Sunday, October 31, 2021

अक्टूबर 2021 की सुर्ख़ियों में : प्रियंका कौशिक

साथियों, इस माह की "सुर्ख़ियों में" i-सक्षम टीम के अनेकों सदस्यों का नाम आया है। आप सभी जानते ही हैं कि कुछ प्रमुख बिंदु हैं, जिनके आधार पर यह चयन किया जाता है। टीम के जिन सदस्यों ने किसी न किसी रूप में किसी अन्य सदस्य को अच्छा करते हुए देखा है, उनका नाम व कार्य आप सुर्ख़ियों के कॉलम के तहत पाएंगे। इस माह के नाम कुछ इस प्रकार हैं

वकील 

वकील सर बहुत ही सक्रिय होकर एडु-लीडर और बड़ी का सहयोग करते है। जैसे – बच्चों की उपस्तिथि और शिक्षकों व अभिभावकों की बैठक के अनुभव साझा करना, साथ ही यदि कोई पुस्तक इस सप्ताह उन्होंने पढ़ी है तो उसके मुख्य बिंदु भी लोगो के साथ साझा करते हैं।

कोमल 

कोमल अपनी कक्षा में एम जी- एम एल को बेहद खुबसूरत ढंग से बच्चों के साथ लागू कर पायी है। बाकी सभी एडु-लीडर्स को कोमल से सीखने की जरुरत है कि किसी भी विषय-वस्तु को कक्षा में कैसे बेहतर ढंग से लागू किया जाए। 

आँचल 

आँचल कुछ महीनों से अपने कार्यों और उनके साथी आई जिम्मेदारियों को लेकर बहुत ही सक्रिय हो गयी हैं, ये जरुरत के समय लीड लेना सीख गयी हैं। वर्चुअल बैठकों के लिए लिंक शेयर करना, सवाल पूछना, नोट्स बनाना, अपने तथा अपने साथियों के लिए आवाज उठाना यह सब कर रही हैं। जब कोई अच्छा कार्य करता है तो उसके कार्यों को सराहती भी हैं। 


प्रियंका कौशिक 

ऑफिस में सभी के स्वास्थ्य को लेकर बहुत ही ज्यादा देखभाल करती है। एडु-लीडर और बड़ी को किसी कार्य विशेष के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभावों के बारे में बताते हुए उन्हें समझाती और सलाह भी देती हैं।

कोई ऐसे कार्य जो प्रत्येक माह होने होते है पर किसी वजह से नहीं होता है तो दीदी सभी को कभी बैठक में तो कभी व्यक्तिगत रूप से बताती हैं। गहन चिंतन करने पर मजबूर पर देती हैं।

कोई चीजें जो नहीं हो पा रहा है या समझ नहीं आ रहा होता है तो उसे भलीभांति समझाती भी हैं।


सीमा देवी (बैच-6)

इस महीने ये ना सिर्फ स्वयं संस्था के मूल्यों पर खरी उतरी बल्कि अन्य साथियों को भी प्रेरित किया।

ये बीते 2 महीनों से अपने अनुभव टीम के सदस्यों के साथ ग्रुप में लिखकर भी साझा करती हैं।


Saturday, October 23, 2021

पाठ्य योजनाओं का क्रिया अनुसन्धान : एकता

हम अक्सर किसी काम को करने से पहले योजना बनाते हैं। योजना कार्य सञ्चालन से लेकर कार्य के निष्पादन तक बनायीं जा सकती है और इन योजनाओं में अनुभवों के आधार पर परिवर्तन भी लाया जा सकता है। हमने भी इस सन्दर्भ में योजनायें बनायी कि, “बच्चों को कक्षा में क्या पढ़ाया जाए?” 

इन योजनाओं को अगर मैं सरल शब्दों में बोलूं तो यह पाठ्य योजनायें हैं जिसका इस्तेमाल आप जैसे शिक्षक/एडु-लीडर्स बच्चों को पढ़ाने के लिए करते हैं। पाठ्य योजनाओं की मदद से शिक्षक को अपने कक्षा का दिनचर्या बनाने में मदद मिलती है, जैसे- आज किस बच्चे को, कौन-से विषय में, कितनी देर क्या पढ़ाना है आदि। 

 i-सक्षम ने भी अपने एडु-लीडर्स और बच्चों के लिए पाठ्य योजनायें बनायीं ताकि सीखने-सिखाने का काम आसानी से चलता रहे। हमनें पाया कि i-सक्षम के द्वारा अपने एडु-लीडर्स के सुविधा के लिए बनाये गए पाठ्य योजनाओं का इस्तेमाल कक्षा में बहुत कम हो रहा है। यहाँ तक कि हमारे बहुत कम एडु-लीडर्स हैं जो खुद भी बच्चों को पढ़ाने से पहले पाठ्य योजना बना रहे हो। 

  • यह एक समस्या है, जिसका कारण जानना हमारे लिए जरुरी है ऐसा क्यों हो रहा है? 
  • क्या कारण हैं कि बहुत कम एडु-लीडर्स पाठ्य योजनाओं का उपयोग अपनी कक्षा में पढ़ाने के लिए कर रहे हैं? 
  • वह कौन सी योजनायें हैं, जो हमारे एडु-लीडर्स को पढ़ाने में मदद कर रही है अथवा नहीं कर रही है? 
  • हम कैसे मुख्य समस्याओं का कारण जानकर इसके लिए कुछ “कार्य योजना” (action plan) बना सकते हैं? 
  • पाठ्य योजना के उपयोग कर एडु-लीडर्स को कक्षा में पढ़ाने में मदद कर सकते हैं एवं एडु-लीडर्स को खुद के लिए पाठ्य योजना बना पाने में सक्षम बना सकते हैं? 

इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए हमने इसपर “क्रिया अनुसंधान” (action research) किया है । मेरी समझ से, “क्रिया अनुसंधान किसी मौजूदा चुनौतियों/ समस्याओं को समझने, उसका अध्ययन करने और अध्ययन के आधार पर समस्याओं/चुनौतियों से निपटने के लिए योजना बनाने की एक प्रक्रिया है।” 

हमें उम्मीद है कि इस लेख के माध्यम से हमलोग जल्द ही आपसे इस समस्या के समाधान के लिए बनाई गयी योजनाओं पर भी चर्चा करेंगे। 

मिलिए i-सक्षम संस्था के नए सदस्यों से : प्रियंका कौशिक

 मेरा नाम देवश्री है। मैं हैदराबाद, तेलंगाना से हूँ और में बिहार पहली बार आयी हूँ। मैंने मेरा ग्रेजुएशन अशोका यूनिवर्सिटी से इंग्लिश लिटरेचर में किया हैं। यह सोनीपत, हरियाणा में स्थित हैं। 

पिछले तीन सालों में मैंने छोटी परियोजनाओं पर काम किया है, मुख्य रूप से संचार, लेखन और अनुसंधान की भूमिकाओं में। 

मुझे हमेशा से समाज के विकास के लिए काम करना था, ख़ास कर महिला सशक्तिकरण के लिए। जैसे i-सक्षम का फ़ेलोशिप होता है, वैसे ही मैं अगले 18 महीनों तक इंडिया फेलो प्रोग्राम के तहत i-सक्षम से जुड़ी रहूँगीं।

जमुई जिले में रहकर मैं आप सभी को अच्छे से जानना चाहती हूँ और आपसे नयी-नयी चीज़े सीखना चाहती हूँ। (और कुछ नयी चीज़े भी खाना चाहती हूँ)

उम्मीद है, मैं आपके केंद्रों पर बार-बार आउंगी और प्रशिक्षण सत्रों में लगातार मिलती रहूँगी। 

(यह फोटो थोड़ा पुराना है, देखते है आप मुझे पहचान पाओगे या नहीं!)



मेरा नाम मोहित कुमार है। मैं हजारीबाग (झारखंड) से हूँ । हालांकि मैं पिछले तीन साल से बैंगलोर में जॉब कर रहा था। मैंने बिरला प्रोद्योगिकी संस्थान मेसरा से बीटेक (इंजीनियरिंग) किया है। जहाँ मैंने इलेक्ट्रॉनिक्स एण्ड कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है।

इससे पहले मैं डेरीवेटिव ट्रेडिंग करता था जो कि ग्लोबल फाइनेंस के डोमेन से संबंधित है। अभी मैं इंडिया फेलो नामक एक फ़ेलोशिप का हिस्सा हूँ जिसके द्वारा ही मैं i-सक्षम से जुड़ पाया हूँ।

मुझे घूमना फिरना, तस्वीरें लेना, साईकिल चलाने का शौक है। मुझे बैडमिंटन खेलना भी पसंद है।

मैं हमेशा से सामाजिक क्षेत्र में कुछ अच्छा काम करना चाहता था और मेरा जॉब छोड़ कर फेलोशिप में आना इसी दिशा में एक कदम है। 

मुझे i-सक्षम के कार्यों के बारे में जानकर काफ़ी अच्छा लगा। यह शिक्षा के छेत्र में एक बहुत अच्छी पहल है। एक सप्ताह जमुई ऑफिस में इंडक्शन के बाद अभी मैं शेरघाटी (गया) ऑफिस से जुड़ कर काम कर रहा हूँ।


 


मेरा नाम आशुतोष कुमार है। मैं जिला गया (बिहार) से हूँ। 

मैंने जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, गया से डी.एल.एड किया है। मैं शिक्षा के क्षेत्र में सोशल वर्क करता हूँ।

मुझे बाइक राइडिंग एवं रहस्यम मूवी देखना बहुत पसंद है।

मैं प्रशासनिक अधिकारी बनकर लोगों की सेवा करना चाहता हूँ।

i-सक्षम एक बहुत अच्छी संस्था है जो शिक्षा के क्षेत्र में काफी प्रयासरत हैं ताकि समाज को एक अच्छा शिक्षक मिल सके तथा जमीनी स्तर पर समाज की रूपरेखा में परिवर्तन हो सके।

Thursday, October 21, 2021

i-सक्षम के टीम सदस्यों की मेहनत रंग लायी: टिक लिंक में राष्ट्रीय स्तर पर जीते अनेकों पुरुस्कार

कहा गया है ना मेहनत करते रहो ज़िन्दगी आज नहीं तो कल तुम्हें मौका ज़रूर देगी, आदिवासी गाँव में रहने वाले बच्चे जिन्हें पढ़ने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं मिलते तथा जिनके पास प्रतिभा है, उन्हें मौका नहीं मिलता, वो ही कुछ कर गुज़रते है।

ऐसा ही कुछ देखने को मिला, मुंगेर और जमुई जिले के कई सरकारी विद्यालयों में, पढने वाले बच्चों में,  जिन्होंने जब राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में अपना परचम लहराया तो सरकारी विद्यालय के शिक्षकों सहित गाँव भर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई।

पिछले दिनों टिक लिंक स्वयंसेवी संस्था के तरफ से राष्ट्रीय स्तर पर  विवेकानंद युवा खोज प्रतियोगिता का शुभ-आरंभ किया गया, जिसका उद्देश्य शिक्षा में मनोरंजन का समावेश है।

इस प्रतियोगिता में देश के 22 राज्यों के 322 सरकारी तथा गैर सरकारी विद्यालयों के 10,500 बच्चों ने भाग लिया, जिसमें मुंगेर तथा जमुई में कार्यरत स्वयं सेवी संस्था i-सक्षम के सहयोग से इन दोनों जिलों के सरकारी विद्यालयों में पढने वाले 28 बच्चों ने भाग लिया।

गौरव की बात यह है कि इसमें से 5 बच्चों को विजेता घोषित किया गया, जिसमे  मुंगेर धरहरा प्रखंड के सराधी गाँव के रहने वाले मो. मोकिम के पुत्र, सैफुल्ला और मजदूरी कर अपने जीवन यापन करने वाले मो. आशिक के पुत्र मो. तोसीफ को विजेता घोषित किया गया। इसे कार्य में i-सक्षम की सदस्य तानिया का मार्गदर्शन रहा। 

वहीं जबसे यह बात बच्चों के अभिवावकों ने सुनी है तब से वो फूले नहीं समा रहे है। उनका कहना है कि जो भी धन राशी उन्हें प्राप्त होगी, उसे वह बच्चों की शिक्षा में ही लगायेंगें।

वहीं जमुई जिले के जिन बच्चों को विजेता घोषित किया गया है, उनका नाम इस प्रकार है- प्रिंस कुमार, पियूष कुमार, छोटू कुमार, गोलू कुमार, सलोनी कुमारी तथा अंकित कुमार। इन सभी को वित्तीय मदद के साथ-साथ देश के बड़े वैज्ञानिको से मिलने के मौका मिलेगा। इन बच्चों के प्रतिभा का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते है, इन दोनों जिलों के 28 बच्चों ने भाग लिया, जिसमें 20 बच्चों को अच्छे परियोजना कार्य के लिए प्रमाणित किया गया। अन्य पाँच को विजेता घोषित किया गया।

Wednesday, October 20, 2021

Meet the Changemaker, Lalita : Priyanka Kaushik

Meet the Changemaker

Lalita is one of our edu-leaders who is married. Her inevitable spark to teach children is what motivated her to join the fellowship. As part of her fellowship, she teaches at the Prathmik Madhya Vidyalaya Vijayanagar, Bariyarpur. Initially, Headmaster Laddu Paswan was reluctant to support her, but her determination made a shift in the headmaster’s behavior. The headmaster noticed Lalita’s punctuality, commitment, innovative ideas, and activity-based teaching style, which impressed him. 

Earlier she didn’t even have a space to teach, but then the headmaster gave her a separate classroom. He has started providing TLMs, chalk, and duster, among other classroom resources, to Lalita. He started praising her in front of other teachers in the school. Another act of the headmaster, which was surprising for many of us, was in place of a print-rich class, he financed BaLA (Building as Learning Aid) for the classroom. BaLA is an innovative concept for qualitative improvement in education; it is used through intervention in school building infrastructure.

BaLA installed in a classroom

She started the culture of preparing class-wise lists of the number of students enrolled, number of students present, and absentees, which she wrote on the headmaster’s office blackboard. That one single blackboard would show every single piece of data about a class. 

Lalita in the headmaster’s office with her initiative of capturing daily attendance of school on a single blackboard

The first quarter of the fellowship was tough for Lalita, as she did not get support from her husband as well, who did not want her to go outside. However, when he came to visit the school, he was happy to see Lalita’s work and he let her continue teaching. The people in the community would also mock her in her initial days for the work she was doing in the fellowship. It was a selfless service for others and she had put her heart into it; she knew that people would not understand. 

When the pandemic was on peak, the community’s perspective changed towards her. She helped them in availing of government services. Now they all respect her. She feels proud when she visits the community today to solve local problems such as filling the forms to apply for the AADHAR card and PAN card, updating information in the bank passbooks, and so on.

In Aug 2021, when her village was submerged in water due to the floods, Lalita shifted to her mother’s place in Begusarai, Bihar. There she reactivated an SHG (self-help group) in which the group members were not working together due to personal issues. She sorted the issue by reaching a mutual consensus and made the SHG functional again. 

She also motivated two school dropouts there to continue their education. i-Saksham financed the education of these girls as they could not afford the admission fee.  

In the future, Lalita wants to open a coaching center for her community’s girls who cannot afford to pay for their education. She is trying to organize the resources needed for this coaching center. 

Tuesday, October 19, 2021

फैमिली मोबिलाइजेशन में नहीं मिला कोई भी इंटर पास- श्रृंखला कुमारी

फैमिली मोबिलाइजेशन में नहीं मिला कोई भी इंटर पास

मैं फैमिली मोबिलाइजेशन का अनुभव साझा करना चाहती हूँ। मुझे बैताल गाँव में जाना था, वहा जानें में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

वहाँ तीन किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता है और उसी रास्ते में एक मोरहर नदी पड़ती हैं। जब मैं वहाँ पहुँची तो उस नदी में कमर भर तक पानी था। कुछ लोग उस नदी को पार कर रहे थे, पर हमें डर लग रहा था कि नदी को कैसे पार करें?

फिर हमें एक दीदी मिली, उनका नाम किरण था। वो बोली कि चलिए मैं पार कर देती हूँ, तो मेरा हाथ पकड़ कर उन्होंने नदी को पार करवा दिया।

फिर मैं 8 परिवारों से मिली तो इनमें से किसी ने इंटर पास नहीं किया हुआ था। थोड़ी देर बात करने पर पता चला कि उनके घर में भी कोई इंटर और मैट्रिक पास नहीं किया हुआ था।

सिर्फ एक ही लड़की मिली जो इंटर पास थी और उनकी शादी हो गई थी। उनके दो बच्चे भी हैं, उन लोगों से मिलकर हमने बात की और हमने समझा कि यहाँ कि लडकियाँ पढ़ क्यों नहीं पाती हैं

एक परिवार से हमें यह सुनने को मिला कि हम लोग गरीबी के कारण बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहे है। हमें एक माह पहले ही जीविका से बकरी पालन और राशन की दुकान मिली है। इसी से हम लोग अपना जीवन यापन कर रहे हैं अब सोच रहे हैं कि जिस बच्चे को नहीं पढ़ा पाये हैं तो नही पर अब बच्चे को पढ़ाएंगे।

Monday, October 18, 2021

क्रिया शोध (एक्शन रिसर्च) पर सत्र : आँचल

जब हमनें एडुलीडर के साथ क्रिया शोध पर प्रेजेंटेशन रखी तो डिब्रीफ में निकल के आया कि उन्होंने इस प्रक्रिया को किस-किस तरह से किया है।

ध्यान देनें योग्य बिंदु:

  • अपनी गाँव की शिक्षा स्थिति का एक नक्शा बनाएं।
  • अपनी गाँव में मौजूद अलग-अलग टोलों और इसमें बसावट को दिखाएँ।
  • हर टोले में कितने और कौन-कौन से आंगनवाड़ी,विद्यालय,कोचिंग केंद्र है दिखाएँ। 
  • हर टोले में इन शिक्षा केन्द्रों की पहुँच और गुणवत्ता पर चर्चा करें।
  • गाँव से नजदीकी विद्यालय या कॉलेज कितनी दूर है इस पर चर्चा करें।  
  • प्रत्येक टोले से कम से कम पाँच-दस अभिभावकों से बात करें कि उनके अनुसार लड़कियों की शिक्षा और विवाह को लेकर उनकी सोच क्या है
  • देखें कि क्या यह टोलों के अनुसार, जवाब देने वाले (पुरुष/महिला) के अनुसार बदल रहा है

(एडु-लीडर अपने अपने गाँव के नक़्शे के साथ)


एडु-लीडर के शब्दों में-

अंशु: जब मुझे यह प्रोजेक्ट मिला तो मुझे पता नही था कैसे बनाएंगे क्योंकि मैंने कभी भी अपने गाँव में बारे में इतनी सारी चीजें पता नहीं की हैं। मैंने जब यह बात अपने बाबा को बताई तो बाबा ने मुझे गाँव का नक्शा निकाल के दिया। मुझे पुराने जमाने के नक्शे से भी कुछ समझ नहीं आया फिर मैंने वापस से मैं बाबा के पास बैठकर जिधर जिधर रास्ता शुरू हुआ है उस तरह से नक्शा बनाना शुरू किया।


नरगिश: मैं अपने गाँव के बारे में इतनी गहरायी से कभी नहीं सोचा था लेकिन जब मैंने मैप बनाना शुरू किया तो मुझे आसान लगने लगा।


कोमल: मेरे गाँव की स्थिति ठीक ठाक है वैसा कोई इलाका नहीं है जहाँ आर्थिक स्थिति ठीक न हो। इसका एक कारण यह है की सभी लोग बाहरी प्रवेश से (माइग्रेंट) हैं।


छोटी: यह बनाने के समय मेरे दिमाग में बहुत सारी बातें चल रहीं थी। घर में दीदी की मदद से इसे कर भी पाई। एक बात मैं बताना चाहती हूँ,  मैं जहाँ अभी पढ़ाने जाती हूँ  वहाँ क्या बेहतर होना चाहिए, यह सब ख्याल  बनाते समय यह भी मेरे दिमाग में चल रहा था।


काजल: मैंने पहली बार इस तरह की किसी गतिविधि में भाग लिया है। मैं खुश हूँ कि हर चीज को बारीकी से दिखा पाई हूँ।  मुझे तो ऐसा लग रहा था मानों मैं लोगों को अपना गाँव घुमा रही हूँ।


नंदनी: मैंने कभी तस्वीर नहीं बनायीं है। लेकिन जब मैं इसे बना रही थी तो मैने अपने गाँव के साथ मैं जहाँ पढ़ाने जाती हूँ उस हरे भरे गाँव को भी दर्शा पाई और बाल विवाह के बारे में लोगों से उनकी सोच का कारण जान पाई। 


इस पूरे प्रक्रिया में एडु-लीडर्स को अपने गाँव का नक्शा बना कर वहाँ की जनसंख्या,टोले, हर टोलों की बसावट और विद्यालय आदि को दर्शा कर अपने टोले के अनुसार वहाँ की शिक्षा और बाल विवाह पर महिलाओं और पुरुषों के विचारों को जानना था।


Friday, October 15, 2021

कक्षा अवलोकन से कभी मन में आये सवाल तो कभी हुई ख़ुशी : सोनम

मैं एक दिन बैच-7 की फ़ेलो दुलारी कुमारी के विद्यालय में कक्षा अवलोकन के लिए गयी थी। दुलारी, प्राथमिक विद्यालय दनियालपुर, प्रखंड-धरहरा में पढ़ा रही हैं और जिस तरीके से वो आगे बढ़ रही हैं वो काबिले तारीफ है।


बच्चों को मौका देना, सत्र के दौरान विभिन्न तरह का टीचिंग लर्निंग मटेरियल (TLM) का उपयोग करना और भी अन्य साधनों का उपयोग करना। मैं एक बच्चे की कहानी आप सभी के साथ साझा कर रही हूँ। छविला कुमार के साथ उसका छोटा भाई जो केवल पाँच साल का है, वो पढ़ने आता है। बच्चों का दोपहर के भोजन का समय हुआ और मैं दुलारी के साथ डीब्रीफ करने के लिए बैठ गयी और हमनें डीब्रीफ किया। 

कुछ समय बाद बच्चे वापस विद्यालय आए। मैंने देखा कि कुछ बच्चे अपनी किताबों के साथ खेल रहे थे पर छविला का छोटा भाई नीचे लगे थ्री-डायमेंशन चार्ट पर उभरें अक्षर पर अपनी उंगली को चला रहा था। जब एक लाइन खत्म हो जाति तो पुनः उसी को शुरू करता। यह एक बहुत बड़ा बदलाव दिखा कि छोटे-छोटे बच्चे पढ़ाई की दुनिया से जुड़ पा रहें हैं।


पर इसी बात को देखकर मेरे मन में एक सवाल भी आया कि क्या कक्षा में लर्निंग मटेरियल और चार्ट-पेपर इतनी ऊँचाई पर लगानी चाहिए जितनी से वो बच्चों के हाथ आ जाये या दीवार पर ऊपर लगानी चाहिए जिससे की उसे कोई बच्चा छू ना सके? 


आप क्या सोचतें हैं इस बारे में, मेरे साथ व्यक्तिगत रूप में भी साझा कर सकते हैं।

दूसरी विजिट में मैं मैंने देखा की दुलारी ने बच्चों को कंकड़ (पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े) से '' अक्षर को लिखने को कहा। छविला कुमार ने ‘आ’ को लिखना शुरू किया और लिखते-लिखते आधे में रुक गया और अपने ऊँगली के इशारे से हवा में आ लिखने लगा। मैंने  दुलारी से पूछना सही समझा कि आपने हवा में लिखने कहा या पत्थरों की सहायता से कहा?

(छविला कुमार, वर्ग-एक का छात्र, कंकडों से ‘आ ‘की आकृति बनाते हुए)


बच्चों ने लगभग 1 मिनट तक याद किया। मैंने देखा कि हवा में तो वो अपनी हाथों से लिख पा रहा था फिर जैसे ही हाथ को पत्थर पर लाता वैसे ही दूसरी हाथ से सिर को ठोकता और सोचने लग जाता!

मैं चुपचाप देख रही थी। आखिर में आ को लिख ही लिया और मुस्कुराया। मुझे यह देखकर बहुत अच्छा महसूस हुआ।


Tuesday, October 12, 2021

सुने-सुनाएँ प्रभावशील कहानियाँ : धर्मवीर

 कहानियाँ होती हैं बेमिसाल, इसमें सिमटा रहता हैं, समय और काल,

कहानियों के बल ये बच्चे दिखाते हैं, कमाल और मचाते हैं धमाल।।

आप सभी को एक ऐसी ही अनोखी बच्ची के विषय में बताने जा रहा हूँ जो बहुत ही प्यारी और शांत बच्ची हैं। इस बच्ची का नाम सोनाक्षी, वर्ग पंचम की छात्रा हैं। सोनाक्षी, निक्की दीदी के पास पिछले एक महीने से पढ़ रही हैं। इसने एक माह से ही विधालय जाना शुरू किया है। शुरू में ये बहुत शांत रहती थी। लेकिन अब ये बहुत ही सृजनात्मक कार्य करने लगी है। मैं जब कक्षा में पहुँचा तो निक्की एक कहानी सुना रही थी। मैं ध्यान से सभी बच्चों को देख रहा था तब मेरी नज़र सोनाक्षी पर पड़ी, मैंने देखा कि वो अपने हाथों से कुछ जोड़ने की कोशिश कर रही थी और कुछ सोच रही थी।

मुझे उस समय ये नहीं पता था कि वो कहानी में जिक्र हुआ घोंसला, अपने मन में सोचकर उसको आकृति देने की कोशिश कर रही है। फिर निक्की के पढ़ाने के बाद, मैंने इस कहानी को मॉडलिंग करके दिखाने की कोशिश की। जिसका नाम था- मुनमुन और मुन्नू

इस कहानी को सुनकर बच्चे बहुत खुश हुए तथा बच्चों ने खूब मज़े किये। साथ-ही-साथ बच्चों का उत्साह देखने लायक था। इन सब चीजों को देखते हुए मैंने सभी को होमवर्क के रूप में घोंसला बनाने को कहा।

मैं सही में आश्चर्यचकित रह गया, जब अगले दिन मैं विधालय पहुँचा!


उस बच्ची को हाथों में घोंसला लेकर आते देखा।

उस दिन उस विधालय में दान-उत्सव होनेवाला था। तो सोनाक्षी अपने माँ के साथ आ रही थी। तभी पता चल गया कि उनकी माँ ने उन्हें घोंसला बनाने में काफी मदद की, जो कि एक जागरूक और बेहतर अभिभावक की पहचान होती है। इस सराहनीय कार्य के लिए बाकी अभिभावक प्रशंसा कर रहे थे, इस प्रशंसा को सुन सोनाक्षी और उनकी माँ दोनों काफी खुश दिख रही थी।

वास्तविक में जब बच्चे इस तरह के कार्य को इतने उत्साहपूर्वक करते हैं। तो हम भी अपने अन्दर एक उत्साह महसूस करते हैं। ऐसी कहानियां बच्चे को तो प्रेरित करती ही हैं, साथ-साथ औरों को भी एक नयी सीख और नयी उर्जा से भर देती हैं।

इससे इतना तो समझ आ ही जाता हैं कि कहानियाँ हमारे बच्चों के जीवन में कितनी प्रभावशील होती हैं। जिन चीजों को बच्चे ऐसे साधारण भाषा में नहीं समझ पाते हैं, यदि उन्हें कहानी के माध्यम से समझाने की कोशिश की जाए तो बच्चों की समझ देखने लायक होती हैं। 

सरल शब्दों में कहें तो कहानी किसी कठिन विषय को बहुत ही आसानी से बच्चों के समस्त प्रकट करने का जरिया होती हैं।

Monday, October 11, 2021

बदलाव की एक पहली शुरुआत: तानिया

बदलाव की पहली शुरुआत 

मीना दीदी ने जबसे इस विद्यालय में पढ़ाना शुरू किया है तब से इनके विद्यालय में काफी चुनौतियां रही हैं। शुरु में तो विद्यालय में पाँच-छ: बच्चे ही आते थे परन्तु अब उपस्थित बच्चों की संख्या 15-20 हो गयी है। 

इनके विद्यालय में अभी बच्चे के उपस्थिति को लेकर समस्याएं हैं और अभिभावक भी जागरूक नहीं है, जो अभिभावक ठीक-ठाक है वो अपने बच्चे को विद्यालय के समय में ट्यूशन भेज देते है और मीना दीदी जब अभिभावकों से बच्चों को विद्यालय भेजने के बारे बात करती हैं तो अभिभावक समझने की बजाय लड़ते-झगड़ते रहते हैं। इसी वजह से और भी समस्याएं इनके विद्यालय में है जिसपर काम करने की जरुरत है।

मुझे जो सबसे बड़ी कमी लगी वो थी समुदाय में शिक्षा के प्रति जागरूकता की। बच्चों के अभिभावकों को अब भी यह लगता है कि विद्यालय में पढ़ाई नहीं होती। 

          (मीना, बैच-7, प्राथमिक विद्यालय बंगालवा मुसहरी में बच्चों को पढ़ाते हुए)

शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने की पहल हमनें “दान-उत्सव” से की। जब मैं विद्यालय पहुँची तो हमेशा की तरह बच्चों की संख्या बहुत कम थी करीब सात-आठ बच्चे ही आए हुए थें । जब उन बच्चों नें मेरे हाथों में किताबें देखीं तो उनके चेहरे से एक प्रश्न जैसा दिख रहा था और उनको लग रहा था कि आज कुछ होने वाला है

फिर मैंने दो-तीन बच्चों से कहा कि आप अपने दोस्तों को भी बुला कर लाइए, जो अब तक विद्यालय नहीं आये हैं। कुछ समय बाद बच्चों की संख्या बीस करीब हो गई। हमनें बच्चों के साथ मिलकर किताबों को सजाया, वकील सर (जो मेरे साथ आये हुए थे) नें मीना दीदी के लाए हुए शिक्षण गतिविधि सामग्री (टी.एल. एम.) को दीवार पर लगाया।

जब किताबें दीवार पर लग गई तो बच्चे इधर-उधर नज़र दौड़ा कर अलग-अलग किताबों को गौर से देख रहें थें और मैंने देखा कि कुछ बच्चे किताबों के बारे में बातचीत भी कर रहे थें। फिर बच्चे व्यवस्थित होकर बैठ गए और मीना दीदी नें बच्चे को कहानी सुनाना शुरू किया। बच्चे बड़े ध्यान से सुन रहे थे और उनकी बातों को दोहरा भी रहें थे। कहानी सुनने के बाद एक बच्चे नें एक और कहानी सुनने की जिद की, उन सब की नज़र एक पुस्तक पर थी जिसमें कुछ अंधेरा था और गुफाएँ बनी हुई थी । वो बच्चे जानना चाहते थे कि उसमें क्या हुआ होगा

बच्चे नें कहा -"दीदी मुझे वो भूत वाली कहानी पसंद है और वो कहानी सुननी है"मैंने उस पुस्तक को उठाया और मैंने देखा कि वो वर्ग-पाँच की पुस्तक थी और लंबी कहानी थी। मैंने उस कहानी को सुनाया पर आधा क्योंकि कहानी बहुत बड़ी थी और उनसे कहा कि आगे की कहानी हम कल सुनेंगे और इसके लिए आप सब को विद्यालय कल भी आना होगा। सभी बच्चों नें जोर से "हाँ आएंगे" कहा। 

फिर मेरा बच्चों के साथ थोड़ा सवाल-जवाब का सत्र हुआ।

जैसे कि आप को किस तरह की कहानी पसंद है?

बच्चों ने जवाब देना शुरू किया कि हमको परी वाली, तो दूसरे नें कहा जादू वाली तो तीसरे ने कहा भूत वाली। फिर मैंने ये पूछा की ऐसी कहानी आपको क्यों पसंद है?

इस सवाल का जवाब कुछ कम बच्चों ने दिया। एक बच्चा जिसका नाम सौरभ था उसने कहा कि हमको भूत वाली कहानी इसलिए पसंद है क्योंकि उसमें लोग डरते है। 

फिर बच्चों नें भी कुछ कहानियां सुनाई पर उनको अभी पढ़ना नहीं आता था तो सिर्फ चित्र देखकर अपनी कल्पनाओं से कहानी बना कर सुनाते गए। 

तब तक वकील सर कुछ अभिभावकों को विद्यालय बुलाकर ले आये और उनसे फिर उनसे बातचीत शुरू हुई। जब हमनें उनसे बातचीत करनी शुरु की तो बहुत शोर होने लगा। महिलाएं आपस में ही बात करने लगीं। वो हमें बोलने का मौका ही नहीं दे रहीं थी।

उनके पास बहुत सारी बातें थीं जो वो कहना चाहती थी, हम थोड़ी देर शांत रहे, उनकी बातों को सुना। अभिभावकों ने अपनी-अपनी बात रखीं। कभी विद्यालय के शिक्षकों के बारे में कुछ कहती, तो कभी पढ़ाई के बारे में, तो कभी साफ-सफाई को लेकर, तो कभी असमानता की बात करने लगती। 

जब सभी अभिभावकों ने अपनी पूरी बात रख ली तो वकील सर और मैंने अपनी बात कही। उन्होंने मीना दीदी के बारे में बताया, शिक्षा की महत्वता को बताया।

इस दान-उत्सव में हुई बैठक से सभी अभिभावक मीना दीदी के बारे में जान पाए और उन्होंने कहा कि हम अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विद्यालय भेजेंगे परन्तु बीच-बीच में कक्षा में आकर जायजा लिया करेंगे। हमारी लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती थी, हमें यह सुनकर काफी अच्छा लगा। 

जब विद्यालय के शिक्षक ने जाना कि बच्चे के अभिभावक आएंगे तो उन्होंने उनके बैठने के लिए दूसरी दरी की व्यवस्था करा दी, वो बैठक में शामिल तो नहीं हो पाये पर उनको दान-उत्सव काफी अच्छा लगा। 

ये पहला प्रयास हमारा काफी अच्छा रहा पर उन अभिभावकों से भी मिलने की कोशिश रहेगी जिनके बच्चे ट्यूशन जाते हैं और वो अपने बच्चे को विद्यालय नहीं भेजते।

Friday, October 8, 2021

चलो जानें, गाँव के समाचार : आँचल

जब मैं गुड़िया दीदी के सेंटर पर गयी थी तो कुछ समय पहले फेलोशिप सत्र में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से जुड़ा एक वीडियो दिखाया गया था, जहाँ पर एक शिक्षिका अपने विद्यालय में किस तरह से बदलाव लायी थी, उसके संघर्षों के बारे में बताया गया था।

उस शिक्षिका ने एक बिंदु रखा था अपने गाँव के बारे में जानना। इस पहल में उस विद्यालय के बच्चे जब अपनी कक्षा में आते हैं तो अपने गाँव की एक न्यूज़ को लेकर आते हैं और जो बड़े बच्चे होते हैं वह उस न्यूज़ को लिखते हैं। कोई एक बच्चा उस समाचार को सुनाता है। इससे बच्चे के सुनने, जानने व लिखने की क्षमता का विकास होता है।

फेलोशिप के आखिरी दिन मैं अपने सारे एडु-लीडर्स के साथ बैठकर बातचीत कर रही थी। गुड़िया दीदी ने मुझे सुझाया था कि क्यों ना हम भी यह काम अपने कक्षा में करें और गाँव में करें! 


हम भी इस तरह से हर रोज बच्चों से कोई एक समाचार मंगवाए और एक बोर्ड बनाकर किनारे में चिपका दें। यदि किसी बच्चे को लिखना आता है तो वह बच्चा बोर्ड पर लिखेगा, बाकी बच्चे इसके बारे में सुनेंगे। साथ ही साथ यह एक नयी गतिविधि भी हो जाएगी तो बच्चों की जिज्ञासा भी बनी रहेगी।


जब मैं गुड़िया दीदी की कक्षा में गयी तो गुड़िया दीदी ने बच्चों को सब्जी से जुड़ी गतिविधि बच्चों के साथ करवा रही थी। मैं कुछ देर रुक और फिर कक्षा के अंत में बैठे बच्चों से वहाँ की कोई एक न्यूज़ के बारे में पूछा। बहुत सारे बच्चों ने कुछ-कुछ बताना शुरू किया।


रजनीश ने अपने गाँव के बारे में बताया। उसी में से एक लक्ष्मी नाम की लड़की थी, जिन्होंने मुझे पूछा किहम लोग किस तरह का समाचार ले करके आएंगे तो मैंने बच्चों को कई सारे उदाहरण दिए मैं वहाँ पर बच्चों के साथ देख पा रही थी कि बच्चे आपस में चर्चा कर रहे थे कि वह किस दिन कौन-कौन से समाचार लेकर आएंगे।

इस तरह से कक्षा में गतिविधि कराना बच्चों में एक नई सोच को विकसित करता है, जहाँ पर बच्चे अपने गाँव के बारे में सोच पाए। सभी बच्चे जब नए-नए गतिविधि को करते हैं तो उन्हें पढ़ने में और भी जिज्ञासा होती है और वो मन लगाकर पढ़ते हैं।

मुझे लगता है कि कक्षा में इस तरह की गतिविधियों को बढ़ावा देना चाहिए और बच्चों को प्रेरित करते रहना चाहिए ताकि बच्चे कुछ सीख-समझ सकें।

Thursday, October 7, 2021

सीखते बच्चे : आँचल

जब मैं उषा दीदी के सेंटर पर गई थी तो उषा दीदी अक्षर से जुड़ी गतिविधि करवा रही थी। सभी बच्चे बैठकर गतिविधि कर रहे थे। कक्षा में कुछ ऐसे भी बच्चे थे जो अपने आस-पास के दोस्तों की कॉपी देखकर लिख रहे थे।

मैं कक्षा में बैठकर चुप-चाप बच्चों को देख रही थी। मैंने उन बच्चों को मना नहीं किया कि वह क्यों देख रहे हैं, या उन्हें नहीं देखना चाहिए। बच्चे जब मेरे तरफ देखते थे तो मैं नजर घुमा लेती थी, मेरे दिमाग में चल रहा था कि बच्चे खुद से लिख नहीं पा रहे हैं लेकिन वह देख कर के लिख रहे हैं बच्चे उस वर्ड को दोबारा पढ़ रहे हैं, फिर अपने कॉपी में लिख रहे हैं।


आपको क्या लगता है जो बच्चे आस-पास के लोगों से देखकर लिखते है उन्हें मना करना चाहिए था?


यदि हाँ तो क्यों, यदि ना तो क्यों?


डी-ब्रीफ: मैं आज जब कक्षा में देखी की शिक्षिका अक्षर मैपिंग कर रही है तो वह कुछ बच्चों से पूछ रही थी और कुछ बच्चे अपने स्लेट पर तस्वीर बना रहे थे।

मैने उस समय बस देखा तो मेरे दिमाग में कई तरह के सवाल चले और दीदी के साथ मैं जब इस बिंदु पर बात की तो दीदी ने मुझे कहा कि वो बच्चे छोटे है और मुझे मालूम था की उन सभी की अभी शुरुआत है। इसलिए उन्हें नहीं आता होगा, और यही कारण रहा कि मैंने दीदी से यह बात नहीं पूछी।

Wednesday, October 6, 2021

ग्राम संगठन बैठक : विपिन

3 अक्तूबर, 2021 को मैं जमुई के (Dhandh) में ग्राम संगठन की दूसरी बैठक में सम्मिलित हुआ। इस बैठक में18 जीविका दीदी, सी.एम. नितीश जी और पप्पू सर भी शामिल थे। बैठक की शुरुआत अभिवादन के साथ शुरू हुई। जब मैंने (विद्यालय चलें हम) का विडियो दिखाया तो चार-पाँच दीदी ने बताया कि उन्हें उनके बचपन के दिन याद आ गये। एक-दो दिन महिलायें तो भावुक हो गयीं थी, जिनसे बात करने पर पता चला कि कैसे न चाहते हुए भी उन्हें पढाई छोडनी पड़ी। 

इस समूह में पाँच-छः दीदी तो अपने बच्चों कि पढाई को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर दिखी और वो हर गतिविधि, हर प्रकिया को अपनाने के लिए तैयार थी। जिससे कि उनके बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। इस समूह में विद्यालय में खिचड़ी बनाने बाली एक दीदी शामिल हैं वो बोलीं कि हम लगभग पाँच साल से अपने गाँव के बच्चों को विद्यालय भेजने का काम कर रही हूँ और करती रहूँगी। जीविका दीदी ने क्राफ्ट वाली गतिविधि करने से मना कर दिये उनके मन में कहीं ये चल रहा था कि यदि मैं नहीं कर पायी तो मेरा समूह में हंसी हो जाएगी। लगभग सभी दीदी ने क्राफ्ट करने से मना कर दिया। मैं भी रुक गया और अपने सन्देश को सिर्फ बात-चीत में ही रख पाया और बैठक का समापन कर पाया।