"इंटर कर ली हो, अब तुम्हारी शादी करवा देंगे।"
यह बात मैं कई बार सुन चुकी थी। और हर बार चुप हो जाती थी।
मेरा नाम सुप्रिया है। मैं जमुई जिले के काकन गाँव की रहने वाली हूँ। किसान परिवार की सबसे बड़ी बेटी। बारहवीं के बाद रिश्ते आने लगे थे। जब भी शादी की बात होती, मैं कमरे से बाहर निकल जाती या सिर झुका लेती। मुझे आगे पढ़ना था, कुछ करना था - लेकिन अपनी बात रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। रात को सोचती थी कि क्या मेरी पढ़ाई बारहवीं तक ही थी। सुबह उठकर फिर चुप हो जाती थी।
यह चुप्पी मेरी आदत नहीं थी। यह डर था।
इसी दौरान मैं i-Saksham से जुड़ी और एडू-लीडर बनी।
पहले-पहले समुदाय में काम करना भी आसान नहीं था। लोगों के सामने बोलने में हाथ काँपते थे। सवाल पूछना हो तो दो बार सोचती थी। लेकिन बच्चों और किशोरियों के साथ काम करते हुए धीरे-धीरे कुछ बदला। मैंने देखा कि जिन लड़कियों को मैं आगे बढ़ने के लिए कह रही थी, उनके लिए मैं खड़ी हो सकती थी - लेकिन खुद के लिए नहीं।
यह बात मन में अटक गई।
एक दिन सत्र के बाद घर लौटते हुए मैंने तय किया कि शादी की बात जब भी आएगी, इस बार चुप नहीं रहूँगी। माँ के पास गई। डरते-डरते कहा कि मुझे और पढ़ना है, अभी शादी नहीं करनी। माँ ने सुना, कुछ नहीं बोलीं। पापा के पास गई - वो भी चुप रहे। लेकिन उस दिन के बाद घर में शादी की बात थोड़ी धीमी हो गई। एक बार बोलने से सब नहीं बदला, लेकिन एक दरवाज़ा खुला।
समुदाय में काम करने के लिए रोज़ कई किलोमीटर का सफर था। कभी धूप में पैदल, कभी ऑटो का लंबा इंतज़ार। एक दिन समय पर पहुँचने के लिए बहुत दूर तक पैदल चली। घर लौटते वक्त एक ही बात मन में थी - अगर अपनी स्कूटी होती तो।
उस दिन से थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाने लगी।
जब घर में स्कूटी लेने की बात की, तो वही हुआ जो मुझे पता था होगा। माँ ने कहा लड़की अकेले स्कूटी लेकर कहाँ जाएगी। पापा ने कहा ज़रूरत नहीं है, ऑटो से काम चल जाता है। रिश्तेदारों की बातें अलग थीं। एक बार फिर वही दबाव था - चुप हो जाओ, मान लो।
लेकिन इस बार मैंने अलग तरीका अपनाया।
नाराज़ नहीं हुई। माँ से अलग बैठकर बात की, उनकी चिंता सुनी - कि सड़क पर अकेली लड़की, कुछ हो गया तो। पापा को बताया कि यह शौक नहीं है, यह काम का साधन है और इसके लिए मैंने खुद पैसे बचाए हैं। यह बातचीत एक दिन में नहीं हुई। हफ्तों हुई। कई बार लगा कि नहीं होगा। लेकिन हर बार थोड़ा और बोली, थोड़ा और समझाया।
और एक दिन घरवाले मान गए।
जिस दिन शोरूम से स्कूटी घर आई, मैं बार-बार बाहर जाकर उसे देख रही थी। शुरुआत में भाई पीछे बैठकर रास्ता समझाता था। डर लगता था कि कहीं गाड़ी बंद न हो जाए। लेकिन धीरे-धीरे हाथ पक्के होते गए।
और एक दिन मैं पहली बार अकेले स्कूटी चलाकर समुदाय पहुँची।
काम खत्म होने के बाद कुछ देर वहीं खड़ी रही। उसी रास्ते पर जहाँ कभी ऑटो का इंतज़ार किया करती थी।
आज मैं अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाती हूँ। छोटी बहन की ज़रूरतों में मदद कर पाती हूँ। समुदाय में समय पर पहुँचती हूँ।
और उस घर में जहाँ बारहवीं के बाद शादी की बात होती थी, आज मेरी पढ़ाई और काम की चर्चा होती है।
पहले लोग पूछते थे - "इतना बाहर क्यों जाती हो?"
आज कहते हैं - "अच्छा है, लड़की अपने पैरों पर खड़ी हो रही है।"
वही लोग।
लेखिका परिचय
नाम: सुप्रिया कुमारी
परिचय: काकन गाँव, जमुई जिले की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-10 की एडू-लीडर रह चुकी हैं और वर्तमान में Buddy Intern के रूप में कार्यरत हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2023
लक्ष्य: सरकारी नौकरी प्राप्त कर समाज के विकास में योगदान देना।