर रखती हैं, तो वो थोड़ा मुस्कुराईं और बोलीं —

"नहीं बेटी, इस उम्र में बचत करके क्या करना। जब ज़रूरत पड़ती है, बेटा दे देता है।"

और फिर जो बताया उसने मुझे एक पल के लिए रोक दिया — जो पेंशन हर महीने आती है, वो भी बेटे को दे देती हैं।

वो बात बहुत सहज तरीके से कही गई थी। जैसे इसमें कोई सवाल ही नहीं था। जैसे यही सबसे स्वाभाविक बात है — कि एक बुज़ुर्ग औरत के पास अपना एक रुपया भी न हो, और यह ठीक है।

मैं थोड़ी देर चुप रही।


फिर मैंने पूछा —

"दादी, अगर कभी ऐसा वक्त आ जाए कि आपके बेटे के पास भी पैसे न हों और आपके पास भी एक रुपया न हो — उस दिन क्या करेंगी?"

दादी कुछ नहीं बोलीं। बस सोचने लगीं।

उनकी वो चुप्पी देखकर मैंने आगे कहा — "जब आपका बेटा छोटा था, हर ज़रूरत में आप उसके लिए खड़ी रहती थीं। आज वो आपकी मदद करता है — लेकिन अगर आपके पास भी कुछ होगा, तो जब उसे ज़रूरत पड़ेगी, आप उसका सहारा बन सकती हैं।"

मैंने उनसे कहा कि पेंशन के एक हज़ार एक सौ रुपयों में से दो सौ रुपए भी अलग रख दें हर महीने — बस इतना काफी है शुरुआत के लिए।

दादी थोड़ी देर और चुप रहीं। फिर बोलीं — "ठीक है बेटी, कोशिश करूँगी।" मुझे उस वक्त नहीं पता था कि वो सच में करेंगी या नहीं।

लेकिन उस महीने जब मैं दोबारा उनके घर गई, तो उन्होंने बताया कि उन्होंने दो सौ रुपए अलग रख दिए हैं। पहली बार — अपने लिए।


लेखिका परिचय

नाम: शिवानी कुमारी
परिचय: पिढ़ौली गाँव, बेगूसराय की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2025
लक्ष्य: पुलिस विभाग में जाकर देश और समाज की सेवा करना।

Friday, July 10, 2026

चूल्हा-चौका संभालना है

"चूल्हा-चौका संभालना है"

मेरा नाम श्रृंखला है। मैं गया के बाँके बाज़ार ब्लॉक के टंडवा गाँव की रहने वाली हूँ।

परसा चुआं एक छोटा-सा गाँव है। पाँचवीं तक का स्कूल गाँव में था — उसके बाद आगे पढ़ना हो तो परसावां खुर्द जाना पड़ता था, जो दस किलोमीटर दूर है। बीच में जंगल है। बस नहीं चलती, ऑटो का किराया देने के पैसे नहीं हैं। तो लड़के साइकिल लेकर जाते थे।

और लड़कियाँ घर पर रहती थीं।

जब भी कोई लड़की माता-पिता से साइकिल माँगती, तो एक ही जवाब आता — "तुम्हें साइकिल नहीं मिलेगी। तुम्हारे भाई को दे दी है। तुम पढ़कर क्या करोगी — आखिर दूसरे घर जाकर चूल्हा-चौका ही संभालना है।" और इसके पीछे एक डर भी था — जंगल का रास्ता, दस किलोमीटर, अकेली लड़की।

यह जवाब इतनी बार दिया गया था कि लड़कियाँ खुद भी माँगना बंद कर चुकी थीं।



इसी गाँव में सुमन होम विज़िट के दौरान पहुँची थीं।

जब उन्होंने लड़कियों से बात की, तो सबने एक ही बात कही — पढ़ना चाहती हैं, लेकिन साइकिल नहीं है। सुमन ने सुना। और फिर अभिभावकों के घर जाना शुरू किया — एक बार नहीं, बार-बार। PTM करवाई। घर-घर बैठकर बात की। अपना उदाहरण दिया। यह नहीं कहा कि आप गलत हैं — बस यह पूछती रहीं कि अगर आपकी बेटी पढ़ ले, तो क्या बुरा है।

शुरुआत में कोई नहीं माना।

सुमन फिर भी जाती रहीं।

धीरे-धीरे कुछ हिला। छह लड़कियों में से तीन के घर वाले साइकिल देने के लिए तैयार हुए।

तीन साइकिलें। छह लड़कियाँ।


उन्होंने तय किया — दो-दो मिलकर एक साइकिल पर जाएँगी। जब एक थक जाए, दूसरी चलाएगी। और वे निकल पड़ीं — हर सुबह, जंगल पार करके, दस किलोमीटर।

बाद में उन लड़कियों ने सुमन से कहा —


"दीदी, जब हम थक जाती हैं तो दूसरी साइकिल संभाल लेती है। हम रुकती नहीं।"

वो एक साइकिल की बात नहीं थी। वो छह लड़कियाँ थीं जो एक-दूसरे का सहारा बनकर हर सुबह दस किलोमीटर का जंगल पार कर रही थीं — उस जवाब के बावजूद जो उन्हें बचपन से सुनाया गया था।


उनकी लगन देखकर गाँव की पाँच और लड़कियाँ आगे आईं। जिन घरों में जल्दी शादी की बात चलती थी, वहाँ थोड़ा रुकाव आया। जो बच्चे ईंट-भट्ठों पर काम करते थे, उनमें से कुछ स्कूल में दिखने लगे।

और वो छह लड़कियाँ — जिन्हें बताया गया था कि साइकिल उनके लिए नहीं है, कि पढ़ाई उनके लिए नहीं है, कि उन्हें तो बस चूल्हा-चौका संभालना है — उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास कर ली।



लेखिका परिचय

नाम: श्रृंखला कुमारी
परिचय: टंडवा गाँव, बाँके बाज़ार ब्लॉक, गया की रहने वाली हैं। i-Saksham में Buddy के रूप में कार्यरत हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2021
लक्ष्य: लाइब्रेरियन बनना।

Thursday, July 2, 2026

"बच्चों को छोड़कर बाहर जाना तुम्हें शोभा नहीं देता"

 "बच्चों को छोड़कर बाहर जाना तुम्हें शोभा नहीं देता"

मेरा नाम लखी कुमारी सिंह है। मैं जमुई जिले की रहने वाली हूँ और i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हूँ।

जब मुझे पता चला कि बिहार दिवस के मौके पर पटना के गांधी मैदान में i-Saksham के स्टॉल का प्रतिनिधित्व करने के लिए मेरा नाम चुना गया है, तो पहला एहसास खुशी का था। लेकिन घर में बात रखते ही जो सुना, वो जाना-पहचाना था —

"बच्चों को छोड़कर बाहर जाना तुम्हें शोभा नहीं देता।"

यह पहली बार नहीं था जब यह बात कही गई थी। लेकिन इस बार दाँव ज़्यादा था — तीन दिन, घर से दूर, पति और बच्चों के बिना। मैं दो बच्चों की माँ हूँ। घर की ज़िम्मेदारियाँ, खाना बनाना, बच्चों की देखभाल — यह सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। तीन दिनों के लिए यह सब छोड़कर जाना आसान फैसला नहीं था।

मेरे पति ने कहा कि इतने दिन बाहर रहने की क्या ज़रूरत है। आसपास के लोगों की बातें भी कानों में गूँज रही थीं। मैं समझ सकती थी कि इन बातों में चिंता भी थी और समाज की पुरानी सोच भी। लेकिन इस बार मैंने चुप रहने के बजाय अपनी बात रखी — कि यह सिर्फ यात्रा नहीं है, यह अपने काम को एक बड़े मंच पर ले जाने का मौका है।

बात आसानी से नहीं बनी। तब मैंने अपने ससुर से बात की — जो हमेशा मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उन्होंने सुना और साथ दिया। मेरी Buddy ने भी परिवार से बातचीत की। कई बातचीतों के बाद परिवार तैयार हुआ।


अनुमति मिलने के बाद भी मैं पूरी तरह निश्चिंत नहीं थी।

सामान पैक करते वक्त ध्यान बार-बार बच्चों की तरफ जाता था — समय पर खाना खाएँगे या नहीं, कोई ज़रूरत हुई तो कौन देखेगा। लेकिन एक बात मन में थी — अगर इस बार पीछे हट गई, तो शायद खुद पर भरोसा करने का एक बड़ा मौका खो दूँगी।

जब टीम के साथ निकली, तो मन में उत्साह और चिंता दोनों थे। रास्ते में साथियों से बातें हुईं, हँसी हुई — और देखते-देखते सफर कब बीत गया, पता नहीं चला।



गांधी मैदान में i-Saksham के स्टॉल पर मेरी ज़िम्मेदारी सिर्फ खड़े रहने की नहीं थी। लोगों से बातचीत करनी थी, बताना था कि i-Saksham क्या है, Voice & Choice क्या है, लड़कियों के नेतृत्व के लिए हम क्या करते हैं।

शुरुआत में थोड़ी झिझक हुई। लेकिन धीरे-धीरे सहज होती गई। जब लोग रुककर ध्यान से सुनते थे, तो मुझे अपने वो शुरुआती दिन याद आते थे — जब मैं खुद दस लोगों के सामने बोलने से हिचकिचाती थी।

तीन दिन तक लगातार लोगों से संवाद किया। सवालों के जवाब दिए। अनुभव साझा किए।


घर लौटकर जब बच्चों से मिली, तो एक बात साफ थी।

गांधी मैदान पहुँचना सबसे बड़ी बात नहीं थी।

सबसे बड़ी बात यह थी कि जिस महिला से कहा गया था कि बच्चों को छोड़कर बाहर जाना शोभा नहीं देता — वही महिला तीन दिन तक एक बड़े मंच पर अपने संगठन की आवाज़ बनकर खड़ी रही।

और घर में सब ठीक था।


लेखिका परिचय

नाम: लखी कुमारी सिंह
परिचय: जमुई जिले की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2024
लक्ष्य: अपने समाज में Voice and Choice को बढ़ावा देना और हर दिन कुछ नया सीखकर अपने गाँव और समुदाय में बदलाव लाना।

Monday, June 15, 2026

जिस वजन को मैं हिला नहीं पाई

मेरा नाम शिवानी है। मैं मुंगेर के धरहरा ब्लॉक के घटवारी गाँव की रहने वाली हूँ।

पेशरा गाँव पहुँचने से पहले ही रास्ता बताने लगा था कि यहाँ ज़िंदगी कैसी है। सड़क कहीं-कहीं थी, कहीं-कहीं नहीं। हम स्कूटी से गए थे — इसलिए पहुँच पाए। लेकिन पूरे रास्ते एक सवाल मन में आता रहा — अगर स्कूटी नहीं होती, तो क्या मैं भी वहाँ तक पहुँच पाती?

गाँव में पहुँचकर पता चला कि वहाँ न ऑटो चलता है, न ई-रिक्शा। लोगों के लिए पैदल चलना ही सबसे बड़ा सहारा है। और यह भी पता चला कि गाँव की कई महिलाएँ हमें देखकर रुक गई थीं — क्योंकि उन्होंने पहली बार किसी लड़की को स्कूटी चलाते देखा था।

यह सुनकर कुछ देर के लिए मैं भी रुक गई।


प्रमिला दीदी के घर पहुँची तो देखा कि खाना आज भी चूल्हे पर बनता है। घर के बाहर लकड़ियों का एक गट्ठर रखा था। मैंने उसे उठाने की कोशिश की — वो मुझसे हिला तक नहीं।

वही गट्ठर प्रमिला दीदी रोज़ पहाड़ों और जंगलों से ढोकर लाती हैं।

उनकी दिनचर्या यह है — सुबह उठकर घर का काम, फिर जंगल जाकर लकड़ी लाना, खाना बनाना, दो बच्चों की देखभाल, बुज़ुर्ग सास की जिम्मेदारी जो काम के बाद भी कहती हैं कि समय पर खाना नहीं मिला, और पति जो बाहर काम करते हैं और खुद भी बीमार रहते हैं। इन सबके बीच प्रमिला दीदी अपने घर से आधे घंटे पैदल पहाड़ी रास्तों पर चलकर गोरैया के सामुदायिक भवन पहुँचती हैं — जहाँ वो किशोरियों के साथ सेशन करती हैं।

कभी-कभी छोटे बच्चे को गोद में लेकर।



प्रमिला दीदी ST समुदाय से आती हैं। उनके समुदाय में लड़कियों का आगे बढ़ना आसान नहीं रहा — कम उम्र में शादी, पढ़ाई का जल्दी छूटना, और यह जुमला जो बार-बार सुनाई देता था — "ज़्यादा पढ़ोगी तो ठीक नहीं होगा।"

i-Saksham से जुड़ने से पहले भी उन्होंने कोशिश की थी — कहीं काम करने की, कुछ करने की। लेकिन धमकियाँ आईं, रुकावटें आईं। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी बात कहना ही कम कर दिया था।

फिर i-Saksham से जुड़ीं। जमालपुर में ट्रेनिंग के लिए पहुँचीं।

शुरुआत में लोगों के सामने बोलना मुश्किल था। लेकिन उनकी Buddy शिवानी लगातार साथ रहीं। धीरे-धीरे एक बात समझ आई — कि अगर वो खुद नहीं बोलेंगी, तो उनके समुदाय की लड़कियाँ कैसे बोलना सीखेंगी।


उन्होंने सेशन शुरू किए। शुरुआत में एक लड़की आती थी, कभी दो। कई लड़कियाँ यह नहीं समझती थीं कि इन बैठकों का क्या फायदा।

प्रमिला दीदी फिर भी जाती रहीं।

धीरे-धीरे लड़कियाँ आने लगीं। सवाल पूछने लगीं। अपने भविष्य के बारे में सोचने लगीं। और एक दिन वो भी हुआ जो उस समुदाय में पहले कभी नहीं हुआ था — कुछ किशोरियाँ i-Saksham का इंटरव्यू देने जमालपुर तक पहुँचीं।

आज उनके समुदाय से दस-बारह किशोरियाँ नियमित रूप से सीखने की प्रक्रिया से जुड़ी हैं।


जब मैं वापस लौट रही थी, तो मुझे वो गट्ठर याद आया जो मुझसे हिला नहीं था। प्रमिला दीदी उसे रोज़ उठाती हैं।

और उसके बाद भी — चलती रहती हैं।


लेखिका परिचय

नाम: शिवानी कुमारी परिचय: घटवारी गाँव, धरहरा ब्लॉक, मुंगेर की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-7 की एडू-लीडर रह चुकी हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2021 लक्ष्य: समाज में सकारात्मक बदलाव लाना।

Friday, June 12, 2026

"दीदी ने आज क्या पढ़ाया"

मेरा नाम ज़ीनत है। मैं बेगूसराय के रतगाँव की रहने वाली हूँ।

जब गुड़िया पहली बार मंसूरीटोल के उस स्कूल में बच्चों के साथ काम करने गईं, तो जो दिखा वो कुछ ऐसा था जो उन्हें जाना-पहचाना लगा। बच्चे ध्यान नहीं देते थे। होमवर्क अधूरा रहता था। कक्षा में शोर रहता था। समय पर कोई नहीं आता था।

गुड़िया यह सब देखती थीं — और चुपचाप सोचती थीं। क्योंकि यह माहौल उन्हें याद था। यही माहौल उनके अपने स्कूल का भी था। किताब थी, डाँट थी — और बस।

उन्होंने तय किया कि वो इन बच्चों के साथ वैसा नहीं करेंगी।


शुरुआत में बच्चे उनकी बात नहीं मानते थे। गुड़िया ने डाँटा नहीं। उन्होंने कहानियाँ सुनाईं। खेल करवाए। बच्चों को छोटे-छोटे समूहों में बाँटकर एक-दूसरे से सीखने दिया। साफ-सफाई की आदत बनाई। समय पर आने की तरीफ की — डाँट से नहीं, नाम लेकर।

यह एक दिन का काम नहीं था। गुड़िया हर दिन आती थीं। हर दिन कुछ नया लाती थीं। और हर दिन थोड़ा-थोड़ा देखती थीं कि बच्चे बदल रहे हैं।

धीरे-धीरे बच्चे साफ यूनिफॉर्म पहनकर आने लगे। कक्षा में एक-दूसरे की मदद करने लगे। जो बच्चा पहले कोने में बैठता था, वो अब हाथ उठाने लगा था।

स्कूल के HM और दूसरे शिक्षक देख रहे थे। उन्होंने गुड़िया से कहा कि बदलाव सिर्फ उनकी कक्षा में नहीं, दूसरी कक्षाओं में भी दिखने लगा है।


फिर एग्ज़ाम के बाद PTM हुई।

माता-पिता आए। रिज़ल्ट देखा। और कई माँ-बाप ने वो बात कही जो गुड़िया के लिए सबसे बड़ा पल था।

उन्होंने कहा — "अब बच्चे घर आकर बताते हैं — दीदी ने आज क्या पढ़ाया, कौन-सी गतिविधि हुई, स्कूल में क्या हुआ।"

एक माँ ने कहा — "पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। अब बच्चा खुद से स्कूल जाने की ज़िद करता है।"

गुड़िया यह सुन रही थीं। और शायद उस पल वो अपने उस बचपन के बारे में सोच रही थीं — जब स्कूल सिर्फ किताब और डाँट था। जब कोई गतिविधि नहीं थी, कोई कहानी नहीं थी, कोई यह नहीं पूछता था कि आज कैसा लगा।

उन्होंने वो सब इन बच्चों को दिया — जो उन्हें खुद कभी नहीं मिला था।



आज मंसूरीटोल के उस स्कूल में बच्चे जब सुबह आते हैं, तो एक लड़की का इंतज़ार करते हैं जो उनके साथ खेलेगी, पढ़ाएगी और उनकी बात सुनेगी।

गुड़िया ने किसी को नहीं बताया कि वो यहाँ अपनी पहचान बना रही हैं।

लेकिन बच्चों ने बना दी।


लेखिका परिचय

नाम: ज़ीनत परिचय: रतगाँव, बेगूसराय की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-10 की एडू-लीडर हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2023 लक्ष्य: सामाजिक क्षेत्र में कार्य करना।