Thursday, May 6, 2021

पूजा के लगातार प्रयासों से प्रेरित हुए अभिभावक: स्मृति

जब अप्रैल में लॉकडाउन खुला तो चारों तरफ खुशी की लहर दौड़ उठी; सभी बच्चे फिर से स्कूल जाने लगेI बच्चों केे अभिभावक, एडु-लीडर सभी बहुत खुश थेI लेकिन यह ख़ुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाई l क्योंकि कोरोना पहले केे मामले में ज्यादा रफ़्तार से तेजी से बढ़ने लगी थी जो कि पहले से ज्यादा खतरनाक थाI इसलिए सरकार ने यह देखते हुए एक महीने केे अंदर ही फिर से लॉकडाउन लगा दियाI जिससे एक बार फिर से बच्चों की पढाई में दिक्कत आने लगीI लेकिन एडु-लीडर ने फिर भी हार नहीं मानी और बच्चों से जुड़ने का तरीका ढूंढ ही निकालाI इन परिस्थितियों में हमारी एक एडु-लीडर पूजा ने कैसे अपनी सूझबूझ से बच्चों को शिक्षा से जोड़ें रखाI 

पूजा i-सक्षम बैच-5 की एडु-लीडर हैI वह केनडिह गाँव केे एक मुसहरी टोला (मांझी समुदाय के लोग) केे बच्चों को पढ़ाती है, जहाँ केे लोग शिक्षा के प्रति कम जागरूक हैI यहाँ के लोगों केे पास स्मार्ट फ़ोन की भी कमी हैI पता लगाने केे बाद पता चला कि इस टोला में मात्र एक ही स्मार्टफोन है जिससे बच्चों को पढ़ाया जा सकता है और वह फ़ोन एक बच्चे केे पिता केे पास रहता हैl पूजा ने जब उस नंबर से जुड़ने की कोशिश की तो पता चला कि उनका अधिकतर समय साटा (जो डीजे बजाता है) में चला जाता है जिससे उसे बच्चों केे साथ जुड़ने में दिक्कत होती हैl बच्चों से समय पर बात भी नहीं हो पाती है l 

पूजा ने अपनी परेशानी को अपनी बडि स्मृति केे साथ साझा कियाI स्मृति और प्रिया ने उन्हें बताया कि अगर वे फ़ोन से नही जुड़ पा रहे हैं तो हम उनसे वर्कशीट और लाइब्रेरी केे माध्यम से जुड़ने की कोशिश करेंगेI 

पूजा ने उसी दिन वर्कशीट और लाइब्रेरी लोगों केे घर तक पहुँचाना शुरू किया, अभिभावकों ने इसे लेने से साफ मना कर दिया क्योंकि लोग कोरोना से काफी सहमें हुए थेl बहुत कोशिश केे बाद शुरू में दो-तीन बच्चे ही इसके लिए आगे आयेl 

पहले दिन की निराशा के बाद पूजा ने हार नही मानी और अगली बार वे फिर अभिभावकों के पास गयी। वह लगातार कोशिश करती रहीl इस बार उनके साथ 10 बच्चें जुड़े और धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गईI कुछ ही दिनों में वह 20-21 बच्चों तक जुड़ गयी है। बच्चे भी अब पूजा को देखकर दौड़ते हुए आ जाते है। 

उसी गांव समुदाय में एक पुराना भवन है जो कई दिनों से बंद थाI उसे खोल कर पूजा ने वहाँ साफ-सफाई करवा कर बच्चों के पढ़ने लायक भी बना दिया है ताकि बच्चे वहाँ जाकर पढ़ पाएं। इसके लिए वहाँ उसने कुछ लाइब्रेरी की किताबें भी लगा दी। कुछ वर्कशीट्स रख दिये है ताकि बच्चे जाकर अपने पसन्द की किताबें पढ़ पाएं।

इसमें पूजा की मदद वहाँ के एक निवासी जयकांत मांझी ने भी की है उन्होंने कुछ लोगो से पूजा के साथ मिलकर बात की और कमरे को खुलवाया। वहाँ के समुदाय के लोगो का कहना था कि वह भवन काफी समय से बन्द था। 

(तस्वीर सामुदायिक भवन की है और पूजा द्वारा ली गयी हैI)

अच्छी बात यह है कि अब वो बच्चों के पढ़ने में उपयोग हो रहा हैI पूजा जिस तरह से बच्चों को लगन और मेहनत से पढ़ा रही हैं,  उम्मीद है सभी बच्चे से फिर से वापस जुड़ जायेंगेI 

Thursday, February 4, 2021

एक नई पहल कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की बच्चियों के अभिभावक के साथ पहला अनुभव

- प्रिया कुमारी 


दरवाजे भी खुलेंगे
पहले ताला तो हटाओ
दिखेगी नई रोशनी 
ज़रा पलके तो उठाओ
रास्ते भी नए मिलेंगे
कुछ कदम तो बढ़ाओ...

आज मैं और मोनिका PTM (अभिभावक शिक्षक बैठक )  करवाने मनियड्डा  गए । जब PTM से 2 दिन पहले मैंने बच्चियों को बताया कि मैं और मौनिका उनके गाँव आ रहे हैं तो बच्चियां  खुशी से उछल पड़ी|  जन मैंने उन्हें बताया कि आपके अभिभावक  से मिलना है, तो बच्च्चियां कुछ देर के लिए शांत हो गयी फिर पूछती है "दीदी क्या हो गया हम लोग कुछ गलती किये क्या?" इस पर मैंने उन्हें कहा कि हम बस मिलने आ रहे हैं, आप लोग अपने घर मे बोल दीजियेगा। 

   

आज सुबह जब जाने का दिन आया तो मेरे मन मे एक खुशी और डर दोनों था की यह सब कैसे होगा? क्या कर पाएंगे? क्योंकि हमदोनो ही नये थे। हम दोनो ने आज से पहले कहीं PTM नहीं करायी थी| हाँ, अपने अपने गांव में खुद जरूर की था । फिर भी मेरे मन मे एक ही सवाल चल रहा था कि क्या यह मुझसे हो पायेगा? क्या मैं उनके सारे सवालो के जवाब दे पाउंगी? पर एक खुशी भी थी कि हम लोग एक नई पहल करने जा रहे है। तो कोशिश करती हूँ, अच्छे से कर पाऊ । मैं अपनी खुशी सब के सामने जाहिर कर रही थी पर जो डर था उसको मे किसी के सामने जाहिर नहीं कर पा रही थी। 


मैं और मोनिका PTM के लिए निकल गए l हम दोनों के मन में  डर था पर किसी से कोई साझा नहीं कर पा रहे थे कि मुझे डर लग रहा है|


हमलोग मनियड्डा पहुँच गए । कुछ पेरेंट्स और बच्ची हमलोगों का इंतजार कर रही थी। ये देख कर ही अंदर से खुशी हुई कि लोग अपना कीमती समय को निकाल कर आए है । 

नमस्ते से शुरुआत हुई । हमलोगों ने अपने बारे मे बताना शुरू किया| फिर और भी लोग आये । हमने अपने और i-सक्षम के बारे में बताया। मेरी बातो को सभी बहुत ध्यान से सुन रहे थे । फिर मैंने उनसे उन के बारे में पुछा और वे भी अपनी बातो को खुल के बता रहे थे। हमलोग एक दूसरे से जुड़ पाये । हमारी शुरुआत अच्छी रही ।


जैसे - किसी का कहना था "आपलोगो ने फोन देकर बहुत अच्छा काम किया है । जो बच्ची हमेशा खेलती थी वो आज इस फोन के जरिये कम से कम पढ़ तो रही है।" किसी ने कहा की "मै बच्ची को पढ़ते देखी दिन भर बच्ची पढ़ते रहती है घर जा कर भी पढ़ती है ।" किसी ने कहा की "दिन भर खेलने से अच्छा की सब एक साथ पढ़ती तो है।" तो किसी ने कहा कि "आप मेरी बच्ची के लिए इतना सब कर रहे है पर जो शिक्षक पैसा ले कर पढ़ाते है वो भी इतना मेहनत नही करते है।"

उनकी बातो से ये साफ पता चल रहा था कि अपनी बच्चियों की पढाई को देखकर वो भी खुश है ।  उनका कहना था की बच्ची मन से पढ़ती है  । उनकी बातो से ऐसा लगा की वो बच्चों के ऑनलाइन क्लास से वे बहुत खुश है । 


हमने अभिभावकों के साथ एक छोटी सी गतिविधि की जहां उन्हें अपने बच्चों के बारे में  कोई 2 ऐसी बातें हमारे साथ साझा करनी थी, जो उन्हें  अच्छी लगती हो l सब से अच्छा ये रहा कि सभी ने बताया कि उनके बच्चों में क्या अच्छा है ।

अंत मे हम लोगो ने उनसे एक पेड़  बनाने की गतिविधि कराई  जो उन्हें अंगूठे से बनाना था| यह गतिविधि काफी अच्छी रही| सभी अपना अंगूठा लगाते समय कह रहे थे की एक सूखे पेड़ में  हरियाली डाल रहे है । (हमारा हाथ शिक्षा और पर्यावरण दोनो  के साथ है) ये हमारा पहला PTM सफल रहा और बहुत कुछ सीख भी दे गया ।