Friday, May 15, 2026

"फिर लड़की हो गई…"

"फिर लड़की हो गई…"

6 फरवरी 2018 को जब मैं अस्पताल से घर लौटी, तो नायरा मेरी गोद में थी और घर में एक अजीब-सी चुप्पी थी। मेरी सास ने बच्ची को देखा, मुँह फेर लिया और बस इतना कहा — "फिर लड़की हो गई।" मेरे पति कुछ नहीं बोले। उनका चुप रहना ही उनका जवाब था। उस दिन मैं समझ गई कि इस घर में नायरा को अपनी जगह खुद बनानी होगी — और शायद मुझे भी।

दरअसल उस दिन से थोड़ा पहले — जब नायरा आने वाली थी — घर में कोई साथ आने की स्थिति में नहीं था। शौर्य, मेरा सात साल का बेटा, घर पर था। मैं अकेले पैदल निकल गई अस्पताल की तरफ। रास्ते में दर्द था, लेकिन रुकने का कोई मतलब नहीं था। और जब वापस लौटी — तो जो स्वागत मिला, वो आप जान ही चुके हैं।

उसी महीने घर में पैसों की तंगी बढ़ गई। काम कम मिल रहा था, और जब भी कोई मुश्किल आती, बात घूम-फिरकर वहीं आ जाती — कि इस बच्ची के आने से सब बिगड़ा है। मैं सुनती रहती थी, कुछ कहती नहीं थी। जानती थी कि शब्दों से यह नहीं बदलेगा। जो बदलना था, वो सिर्फ मेरे हाथों से होगा।

इसलिए मैंने एक-एक करके रास्ते ढूँढे। पहले आसपास के दो घरों में काम करना शुरू किया — सुबह पाँच बजे उठकर, अपना घर निपटाकर, फिर दूसरों का। थोड़े पैसे आने लगे, लेकिन महीना पूरा नहीं होता था। तो फिर एक पड़ोसन से सिलाई सीखी। शुरुआत में कई बार कपड़ा बर्बाद हुआ, लोगों ने डाँटा भी, लेकिन मैंने जारी रखा क्योंकि रुकने का कोई विकल्प नहीं था। धीरे-धीरे हाथ बैठने लगा। फिर मोहल्ले के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया — पहले एक, फिर दो, फिर पाँच। महीने के आखिर में दो-तीन सौ रुपये आने लगे, जो उस वक्त मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।

इन सब के बीच रात को कभी-कभी थकान इतनी होती थी कि रोना आ जाता था। लेकिन बच्चों के सामने कभी नहीं रोई। दिन में जो भी हो — शाम को बच्चों के पास बैठ जाती थी। नायरा को पढ़ाती थी, शौर्य के साथ बात करती थी।

उन्हीं दिनों एक शाम शौर्य ने अचानक पूछा — "माँ, लोग दीदी के बारे में ऐसा क्यों बोलते हैं?" मैंने उसे कहा — "लोग जो नहीं समझते, वही बोलते हैं। हमें अपना काम करना है।" लेकिन उस रात मैं देर तक सोचती रही। शौर्य उस वक्त आठ-नौ साल का था। उसने देख लिया था — वो सब जो घर के बड़े देखकर भी अनदेखा कर रहे थे। अपनी बहन के साथ जो हो रहा था, वो उसे गलत लगता था। उसके पास इसके लिए शब्द नहीं थे, लेकिन सवाल था। और उस एक सवाल ने मुझे और मज़बूत कर दिया — कि नायरा की पढ़ाई पर जितना हो सके, उतना ध्यान देना है।

चाहे दिन कितना भी भारी रहा हो, रात को उसके साथ बैठकर ज़रूर पढ़ाती थी। और नायरा भी थी — जो लगन से पढ़ती रही, आगे बढ़ती रही। धीरे-धीरे स्कूल में नंबर अच्छे आने लगे। और एक दिन वो स्कूल से इनाम लेकर घर आई।

उस दिन कुछ बदला। मेरी सास ने पहली बार नायरा की तारीफ की। पड़ोस में किसी ने कहा — "लड़की पढ़ने मे तेज है।" वही लोग जो कभी उसके आने को बोझ कहते थे, अब उसके नंबर सुनकर सिर हिला रहे थे। जिन्होंने उसे जन्म के दिन गोद तक नहीं लिया था, वो अब उसके इनाम की बात गाँव में करने लगी थीं। मेरे पति — जो उस दिन चुप रहे थे — अब कभी-कभी बच्चों के स्कूल भी जाने लगे।

यह बदलाव किसी बहस से नहीं आया था, किसी के समझाने से नहीं आया था। नायरा की अपनी मेहनत ने वो काम किया जो शायद मेरे किसी भी शब्द से नहीं होता।

आज सब कुछ एकदम ठीक नहीं है। लेकिन उस घर में अब कोई खुलकर नायरा के बारे में कुछ गलत नहीं कहता। वो पढ़ रही है। शौर्य पढ़ रहा है। और मेरी सास — जिन्होंने उस दिन मुँह फेर लिया था — आज नायरा के इनाम की बात गाँव में करती हैं।


लेखिका परिचय:

  • नाम: चमन लता

  • परिचय: चमन लता मुंगेर के धरहरा गाँव की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2024 में i-Saksham से जुड़ीं।

  • लक्ष्य: चमन लता का लक्ष्य ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और समाज में जेंडर समानता की सोच को मज़बूत करना है।

Monday, May 11, 2026

मुंबई जाने से एक रात पहले

 जब सबसे करीबी इंसान रास्ता रोके — तब असली इम्तिहान शुरू होता है

रात के दस बज रहे थे। मुंबई की फ्लाइट सुबह थी। बैग पैक था। कागज़ात तैयार थे। 

और तभी पति ने कहा — "नहीं जाना है।"


मेरा नाम रुखसाना है। मुजफ्फरपुर के मुशहरी प्रखंड के बुधनगरा गाँव में मेरा घर है। एक मुस्लिम परिवार में पली-बढ़ी — जहाँ लड़कियों की दुनिया घर की चारदीवारी और पास के बाज़ार तक सीमित होती है। बिना बुर्क़े के बाहर निकलना ठीक नहीं माना जाता। अकेले कहीं जाना — वो तो कल्पना से भी बाहर था।

लेकिन i-Saksham से जुड़ने के बाद कुछ बदला था। सोच खुलने लगी थी। और जब India Exim Bank की मीटिंग के लिए मुंबई जाने का मौका मिला — मैंने हाँ कर दी।

पति पहले तैयार थे। उन्होंने साथ देने का वादा किया था।


लेकिन जाने से पहले के दिनों में मोहल्ले की बातें शुरू हो गईं।

कोई कह रहा था — "एयरपोर्ट पर घंटों रुकना होगा।" कोई कह रहा था — "अकेली औरत, इतनी दूर।" कोई कह रहा था — "पता नहीं वहाँ कैसे लोग होंगे।" 

किसी ने कुछ नहीं देखा था। कोई गया नहीं था। लेकिन बातें — बातें सबके पास थीं।

और वो बातें धीरे-धीरे पति के मन में उतरती गईं।


जाने से एक रात पहले उन्होंने i-Saksham के कई लोगों को फोन किया। कहा — रुखसाना नहीं जाएगी। प्लान कैंसिल। सबने समझने कि पूरी कोशिश की । आखिरी वक्त मे ऐसा नहीं करना चाहिए । 

India Exim Bank की मीटिंग में i-Saksham को बुलाया गया था — छह संगठनों में से एक के तौर पर। यह कोई छोटी बात नहीं थी। यह एक बड़े donor के सामने i-Saksham की साख का सवाल था। और अब — एक रात पहले — सब कुछ अधर में था।


जब मुझे यह पता चला — मेरे मन में पहले तूफान आया। गुस्सा। दुख। और एक सवाल — क्या यही होता है? क्या हर बार कोई न कोई आकर रास्ता रोक देता है?

लेकिन फिर एक और बात आई — और वो ज़्यादा तेज़ थी।

"अगर मैं नहीं गई — तो संगठन की क्या इज़्ज़त रहेगी? donor के सामने क्या जवाब होगा? और जो लड़कियाँ आगे इस तरह के मौके माँगेंगी — उनके लिए दरवाज़ा बंद हो जाएगा।"

यह सिर्फ मेरी उड़ान का सवाल नहीं था। यह उन तमाम लड़कियों के भविष्य का सवाल था —  जो मेरे जैसी हैं, मेरे गाँव जैसी जगहों में हैं, और जिनके लिए यह संगठन एक रास्ता खोलता है।

मैं यह रास्ता बंद होने नहीं दे सकती थी।


मैं पति के पास गई। इस बार लड़ाई नहीं की। भाषण नहीं दिया। बस इतना कहा —

"आपको डर है — मैं समझती हूँ। लेकिन आपने जो सुना, वो अधूरी बातें थीं। अगर आप चाहें तो पूरे रास्ते वीडियो कॉल पर रह सकते हैं। हर कदम देख सकते हैं।"

वे नहीं माने। 

तब मैंने कहा —"ठीक है। आप आइए या न आइए। लेकिन मैं जाऊँगी। क्योंकि यह सिर्फ मेरा मौका नहीं है — यह उन लड़कियों की उम्मीद है जो मुझे देख रही हैं। मैं संगठन की इज़्ज़त को इस तरह नहीं जाने दे सकती।"

उसके बाद मैंने बात करना बंद कर दिया।

वो चुप्पी मेरे लिए आसान नहीं थी। जिस इंसान के साथ ज़िंदगी बनाई हो — उससे इस तरह रुकना — वो भीतर से तोड़ता है।

लेकिन कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो सिर्फ अपने लिए नहीं लिए जाते।

अगली सुबह। दरवाज़े पर दस्तक हुई।

पति खड़े थे — बैग उठाने के लिए। कुछ नहीं बोले। बस आए। और छोड़ने चल दिए।

शायद उन्हें रात भर में समझ आ गया था। शायद मेरी चुप्पी ने वो कहा जो शब्द नहीं कह पाए थे। शायद उन्हें समझ हो कि यह ज़िद नहीं — यह ज़िम्मेदारी है।


एयरपोर्ट पर कदम रखा — सब कुछ नया था। भीड़। सिक्योरिटी चेक। अनाउंसमेंट। भागते लोग।

मैं घबराई भी। लेकिन डरी नहीं।जब फ्लाइट ने उड़ान भरी और खिड़की से ज़मीन छोटी होती दिखी — तो मुझे लगा कि मैं सिर्फ आसमान में नहीं उठ रही। मैं उन तमाम बातों से ऊपर उठ रही हूँ — जो रात भर मुझे रोकने की कोशिश करती रहीं।


मुंबई में India Exim Bank की मीटिंग में छह संगठन थे। मैंने i-Saksham का काम रखा। रवि सर के साथ। अपने गाँव की कहानियाँ — उस बड़े कमरे में, उन बड़े लोगों के सामने। Exim Bank के सदस्यों ने सुना। सराहा। हौसला दिया। और उस पल मैं सोच रही थी — कि अगर एक रात पहले मैं रुक गई होती — तो यह पल नहीं होता। यह दरवाज़ा नहीं खुलता।


जब मैं अपने गाँव वापस लौटी, तो मैं वही रुखसाना थी, लेकिन मेरी सोच बदल चुकी थी। पति ने भी कुछ नहीं पूछा। लेकिन कुछ तो बदला था। मे हमेशाअपने जैसी और लड़कियों के लिए  कुछ करना चाहती हूँ—ताकि वे भी अपने सपनों को पहचान सकें और उन्हें पूरा करने की हिम्मत जुटा सकें। और ये मे जरूर करूंगी एक दिन । 


लेखिका परिचय

नाम: रुख़साना ख़ातून परिचय: बुधनगरा गाँव, मुशहरी ब्लॉक, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2024 लक्ष्य: भविष्य में एक Software Engineer के रूप में अपनी पहचान बनाना — और अपने जैसी लड़कियों के लिए रास्ता खुला रखना।

Friday, May 1, 2026

"मैं जाऊँगी।"

कुछ फैसले एक बार नहीं, बार-बार लेने पड़ते हैं

घर में वही सवाल था जो हमेशा से था।

"लड़की अकेले इतनी दूर जाएगी? अगर कुछ हो गया तो?"

मोनी कुछ देर के लिए चुप हो जाती। फिर अंदर से एक आवाज़ आती — वही आवाज़, वही जवाब।

"मैं जाऊँगी।"


मेरा नाम मोनिका है। मैं खैरमा की रहने वाली हूँ और 2022 से i-Saksham से जुड़ी हूँ। यह कहानी मोनी की है — सिकंदरा गाँव की उस लड़की की, जिसने एक दिन तय किया कि वो रुकेगी नहीं।

मोनी का घर सात लोगों का था। तीन बहनों की शादी हो चुकी थी। एक बड़ा भाई। पिता का कोई स्थायी काम नहीं — और शराब की लत। माँ एक छोटे काम से घर संभालती थीं।

ऐसे घर में लड़कियों के फैसले अक्सर उनके अपने नहीं होते।

लेकिन मोनी के अंदर एक सीधी-सी चाह थी — अपने पैरों पर खड़ा होना। कुछ कमाना। अपना घर बनाना।

और जब उसे महाराष्ट्र के नव गुरुकुल जाने का मौका मिला — उसने हाँ कह दी। खुद से।


घर और आस-पड़ोस तुरंत विरोध में खड़े हो गए।

"लड़की इतनी दूर अकेले नहीं जाती।" "कुछ गलत हो गया तो?" "कौन जाने वहाँ कैसे लोग हों।"

ये आवाज़ें उसके फैसले को रोक रही थीं। और कहीं न कहीं उसके अंदर भी डर पैदा कर रही थीं।

लेकिन मोनी ने रुकने के बजाय एक काम किया — उसने i-Saksham में सीखे कोचिंग के तरीके से पहले खुद से सवाल पूछा।

"अगर मैं नहीं गई — तो क्या मैं आगे बढ़ पाऊँगी?"

जवाब साफ था।

फिर उसी स्पष्टता के साथ वो परिवार के पास गई। बार-बार गई। उसने भाषण नहीं दिया — उसने बातचीत की। और एक ठोस प्रस्ताव रखा —

"मैं एक महीने के लिए जाऊँगी। अगर सही नहीं लगा — वापस आ जाऊँगी।"

यह समझौता नहीं था। यह भरोसा बनाने की प्रक्रिया थी।

धीरे-धीरे परिवार मान गया।


लेकिन सफर उसका अपना था — और वो उसे खुद तय करना था।

मोनी ने i-Saksham की फेलोशिप से बचाए अपने पैसों से यात्रा का खर्च उठाया। खुद तैयारी की। और पहली बार — अकेले ट्रेन में बैठी।

रास्ते में अजनबियों से बात करना, मदद माँगना, रास्ता समझना — हर छोटे कदम पर उसने अपनी झिझक तोड़ी।

पुणे पहुँचकर उसने खुद Rapido बुक किया।

यह छोटी-सी बात थी। लेकिन उस पल वो जानती थी — यह अपने फैसले खुद लेने की शुरुआत है।


कैंपस पहुँचने के बाद चुनौतियाँ खत्म नहीं हुईं।

नए लोग। नया माहौल। नई भाषा। नए नियम।

और एक दिन — खाने में कॉकरोच।

एक पल के लिए लगा कि शायद घरवालों का डर सही था। शायद यहाँ आना गलत था।

लेकिन इस बार मोनी चुप नहीं रही।

उसने अपने साथियों और सीनियर्स से बात की। और फिर Discord पर पूरी feedback लिखकर डाली — समस्या क्या है, क्या बदलना चाहिए, और क्यों।

यह एक लड़की की शिकायत नहीं थी।

यह एक आवाज़ थी — जो अपनी जगह माँग रही थी।

असर हुआ। खाने में सुधार हुआ। व्यवहार बदला। लोग उसे गंभीरता से लेने लगे।

वो अब चुप रहने वाली लड़की नहीं थी।


धीरे-धीरे कैंपस उसका हो गया।

अलग-अलग राज्यों के लोगों से दोस्ती हुई। नई भाषाएँ आईं। नए नज़रिए आए।

जब भी कुछ समझ नहीं आता — वो सीनियर्स से पूछती। सीखती रहती।

आर्थिक चुनौतियाँ आज भी हैं। परिवार से नियमित मदद नहीं आती। कभी-कभी जीजू या कोई दोस्त सहारा दे देता है। लेकिन अपने सफर की ज़िम्मेदारी उसने खुद उठाई है — और उसे किसी और को सौंपने का इरादा नहीं है।


मोनी सिकंदरा की वो पहली लड़की है जो वहाँ से इतनी दूर — अकेले — पढ़ने गई।

यह कोई बड़ा आंदोलन नहीं है।

यह बस एक लड़की है — जिसने तय किया कि उसकी ज़िंदगी का फैसला उसका अपना होगा। और जब-जब डर आया, उसने उससे लड़ने के बजाय उसे समझा — और आगे बढ़ गई।

अब उसके अंदर सिर्फ एक बात साफ है।

रुकना नहीं है।

जो रास्ता उसने खुद के लिए बनाया है — उस पर चलते रहना है।


लेखिका परिचय

नाम: मोनिका परिचय: खैरमा की रहने वाली हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2022 से i-Saksham से एक Buddy के रूप में जुड़ी हैं। भूमिका: मोनिका का काम सिर्फ मार्गदर्शन देना नहीं — बल्कि बच्चों और समुदाय के साथ एक दोस्त, सहयोगी और प्रेरक बनकर आगे बढ़ना है।

Friday, April 24, 2026

खिड़की वाली लड़की - बुधनी

 कुछ ज़िंदगियाँ एक नज़र से बच जाती हैं — अगर कोई देखने वाला हो

स्कूल से लौटते वक्त रेखा दीदी की नज़र अक्सर रास्ते के उस घर पर नहीं पड़ती थी।

लेकिन उस दिन पड़ी।

खिड़की पर बुधनी खड़ी थी। चुप। घबराई हुई। जैसे कुछ कहना चाहती हो — और जैसे कहने की हिम्मत जुटा नहीं पा रही हो।

रेखा दीदी रुकीं। पास गईं। और बस इतना पूछा — "क्या हुआ?"

बुधनी ने हिचकते हुए बताया — घर में उसकी शादी की तैयारी हो रही है।


मेरा नाम शिवानी है। मैं मुंगेर के धरहरा ब्लॉक के घटवारी गाँव से हूँ। यह कहानी रेखा दीदी की है — और उस एक पल की, जब उन्होंने चलते-चलते रुकने का फैसला किया।

बुधनी उस वक्त बस इतना जानती थी कि कुछ तय हो रहा है — उसके बारे में, उसके बिना। उसकी पढ़ाई अभी पूरी नहीं हुई थी। उसके सपने अभी बने भी नहीं थे। लेकिन घर में एक फैसला हवा में तैर रहा था।

रेखा दीदी के लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं थी। यह एक ज़िम्मेदारी थी।


उस घर में जाना आसान नहीं था। रेखा दीदी को डर था — कि माता-पिता नाराज़ होंगे, कि वे बाहर वाले की बात क्यों सुनेंगे, कि कहीं बात बिगड़ न जाए।

लेकिन बुधनी की वो आँखें भूली नहीं थीं। वे गईं।

शुरुआत में माहौल भारी था। माता-पिता के पास अपने तर्क थे — पूरे, पक्के, और उनकी अपनी चिंता से निकले हुए। उन्हें डर था कि लड़की बड़ी हो गई तो लोग बातें करेंगे। कोई अनहोनी हो सकती है। इज़्ज़त दाँव पर लग सकती है। और शादी कर दो — तो जिम्मेदारी पूरी।

रेखा दीदी ने उन्हें बीच में नहीं रोका। सुनती रहीं। पूरा सुना।


फिर उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया। बस कुछ सवाल रखे — धीरे से, जैसे कोई अपना पूछता है।

"अगर अभी शादी हो गई — तो क्या बुधनी अपनी पढ़ाई पूरी कर पाएगी?"

"क्या वो इस उम्र में नई ज़िम्मेदारियों के लिए तैयार है?"

"आपने अपने आसपास ऐसी लड़कियाँ देखी हैं जो पढ़-लिखकर अपने घर का सहारा बनीं?"

और फिर उन्होंने उदाहरण दिए — उसी गाँव के, उसी टोले के। पास की एक लड़की जिसने इंटर के बाद आँगनवाड़ी में काम शुरू किया — और आज अपने घर का खर्च खुद उठाती है। एक और लड़की जिसने सिलाई सीखी, छोटा काम शुरू किया — और अब घर में उसकी बात सुनी जाती है।

"समाज की बातें कुछ महीने होती हैं," रेखा दीदी ने कहा। "लेकिन जल्दी में लिया गया एक फैसला — पूरी ज़िंदगी के साथ रहता है।" 

यह बातचीत एक दिन में खत्म नहीं हुई। रेखा दीदी दो बार और गईं। हर बार उसी शांति के साथ। उसी सम्मान के साथ।

उन्होंने माता-पिता को गलत नहीं ठहराया। उन्होंने बस यह कहा — आपका डर गलत नहीं है। लेकिन उसका जवाब जल्दबाज़ी नहीं है।

और एक दिन वो पल आया। माता-पिता ने खुद कहा — "अभी नहीं। बुधनी पढ़ेगी।" 

वो चार शब्द — किसी कानून से नहीं आए थे। किसी अभियान से नहीं आए थे। वो तीन मुलाकातों से आए थे। एक लड़की की खिड़की पर ठहरी एक नज़र से आए थे। बुधनी आज स्कूल जाती है। उसी रास्ते से — जिस रास्ते पर एक दिन रेखा दीदी रुकी थीं।


और मैं सोचती हूँ — कितनी बुधनियाँ हैं जो अभी भी किसी खिड़की पर खड़ी हैं? कितनी चुपचाप इंतज़ार कर रही हैं कि कोई रुके। कोई पूछे। कोई सुने। शायद अगली बार वो कोई — आप हों।


लेखिका परिचय

नाम: शिवानी कुमारी परिचय: घटवारी गाँव, धरहरा ब्लॉक, मुंगेर की रहने वाली हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2021 से i-Saksham के साथ जुड़ी हैं। लक्ष्य: UPSC की तैयारी करना और सामाजिक क्षेत्र में काम करते हुए ज़मीनी बदलाव लाना।

Friday, April 17, 2026

"नहीं। लड़कियाँ ऐसे पैर फैलाकर नहीं बैठतीं।"

 दो पैर, दो पहिये — और एक ज़िद

"नहीं। लड़कियाँ ऐसे पैर फैलाकर नहीं बैठतीं।"

पिता जी के ये शब्द उस दिन मेरे दिल में कहीं गहरे उतर गए। मैं पंद्रह साल की थी और बस इतना चाहती थी कि साइकिल चलाना सीख सकूँ। लेकिन मेरे पिता जी की नज़र में साइकिल की सीट पर दोनों तरफ पैर फैलाकर बैठना किसी लड़की के लिए शर्म की बात थी। उन्होंने कहा, "इससे बेहतर है पैदल जाओ।"

मैं चुप रही। जवाब नहीं दिया। लेकिन मन में एक ज़िद ज़रूर पाल ली।


मेरा नाम नैंसी है। मुजफ्फरपुर के मुरौल ब्लॉक के हसनपुर गाँव में पली-बढ़ी। हमारे घर में एक अनकहा नियम था — लड़कियाँ दायरे में रहें, लड़कों की बराबरी न करें। और इस दायरे की दीवारें हर उस काम के आगे खड़ी हो जाती थीं जिसमें मुझे थोड़ी भी आज़ादी दिखती थी।

पर मैंने छुप-छुपकर साइकिल सीख ली।

जब भी पिता जी देख लेते, डाँट पड़ती। मैं बिना जवाब दिए वहाँ से चली जाती। डर था उनका — लेकिन साइकिल के पहिये भी नहीं रुके।

फिर एक दिन मेरे मन में एक अलग ही विचार आया।

मैंने पिता जी से कहा — "मुझे स्कूटी सीखनी है।"

उन्होंने एक पल रुककर सोचा और... हाँ कर दी।

दरअसल उन्हें यकीन था कि मैं सीख ही नहीं पाऊँगी। स्कूटी खरीदना उनके लिए एक तरह की चुनौती थी — जो उन्हें लगा, मैं हार जाऊँगी।

लेकिन मैंने सीख ली।

पहली बार जब स्कूटी की हैंडल मेरे हाथ में थी और वो आगे बढ़ी, तो मुझे जो महसूस हुआ — उसे मैं आज भी शब्दों में पूरा नहीं बता सकती। वो सिर्फ रफ्तार नहीं थी। वो एक एहसास था — कि मैं खुद अपना रास्ता तय कर सकती हूँ।


कुछ महीने बाद मुझे खुशी और वंदना में वही भूख दिखी — जो कभी मुझमें थी।

दोनों मेरे ही गाँव की लड़कियाँ हैं। उम्र करीब बाईस साल। स्नातक की पढ़ाई कर रही हैं — लेकिन कॉलेज जाने के लिए घंटों सड़क किनारे खड़े होकर गाड़ी का इंतज़ार करना पड़ता है। कभी गाड़ी आती है, कभी नहीं। कभी समय पर पहुँचती हैं, कभी नहीं।

वे स्कूटी सीखना चाहती थीं — ताकि किसी का इंतज़ार न करना पड़े। ताकि अपने आने-जाने की ज़िम्मेदारी खुद उठा सकें।

जब मैं उनके साथ बैठी और उनकी बातें सुनीं, तो मुझे समझ आया कि उन्हें स्कूटी चलाने से ज़्यादा एक चीज़ की ज़रूरत है — भरोसा। खुद पर।

उसी पल मैंने तय किया कि जो ताकत मुझे मिली है, वो मेरे तक नहीं रुकेगी।


मैंने उन दोनों को सिखाना शुरू किया। पर समाज कहाँ चुप रहता है।

लोगों ने कहा — "तुम तो सीख गई, लेकिन ये नहीं सीख पाएँगी।"

मैंने उन आवाज़ों को अनसुना किया। और अपनी आवाज़ से खुशी और वंदना का हौसला बढ़ाती रही। जब वे डगमगाईं, मैं उनके पास खड़ी रही। जब उन्हें लगा कि नहीं होगा, मैंने उन्हें याद दिलाया — "मुझे भी यही कहा गया था।"

धीरे-धीरे डर हटा। हैंडल मज़बूत हुई। और एक दिन वो पल आया — जब खुशी और वंदना बिना किसी के सहारे के, सड़क पर निकल पड़ीं।


आज जब मैं उन्हें कॉलेज की तरफ जाते देखती हूँ — स्कूटी पर, खुद के दम पर — तो मुझे लगता है कि शायद बदलाव ऐसे ही होता है।

एक लड़की के भीतर की ज़िद, दूसरी लड़की का रास्ता बन जाती है।


लेखिका परिचय

नाम: नैंसी कुमारी परिचय: हसनपुर गाँव, मुरौल ब्लॉक, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं। i-Saksham के बैच-11 की एडू-लीडर रह चुकी हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2024 लक्ष्य: उच्च शिक्षा हासिल करना और आगे बढ़ना।