"चूल्हा-चौका संभालना है"
मेरा नाम श्रृंखला है। मैं गया के बाँके बाज़ार ब्लॉक के टंडवा गाँव की रहने वाली हूँ।
परसा चुआं एक छोटा-सा गाँव है। पाँचवीं तक का स्कूल गाँव में था — उसके बाद आगे पढ़ना हो तो परसावां खुर्द जाना पड़ता था, जो दस किलोमीटर दूर है। बीच में जंगल है। बस नहीं चलती, ऑटो का किराया देने के पैसे नहीं हैं। तो लड़के साइकिल लेकर जाते थे।
और लड़कियाँ घर पर रहती थीं।
जब भी कोई लड़की माता-पिता से साइकिल माँगती, तो एक ही जवाब आता — "तुम्हें साइकिल नहीं मिलेगी। तुम्हारे भाई को दे दी है। तुम पढ़कर क्या करोगी — आखिर दूसरे घर जाकर चूल्हा-चौका ही संभालना है।" और इसके पीछे एक डर भी था — जंगल का रास्ता, दस किलोमीटर, अकेली लड़की।
यह जवाब इतनी बार दिया गया था कि लड़कियाँ खुद भी माँगना बंद कर चुकी थीं।
इसी गाँव में सुमन होम विज़िट के दौरान पहुँची थीं।
जब उन्होंने लड़कियों से बात की, तो सबने एक ही बात कही — पढ़ना चाहती हैं, लेकिन साइकिल नहीं है। सुमन ने सुना। और फिर अभिभावकों के घर जाना शुरू किया — एक बार नहीं, बार-बार। PTM करवाई। घर-घर बैठकर बात की। अपना उदाहरण दिया। यह नहीं कहा कि आप गलत हैं — बस यह पूछती रहीं कि अगर आपकी बेटी पढ़ ले, तो क्या बुरा है।
शुरुआत में कोई नहीं माना।
सुमन फिर भी जाती रहीं।
धीरे-धीरे कुछ हिला। छह लड़कियों में से तीन के घर वाले साइकिल देने के लिए तैयार हुए।
तीन साइकिलें। छह लड़कियाँ।
उन्होंने तय किया — दो-दो मिलकर एक साइकिल पर जाएँगी। जब एक थक जाए, दूसरी चलाएगी। और वे निकल पड़ीं — हर सुबह, जंगल पार करके, दस किलोमीटर।
बाद में उन लड़कियों ने सुमन से कहा —
"दीदी, जब हम थक जाती हैं तो दूसरी साइकिल संभाल लेती है। हम रुकती नहीं।"
वो एक साइकिल की बात नहीं थी। वो छह लड़कियाँ थीं जो एक-दूसरे का सहारा बनकर हर सुबह दस किलोमीटर का जंगल पार कर रही थीं — उस जवाब के बावजूद जो उन्हें बचपन से सुनाया गया था।
उनकी लगन देखकर गाँव की पाँच और लड़कियाँ आगे आईं। जिन घरों में जल्दी शादी की बात चलती थी, वहाँ थोड़ा रुकाव आया। जो बच्चे ईंट-भट्ठों पर काम करते थे, उनमें से कुछ स्कूल में दिखने लगे।
और वो छह लड़कियाँ — जिन्हें बताया गया था कि साइकिल उनके लिए नहीं है, कि पढ़ाई उनके लिए नहीं है, कि उन्हें तो बस चूल्हा-चौका संभालना है — उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास कर ली।
लेखिका परिचय
नाम: श्रृंखला कुमारी
परिचय: टंडवा गाँव, बाँके बाज़ार ब्लॉक, गया की रहने वाली हैं। i-Saksham में Buddy के रूप में कार्यरत हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2021
लक्ष्य: लाइब्रेरियन बनना।