Thursday, February 4, 2021

एक नई पहल कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की बच्चियों के अभिभावक के साथ पहला अनुभव

- प्रिया कुमारी 


दरवाजे भी खुलेंगे
पहले ताला तो हटाओ
दिखेगी नई रोशनी 
ज़रा पलके तो उठाओ
रास्ते भी नए मिलेंगे
कुछ कदम तो बढ़ाओ...

आज मैं और मोनिका PTM (अभिभावक शिक्षक बैठक )  करवाने मनियड्डा  गए । जब PTM से 2 दिन पहले मैंने बच्चियों को बताया कि मैं और मौनिका उनके गाँव आ रहे हैं तो बच्चियां  खुशी से उछल पड़ी|  जन मैंने उन्हें बताया कि आपके अभिभावक  से मिलना है, तो बच्च्चियां कुछ देर के लिए शांत हो गयी फिर पूछती है "दीदी क्या हो गया हम लोग कुछ गलती किये क्या?" इस पर मैंने उन्हें कहा कि हम बस मिलने आ रहे हैं, आप लोग अपने घर मे बोल दीजियेगा। 

   

आज सुबह जब जाने का दिन आया तो मेरे मन मे एक खुशी और डर दोनों था की यह सब कैसे होगा? क्या कर पाएंगे? क्योंकि हमदोनो ही नये थे। हम दोनो ने आज से पहले कहीं PTM नहीं करायी थी| हाँ, अपने अपने गांव में खुद जरूर की था । फिर भी मेरे मन मे एक ही सवाल चल रहा था कि क्या यह मुझसे हो पायेगा? क्या मैं उनके सारे सवालो के जवाब दे पाउंगी? पर एक खुशी भी थी कि हम लोग एक नई पहल करने जा रहे है। तो कोशिश करती हूँ, अच्छे से कर पाऊ । मैं अपनी खुशी सब के सामने जाहिर कर रही थी पर जो डर था उसको मे किसी के सामने जाहिर नहीं कर पा रही थी। 


मैं और मोनिका PTM के लिए निकल गए l हम दोनों के मन में  डर था पर किसी से कोई साझा नहीं कर पा रहे थे कि मुझे डर लग रहा है|


हमलोग मनियड्डा पहुँच गए । कुछ पेरेंट्स और बच्ची हमलोगों का इंतजार कर रही थी। ये देख कर ही अंदर से खुशी हुई कि लोग अपना कीमती समय को निकाल कर आए है । 

नमस्ते से शुरुआत हुई । हमलोगों ने अपने बारे मे बताना शुरू किया| फिर और भी लोग आये । हमने अपने और i-सक्षम के बारे में बताया। मेरी बातो को सभी बहुत ध्यान से सुन रहे थे । फिर मैंने उनसे उन के बारे में पुछा और वे भी अपनी बातो को खुल के बता रहे थे। हमलोग एक दूसरे से जुड़ पाये । हमारी शुरुआत अच्छी रही ।


जैसे - किसी का कहना था "आपलोगो ने फोन देकर बहुत अच्छा काम किया है । जो बच्ची हमेशा खेलती थी वो आज इस फोन के जरिये कम से कम पढ़ तो रही है।" किसी ने कहा की "मै बच्ची को पढ़ते देखी दिन भर बच्ची पढ़ते रहती है घर जा कर भी पढ़ती है ।" किसी ने कहा की "दिन भर खेलने से अच्छा की सब एक साथ पढ़ती तो है।" तो किसी ने कहा कि "आप मेरी बच्ची के लिए इतना सब कर रहे है पर जो शिक्षक पैसा ले कर पढ़ाते है वो भी इतना मेहनत नही करते है।"

उनकी बातो से ये साफ पता चल रहा था कि अपनी बच्चियों की पढाई को देखकर वो भी खुश है ।  उनका कहना था की बच्ची मन से पढ़ती है  । उनकी बातो से ऐसा लगा की वो बच्चों के ऑनलाइन क्लास से वे बहुत खुश है । 


हमने अभिभावकों के साथ एक छोटी सी गतिविधि की जहां उन्हें अपने बच्चों के बारे में  कोई 2 ऐसी बातें हमारे साथ साझा करनी थी, जो उन्हें  अच्छी लगती हो l सब से अच्छा ये रहा कि सभी ने बताया कि उनके बच्चों में क्या अच्छा है ।

अंत मे हम लोगो ने उनसे एक पेड़  बनाने की गतिविधि कराई  जो उन्हें अंगूठे से बनाना था| यह गतिविधि काफी अच्छी रही| सभी अपना अंगूठा लगाते समय कह रहे थे की एक सूखे पेड़ में  हरियाली डाल रहे है । (हमारा हाथ शिक्षा और पर्यावरण दोनो  के साथ है) ये हमारा पहला PTM सफल रहा और बहुत कुछ सीख भी दे गया ।

 

Wednesday, December 23, 2020

कोई बच्चा छूटे ना , कोई बच्चा रुके ना

आज कोरोना महामारी का सामना पुरे देश को करना पड़ रहा है | हम सभी  के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण रहा है | 


जहाँ एक और कोरोना से लोगों के स्वास्थ पर भारी असर पड़ा हैं, वहीँ दूसरी और बच्चों की शिक्षा भी बहुत प्रभावित हुई है| लॉकडाउन लगने से लेकर अब तक  सभी  विद्यालय व संस्थान बंद है | ऐसे मे बच्चों को शिक्षा मिल पाना बहुत मुश्किल हो गया है और यह समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में और भी विषम हो गयी है|  माता-पिता भी अपने  बच्चे के शिक्षा को लेकर बहुत चिंतित है कि इस स्थित में अपने बच्चे को कैसे शिक्षा से  जोड़ा जाए | ऐसे में सराधी गाँव की एक युवती गुलमेहर इस परिस्तिथि का सामना कर अपने गाँव के बच्चों की शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं का निदान कर रही हैं|


गुलमेहर आई सक्षम के बैच  3rd  की  फेलो  हैं | वे मुंगेर जिले के सराधी गांव की  निवासी है |  यह गांव कई टोले में बंटा हुआ है | गुलमेहर लॉकडाउन के पहले   बच्चों को स्कूल में पढ़ाती थी |  स्कूल गांव के मध्य में आता है जहाँ सभी बच्चे एक साथ पढने आ जाते थे| लेकिन अचानक लॉकडाउन हो जाने के कारण बच्चों का स्कूल आना बंद हो गया | लेकिन गुलमेहर ने पढ़ाना बंद नही किया|  उन्होंने बच्चों को फोन के माध्यम से पढ़ाना शुरु किया |  जब तक लॉकडाउन लगा रहा तब तक गुलमेहर बच्चों को फोन  कॉल केे माध्यम से ही पढ़ाती रही |  लॉकडाउन खत्म होने के बाद गुलमेहर ने अपने सेंटर पर अपने आस पास के कुछ  बच्चों को सोशल दिस्टेंसिंग व् साफ़ सफाई का पालन कर  पढ़ाना शुरु किया|


 बच्चों को घर पर बुलाकर पढ़ाने में एक समस्या यह आ रही थी कि जगह की कमी के कारण सभी बच्चे पढने के लिए नही आ सकते थे| साथ ही महामारी के चलते उन्हें कम से कम बच्चों को बुलाना ही ठीक लगा| इसलिये उन्होंने बच्चो को उनके स्तर के अनुसार अलग -अलग समूह में बाँट दिया और उन्हें अलग अलग बैच में पढाना शुरू किया| 


जैसे की हमने पहले भी जाना की सराधी गांव बहुत सारे टोले में बटा हुआ है, इनमें से कुछ टोले गुलमेहर के घर से काफी दूरी पर है | जिस कारण दूर के बच्चे केे  गुलमेहर केे यहाँ नही पहुँच पाते थे | गुलमेहर इन दूर रह रहे बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित थी और वे किसी न किसी तरह उन बच्चों तक शिक्षा पहुचना चाहती थीं| वे जानती थी कि अगर इन बच्चों का पढाई से जुड़ाव छूट गया तो उन्हें वापस उनके शैक्षणिक स्तर पर लाने के लिए बहुत प्रयास करना होगा| उन्होंने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने केे लिए बच्चों को वर्कशीट के माध्यम से पढ़ाने के बारे में सोचा (वर्कशीट जिसमे गणित , हिन्दी, अंग्रेजी के विषय के प्रयास, प्रश्न व उतर रहते है जिसे बच्चे खुद  बनाते हैं )| फिर क्या था, अगर वे बच्चे गुलमेहर तक नही पहुँच पाए, गुलमेहर उन तक जा पहुंची| उन्होंने दूर रह रहे हर बच्चे के घर जा कर वर्कशीट बांटी और साथ ही बच्चों के अभिभावकों से बात की| अभिभावकों से बातचीत के दौरान गुलमेहर ने उन्हें बच्चों को शिक्षा के प्रति उनके संभव सहयोग के बारे में बताया| साथ ही उन्होंने घर के शिक्षित सदस्य को worksheet को किस तरह से बच्चों को समझाना है, यह भी बताया|


कुछ सप्ताह बाद अभिभावकों व् बच्चों में गुलमेहर के प्रयास के प्रति ख़ुशी नज़र आई और उन्होंने गुलमेहर के प्रयासों की प्रशंसा की| जब एक दिन गुलमेहर को बच्चों के घर पहुँचने में थोड़ी देर हो गई तो बच्चे वर्कशीट के लिए गुलमेहर का इंतजार रहे थे| वे अपने घरों से बहार रोड के किनारे खड़े देख रहे थे कि गुलमेहर कब वर्कशीट लेकर आएगी| गुलमेहर द्वारा बच्चों से उनके रोड के किनारे खड़े होने का कारण जान्ने पर बच्चों ने बताया कि अगर वे पहले से रोड के किनारे  पहुँचकर खड़े रहेंगे तो गुलमेहर को पैदल ज्यादा दूरी नही तय करनी पड़ेगी| बच्चों में शिक्षा के प्रति यह उत्साह व् गुलमेहर के प्रति इस स्नेह को देख गुलमेहर फूले न समाई और उन्हें खुद पर और अपने बच्चों पर बेहद गर्व हुआ| अब बच्चे हर बार गुलमेहर से पहले पहुँच जाते थे | बच्चे पूरे मन से वर्कशीट पर कार्य करते हैं और उनके अभिभावक उन्हें इसमें पूरा सहयोग करते हैं|


एक ऐसे समाज का हिस्सा होने के बावजूद जहाँ महिलाओं को बहुत अधिक गाँव से बाहर अकेले आने जाने की छूट नही है, गुलमेहर ने अपने साहस के दम पर यह कार्य कर दिखाया| यह एक अहम् और चुनौती पूर्ण कार्य था परन्तु अपने गाँव के बच्चों की शिक्षा के ऊपर गुलमेहर को उस वक़्त कुछ नही दिखा और उनकी मेहनत रंग लाई  | वे  इन परिस्थितियों में भी बच्चों तक शिक्षा पहुँचाने में कामयाब रहीं | बच्चों का खुद चलकर आना , अभिभावकों का पूर्ण सहयोग मिलना, यह सब इन बातों को दर्शाता है की बच्चों के साथ -साथ अभिभावक में  भी शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है और पिछड़े इलाकों में भी अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति चिंतित हैं|  गुलमेहर ने समुदाय में अपना मजबूत रिश्ता बनाया है और समाज का विश्वास हासिल किया है| 


गुलमेहर अब स्कूल खुलने का बेसब्री से इंतजार कर रही है | वे वापस अपने विद्यालय के उस परिवार से मिलने के लिए इच्छुक है जिसके साथ वह रोज़ समय बिताती और उन्हें नयी नयी चीज़ें सिखाती| वहीँ दूसरी और बच्चे भी वापस कक्षा में आने का इंतज़ार कर रहे हैं|  गुलमेहर का कहना है - परिस्थितियाँ जैसी भी हों, कोई बच्चा रुके ना कोई बच्चा छूटे ना! 


Monday, November 23, 2020

साक्षी कुमारी: परिस्तिथियों से परे बच्चों को एक बेहतर बचपन देने की ओर!

-रोहित कुमार

कभी- कभी कुछ परिस्थितियां ऐसी आ जाती हैं जिसमे हमे सावधानी बरतने की जरुरत होती है| और यही  बात अगर बच्चों  से जुड़ी हो  तो वो और भी जरुरी और जिम्मेदारी पूर्ण हो जाती है| कुछ ऐसी ही एक समस्या का हल हमारी एक एडू-लीडर ने अपनी सूझबूझ से निकाला|


यह कहानी साक्षी की है | साक्षी जीविका आई-सक्षम फ़ेलोशिप कार्यक्रम के प्रथम बैच की एडू-लीडर हैं| साक्षी का घर मुंगेर जिला के फरदा गांव में स्थित है जो की  गंगा नदी किनारे बसा हुआ है| यहां जब भी बारिश होती है तो पूरे आसपास के इलाके जलमग्न हो जाते हैं| इसके कारण लोगों को कहीं आने- जाने में बहुत दिक्कत होती है | साक्षी भी उन्हीं लोगों में से एक है | 


साक्षी अपने ही गाँव के प्राथमिक विद्यालय में रोज़ ढाई घंटा बच्चों को पढाती हैं| कोरोना में स्कूल बंद हो जाने के चलते वे social distancing व् अन्य बचाव का पालन कर बच्चों को घर पर ही पढ़ा रही थीं| कुछ सप्ताह पहले साक्षी के गाँव में कुछ दिनों तक लगातार वर्षा हुई जिससे इनका पूरा  क्षेत्र जल - थल  हो गया और बच्चों को पढने आने में दिक्कत होने लगी | साक्षी इस तरह की स्थिति को देख बहुत चिंतित हुई | उन्हें इस बात का अच्छे से ज्ञात था की बच्चे अगर इतने पानी में आएंगे तो डूब भी सकते हैं और कोरोना का भी भय बना रहेगा | 


यह सब देखते हुए साक्षी ने सावधानी बरती और बच्चों को कुछ दिनों केे लिए पढने के लिए आने से मना कर दिया | उन्होंने बच्चों को यह सूचित कर दिया कि जब तक  बारिश थम ना जाए तब तक कक्षा नहीं होगी | बच्चों केे अभिभावक भी बच्चों की पढ़ाई को लेकर चिंतित थे | वे साक्षी के शिक्षण से बहुत प्रभावित भी थे | बच्चों की पढ़ाई रुक ना जाए इसके लिए उन्होंने साक्षी को फोनने कर उनसे बच्चों को अपने घर आकर पढ़ाने के लिए कहा | साक्षी भी बच्चों को पढ़ाना चाहती थी लेकिन रास्ते में पानी जम जाने के कारण साक्षी उनके घर जाने में असमर्थ थी| साथ ही साथ कोरोना का डर भी मंडरा रहा था|


जहाँ साक्षी एक और बच्चों की पढाई को लेकर चिंतित थी वहीँ दूसरी और उन्हें इस बात की ख़ुशी थी कि किस तरह बच्चों के अभिभावक ऐसी स्तिथि में भी बच्चों की शिक्षा के प्रति चिंतित हैं और उन्हें पढ़ते देखना चाहते हैं| साक्षी ने अभिभावकों को अच्छे से समझाया की बारिश से हुई जलजमाव के कारण वे अभी बचों को अपने पास बुलाकर पढाने में असमर्थ हैं परन्तु अगर अभिभावकों का सहयोग हो तो वे बच्चों को फ़ोन के माध्यम से पढ़ाएंगी| अभिभावकों को साक्षी की इस बात से बहुत ख़ुशी हुई और वे सहयोग करने के लिए राज़ी हो गये| 


अभिभावकों के सहयोग से साक्षी फ़ोन के माध्यम से बच्चों को एक मुश्किल भरे वक़्त में भी शिक्षा पहुँचा पायी और बच्चे पढाई से जुड़े रहे| अब साक्षी केे यहाँ जलभराव की स्तिथि खत्म हो चुकी है परन्तु विद्यालय कोरोना के चलते अभी भी बंद है| साक्षी बच्चों को अब घर पर पढ़ा रही हैं| वे कोरोना सम्बंधित सभी बचाव के नियमों का पालन कर रही हैं और जो बच्चे उन तक पढने नही आ रहे हैं उनसे व् उनके अभिभावकों से फ़ोन के माध्यम से जुड़ रही हैं| वे हर हाल में अपने बच्चों को  शिक्षा से  जोड़ें  रखना चाहती है| उनके इस जज़्बे से बच्चों के अभिभावक भी बहुत प्रभावित हैं और उनका विशवास भी साक्षी के ऊपर बढ़ा है|


साक्षी जैसे edu-लीडर  हमारे समाज में शिक्षा की एक नई उम्मीद जगा रहें है और साथ ही साथ इस बात का प्रमाण हैं कि देश के युवा देश को प्रगति की और ले जाने में सक्षम हैं|


Wednesday, October 21, 2020

प्रयास और एक बेहतर समाज का सपना - आँचल

यह कहानी एक ऐसे edu leader की है जिनके अंदर कुछ सीखने व करने का जज्बा है| जब आप को किसी को गहराई से जान्ने का मौका मिलता है और आप उनके जज़्बे की समझ बना पाते हैं तो एक अलग ही प्रेरणा मन में जग उठती है| यह कहानी एक ऐसी ही edu-लीडर हीना की है|

आई-सक्षम में हर edu-लीडर को उनके 2 साल की फ़ेलोशिप के दौरान आई-सक्षम टीम से एक बडी (दोस्त) मिलता है| यह बडी फेल्लो को हर तरह का सहयोग प्रदान करता है,जैसे- प्रशिक्षण के दौरान फेलो की समझ को जानना, फेलो के पढ़ाने के तरीके को समझना व् उपयुक्त सुधार के तरीके बताना, फेलो के शेक्षणिक विकास में सहयोग देना व् फ़ेलोशिप में हर उतार चढ़ाव के दौरान उनके साथ खड़े रहना| सभी बडी अपने फेलो के साथ हर माह 2-3 बडी टॉक करते हैं, जिसमे वे फेलो के कार्यों, अनुभव व् उनके प्रदर्शन के ऊपर बात करते हैं व् उन्हें आगे बेहतर करने के सुझाव देते हैं| मैं उन्ही बडी में से एक हूँ और आज अपनी एक फेलो हीना के साथ हुई बडी टॉक के अनुभव को साझा कर रही हूँ|


पहले पहल जब मैंने हिना दीदी से बडी टॉक कि थी तो उनके और उनके घर - परिवार व बच्चे के बारे में जानने को मिला था।मैं कभी-कभी दीदी से बीच में फॉलो -अप कर लेती थी लेकिन उनके अंदर के कारणों को नहीं समझ पाती थी या फिर नहीं जान पाती थी।लेकिन शुरुआत में एक बार दीदी ने बडी टॉक के दौरान मुझे एक समस्या के  के बारे में बताया था कि -“ जब वह अपनी कक्षा में पढ़ाती है तो उन्हें बच्चों को बुलाने उनके घर जाना पड़ता है क्योंकि बच्चे आंगनवाड़ी के हैं और बहुत छोटे हैं| वे पढने नहीं आना चाहते|


हमने पहले भी इस विषय पर बात की थी और समझ बनायीं थी कि बच्चों के अभिभावक व् उनके दोस्तों का सहयोग ले कर बच्चों को पढने बुलाया जाए| परन्तु अभिभावकों की और भी दुसरे ज़रूरी कामों में व्यस्तता के कारण बात कुछ बन नहीं पायी| आज बडी टॉक में फिर वही समस्या सामने आई| दीदी को आज भी बच्चों को पढने बुलाने के लिए उनके घर जाना पड़ता है|


दीदी गर्भ से हैं और यह उनका अपने समाज के बच्चों को शिक्षित करने का जज्बा ही है कि वे इस स्तिथि में भी बच्चों को घर जाकर बुलाती हैं और फिर उन्हें पढ़ाती हैं। भले ही उन्हें इस कार्य में थोड़ी तकलीफ होती होगी परन्तु वे कहती हैं कि बच्चों का पढना बहुत जरूरी हैं|  मैंने जब इन बातों को दीदी के मुह से सुना तो मैं दंग रह गई कि इतनी ताकत हमारे समाज की महिलाओं में कैसे देखने को मिल जाती है| वे घर का काम करती हैं,  बच्चे व परिवार को देखती है और खुद बच्चों को घर जाकर पढने के लिए बुलाती हैं और फिर उन्हें पढाती भी हैं| फिर भी वही समाज के कुछ लोग कह रहे है कि महिला कुछ नहीं करती या कर नहीं सकती है।


परन्तु धीरे धीरे समाज में कुछ लोग महिलाओं के इन प्रयासों व् जज़्बे से सीखने और समझने  का प्रयत्न कर रहे हैं| वे  इसी समाज में रह कर उनके लिए बदलाव कि छवि देखने का प्रयास कर रहे है। इसी सोच के साथ कि एक ना एक दिन बदलाव आएगा। और सभी को समान दर्जा दिया जाएगा| इसी से हमारी आने वाली पीढ़ी भी महिलाओं के सामन दर्जे की समझ बनाएगी| 


इन दीदियों  में काफी कम समय में एक अच्छे बदलाव और एक अच्छी सोच की छवि मुझे नजर आई है।इसी तरह की सोच को लेकर अगर हमारे समाज के लोग आगे बढें तो एक साकारात्मक बदलाव दूर नही|


   कोशिश कर, हल निकलेगा, 

   आज नहीं तो, कल निकलेगा। 

   कोशिशें जारी रख कुछ कर गुजरने की, 

   जो है आज थमा-थमा सा, चल निकलेगा।


 मैं दीदी के प्रयासों से उन्हें बहुत-बहुत आभार देती  हूं कि उन्होंने इन चीजों को किया और आज भी उनके  कथक प्रयास जारी है| वह समाज को बेहतर करने में एक अहम भूमिका निभा रही हैं| 


जज्बा जो छिपाए न छुपे!

हमारे कार्यों के दौरान कई बार ऐसे पल आते हैं जो हमे हमारी ज़िम्मेदारी का अहसास कराने के साथ साथ हमारे दिल के हमेशा करीब रहे जाते हैं| कई बार दूसरों के जीवन की कहानी से हम इतना प्रभावित हो उठते हैं कि हम अपने कर्तव्यों के और नज़दीक हो जाते हैं| कुछ ऐसा ही हुआ इस बार आई-सक्षम फ़ेलोशिप के लिए हो रहे महिलाओं के साक्षात्कार में| आई-सक्षम परिवार से एकता अपने अनुभव को साझा करते हुए कहती हैं: 


मैं बहुत संक्षिप्त में उन बातों को साझा करना चाहूंगी जिसने मुझे प्रभावित किया है और इंटरव्यू के लिए आई महिलाओं ने मुझे सीखने का मौका दिया है | आज हमलोगों ने जमुई में 24-25 महिलाओं का इंटरव्यू लिया | जिसमें से मेरे समूह व् मुझे 13 महिलाओं से बात करने का मौका मिला | इनमें से ज्यादातर महिलाएं शादीशुदा हैं | इंटरव्यू से पहले हमलोग आपस में यही बात कर रहे थे कि "अधिकांश महिलाएं शादीशुदा है | पता नहीं वो परिवार की जिम्मेदारियों के साथ किस तरह हमारे फ़ेलोशिप से सक्रिय रूप से जुड़ी रह पाएंगी ?" अगर मैं अपनी बात कहूँ तो मेरे मन में एक ही सवाल आ रहा था कि "क्या इनमें उतनी उर्जा होगी?"

 

पर जब मैंने इन महिलाओं से बात की तो मैं दंग रह गयी | इनमें से अधिकांशतः महिलाओं की शादी को 8 से 10 साल हो गए थे पर आज भी उनके अन्दर उनके सपनो को लेकर वही जज्बा है जो उनमे शादी से पहले रहा होगा| आज भी उनके मन में खुद के लिए कुछ करने का उतना ही जूनून है जितना शायद उन सपनो को देखने की शुरुआत में रहा होगा|

एक बात जो 5 महिलाओं ने कही वह यह है कि "हमें यहाँ आ कर बहुत अच्छा लग रहा है | हमसे लोग अक्सर हमारे परिवार के बारे में पूछते हैं | बहुत कम ऐसा होता है कि हमें खुद के बारे में बात करने का मौका मिलता है | आपलोग आज इतना धैर्य से मेरे बारे में सुन रहे हैं; हमको बताकर अच्छा लग रहा है | हम तो अपने जीवन में कुछ करना चाहते थे पर कभी इस तरह का मौका नहीं मिला |" जब उनसे यह पूछा गया कि "क्या आप सप्ताह में एक दिन अपने गाँव से ट्रेनिंग के लिए यहाँ जमुई ऑफिस आ पाएंगी? एक महिला ने बहुत प्यार से जवाब दिया, "क्यों नहीं! कम से कम एक दिन तो अपने मन से आने जाने का मौका मिलेगा | फिर यहाँ नए दोस्त भी तो बनेंगे ”| 

इंटरव्यू के दौरान महिलाओं के द्वारा समाज के अनेकों परिवेश को जान्ने का मौका मिला| जहाँ कुछ महिलाओं ने अपने घर से बाहर काम न कर पाने का कारण अपने ससुराल की जिम्मेदारियां बताई तो वहीँ एक महिला ने बताया कि उनकी सास उनके साथ यहाँ इंटरव्यू दिलवाने के लिए आई हैं | वे चाहती हैं कि उनकी बहु आगे बढ़े | 


एक महिला से जब यह पूछा कि “आपके अनुसार आपके गाँव में शिक्षा की स्थिति कैसी है” तो इसका जवाब देते-देते वे भावुक हो गई | उन्होंने बताया कि उनके गाँव में स्कूल नहीं था | किसी तरह से गाँव वालों ने छोटे से जगह में सरकार को अर्जी देकर स्कूल बनवाया था पर फिर भी शिक्षा की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है | उनको इस बात की चिंता है कि अगर उनके बच्चे नहीं पढेंगे तो क्या होगा | पूरा गाँव पिछड़ा ही रह जायेगा साथ-साथ उनका बेटा भी | 


इन महिलाओं से बात करने के बाद मेरा सवाल, सवाल नहीं रहा | मुझे लगता है सपना देखने और उसके पीछे भागने की कोई उम्र नहीं होती| फर्क बस इतना है किसी को सहयोग मिलता है और कोई इसके आभाव में पीछे रह जाता है| परंतु इन महिलाओं में अपने सपनो को जीने का जज्बा आज भी है और उनकी निरंतर कोशिश आज भी ज़ारी है| 


आई-सक्षम टीम के सदस्यों का ऐसा अनुभव हमे समक्ष इस बात को उजागर करता है की हमारे समाज में महिलाओं में अनेकों हुनर छिपे हुए हैं| वे परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ अपने देश व् समाज की बेहतरी की ज़िम्मेदारी भी बखूबी निभा सकती हैं| पिछले 5 साल के सफ़र में लगभग 150 ऐसी ही महिलाओं ने आई-सक्षम फ़ेलोशिप से जुड़ कर अपने समाज की शिक्षा की बेहतरी के लिए कार्य किया है और आज भी शिक्षा से जुडी हुई हैं| यह महिलाएं हमारे लिए एक प्रेरणा हैं और इनका जज़्बा हमारी ताकत| 


Friday, August 21, 2020

Bringing sense to EdTech: 5 pillars of an Edtech intervention

Author: Shravan Jha (Co-founder, i-Saksham)

It was the year 2014. As the Prime Minister’s Rural Development Fellows, we were working with the local district administration in Jamui district, Bihar to improve learning opportunities for students of three residential schools. Our experience of working with government schools over the past two years had reinforced our belief that teachers were simply a resource in the school system; and an easily replaceable one at that.

The answers lie in technology, or so we thought


Our initial belief was that educational technology (EdTech), was the solution, and would work independently of the teacher’s role in ensuring quality education to the students. We saw both the teacher and the tech simply as platforms for disseminating information. So, we designed our programme based on these assumptions. The two were compared on metrics such as the quantity, quality, and delivery of information, and on the way in which a student might benefit from the design advantage that technology offers--variety in type and use of content. For instance, ‘What information should I watch?’ (type of content), and ‘How should I engage with the information?’ (use). 

We pitched this idea to our friends, and though many of them were skeptical, they donated 60 tablets to us. Once the tablets were in place, we searched and partnered with a quality content provider, who provided us content free of cost. Then, we mapped the content with the state government’s syllabus, created groups of students who would be using them, installed apps that would monitor content use, and placed these tablets in three government residential schools. This intervention was designed based on our initial hypothesis that an EdTech platform will function independent of the teacher’s participation, as we thought factors associated with teachers (quality of instruction, lack of interest, absenteeism) were the major reasons that learning was not happening. 

However, once the initial euphoria and the real work set in, we started to realise that our intervention had several loopholes. This resulted in almost 50 percent of the tablets breaking in the first four months of the intervention, and the EdTech platform being used poorly by the students. Our learning from this intervention made us realise how our assumptions stopped us from considering what we now see as the five fundamental pillars of designing an EdTech intervention.

1. Information is not knowledge

The idea was to use technology as a platform for disseminating information which would be of a better quality, and would therefore help overcome the limitations of a teacher and the boredom of a textbook. We thought this would give students a chance to learn better, and at their own pace. However, we failed to realise that information is not knowledge. For information to become knowledge and be valued by the child, it has to go through processes of reasoning, dialogue, questioning, and sharing. A teacher, not technology, is best placed to facilitate this.

2. Forming a learning group doesn’t ensure accountability

Our intervention was built around the idea that a group of five students would share and learn from one tablet. These students were grouped based on their grades, and we assumed that since they shared common spaces, they would be more likely to support one another. This assumption turned out to be wrong. We realised that until a strong common identity, shared purpose, and regular reinforcement of values are built in, merely bringing people together and forming a group doesn’t lead to accountability.

3. Technology doesn’t automatically create agency for users

One of the central ideas of the intervention was that giving tablets to a group of students will ensure agency to all members of the group. This, however, was not how things panned out. In many groups, we found that certain members had emerged as decision makers, and they would decide what content would be watched, when, and how. This created a hierarchy within the group.

While we measured access to tablets at a group level, we ignored lack of access within these groups. We also ignored the importance of reinforcing the common purpose. What we failed to do was envision the influence a peer group leader could have and think of ways to identify and engage them in the intervention.

4. EdTech is a system, not an individual platform for disseminating information

Our intervention was focused on the platform and content, and all our energy was spent putting a tempered glass and a leather cover for protection, coding, and adding quality content to the tablets. We paid very little attention to understand our EdTech intervention as a system, with many components linked to each other.

We failed to ask, for instance: How many charging points were there in the schools? For how many hours did the school get electricity? What were the voltage fluctuations? How could we link speakers and audio splitters, which were necessary for some aspects of the content? This ignorance led to many of the tablets becoming dysfunctional within a short period, mainly due to high voltage fluctuations and using very poor-quality chargers to charge the tablets.

5. Teachers and EdTech are collaborators, not competitors

Throughout our intervention, we ignored the role of a teacher, believing we could circumvent them and link students to what mattered the most—a good content platform. This was our biggest failure. We failed to build on the possibility of bringing teachers and technology together. Doing so would have allowed the teacher to use EdTech as a powerful tool to expand their capabilities, and envision a learning ecosystem that breaks the limitation of textbooks or other resource constraints, creating endless possibilities

We believe the power of EdTech lies in creating and expanding these possibilities, not only for the students or the teacher but for all stakeholders. This is possible only when stakeholders have a stake and a voice in the intervention design.

Tuesday, August 18, 2020

Didis and Mothers taking the baton of education in villages of Bihar during Covid

Sangeeta, a young girl from Daniyalpur village in Munger district of Bihar, is making phone calls for 2 hours every single day, to tell stories to her children, and share learning activities with mothers. These activities are designed using daily objects  and can easily be understood by women, irrespective of their literacy level.

For example,. exploring leaves to learn about different shapes, counting utensils to learn numbers, and so on. 

Sangeeta’s efforts ensure that the children in her community continue their learning during the pandemic. Even though these children have limited access to digital technology.  Following the structured session plans  with learning activities appropriate to the level of each child gives heran  edge against digital solutions, which rely just on dissemination of content. 

 “Education is not only about sharing of information, but also as much about dialogue, debate, and critical analysis of information”, says Sangeeta. The in-person facilitation ensures that her children learn to do that instead of just consuming the animated content on the digital device. 

The disruptions caused by COVID-19 must serve as an inflexion point to recognise the critical role that community initiatives can play in education, especially in rural India.   The challenge to provide education in the deep interior pockets of the country during Covid is a case in point.

“Whom can we rely upon? Who can take the baton of educating our children?”, ask Ravi Dhanuka, Co-founder and CEO of I-Saksham Education And Learning Foundation (i-Saksham), a not-for profit organization working in extremism affected districts of Bihar to transform local youth - mainly females - into community edu-leaders.  

There are 100 edu-leaders like Sangeeta who are trained by i-Saksham go through a 2-year fellowship program. They help in imparting better quality education in remote areas, in partnership with government schools. During normal days, these edu-leaders go to under-resourced primary schools, and assist government school teachers to effectively teach multi-grade classroom through modern-day pedagogy methods. 

They meet school management committees every month, organize learning fairs in villages, and meet parents on an individual basis, to showcase how children have begun to show significant improvement in their learning level.

The forced school closures due to pandemic have affected over 30 crore children, resulting in poor children falling further behind and at risk of dropping out of the system.

In a separate initiative, i-Saksham has formed a collective with 7 educational organizations such as JEEViKA (a World Bank aided Livelihood Project that forms women self-help groups) and Mahila Samakhya (a MHRD run program to create women leaders who work on literacy and gender). The idea is to undertake community-led initiatives related to education in remote villages of the country during Covid-19. 

                                              

   

The project is running as ‘Shiksha Sahelis’ in Bihar, where young mothers, supported by these institutions are coming forward to run community learning centres as long as schools are closed, and undertake project based learning activities.  

“Our core belief has been that the community must demand quality education for any large scale change in the system to sustain”, shares Ravi. This core belief led to the birth of i-Saksham to work with youth, the most active agents of the society and create them into change-makers, the edu-leaders.

Kiran, a young mother, and another edu-leader from Mahgama Panchayat, affected with extremist violence, assists single teacher led schools with 5 grades in 1 classroom. 

“The way she manages her classroom by dividing children into various learning groups, and assigning them activities appropriate to their learning level would make any teacher hold his breath in awe”, shares the headmaster of the school. “She decorates her classroom so well each day based on the theme she is teaching, and uses many child-centric activity-based learning methods… which are generally seen only in training sessions!” 

“My biggest achievement has been that my community members, parents of these kids, have become hopeful of change”, say Sangeeta and Kiran. “They now believe that their children can learn. They have access to the same educational methods that rich kids would pay every month the sum equivalent to our annual income”.

The impact of i-Saksham not only transforms the educational journey of children, but also the lives of youth ie  the edu-leaders. Today, 10 of i-Saksham first batch of edu-leaders are pursuing professional courses in education from prestigious universities of the country like Tata Institute of Social Sciences, Mumbai; and Azim Premji University, Bangalore.

Ravi (director, i-Saksham) shares that the fight against inequity in education is huge and cannot be won unless more and more spaces and capabilities are created to support the mainstream public education system. Solely blaming the system won’t help. We must first become the capable community to support the system and then must also learn to hold it accountable. 

Unless we learn to do it, we can’t expect democratic institutions like schools to perform well. They too respond to the need of their clients, based on how vociferous their customers are. It is high time to revitalize the third pillar-the community, one of the critical building blocks of a good society (as Raghuram Rajan argues in his book-The Third Pillar).