कुछ फैसले एक बार नहीं, बार-बार लेने पड़ते हैं
घर में वही सवाल था जो हमेशा से था।
"लड़की अकेले इतनी दूर जाएगी? अगर कुछ हो गया तो?"
मोनी कुछ देर के लिए चुप हो जाती। फिर अंदर से एक आवाज़ आती — वही आवाज़, वही जवाब।
"मैं जाऊँगी।"
मेरा नाम मोनिका है। मैं खैरमा की रहने वाली हूँ और 2022 से i-Saksham से जुड़ी हूँ। यह कहानी मोनी की है — सिकंदरा गाँव की उस लड़की की, जिसने एक दिन तय किया कि वो रुकेगी नहीं।
मोनी का घर सात लोगों का था। तीन बहनों की शादी हो चुकी थी। एक बड़ा भाई। पिता का कोई स्थायी काम नहीं — और शराब की लत। माँ एक छोटे काम से घर संभालती थीं।
ऐसे घर में लड़कियों के फैसले अक्सर उनके अपने नहीं होते।
लेकिन मोनी के अंदर एक सीधी-सी चाह थी — अपने पैरों पर खड़ा होना। कुछ कमाना। अपना घर बनाना।
और जब उसे महाराष्ट्र के नव गुरुकुल जाने का मौका मिला — उसने हाँ कह दी। खुद से।
घर और आस-पड़ोस तुरंत विरोध में खड़े हो गए।
"लड़की इतनी दूर अकेले नहीं जाती।" "कुछ गलत हो गया तो?" "कौन जाने वहाँ कैसे लोग हों।"
ये आवाज़ें उसके फैसले को रोक रही थीं। और कहीं न कहीं उसके अंदर भी डर पैदा कर रही थीं।
लेकिन मोनी ने रुकने के बजाय एक काम किया — उसने i-Saksham में सीखे कोचिंग के तरीके से पहले खुद से सवाल पूछा।
"अगर मैं नहीं गई — तो क्या मैं आगे बढ़ पाऊँगी?"
जवाब साफ था।
फिर उसी स्पष्टता के साथ वो परिवार के पास गई। बार-बार गई। उसने भाषण नहीं दिया — उसने बातचीत की। और एक ठोस प्रस्ताव रखा —
"मैं एक महीने के लिए जाऊँगी। अगर सही नहीं लगा — वापस आ जाऊँगी।"
यह समझौता नहीं था। यह भरोसा बनाने की प्रक्रिया थी।
धीरे-धीरे परिवार मान गया।
लेकिन सफर उसका अपना था — और वो उसे खुद तय करना था।
मोनी ने i-Saksham की फेलोशिप से बचाए अपने पैसों से यात्रा का खर्च उठाया। खुद तैयारी की। और पहली बार — अकेले ट्रेन में बैठी।
रास्ते में अजनबियों से बात करना, मदद माँगना, रास्ता समझना — हर छोटे कदम पर उसने अपनी झिझक तोड़ी।
पुणे पहुँचकर उसने खुद Rapido बुक किया।
यह छोटी-सी बात थी। लेकिन उस पल वो जानती थी — यह अपने फैसले खुद लेने की शुरुआत है।
कैंपस पहुँचने के बाद चुनौतियाँ खत्म नहीं हुईं।
नए लोग। नया माहौल। नई भाषा। नए नियम।
और एक दिन — खाने में कॉकरोच।
एक पल के लिए लगा कि शायद घरवालों का डर सही था। शायद यहाँ आना गलत था।
लेकिन इस बार मोनी चुप नहीं रही।
उसने अपने साथियों और सीनियर्स से बात की। और फिर Discord पर पूरी feedback लिखकर डाली — समस्या क्या है, क्या बदलना चाहिए, और क्यों।
यह एक लड़की की शिकायत नहीं थी।
यह एक आवाज़ थी — जो अपनी जगह माँग रही थी।
असर हुआ। खाने में सुधार हुआ। व्यवहार बदला। लोग उसे गंभीरता से लेने लगे।
वो अब चुप रहने वाली लड़की नहीं थी।
धीरे-धीरे कैंपस उसका हो गया।
अलग-अलग राज्यों के लोगों से दोस्ती हुई। नई भाषाएँ आईं। नए नज़रिए आए।
जब भी कुछ समझ नहीं आता — वो सीनियर्स से पूछती। सीखती रहती।
आर्थिक चुनौतियाँ आज भी हैं। परिवार से नियमित मदद नहीं आती। कभी-कभी जीजू या कोई दोस्त सहारा दे देता है। लेकिन अपने सफर की ज़िम्मेदारी उसने खुद उठाई है — और उसे किसी और को सौंपने का इरादा नहीं है।
मोनी सिकंदरा की वो पहली लड़की है जो वहाँ से इतनी दूर — अकेले — पढ़ने गई।
यह कोई बड़ा आंदोलन नहीं है।
यह बस एक लड़की है — जिसने तय किया कि उसकी ज़िंदगी का फैसला उसका अपना होगा। और जब-जब डर आया, उसने उससे लड़ने के बजाय उसे समझा — और आगे बढ़ गई।
अब उसके अंदर सिर्फ एक बात साफ है।
रुकना नहीं है।
जो रास्ता उसने खुद के लिए बनाया है — उस पर चलते रहना है।
लेखिका परिचय
नाम: मोनिका परिचय: खैरमा की रहने वाली हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2022 से i-Saksham से एक Buddy के रूप में जुड़ी हैं। भूमिका: मोनिका का काम सिर्फ मार्गदर्शन देना नहीं — बल्कि बच्चों और समुदाय के साथ एक दोस्त, सहयोगी और प्रेरक बनकर आगे बढ़ना है।
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