Friday, February 3, 2023

A Teenager's perspective and reflection during one of our session on Gender. 


Friends, on the 20th of January 2023, we had our third session on Gender. As usual the session started on a great and enthusiastic note with a poem titled, “Mujhe Kab Tak Rokegay?”. 

Upon listening to the lines in the poem, each one of us attending the session were filled with a different feeling, one that is encouraging with a new sense of hope and positivity. Everyone could relate to the poem and it made us all emotional. It opened up thoughts from their pasts in some of the participants, while some could recall how they faced several taunting remarks from the society in their quest for coming out of their shell. In all this ocean of thoughts exchanges, I was also able to relate my own life experiences with it, particularly the taunts like all other Edu-leaders. In that particular moment, I also came to realize that not only girls but even boys suffer in our society where their dreams are crushed and forced to live with the society’s expectations. 

Being a girl myself, I was however only empathizing with them from how I see things from a girl’s perspective, like I understand for certain that when a girl manages to somehow step outside her home, she has done so only after braving a series of taunts, obstacles and challenges.

Satrangi Ladkiyan”, a video was shown in the session and the new Edu-leaders were asked to share how they would describe themselves after watching the video. 

Someone shared that they are of shy natured, while others like Nibha didi said she is calm. Dulari shared how some of the Edu-leaders are calm and composed by nature, some loved getting groomed while others are outgoing and playful, Kajal didi described herself as a simple being. Towards the end, it was concluded that every girl is of different nature and it is impossible to categorize them all under one particular personality type and expect them to behave in a particular manner.

It is only that society has been conditioning girls to behave in one certain way but it should not be so as every individual is special, different and unique and would behave accordingly. 

On this note, the Edu-leaders were asked to share if there were certain things that they couldn’t/wouldn’t do prior to joining the fellowship due to fear of the society but now they are able to do? 

Many responded wherein many things came to the fore like the Edu-leaders’ sharing how they are now able to take their own decisions, venture out on their own, meeting and talking to people in their community and outside with a whole lot of confidence and a rise in self esteem, wearing clothes of their own choices and so on!

Afterwards, we tried connecting these thoughts to the previous session where we had asked the Edu-leaders to share about a challenge in their personal lives that they are unable to overcome but they wish to change it. On this, came a very surprising and pleasant sharing, one by Prerna Didi who said, “ I wish to stay with my friend and study further but this isn’t going to happen.” 

To this, I said - “Think about what you can possibly do to achieve this and whose help do you need?”  Prerna didi devised a plan and immediately came up with it. 

Upon doing this activity, a realization also drawn unto me that there is really nothing that is impossible to achieve and change in this world. It is just a matter of time and for that we need to bring upon a change in our “attitude” about how we see things and to adopt discipline, work hard to achieve that dream and keep reminding ourselves how important it is for us to bring that change and whether you are doing it or not!  After this, you will notice that your whole world can change with one effort of yours.”



Taniya Parveen, our executive buddy - a graduated Edu-leader from our first fellowship batch shares her reflection attending a session on Gender for the ongoing 10th Batch of the i-Saksham Edu-leader fellowship in Begusarai, Bihar.










Translated and Edited by Namrata Sharma

कुछ इस तरह यादगार बनाया हमने सावित्रीबाई फुले का जन्मदिन




महिला शिक्षा सप्ताह के अंतर्गत विषय मेरी पहचान 'शिक्षा' पर ऑनलाइन सेशन कराया गया, जहां महिलाओं ने अपनी कहानियां साझा की। इस दौरान कई कहानियां ऐसी भी थी, जिन्होंने एक पल को हमें सोचने पर मजबूर कर दिया। 


किसी ने बिल्कुल सही कहा है कि किसी भी इच्छा की कोई उम्र नहीं होती और सीखने, लिखने, पढ़ने की कोई निश्चित उम्र बिल्कुल नहीं है। उम्र उस वक्त हार जाती है, जब मेहनत का पलड़ा भारी हो जाता है और कुछ ऐसा ही हुआ है हमारी इन एडुलीर्डस के साथ।                     


सबसे पहले इस अवसर को मनाने का पूरा उद्देश्य जानना जरुरी है। यह ऑनलाइन सेशन भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन के अवसर पर रखा गया था, जिसे 3 जनवरी को मनाया गया। सावित्रीबाई फुले का जन्मदिन पूरे देश में 192वीं जयंती के रूप में मनाया गया। 


सपनों से समझौता नहीं 


सावित्रीबाई फुले का जीवन भी संघर्ष में गुजरा था। मात्र 9 वर्ष की उम्र में उनकी शादी 13 वर्षीय 

ज्‍योतिबा फुले से हो गई। हालांकि सावित्रीबाई ने शादी का विरोध नहीं किया मगर अपने सपनों से समझौता भी नहीं किया। साथ ही अपने क्रांतिकारी पति ज्‍योतिराव फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए कई कदम उठाएं। उन्‍होंने लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले, जिसमें से पहला स्‍कूल पुणे में खोला गया था। वे देश की पहली महिला अध्यापक थीं एवं नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता भी थीं। उन्होंने समाज की कई कुरीतियों के विरुद्ध मोर्चा बुलंद किया। जैसे- छूआछूत, बाल-विवाह, सतीप्रथा, विधवा विवाह। वे शिक्षा को लेकर इतनी ज्यादा गंभीर थी कि उन्होंने मजदूरों के लिए रात के वक्त स्कूल खुलवाए क्योंकि दिन के वक्त मजदूरी करने के कारण वे पढ़ नहीं पाते थे।   


उनके लिए कुछ भी लिखना सूरज को दीया दिखाने के बराबर है क्योंकि समाज के उत्थान के लिए उनके कदम आजतक सराहनीय हैं और लोगों के लिए प्रेरणा का विषय है और उनसे ही प्रेरणा पाकर हमने भी कुछ प्रतियोगिताएं एवं मेरी पहचान के तहत एक ऑनलाइन सेशन का आयोजित किया, जिसमें जमुई, मुंगेर, गया और मुजफ्फरपुर से काजल दीदी, सीमा दीदी, सलोनी दीदी, बुलबुल दीदी ने अपनी कहानियां हमारे साथ साझा की। आइए, रुबरु होते हैं, उनकी कहानियों से- 


काश, मैं भी पढ़ पाती 



गया जिले के नीमा गांव की रहने वाली सीमा
ने भी अपने संघर्ष की यात्रा हमारे साथ साझा की है। वे बताती हैं कि उनके परिवार में तीन लोग हैं। उनके पति और उनका एक छोटा बेटा भी है। सीमा के पिता किसान हैं और उनकी मां एक एनजीओ में काम करती हैं। उन्होंने आई सक्षम को बताया, उन्होंने 2003 में मैट्रिक की परीक्षा दी और साल 2006 में उन्होंने इंटर की परीक्षा दी लेकिन परीक्षा के बाद ही उनकी शादी हो गई और जहां शादी हुई वहां की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी लेकिन वे आगे पढ़ना चाहती थीं क्योंकि उन्हें शिक्षा की अहमियत थी। वे जब कभी दूसरे साथी को देखा करती थीं, तो उन्हें लगता था कि काश मैं भी पढ़ पाती और कुछ कर पाती लेकिन उन्हें अपने हालातों पर शर्मिंदगी महसूस होती थी। कोरोना के वक्त साल 2020 में अपनी बड़ी दीदी प्रेमलता द्वारा उन्हें शिक्षा सहेली के बारे में पता चला, जहां उन बच्चों को पढ़ाने का काम था, जो कोरोना के दौरान शिक्षा से वंचित हो गए थे। थोड़ी असमंजस की स्थिति के बाद सीमा ने बच्चों को पढ़ाना स्वीकार कर लिया। 


साल 2020 में आई-सक्षम के दो वर्षीय फैलोशिप प्रोग्राम के बारे में पता चला, जिसे उन्होंने ज्वाइन कर लिया और यही से उनके सीखने और सिखाने का सफर शुरू हुआ तथा पढ़ने की ललक दोबारा से जगने लगी। आई-सक्षम के धर्मवीर भैया ने उनकी काफी मदद की और उनका ग्रैजुएशन में दाखिला भी करवाया गया। साथ ही सीमा बताती हैं कि उन्हें अपने परिवार वालों का भी काफी सहयोग मिला, जिस कारण वे यहां तक पहुंची हैं। पहले उनके अंदर काफी झिझक थी, जैसे- किसी के सामने कुछ बोलने में हिचक होती थी, किसी के सामने खाना भी नहीं खाती थीं। कुल मिलाकर वे काफी संकोची और शर्मीली सदस्य थी लेकिन अब वे अपने अंदर काफी बदलाव महसूस करती हैं और सकारात्मकता से आगे बढ़ रही हैं। 


इंटर पास करते ही हुई शादी



मुंगेर, बिहार की रहने वाली बुलबुल कुमारी को पढ़ना और पढ़ाना दोनों बेहद पसंद है। उनके पिता एक मजदूर हैं, और कार्य के दौरान घाटा होने के कारण उनकी आमदनी कम हो गई और अंततः उनकी पढ़ाई छूट गई मगर अपने एक रिश्तेदार की मदद से उन्होंने इंटर की परीक्षा दी लेकिन इंटर पास करते ही उनकी शादी हो गई। साथ ही जहां शादी हुई, वहां भी शिक्षा का माहौल नहीं था और उनके पति स्वयं 9वीं पास थे। एक रोज उनके पति ने बुलबुल से एक स्कूल में पढ़ाने को कहा लेकिन वे पढ़ाना नहीं चाहती थी मगर उन्होंने बच्चों को पढ़ाना शुरु किया और पढ़ाने के दौरान ही उनके पिता का देहांत हो गया और उन्होंने पढ़ाना छोड़ दिया। 


इसके बाद एक आवासीय विद्यालय में 11 महीने तक पढ़ाने का मौका मिला मगर 11 महीने के बाद वो भी छूट गया। इसी बीच उन्हें आई-सक्षम के बारे में पता चला और उस समय उन्होंने आई-सक्षम का एग्जाम दिया मगर दूसरे बार के प्रयास में उन्हें सफलता मिली फिर उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरु की। तकरीबन साल 2003 में उन्होंने इंटर किया और साल 2022 में उन्होंने बीए करना शुरु किया। 


मां के निधन ने उजारी दूनिया 



मुजफ्फरपुर बिहार की रहने वाली सलोनी कुमारी
ने सेशन में अपनी यात्रा के बारे में बताते हुए कहा, जब वे 11 साल की थीं, तब ही उनकी मां का देहांत हो गया था, जिस कारण उनका परिवार थम गया। लगभग 5-6 सालों तक उनकी पढ़ाई रुक गई। वे बताती हैं कि उनके पिता से अचानक सारी चीजें व्यवस्थित नहीं हो पा रही थीं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे काम करें या अपने बच्चे को संभालें क्योंकि सलोनी का एक छोटा भाई भी था। वे बताती हैं कि इसके बाद वे नानी घर चली गई लेकिन वहां भी कुछ व्यवस्थित नहीं हुआ मगर धीरे-धीरे सारी चीजें पटरी पर आईं मगर पढ़ाई छुटने के कारण रुचि भी नहीं जग पा रही थी। हालांकि कुछ समय बाद उनके पिता ने कहा कि अब 10वीं के बाद आगे नहीं पढ़ा सकेंगे मगर सलोनी की जिद के कारण उनकी पढ़ाई जारी रही। साल 2022 में आई सक्षम से जुड़ने के बाद उन्हें काफी सहयोग मिला, जैसे- पेटिंग उनकी हॉबी है, तो अब वे अपने शौक को भी समय दे पा रही हैं।


संघर्ष का असल मतलब 


ये कहानियां कोई कोरी-काल्पनिक कहानियां नहीं हैं बल्कि संघर्ष की कहानी है, जिसमें हताशा का अंधियारा है लेकिन क्षण भर का, जिसमें हार का नजारा लेकिन क्षण भर का, हतोत्साह है लेकिन वो भी पल भर का मेहमान है क्योंकि इन सारी महिलाओं के अंदर का जूनुन है, जिसने उन्हें टूटने नहीं दिया। 

 

कलम की शक्ति अतुलनीय है। रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं, 


दो में से क्या तुम्हें चाहिए

कलम या की तलवार 

मन में ऊंचे भाव कि 

तन में शक्ति विजय अपार 


इन पंक्तियों को सिद्ध करते हुए, इन महिलाओं ने कलम की ताकत को चुना। मन के भावों को हमेशा ऊंचा बनाए रखा और यही कारण है कि आज इनकी कहानी हमारे सामने है। 


अपने आप को कभी कम ना आंके और विजयपथ पर आगे बढ़ते रहे। हम अगर कहीं जाएं और बीच में समंदर दिखाई दे, तो हम किनारों पर रुकें ना। अगर रुकें, तो रणनीति बनाने के लिए रुकें और आगे बढ़ें क्योंकि समंदर भी केवल बहना जानता है इसलिए वो समंदर है और जो थम गया, वो शायद जीवित ही नहीं है।  


सलोनी, बुलबुल और सीमा की कहानियां भले ही अलग अलग भोगौलिक हिस्से से हो लेकिन सब में अपने हक के लिए लड़ने, अपने लिए आवाज उठाने और कुछ कर गुजरने की ललक साफ झलकती है। ये चारों कहानियां अलग अलग हो कर भी एक ही मर्म बयान करती है, वो है संघर्ष। 


Wednesday, February 1, 2023

ऑनलाइन सेशन पर तानिया की समझ


दोस्तों 20 जनवरी 2023 को हमने जेंडर पर आधारित तीसरा सेशन किया। हमेशा की तरह सेशन की शुरुआत बेहतरीन और ऊर्जावान तरीके से हुई। सेशन की शुरुआत एक कविता के साथ हुई, जिसका शीर्षक था, 'मुझे कब तक रोकोगे.' कविता की इन पंक्तियों को सुनना हम सबके लिए काफी प्रोत्साहित करने वाला था, जिससे हम सबने अंदर सकारात्मकता और आशआ की एक नई किरण को महसूस किया, मानो एक चेतना का विकास हो रहा हो।

साथ ही सेशन में मौदूद हर एक शख्स एवं एडुलीडर भी स्वयं को भावनात्मक तरीके से जड़ पा रहे थे। किसी के अंदर पूराने ख्यालों का पुलिंदा चल पड़ा था, तो किसी के अंदर समाज द्वारा दिए गए तानों का जनसैलाब उमड़ आया था। जब समाज से मिल रहे ताने और समुद्र की गहराई की बात हो रही थी और कहीं न कहीं मैं भी इसी लाइन से खुद को जोड़ पा रही थी। उस समय जब एडुलीडर्स ने भी इस लाइन से संबंध महसूस किया तो मुझे एक बात समझ आई कि केवल लड़कियों के साथ ही नहीं बल्कि लड़कों के साथ भी भेदभाव होता है या उनके सपनों को कुचला जाता है मगर एक लड़की होने के नाते मैं एक लड़की के नजरिए ये सोच पा रही थी। मैं सोच सकी कि जब एक लड़की अपने घर से बाहर निकलती है, तो ये कई बार यह निश्चित होता है कि न जाने कितने तानें, रुकावट और चुनौतियों को चीरते हुए वो यहां तक पहुंची है।   

सतरंगी लड़कियां, लड़कियों का स्वभाव 

सेशन में एक वीडियो भी चलाया गया, जिसका नाम 'सतरंगी लड़कियां' था। इस वीडियो को देखने के बाद एडुलीडर्स ने बताया कि उन सबका स्वभाव कैसा है? जैसे- किसी ने कहा कि मैं तो शर्मीली हूं, तो निभा दीदी ने कहा कि मैं शांत हूं फिर दुलारी ने तीन-चार एडुलीडर के बारे में बताया कि वे शांत स्वभाव की हैं, कुछ सजने संवरने वाली हैं, तो कुछ चंचल स्वभाव की लड़कियां भी हैं। काजल दीदी ने कहा कि उन्हें सिंपल रहना पसंद है। अंत में यह भी निकलकर सामने आया कि लड़कियां तो किसी भी तरह की हो सकती हैं। उन्हें केवल एक बंधन ा एक स्वभाव में बांधना नामुमकिन है। 

समाज ने ही भावना बना दी है कि लड़की है, तो ऐसी ही रहेगी मगर ऐसा हरगिज नहीं है क्योंकि हर एक व्यक्ति स्वयं में विशिष्ठ और भिन्न है।  हमने एडुलीडर्स को सोचने के लिए कहा कि क्या ऐसा काम है, जो फेलोशिप से पहले आपको लगता था कि आप नहीं कर पाएंगे। डैसे- परिवार या समाज द्वारा कोई बंदिश हो लेकिन अब आप कर पा रहे हैं और अपने शर्तों पर जी पा रहे हैं। इस प्रश्न के बाद ऐसी कई बातें सामने आईं, जैसे- अपने निर्णय खुद लेना, बाहर अकेले जाना, समाज के लोगों से मिलना और आत्मविश्वास के साथ बातें करना और अपने मनपसंद कपड़े पहनना इत्यादि।  

उसके बाद हमने पिछले सेशन से जोड़ कर सोचा कि क्या ऐसा चीज है, जो हम बिल्कुल भी नहीं बदल सकते मगर हम बदलना चाहते हैं। इसमें यह निकलकर सामने आया, जिससे सुनकर आपको भी काफी हैरानी होगी। प्रेरणा दीदी ने कहा, मैं अपने दोस्त के साथ रहकर पढ़ना चाहती हूं मगर ये होगा नहीं। इस पर मैंने कहा, "इसे पाने के लिए आप क्या कर सकती हैं और किसकी मदद चाहिए?" तो मेरे इस सवाल पर उन्होंने तुरंत अपनी योजना बता दी।  

ये गतिविधि करके मुझे भी एहसास हुआ कि इस दुनिया में ऐसा कुछ नहीं है, जो हम नहीं बदल सकते। बस देर है, उस चीज को लेकर अपना 'नजरिया' बदलने की और उस सपने को पाने के लिए संघर्ष का रास्ता अपनाने की और महसूस करने कि भी जरुरत है कि आपके लिए किसी चीज का बदलना कितना महत्व रखता है और क्या सच में आप उसमें बदलाव चाहते है या नहीं। इसके बाद देखें कि आपकी एक कोशिश से आपका पूरी दूनिया बदल सकती है।

Thursday, January 26, 2023

Drawing Inspiration - ''The First Teacher''

 



Naziya, an Edu-leader to engage her mind began reading books regularly and she came across a book called The First Teacher (पहला अध्यापक) which was a story of a soldier who after being injured in the war had to retire and had out of deep compassion for children had begun teaching them. 


The story is set in a time when education wasn’t formalized and compulsory for all as per the regulating laws. The soldier however taught the children by taking classes under a Peepal tree. While some confused villagers assumed that he was downright foolish for spending time with children, other villagers believed he was without a family and all alone in the world and that's why he spent his time with the children. The soldier didn’t resort to monotonous teaching of grammar and math, he used clay and stones to teach them to count and engaging them in a wide array of activities inspiring them and pushing them to look for deeper goals in life. 


The book goes on to explain the life of a little girl who was drowning in household work but went on to achieve greatness. It is a story that inspires one to reach the skies and Naziya can’t help but feel enthused by learning the fruits of a mentor’s efforts that last children a lifetime.

The Creativeness in being an Edu-leader




 Ranju Kumari, Batch-6 edu-leader is fervent to present her journey that has happened not in one single day but the process of learning, sharing, and re-learning. The day went on as usual with morning prayers and greetings, the previous activities and lessons were discussed with the children to keep track of their comprehension. Ranju uses the calendar as an effective tool to bring the children on board into the process of education and make them active receptors of information as they introspect their growth over the week and month. She observed this also helped the other edu-leaders, as well as they too, became inclined to adopt best practices and innovate their ways of reaching out to the children. Ranju was impressed when other edu-leaders volunteered themselves to perform songs and fol plays with the children as a group activity and participate in storytelling where there is a character sketch presented to the students to help them form a relationship with the character traits, then the story is told most animatedly by the edu-leader and questions are asked in the end to sink into the young ones’ mind the moral of the story and even encourage their interpretations to it. Seeing the initiative and creativity of the edu-leaders motivates Ranju further to do better every day!

Reshma's Happy Ending

 


Making Parents' Teachers Meeting Fun!

 Priyanjali Kumari shares with us her experience as an Edu-leader in Hasanpur.


On Thursday, the Parents Teachers Meet for the primary school was scheduled from 11 am to 1 pm. Upon the arrival of the parents, they were welcomed by the principal followed by a motivational song. Students from grades 1 and 2 were made to do simple activities and the parents were informed on the importance of storytelling and reading and how it aids in brain development as well as communication skills. Priyanjali then went on to demonstrate telling a story to the kids which impressed the parents as they got to see their child’s thinking capabilities and vocabulary live.


For students of grade 4 and 5, a presentation of songs was done to express their creativity and knowledge. Parents were encouraged to support the endeavors of their children to safeguard their interests and tap their full potential. The principal of the school then went on to thank the parents for their attendance.