Monday, February 26, 2024

मैत्री प्रोजेक्ट के दुर्गम अनुभव : सीमा

अशिक्षित को शिक्षा दो, अज्ञानी को ज्ञान, शिक्षा से ही बन सकता हैं, मेरा भारत देश महान।

नमस्ते साथियों,

मुझे आमस प्रखंड के बड़की-चिलमी, नैनागढ़ के बच्चियों (प्रियंका कुमारी, उर्मिला कुमारी, सोनाली कुमारी) के पैरेंट्स से मिलने पर पता चला कि एक गरीब मजदूर होने के कारण उन्होंने अपनी बच्ची, प्रियंका कुमारी को मगह, धान पीटने के लिए भेज दिया हैं।

यह सुनकर मैंने पेरेंट्स से पूछा कि कब तक आएगी?

उन्होंने कहा कि आज ही आएगी।

मैंने कहा कि आज ही आएगी तो कल से विद्यालय भेजिएगा। यदि आप नहीं भेजेंगें तो मैं खुद ही आउंगी और इसे विद्यालय लेकर जाउंगी।

इतना प्रयास करके मैंने इसका नामांकन करवाया था, इसके बावजूद आपलोग अपने बच्चे को विद्यालय नहीं भेज रहे हैं। क्या यह एक अच्छी सोच है?                                                        

आप अभिभावक हैं! खुद सोचिए कि पढ़ाई हमारे जीवन के लिए कितनी महत्वपूर्ण है? अगर आप अपने बच्चे को एक दिन भी किसी कारणवश विद्यालय से वंचित करते हैं तो मानिए कि आप उसका भविष्य खराब कर रहें हैं। जिस दिन आपको शिक्षा का महत्व पता चलेगा, उस दिन आप अपने बच्चे को शिक्षित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगायेंगें।

इतना समझाने के बाद पैरेंट्स बोले कि दीदी आप बिल्कुल सही बोल रहे हैं। क्योंकि आप जो भी कार्य कर रहे हैं वह समाज सेवा है और सराहनीय है। आप हमारे बच्चे का भविष्य बने, इसलिए इतनी मेहनत कर रहें हैं।

मैं हमेशा यही सोच रखती हूँ कि हमारे द्वारा की गयी समाजसेवा से हर घर, हर गाँव, हर समाज के सभी बच्चे शिक्षा ग्रहण कर, एक अच्छा नागरिक बनें। जिससे मुझे ख़ुशी मिलेगी और हमारा उद्देश्य भी पूरा होगा। मैंने अपने जीवन में आज तक जो भी कार्य किये बहुत ही जिम्मेदारीपूर्वक और ईमानदारी के साथ किये।

आगे भी मैं ईमानदारी के साथ कार्य करुँगी, तभी मुझे खुद पर और अपने काम पर गर्व होगा। यही कार्य मुझे खुश भी रखेगा। समाज में सबसे बहुमूल्य चीज यदि कुछ है तो वो है "ज्ञान"। मानव के मूलभूत अधिकारों में ज्ञान की प्राप्ति प्राथमिकता में होनी चाहिए। हर व्यक्ति का पहला सपना शिक्षित व्यक्ति बनने का होना चाहिए क्योंकि शिक्षित व्यक्ति ही समाज में परिवर्तन ला सकता है। विद्यार्थियों को ऐसे विचारों के बारे में अवश्य पढ़ना चाहिए, जिनके बारे में पढ़कर विद्यार्थी शिक्षित होने की राह में खुद को प्रेरित कर सकते हैं। शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जो हमें सफलता की ओर अग्रसर करती है।

शिक्षा ही संसार में हमें श्रेष्ठ बनाती है सिर्फ किताबी ज्ञान ही शिक्षा नहीं होता, अपितु हमारा मानसिक विकास भी सफलता के लिए आवश्यक है। शिक्षा पाकर आप स्वयं को प्रेरित करने के साथ-साथ, समाज शिक्षा जैसे मूल अधिकारों के लिए अन्य लोगों को जागरूक कर सकते हैं। बच्चे वही सीखते हैं, जो आसपास देखते हैं। माहौल और रहन-सहन का उनपर काफी प्रभाव पड़ता है। बच्चे की सही संगत उसके व्यक्तित्व के विकास में अहम भूमिका निभा सकती है। बच्चा किसी भी काम को करने में पीछे रहता है, तो पेरेंट्स को तरीका बदलने की जरूरत है।

 

इसीलिए कहा गया है-

संग बड़े बचपन के साथी,

कौन, कहाँ कल आएगा।

स्कूल में जो संग बिताया,

वक्त बहुत याद आएगा।।

 

सीमा
टीम सदस्य, गया

फील्ड वेरिफिकेशन में गुरुदेव ने बहुत मदद की : Kritika

आज मैं आप लोगों के साथ अपने फील्ड विजिट का अनुभव साझा करने जा रही हूँ जैसा कि आप सभी को पता है कि अभी 7 से 14 वर्ष के बच्चो का वेरिफिकेशन करना है कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं या फिर नहीं। नहीं जा रहे हैं तो क्या कारण है?

तो आज मैं सबसे पहले तो इटहरी गाँव वेरिफिकेशन के लिए गई थी। गाँव जाकर मैं कुछ बच्चों के अभिभावकों से मिली और बच्चो के बारे में पूछा तो पता चला कि बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं। 

फिर मैं वहाँ से करहरिया गाँव, नीरपुर गाँव और कुमारपुर गाँव के लिए निकल पड़ी। सबसे पहले मैं कुमारपुर गाँव गई, फिर वहाँ से नीरपुर गाँव गई। वेरिफिकेशन करने के बाद मैं रघुनाथपुर गाँव के लिए चली गई, वहाँ जाकर मैं सारे बच्चों का डाटा देखकर, हर एक के घर गई। दो-तीन बच्चो का वेरीफिकेशन करने के बाद, मुझे चौथे बच्चे के घर जाना था, जिसका नाम गुरुदेव कुमार था।

जब मैं गुरुदेव कुमार से जब मिली तो वह अपने घर के बाहर सारे बच्चों के साथ कंचे खेल रहा था। मैंने उसे जब उसके पिता का नाम बताया तो उसने मुझे कहा कि हाँ दीदी, यह मेरे ही पिता जी का नाम है।

फिर वो अपनी माँ को बुलाकर लेकर आया तो मैंने उनसे नामांकन ना होने की वजह पूछी। उन्होंने मुझे अपने नामांकन न करने की वजह बतायी।

उसके बाद मैं दूसरे बच्चों के लिए जब वेरिफिकेशन के लिए जा रही थी तो मुझे बच्चों का घर नहीं मिल रहा था। बहुत सारे अभिभावक कभी इस गली में जाने को बोलते थे तो कभी उस गली भेज देते थे।

जिससे मैं बहुत परेशान हो गई थी क्योंकि एक ही गाँव में मुझे 10 चक्कर लगाने पड़ रहे थे और मेरा टाइम भी जा रहा था। मुझे परेशान देखकर गुरुदेव कुमार ने मेरी मदद करने की सोची। 

उसने बोला कि दीदी, मैं आपकी मदद कर सकता हूँ। क्योंकि मुझे पता है मेरा गाँव है तो आप चलिए मेरे साथ और वह मेरे साथ पूरे गाँव के बच्चों को ढूंढने में मेरी मदद करने लगा”।

उसने मेरी काम आसान कर दिया और यह देख मुझे बहुत अच्छा लगा कि वह बच्चा काफी एक्टिव था और मुझसे बार-बार पूछ रहा था कि दीदी मेरा एडमिशन आप पक्का करवा दीजिएगा ना?

क्योंकि मुझे पढ़ना अच्छा लगता है। मैं आगे पढ़ना चाहता हूँ। तो मैंने भी उससे कहा कि हाँ मैं तुम्हारा नामांकन करवा दूँगी। जिसे सुन गुरुदेव बहुत खुश हुआ और फिर मैं वहाँ से ऑफिस के लिए निकल पड़ी।

जब मैं ऑफिस के लिए आ रही थी तो फिर उसने मुझे कहा कि दीदी आपको कभी भी मेरी इस गाँव में मेरी मदद की जरूरत पड़े तो आप मेरे घर आ जाइयेगा। मैं आपकी मदद करूंगा। यह सुन मुझे भी काफी खुशी हुई और मैं उसे धन्यवाद बोलकर निकल पड़ी।

कृतिका कुमारी
मुंगेर

हिन्दी वर्तनी से सम्बन्धित ध्यान देने योग्य बिन्दु: Priyanka Kaushik

 

हिन्दी वर्तनी से सम्बन्धित ध्यान देने योग्य बिन्दु

 

नमस्ते साथियों,

सीखें। सिखाएं।। के पूर्व के दो अंकों में हमने वर्तनी को शुद्ध करने हेतु भाषा में अशुद्ध प्रयोग और शुद्ध प्रयोग की तुलना करते हुए मिथकों को तोड़ने का प्रयास किया। इसी कड़ी में आगे कुछ नये विन्दुओं के विषय मे जानते हैं और इन्हें अपनी लेखनी में प्रयोग करने का प्रयास करते हैं।

ए और ये का उपयोग:

“ए” का उपयोग:

किसी शब्द के अंत में “ए” का प्रयोग ज़्यादातर तब किया जाता है जब हम किसी से अनुरोध कर रहे हों। जैसे: कीजिए, आइए, बैठिए, जाइए, सोचिए, बताइए आदि।

उदाहरण: देखिए, अब आप भी इस बिन्दु को समझने की कोशिश कीजिए। (देखिये और कीजिये नहीं)

“ये” का उपयोग:

लेकिन जब अनुरोध की बात न हो तब “ये” उपयोग किया जाता है। जैसे: बनाये, खिलाये, सजाये, बजाये, दिखाये, सुनाये आदि।

उदाहरण: अल्का ने तरह-तरह के पकवान बनाये और खिलाये। (बनाए और खिलाए नहीं


नीचे दिए गये चित्र में एम्बुलेंस के पीछे लिखे वाक्य को ध्यानपूर्वक देखें कि “लिऐ” कैसे लिखा हुआ है। क्या यह सही है? अपने साथियों के साथ विचार करें।


ई और यी का उपयोग:

“ई” का उपयोग: ज़्यादातर “ई” संज्ञा शब्दों के अंत में ही आता है क्रियाओं में नहीं। जैसे: सिंचाई, कटाई, कढ़ाई, मिठाई, मलाई, रज़ाई, दवाई, आदि।

उदाहरण: खेतों की सिंचाई हो गयी है अब फ़सलों की कटाई बाक़ी है। (सिंचायी और कटायी नहीं)

“यी” का उपयोग: इसी तरह क्रियाओं के अंत में “यी” आता है। जैसे: दिखायी, मिलायी, सतायी, जमायी, पायी, खायी आदि।

उदाहरण: उसने मुझे “सीखें-सिखाएं” पत्रिका दिखायी। (दिखाई नहीं)

हम, देश और गणतंत्र : Poem by Aditya Tyagi

         हम, देश और गणतंत्र


बेहतर सदा करते रहें, मन, वचन और कर्म से,

हर क्षण को समझें, करेंसंविधान के मर्म से।

हम में कर कोई है, प्रगति और बदलाव का नायक,

चलो थोड़ा और बनाएं अपने कोप्रकृति और देश के लायक।

जिस पर हो पीढ़ियों को गर्व, घर, गाँव, मोहल्ला, देश बनाएँ,

छोटी-बड़ी, हर मुश्किल को, मिल कर के सुलझाते जाएँ।

सीखना और सीखना है, आगे बढ़ने का मंत्र,

अहं से बड़ा वयम्, वयम् से बड़ा गणतंत्र।

आदित्य त्यागी

टीम सदस्य

जीवन-मृत्यु : Poem by Dharamveer

                जीवन-मृत्यु

धूप में बीता एक समय, छाँव में चला दूसरा,

मृत्यु की रेखा से, जीवन का मेला जुड़ा।

 

समय की गति, बदलती हर समय,

जीवन की मिठास, बसी है यही कहानी के साथ।

 

जीवन के धागे, उलझे हुए संसार में,

हर कदम पर नई राह, हर पल में है नया सफर।

 

चमत्कारों का आश्रय नहीं, है जीवन का सत्य,

धागों का समूह, है जीवन की सही पहचान।

 

मृत्यु एक सरल रेखा, जीवन एक कठिन कहानी,

पर उन उलझे हुए धागों में, बसी है अनगिनत माया।

धर्मवीर कुमार

टीम सदस्य, गया

"खुद को ऐसा बनाना है"- Poem by Shahila Shahid

 "खुद को ऐसा बनाना है"


रोज नया सवेरे लाना

रोज नया है लक्ष्य बनाना

हारने से खुद को नही डराना

खुद को ढीठ बनाना है,


खुद को ऐसा बनाना है

खुद को ऐसा बनाना है।


चाहे आए कैसी भी मंजिल

बस उसको पार कर जाना है

चाहे बोले लाख लोग भी

चाहे बोले अपना परिवार भी

उन्हें कुछ करके दिखाना है,


खुद को ऐसा बनाना है

खुद को ऐसा बनाना है।



सबसे जीत के वहाँ तक जाना

जहाँ तक सोचा नही था जमाना

चाहे जितना भी वक्त गवाना है

खुद को वहाँ तक पहुँचाना है,


खुद को ऐसा बनाना है

खुद को ऐसा बनाना है।।


शाहिला शाहिद
मुंगेर


लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

हमें आपको बताते हुए अति प्रसन्नता हो रही है कि हमारी संस्था, बेगूसराय से तीन एडु-लीडर्स- ज़ेबा, कोमल और आरती का अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षाओं में सफलतापूर्वक चयन हुआ है

APU Exam को crack करने पर इन साथियों को हार्दिक शुभकामनाएँ। इस सेक्शन में आप इनके द्वारा किये गए परिश्रम की समय-सारणी के बारे में थोड़ा जानेंगें। आशा करते हैं कि जो अभ्यर्थी वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने के लिए मेहनत कर रहें हैं उनके लिए इन एडु-लीडर्स के अनुभव मार्गदर्शन का कार्य करेंगें।

ज़ेबा: APU की तैयारी के लिए, प्रतिदिन शाम में i-सक्षम के मेंटोर्स (श्रवण सर, एकता दीदी और अमर भैया) हमारी क्लासेज (classes) लेते थे। परन्तु उन दिनों घर का अत्यधिक काम मेरे सर पर होने के कारण मुझे इस एग्जाम और इंटरव्यू की तैयारी करने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। मैं, घर का सारा काम करती थी, फिर, स्कूल और क्लस्टर भी जाती थी।

पढ़ते-पढ़ते रात के 12-1 भी बज जाते थे और उसके बाद मैं सोती थी। कभी-कभी तो मन में आता था कि सब कुछ छोड़ दूँ! मुझसे नहीं हो पाएगा! लेकिन फिर मैं ही खुद को समझाती थी कि लगन और मेहनत से कोशिश करुँगी तो बिलकुल हो जाएगा। और हो गया। 

आरती: i-सक्षम के मेंटोर्स (श्रवण सर, एकता दीदी, धरमवीर भैया और अमर भैया) हमारी एक-एक दिन क्लासेज (classes) लेते थे जिसमें Read Theory, Essay Writing, Maths और Current Affairs पढ़ाते थे।

क्लास लगभग एक घंटे की होती थी और उसके बाद 2-3 घंटे रिवीज़न (revision) करना होता था। पढ़ाई के लिए सुबह तो समय मिल ही नहीं पाता था। इसलिए रात को ही पढ़ती थी। दिन में स्कूल जाना होता था और घर का काम होता था।

कोमल: श्रवण सर तथा अन्य मेंटोर्स की सारी क्लासेज अटेंड (attend) करके मैं उनके दिए हुए सभी tasks को पूरा करती थी।

मैं फील्ड या ऑफिस से पाँच बजे शाम को घर वापस आती हूँ। बाहर से आकर मैं घर का काम जो मेरे ज़िम्मे आता है जैसे कि रोटी बनाना तथा अन्य कोई कार्य इन्हें समाप्त करके जल्दी-से-जल्दी अपनी पढ़ाई करने बैठ जाती हूँ। इसी में साढ़े छः या सात बज जाते थे। फिर अपनी प्रतिदिन वाली क्लास करने के लिए बैठती थी।

मैं प्रतिदिन सुबह, गूगल न्यूज़ पढ़ती हूँ। मुझे लगता है कि मैं बहुत ज्यादा तो नहीं पढ़ पाती हूँ- जॉब और घर के काम के साथ परन्तु मैं रात में रोज़ाना 7 बजे से 10 बजे तक का समय सेल्फ-स्टडी (Self-study) के लिए जरुर निकालती थी।

शिक्षा का द्वितीय अवसर: Juhi From WAYAM

यह कहानी बिहार के जमुई जिले के एक छोटे से गाँव चौडिहा में रहने वाली दौलती नाम की एक लड़की की है। दौलती ने 5वीं कक्षा तक पढ़ाई की, लेकिन उसके बाद पढाई छोड़ दी और घर के कामों में लग गई। दौलती के माता-पिता हमेशा चाहते थे कि उनकी बेटी पढ़े-लिखे और जीवन में सफलता प्राप्त करे। वे उसे समझाते थे कि शिक्षा जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है।

पुनः शिक्षा की शुरुआत:

एक दिन, वयम् संस्था के दो सदस्य दौलती के गाँव में फील्ड विजिट के लिए गए। वहाँ उन्होंने गाँव की किशोरियों से मुलाकात की और उनके जीवन के बारे में जानने की कोशिश की।

जब सभी किशोरियाँ अपनी शिक्षा के बारे में बता रही थीं, तब दौलती चुपचाप बैठी उन्हें सुन रही थी। वयम् सदस्यों ने दौलती से पूछा कि वह क्यों नहीं बोल रही है? तो वह चुप हो गई।

गाँव के कुछ लोगों ने कहा कि वह पढ़ती ही नहीं है और उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी है। बार-बार पूछने पर भी दौलती कुछ नहीं बोल रही थी। अंत में, जब उनसे पूछा गया कि क्या वह फिर से अपनी पढ़ाई शुरू करना चाहती हैं? तो उन्होंने हाँ में जवाब दिया।

दौलती उसी गाँव की किरण दीदी, जो वयम् की सदस्य भी हैं, के पास पढ़ने के लिए जाने लगी। किरण दीदी ने दौलती को न केवल पढ़ाई में मदद की, बल्कि उसे जीवन में आगे बढ़ने के लिए भी प्रेरित किया।

दौलती की कहानी हमें सिखाती है कि कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। दौलती को जब मौका मिला तो फिर से अपनी पढ़ाई शुरू कर दी। 

यह कहानी हमें प्रेरणा देती है कि हम भी अपनी शिक्षा को महत्व दें और जीवन में सफलता प्राप्त करें। दौलती की कहानी एक प्रेरणादायक कहानी है जो हमें सिखाती है कि शिक्षा जीवन में कितनी महत्वपूर्ण है। हमें कभी भी शिक्षा को नहीं छोड़ना चाहिए, चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों न हों।

जूही कुमारी 
जमुई, वयम् कोऑर्डिनेटर 


समय का सदुपयोग : Reading Reflection

प्रिय साथियों, 

“टाइम मैनेजमेंट” इस टॉपिक और इस शब्द से आप सभी परिचित ही होंगें। “टाइम मैनेजमेंट” शब्द बहुत छोटा है लेकिन हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है।

पहले के जमाने में टाइम मैनेजमेंट जैसा कोई शब्द नहीं था क्योंकि उनके पास  हम लोग के जैसा टाइम वेस्ट करने के यंत्र नहीं थे। 

हम अपना टाइम इंटरनेट, मोबाइल, टीवी इन चीजों के अत्यधिक उपयोग में गँवा देतें हैं। इसलिए  वैज्ञानिको ने हम लोगों को टाइम बचाने के लिए बहुत सारे यंत्र भी बनाए। डॉक्टर्स ने इन यंत्रो को उपयोग करने की सलाह भी दी है। 

पहले के जमाने में ऐसा नहीं था। उन लोगों को ना टाइम बचाने की जरूरत थी, ना टाइम पर उठने की चिंता थी, ना ही टाइम पर अपना काम खत्म करने की कोई जल्दबाज़ी रहती थी। क्योंकि उन्हें पता होता था कि हम अपना काम कर लेंगे।

लेकिन आजकल के युग में हम अपना टाइम बहुत गँवाते (waste) हैं। हमें पता नहीं होता कि हम अपना टाइम का उपयोग कहाँ करें? और कहाँ ना करें? हम अपनी आवश्यकताओं के अनुसार अपनी प्राथमिकता ही सेट नहीं कर पाते हैं।

इस कारण हम फिर सोचते हैं कि टाइम कैसे बचाएँ? हम सभी कार्यों को टाइम पर कैसे पूरा करें? 

जब कोई भी कार्य हमारा समय पर खत्म नहीं होता तो हमारा ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है, हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ता है। बहुत बार टाइम पर काम न होने के कारण बहुत सारी दुर्घटना भी हो जाती है। इस “टाइम मैनेजमेंट” टॉपिक से मुझे एक बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा प्राप्त हुई है-

अगर आप घर खो देते हैं तो वापस मिल जाएगा।
अगर आप दौलत खो देते हैं तो आपको वापस मिल जाएगी।
और अगर आप समय खो देते हैं तो आपको फिर वापस नहीं मिलेगा!

इसलिए आप जितना हो सके अपने टाइम को बचाना सीखिए। या यूँ कहूँ कि आप अपने टाइम का सदुपयोग करना सीखें, जिससे आपको बाद में पश्चताप ना करना पड़े।

रोज़ी
टीम सदस्य, बेगूसराय



गणतंत्र दिवस की तैयारी और बच्चों की उत्सुकता

मैं आपके साथ आज का अनुभव साझा कर रही हूँ। मैं 26 जनवरी की तैयारी करवा रही हूँ। आज हम सभी ने नाटक का मॉडलिंग करते हुए खूब एंजॉय किया। वैसे तो स्कूल में 14 जनवरी से बच्चों की छुट्टियाँ चल रही हैं परन्तु जो बच्चे पार्टिसिपेट कर रहे हैं, उन्हें मैं स्कूल में दो घंटा प्रैक्टिस करवाने जाती हूँ। 

कल जब मैं ट्रेनिंग में चली गयी थी तो कुछ बच्चो को पता नहीं था।

जब मैं घर आयी तो मम्मी बोली कि स्कूल के बच्चे बुलाने आये थे। अक्सर हमारी ट्रेनिंग शनिवार को होती थी तो इसलिए बच्चे घर बुलाने आ गए। 

शाम को घर आते समय रास्ते में, कुछ बच्चे पूछने पूछने लगे कि दीदी आप कल स्कूल जायेंगे न? मैंने, हाँ कहा। 

वो लोग पूरा शोर करने लगे कि दीदी कल स्कूल आयेंगी, कल बहुत मजा आयेगा। मुझे भी शोर सुनकर काफ़ी अच्छा लगा। खुशी हो रही कि बच्चे खुद से आगे आकर किसी भी चीज में भाग ले रहे हैं और अपनी प्रतिभा को निखार रहे हैं।

खुशबू
बैच-9, जमुई 


सुविचार- गाँधी जी के तीन बन्दर : Classroom Session by Muskan

आज मैं तीन-चार दिनों बाद स्कूल गयी, क्योंकि बीते कुछ दिनों से मेरी तबीयत ठीक नहीं थी। इन कुछ दिनों मे ही बच्चों मे एक अजीब सा बदलाव देखने को मिला। वो यह कि बच्चे पहले से अधिक झगड़ा कर रहे थे, और बीच-बीच में एक-दूसरे को गाली भी दे रहे थे।

मुझे समझ नही आ रहा था कि मैं क्या करूँ? इस समस्या का समाधान कैसे निकले? 


फिर मुझे गांधी जी के ये सुविचार याद आए: -     

(1.) बुरा मत देखो।🙈

(2.) बुरा मत बोलो।🙊

(3.) बुरा मत सुनो।🙉

फिर क्या...? 
मैंने यही सुविचार बोर्ड पर लिख दिये। बच्चे इसे पढ़ने लगे, लेकिन बच्चे इसे थोड़ी ही देर बाद भूल जाते, यदि वो सिर्फ इन सुविचारों को पढ़ते । बच्चे इसे आगे भी याद रखें इसके लिए कुछ विशेष किया गया। वैसे आज बच्चे मैडिटेशन करना चाहते थे। उन्हें मैडिटेशन के स्थान पर गांधी जी के तीन बंदर बनने को कहा गया। बच्चो ने अपना पात्र बखूबी निभाया। (आप तस्वीर में देख सकते हैं।)

इसके तहत मैने बच्चों को ये बताया कि आप बुरा ना देखो, ना सुनो, ना बोलो। (जैसे:- किसी को कुछ गलत बोलना, गाली देना- ये अच्छे बच्चों की आदतें नहीं हैं। अगर आप अच्छे बच्चे हैं तो आगे से कभी भी एक-दूसरे को गाली ना दें।)
 
 
फिर हमने मिलकर इन नियमों का सात-आठ बार अभ्यास किया। पहले बोलकर, फिर मैं एक्शन कर रही थी और बच्चे बोल रहे थे। एक बार बच्चे नियमों का एक्शन कर रहे थे और मैं बोल रही थी। ऐसा करने से लगभग सभी बच्चो को ये बातें याद हो गयी।

बदलाव:-  
1. बच्चो का आपस मे झगड़ा कम हुआ।              
2. बच्चों ने गाली देना कम कर दिया (एक ही दिन में)
3. अगर कोई बच्चा गाली देता तो दूसरा बच्चा आकर मुझे बताता, दीदी ये बुरा बोल रहा है। फिर जब मैं उस बच्चे से बात करती तो वो बच्चा बोलता, आगे से नहीं बोलेंगे, दीदी! 

मुस्कान
बैच-9, गया 

साडी से सलवार-कुर्ता पहनने का सफ़र

प्यारे साथियों, 

मैं आपके साथ अपना एक छोटा सा अनुभव साझा करना चाहता हूँ। जब, मैं फ़ेलोशिप के दौरान, कुछ लोगो में हुए बदलावों के बारे में सोचता हूँ, तो लगता है कि इस बदलाव में तो कोई जद्दोजहद नहीं करनी पड़ी होगी। लेकिन मेरे इस नज़रिये को रंजू दीदी के साड़ी से सूट और फिर साइकिल सीखने के अनुभव ने चुनौती दे डाली!

साड़ी से सूट पहनने तक का सफ़र, यह बात और वाक्य सुनने में कितना आसान और साधारण लगता है। शुरुआत में जब मैं रंजू दीदी को सूट पहनने के लिए बोलता था, तो मुझे भी आसान लगता था। 

सूट पहनकर ऑफिस आने में क्या दिक्कत है? सूट पहनने पर कोई क्या ही बोलेगा?

लेकिन मुझे आने वाली चुनौतियों का तनिक भी अंदाज़ा नहीं था। वास्तविकता तो यह है कि मेरा भी यह पहला अनुभव था। जब मैं किसी को साड़ी से सूट पहनने के लिए प्रेरित कर रहा था।

मेरे और ऑफिस के अन्य साथियों के द्वारा बार-बार बोलने के बाद दीदी ने एक नया सूट सिलाया और उसे सबसे पहले ऑफिस लेकर आयीं।

सभी के बोलने के बाद ऑफिस में ही पहन कर बाहर आयी तो दीदी के चेहरे पर जो ख़ुशी झलक रही थी, उसे कोई भी पढ़ सकता था। पहली बार सूट पहनने के कारण दीदी थोड़ी शर्मा भी रही थी। लेकिन साथियों ने भी उनका मनोबल खूब बढाया।

बहुत दिन बीत गए। मैं सप्ताह में 2-3 बार, रंजू दीदी से सूट के बारे में चर्चा कर ही लेता था। दीदी, सूट पहनकर ऑफिस कब से आना शुरू करेंगे? तो दीदी कहती थी कि “भैया घर से बाहर सूट पहनकर निकलेंगे तो लोग क्या सोचेंगे?” 

यह सुनकर मैं उन्हें समझाता था कि “अगर लोगो के सोचने वाली बात, आप ही सोच लेंगे, तो फिर लोग क्या सोचेंगे?” मुझे तो तनिक भी अंदाज़ा नहीं था कि उस बात का असर इतना जल्दी हो जायेगा। मैं अपनी आदत के अनुसार तैयार होकर बाहर खड़ा था, तभी मेरी नज़र ऑफिस में प्रवेश कर रही रंजू दीदी पर पड़ी, तो देखा कि दीदी सूट पहनकर मुस्कराते हुए आ रही हैं। मैं, उन्हें देखकर भाव-विभोर महसूस कर रहा था। लेकिन मेरे पास उस दिन बोलने के शब्द नहीं थे। मुझे सही में बहुत ख़ुशी हुई थी।

अब सूट पहनकर ऑफिस आने का सिलसिला लगातार चलने लगा। मैं आपको बताना चाहूँगा कि मैं ही रंजू दीदी का Development मेंटर हूँ। तो जैसे ही मैंने उनसे पिछले कुछ महीनों के ख़ुशी के पल साझा करने को कहा, तो दीदी ने यह कहानी सुनायी जिसे सुनकर मैं स्तब्ध हो गया। 

जब मैंने शुरुआत में सूट पहनकर ऑफिस आना शुरू किया तो पहले मुझे खुद से ही जद्दोजहद करनी पड़ रही थी। मन में हमेशा डर लगा रहता था कि कोई गॉव के लोग न देख लें। इसीलिए अपनी बेटी को बलकर टोटो रुकवाकर रखने को बोलती थी। जैसे ही टोटो रूकती, मैं जल्दी से सर नीचे करके बैठ जाती थी।  

फिर एक दिन लोगो से सुनने में आया कि कैसी बहू है? अब सूट पहनने लगी है, ससुराल में सूट पहनकर घूमती है। सूट पहनकर ही कहीं काम करने भी जाती है। मेरे आस-पास के लोग भी मेरे ससुर और सास को बोलने लगे। 

मुझे लगने लगा कि अब नहीं पहनना चाहिए। फिर भी मैंने सोचा कि देखते हैं क्या होता है? कुछ दिन ऐसे ही लोग कुछ न कुछ कहते रहे। लेकिन मेरे सास-ससुर ने मुझसे कुछ नहीं बोला।

अब धीरे-धीरे दीदी का डर कम हो रहा था और लोगों के ताने भी कम हुए। ऑफिस में स्कूटी लाने का निर्णय चल रहा था तो दीदी ने सोचा कि स्कूटी सीखने से पहले अपनी बेटी से साइकिल सीख लेती हूँ। 

ताकि स्कूटी सीखने में आसानी हो, क्योंकि प्रितीमाला साइकिल चलाना जानती हैं, तो वह शुरुआत से ही बैलेंस बना पाती हैं। 

जब उन्होंने साइकिल सीखने का कदम उठाया, तो उन्होंने अपने आत्मविश्वास में बहुत बड़ा बदलाव देखा। अब उन्हें कोई भी डर नहीं था, और वह किसी से भी अपनी बातें समझाने में सक्षम थीं।

उन्होंने अपने गॉव के आस-पास की महिलाओं से बातचीत की और उनसे साझा किया कि वो ऐसा क्यों कर रहीं हैं? 

अब अपनी बातों से लोगो को समझाने में सक्षम हो पायी हैं। कहते भी हैं कि “जब किसी महिला की मोबिलिटी बढ़ जाती है तो वह सक्षम एवं सशक्त होती जाती हैं। यह बात मुझे सच होती दिख रही थी”। यह अनुभव मुझे यह सिखाता है कि हमें कभी-कभी उस ओर भी देखना चाहिए जिस ओर हमने कभी ध्यान नहीं दिया। 

धर्मवीर
टीम सदस्य, गया


एजेंसी पर किया गया, गृहकार्य (Homework)

 साथियों, एजेंसी पर हुए सेशन के अंत में तीन प्रश्न एडु-लीडर्स को गृहकार्य में दिये गये थे। बहुत सारे एडु-लीडर्स ने इन प्रश्नों के उत्तर ग्रुप में साझा किये थे। यहाँ आप रश्मि के उत्तरों को पढेंगें जो बैच-9 मुंगेर से हैं।



1. अपनी कोई एक ऐसी एजेंसी जो आपके पास नहीं है, उसके पीछे का कारण जाने और साझा करें।

उत्तर- मेरे पास अपनी आर्थिक स्थिति को देखते हुए बाहर पढ़ाई करने की इच्छा, मेरे लिए एक एजेंसी को घटा देती है। सरल शब्दों में कहें तो मुझे अभी बाहर पढ़ने की एजेंसी नहीं है। जिसका एक मात्र कारण मेरे घर की आर्थिक स्थिति है। लेकिन आने वाले कुछ सालों में, मैं अपनी इस एजेंसी को खत्म करुँगी। यह मेरा खुद पर विश्वास है।

2. अपनी कक्षा के लिए बनाए गये चयनित तीन एक्शन प्लान पर काम शुरू करें। 

उत्तर- विद्यालय बंद होने के कारण मैं अभी इस कार्य को नहीं कर पायी हूँ। विद्यालय बंद होने से पहले मैंने बच्चो के साथ अपने और अपने साथियों द्वारा बनाए गए एक्शन प्लान पर काम किया था। लेकिन फिलहाल मैं विद्यालय खुलने के इंतजार में हूँ। 

3. अपनी कक्षा में हुक का उपयोग करें।

उत्तर- इसका उपयोग हमारी कक्षा के लिए बहुत उपयोगी है। जैसा कि आज के सेशन में हम सभी साथियों ने मिलकर बहुत (उदाहरण: snack साउंड, जॉनी-जोनी yes पापा , अप-डाउन, etc.) हुक का उपयोग किया। हम इसी तरह अपनी कक्षा के बच्चो का ध्यान एकाग्र करने के लिए इसका उपयोग पूरी तरह से करेंगे।


Fellowship session on Agency

साथियों,

मैं आपके साथ कल के सेशन का अनुभव साझा करने जा रही हूँ। कल के सेशन में जब माइंडफुलनेस करवाया गया तो मुझे बहुत अच्छा लगा। उसमें समुद्र, डॉल्फिन मछलियों को, पेंग्विंस को इन सब चीजों को देखकर मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। 

ऐसा लग रहा था कि मैं देखते जाऊं। शुरू-शुरू में, मैं जब मैडिटेशन कर रही थी तो उस समय मेरा ध्यान थोडा भटका, परन्तु फिर लौट आया। मैं घर के बारे में सोचने लग गयी थी।

फिर पिछले सेशन का रिवीजन (revision) हुआ जो मुझे बहुत अच्छा लगा। जो दीदी उसमें उपस्थित नहीं थी, वो भी अच्छे से समझ पायी। मुझे सुनील की एक स्टोरी बताई गई जो कि मैं खुद से डिलीट (delete) कर पाई। 

मैंने बहुत सारे स्कूल में देखा है कि बीपीएससी (BPSC) के शिक्षक आये हुए हैं, जिनसे एडु-लीडर्स को कुछ समस्याएं आ रही है। ग्रुप में इन पर चर्चा करके उनकी समस्याओं का हल निकालना अच्छा लगा। 

मैं यह समझ पायी कि उस समय यदि मैं उनकी जगह होती, तो मैं क्या करती? मैं अपनी कक्षा में हुक का इस्तेमाल तो करती थी परन्तु मुझे दो-चार ही हुक्स आते थे। उसी को मैं बार-बार करती थी। कल के सेशन के बाद मुझे बहुत सारे हुक्स (hooks) के बारे में पता चला। उनमें से एक gratitude है। इसका उपयोग मैं स्वयं भी करुँगी और मेरी कक्षा के बच्चे भी करेंगें। जिससे दूसरे बच्चे भी प्रोत्साहित होंगें। 

अभी तो ठंड की वजह से स्कूल बंद है, परन्तु मैं उत्सुक हूँ कि कब स्कूल खुले और मैं इन चीजों को अप्लाई (apply) कर पाऊं। 

कल हमने एजेंसी (agency) पर अच्छे से समझ बनायी। एजेंसी क्या है? किस कारण मेरी एजेंसी बढ़ती या घटती है? और हम अपनी एजेंसी को कैसे बढ़ा और कैसे घटा सकते हैं?

यह हमारे स्टेप्स (steps) और हमारी स्किल्स (skills) पर निर्भर करते हैं हम चाहें तो अपनी एजेंसी को सबसे आगे लेकर जा सकते हैं, यदि हम सबसे पीछे हैं तो भी।


हमें हमेशा कोशिश करनी चाहिए कि हमारी एजेंसी बढ़े और यह हमारे हाथों में है। मैं हमेशा कोशिश करूंगी अपनी एजेंसी बढ़ाने के इसके लिए मैं हमेशा एटॉमिक हैबिट का यूज (use) करूंगी। आज का अनुभव इतना ही।

आँचल
बैच- 9, मुंगेर


जनवरी में कराये गए बाल उत्सव के लक्ष्य और प्रगति

 प्रिय साथियों, आप जानते ही होंगे कि i-सक्षम द्वारा बाल-उत्सव, मैत्री प्रोजेक्ट में नामंकित बच्चियों को शिक्षा से दोबारा जोड़ने के लिए शुरू किया गया। ताकि उन बच्चियों की शिक्षा में रुचि जगे और वो दोबारा स्कूल से ड्राप-आउट न हो। गतिविधि आधारित शिक्षा के नवाचारों को सीखें और साथ ही साथ इसमें उनके अभिभावकों को भी शिक्षा के लिए जागरूक करने की एक विशेष पहल शामिल है। 

हमारा एक लक्ष्य यह भी है कि अभिभावक अपने बच्चे में हो रहे बदलाव को देखें और उन्हें स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित करते रहें। यदि बच्चे को निरंतर स्कूल पहुँचने में कोई समस्या हो रही है तो अभिभावक हमारी फील्ड टीम से कांटेक्ट कर समस्या का समाधान कर सकते हैं।

बिहार के तीन जिलों (गया, मुंगेर व जमुई) में पिछले एक महीने में 23 बाल-उत्सव करवाने के बाद इन बच्चों में निम्न बदलाव देखें जा सकते हैं। 

स्कूल से उनका जुड़ाव बढ़ा है

पढ़ाई में उनकी रूचि दिखने लगी है

जो बच्चे नियमित स्कूल नहीं जा रहे थे वो प्रतिदिन स्कूल आ रहे है

अभिभावकों द्वारा भी बच्चों को स्कूल भेजने पर ज़ोर दिया जा रहा है 

स्कूल के सभी बच्चें एडु-लीडर्स को जानने लगे। उनके स्कूल में आने का इंतजार करते हैं। 

विद्यालयों का i-सक्षम से जुड़ाव बढ़ा है।

बाल-उत्सव (जमुई, जनवरी 2024)

उत्क्रमित मध्य विद्यालय सोनपै, गरसंडा एवं उत्क्रमित मध्य विद्यालय तरीदाबिल, दाबिल से बाल-उत्सव की कुछ अहम प्रतिक्रियाएँ निन्मलिखित हैं।

प्रतिक्रियाएँ: अभिभावक (सोनपै, गरसंडा): अभिभावकों ने अपने बच्चों को पहली बार TLM के माध्यम से पढाई करते हुए देखा तो उनकी एक नयी समझ बनी। बाल-उत्सव में भाग लेकर अभिभावकों का एडु-लीडर्स के प्रति विश्वास बढ़ा। अभिभावक, पेरेंट्स कार्ड का प्रयोग एवं उनसे गतिविधि करके भी अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रहे थे।

“बिना कॉपी कलम के भी बच्चा सीख सकता है! यह हम पहली बार देख रहे हैं”। ~अभिभावक

अभिभावक (तरीदाबिल, दाबिल): अभिभावक अपने बच्चों को गतिविधि करते देख ख़ुश हो कर अभिवादन कर रहे थे। सोनपै के 20-25 अभिभावकों को i-सक्षम के  बारे में पहले से पता था, हमारे द्वारा TLM और गतिविधि द्वारा पढाई उनके लिए नया नहीं था। 

“मुझे तो स्कूल आने से डर लगता था क्योंकि मैं सोचती थी कि मैं क्या करुँगी स्कूल जाकर? कहीं शिक्षक कुछ सवाल न पूछने लगें? परन्तु आज बाल-उत्सव के बहाने से स्कूल में आकर अच्छा लग रहा है। यह देख पा रही हूँ कि  मेरी बच्ची स्कूल में किस तरह पढाई करती है”? अब से मैं अपनी बच्ची पर और ज्यादा ध्यान दूंगी। -महिला अभिभावक

आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि OOSG के अभिभावकों का यह विद्यालय आने का पहला मौका था। ये ना तो स्वयं पढ़े हैं और ना ही इनके बच्चे अब तक विद्यालय में दाखिल हुए थे। इस कारण उनके मन में थोडा डर होना वाजिब था।

बच्चे: सभी गतिविधियों में भाग लेकर बच्चे बहुत खुश दिखे। बच्चों का कहना था कि हमारे स्कूल में ऐसा प्रोग्राम कभी नहीं हुआ। मुझे ऐसा लगा कि सब गतिविधियाँ मेरे अनुसार ही हैं। इस तरह के प्रोग्राम होते रहने चाहिए।
शिक्षक: एक शिक्षक की प्रतिक्रिया यह थी कि बच्चों के लिए इस तरह का प्रोग्राम जरुरी होता है क्योंकि इससे बच्चे का चौमुखी विकास होता है, बच्चे विद्यालय आने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।

 

 यदि इनके अभिभावकों की बात की जाए तो बच्चो को पढाने में उनकी भी सक्रीय भूमिका आवश्यक है। कभी-कभी अभिभावकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, विद्यालयी अनुभव और विद्यालय का उनके प्रति दृष्टिकोण- बच्चे को पढने में बाधा बन जाता है। बाल-उत्सव जैसे कार्यक्रम विद्यालय और समुदाय के बीच एक पुल का कार्य करता है। अतिरिक्त भार होने के कारण हम लोग पहल नहीं ले पाते हैं। i-सक्षम जैसी टीम्स का विद्यालय के साथ जुड़ना आवश्यक है। -शिक्षक

प्रियंका कौशिक और साक्षी,
टीम सदस्य, मुंगेर

Wednesday, February 21, 2024

PTM में सिखाया गया हस्ताक्षर करना

 प्रिय साथियों, 

आज मैं आप लोगों के साथ अपने स्कूल में हुई PTM का अनुभव साझा करने जा रही हूँ। आज की PTM 11:00 बजे से शुरू हुई। सभी अभिभावक समय से आये। इस बैठक में मेरे स्कूल के प्रिन्सिपल सर और वाईस-प्रिन्सिपल सर और क्लास टीचर भी शामिल हुए।

बैठक में कुल 32 पेरेंट्स को आना था, लेकिन 26 पेरेंट्स ही शामिल हुए। बैठक का मुख्य उद्देश्य निन्मलिखित बातों को जानना था:

बच्चे रेगुलर स्कूल क्यों नहीं आते है?
आते भी हैं तो समय से क्यों नहीं आते हैं?
बच्चे जब स्कूल से घर जाते हैं तो आपलोग उनकी कॉपी चेक करते है कि बच्चे ने आज क्या पढ़ा?
मेरे बच्चों को और क्या सीखने की जरूरत है?

सभी पेरेंट्स ने कुछ उत्तर दिये। कुछ पेरेंट्स बोले कि ठंड के कारण बच्चा लेट आता है। आज से हम कोशिश करेंगे कि मेरा बच्चा रेगुलर स्कूल आए और समय से आए तभी तो मेरा बच्चा कुछ सीख पायेगा।

कुछ पेरेंट्स बोले हम तो पढ़े लिखे नहीं हैं, तो हम किस तरह जान पायेंगें कि मेरा बच्चा क्या सीख रहा है? और क्या नहीं?

मेरा मन यह बात सुनकर थोड़ा उदास हुआ, मैं सोचने लगी कि काश ये लोग भी पढ़े लिखे होते तो जान पाते कि मेरा बच्चा क्या सीख रहा है!

मैंने उनसे एक प्रश्न किया कि क्या आप सभी हस्ताक्षर करना जानते हैं? 
वो बोले, नहीं। 

तो मैंने फिर से प्रश्न किया, क्या आप सीखना चाहेंगे? 
सभी ने हाँ कहा। 

उसी समय मैं सभी को कॉपी-कलम (उनके बच्चों से ली हुई) देकर उनके नाम और हस्ताक्षर की प्रैक्टिस कराने लगी। सभी पेरेंट्स मेरे चारों तरफ बैठ गए। सभी अपना नाम सीखने के लिए उत्साहित थे, यह देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही थी। 

प्रिंसिपल सर को भी मेरा यह कार्य बहुत अच्छा लगा, उन्होंने मुझे धन्यवाद भी किया।

सपना कुमारी
बैच-10, बेगूसराय 


दूसरी PTM सोमवार को हुई

 नमस्ते साथियों, 

मैं अपनी PTM का अनुभव आप सभी के साथ साझा कर रही हूँ। यह मेरी करवायी हुई दूसरी PTM है। वैसे तो PTM शनिवार को होती है परन्तु सभी बच्चों के द्वारा मैंने यह सन्देश पहुँचा दिया था कि इस बार PTM सोमवार को सुबह 10 बजे से होगी। 

सोमवार को 10 बजे जब हम स्कूल पहुँचे तो पेरेंट्स (parents) नहीं आये थे। मैंने कुछ देर इंतज़ार भी किया। इतने में ही रोज़ी दीदी आयीं। उन्होंने हमें सलाह दी कि सभी पेरेंट्स को कॉल किया जाए।
 
मैंने और अंजली ने मिलकर सभी पेरेंट्स को कॉल लगाना शुरू किया। थोड़ी देर में कुछ पेरेंट्स आ गए। मुझे थोड़ा डर लग रहा था कि कहाँ से शुरू किया जाये? 

फिर रोज़ी दीदी ने गाइड (guide) किया कि पहले स्वागत कीजिये, उसके बाद सेशन प्लान के अनुसार चलिये। मैंने वैसा ही किया। सेशन प्लान के अनुसार पहले माइंडफुलनेस कराया। पिछली PTM का एक रिकैप (recap) किया। 

उसके बाद रोज़ी दीदी ने रट्टा लगाने और समझकर पढ़ने में अंतर को लेकर एक वीडियो दिखायी। सभी पेरेंट्स ने उस वीडियो को ध्यान से देखा और सुना। पूरा वीडियो देखने के बाद दीदी ने उनसे प्रश्न पूछे। सभी ने अपनी समझ के अनुसार उत्तर दिये। 


कुछ पेरेंट्स ने यह भी बोला कि बच्चे खेल-खेल के माध्यम से ज्यादा सीखते हैं। पेरेंट्स खुद ही प्रश्न पूछ रहे थे। रोज़ी दीदी की हेल्प (help) से हमारी PTM बहुत अच्छे से हो गया। रोज़ी दी को बहुत-बहुत धन्यवाद, हमारी PTM में आने के लिए और इसे सफल बनाने के लिए।

सुप्रीति 
बैच-10, बेगूसराय

PTM के दसवें सेशन में 14 अभिभावक शामिल हुए

 प्रिय साथियों, 

मैं आज की PTM का अनुभव साझा कर रही हूँ। आज, PTM में 14 अभिभावक शामिल हुए थे। ठंड की वजह से सभी अभिभावक बहुत लेट आए थे। यह PTM का दसवाँ सेशन था। 

सबसे पहले मैंने सभी को आने के लिए धन्यवाद किया, उनका स्वागत किया। फिर हमने “बूझो तो जाने” गेम खेला। यह गेम सभी को अच्छा लग रहा था। सभी जवाब भी दे रहे थे। 

फिर चित्र-पठन हुआ। उसके बाद हम सभी अभिभावकों के साथ कविता-पठन किये। वो लोग कविता करने में झिझक रहे थे। कुछ-कुछ अभिभावक तो अच्छे से कर रहे थे। 

सभी अभिभावकों को घर जाने की बहुत जल्दी थी। वो लोग जाने की जिद्द करने लगे, मैंने उन्हें किसी तरह रोका फिर कविता और चित्र-पठन पर बात हुई। 



PTM में अच्छा हुआ:
14 लोग शामिल हुए। सभी parents इसमें सक्रिय थे और कविता कर रहे थे। 

PTM में अच्छा हो सकता था:
सभी parents टाइम पर आते और सभी मीटिंग के अंत तक रुक सकते थे।

गौशिया प्रवीन
बैच- 9, जमुई 


समुदाय में PTM- उद्देश्य था CRA पर समझ

नमस्ते साथियों,

मैं, जमुई के भंडरा गॉंव से हूँ। मैं आप सभी के साथ अपने समुदाय में करायी हुई PTM का अनुभव साझा कर रही हूँ। 

अधिक सर्दी के कारण कोई अभिभावक स्कूल में PTM में पार्टिसिपेट करने नहीं आये। यह सातवीं PTM थी और इस PTM का उद्देश्य था- CRA (Concrete, Representational & Abstract) पर समझ बनाना। इसमें कुल 16 अभिभावक ही सम्मिलित हुए। 


मैं डोर-टू-डोर (door-to-door) सभी अभिभावकों को उनके घर बुलाने गयी थी। कोई महिला बोल रही थी कि मेरी तबियत ठीक नहीं हैं, किसी ने बोला कि बहुत ठंड हैं और किसी को घर में बहुत काम था। बहुत विनती करने पर कुछ लोग PTM में शामिल हुए और मैं इसे करा पायी। 

संध्या कुमारी
बैच-9, जमुई

Short-Notice पर PTM करवायी

प्रिय दोस्तों,

आज मैं आपके साथ PTM का अनुभव साझा कर रही हूँ। वैसे तो आज हमें क्लस्टर मीटिंग करनी थी परन्तु मुझे मेरी बडी से सूचना मिली कि आज हमें अपने विद्यालय में अभिभावक शिक्षक बैठक (PTM) करवानी है। 

जब मैं कक्षा में पहुँची और मैंने अपनी क्लास-टीचर (Class Teacher) को बताया कि आज PTM करवानी है तो उन्होंने बोला कि ऐसे बिना सूचना के हम बच्चो को नहीं छोडेंगें, कि घर जाकर वो अपने अभिभावकों को बुला कर लायें!

कुछ ही देर में मैंने उन्हें PTM के लिए मनाया। 

विद्यालय के ही शिक्षक गोपाल सर ने बच्चों के अभिभावकों को घर से बुलाने में सहायता की और मैंने पहली बार PTM का नेतृत्व किया। मैंने Save Water के बारे में अभिभावकों को जागरूक किया।  

मेरा इस PTM को करवा कर आत्मविश्वास (confidence) बढ़ा कि अब मैं PTM कराने में सक्षम हो गयी हूँ।

प्रतिमा कुमारी
बैच- 10, बेगूसराय



क्लस्टर मीटिंग और Fun

 नमस्ते साथियों,

मैं आज आप सभी के साथ कलस्टर मीटिंग का अनुभव साझा कर रही हूँ। हमारे कलस्टर का नाम 'अवसरों की दुनिया’ हैं और यह कलस्टर मीटिंग अरहरा पाटम मंदिर के पास एक स्कूल मे हुई थी। हमारे कलस्टर मे कुल 16 दीदी थी, जिसमें से 12 एडु-लीडर्स थी।

हमारी कलस्टर मीटिंग 10 बजे से शुरू हुई और सभी साथी समय पर पहुँच गये थे। ठंड बहुत ज्यादा होने के कारण एक-दो साथी थोड़ा लेट से पहुँचे। फिर सभी साथी एक जगह पर बैठ गये और हमने माइंडफुलनेस और एक गतिविधि की। 

फिर हमने अपने पिछले महीने के लक्ष्य (goal), “लाइब्रेरी के लिए जगह खोजना” पर बात की। ये लक्ष्य कितना पूरा हो पाया, किसे क्या-क्या चुनौतियाँ आयीं, यह सब जाना। उदयपुर की एडु-लीडर्स ने लाइब्रेरी के लिए स्थान खोज लिया था और फरवरी में लाइब्रेरी का उद्घाटन करने का प्लान है।

हमने अगले महीने का गोल भी यही रखा कि “लाइब्रेरी के लिए जगह खोजना”। क्योंकि पिछले महीने का गोल अधिकतर लोगों का पूरा नहीं हो पाया है।

इसके बाद हमने दो समूह बनाये और बढ़ते कदम पर बात की। अपना-अपना बढ़ते कदम जो साथी बना कर ले गये थे उन्होंने सभी के साथ साझा किया। एक-दूसरे को फीडबैक भी दिया और खुद के फीडबैक पर भी विचार किया। 

हमलोग जो बढ़ते कदम बनाते हैं तो उसे हम कितना स्मार्ट बना पाए? और कहाँ सुधार की जरूरत है? वो सब फीडबैक एक-दूसरे से मिलता है। आज सभी सदस्य अपना बढ़ते कदम बना कर आयी थी और सभी ने साझा भी किया कि हर बार की तरह इस बार भी यह बहुत अच्छा लगा।

उसके बाद मोना दीदी ने स्कूल में ही लाइब्रेरी के लिए एक जगह दिखायी। जगह देखकर हम मोना दीदी के घर गए। सभी ने भर-पेट खाना खाया। सभी को बहुत अच्छा लगा, बहुत मज़ा आया। हमने दीदी को धन्यवाद किया और अपने घर लौट आये। 


सोनम खातून
बैच- 10 (A), मुँगेर 



क्लस्टर मीटिंग का अनुभव और समस्याएँ

 प्रिय साथियों,

मैं आप सभी के साथ अपने क्लस्टर का अनुभव साझा करने जा रही हूँ। मेरे क्लस्टर का नाम पावर ऑफ एडु-लीडर्स है। हमने मीटिंग की शुरुआत मेडिटेशन से की। ज़ेबा दीदी, सुप्रिया दीदी और मैंने सांझा किया कि पिछ्ले महीने ऐसा कौन सा पल था, जिसे याद करके हमें खुद पर बहुत ज्यादा प्राउड (proud) फील हुआ। 

उसके बाद हम सभी ने एक-दूसरे से बढ़ते कदम शेयर किया। एक-दूसरे को फीडबैक देकर पिछले एजेंडा पर बातचीत करने लगे। पिछले महीने हमारा एजेंडा था कि हम 30 किशोरियों को पढ़ाई से जोड़ें,उनका नामांकन (enrolment) करवायें। 


सभी के अनुभव सुनकर निन्मलिखित चैलेंज निकल कर आये:

गाँव में वैसी लड़कियाँ नहीं मिली जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी।
बहुत सारी लड़कियों का आधार कार्ड नहीं बना है।
बहुत सारी लड़कियों का बैंक में अकाउंट नहीं बना है।
मुझे भी अपनी कम्युनिटी में एक भी ऐसी लड़की नहीं मिली जिसने पढ़ाई छोड़ दी हो लेकिन मुझे दूसरी समस्या का सामना करना पड़ा। मुझे 20-22 बच्चे ऐसे मिले जो आंगनवाड़ी भी नहीं जाते थे।
हमारे गाँवों में हम अपना एजेंडा कंप्लीट नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि लड़कियाँ मिल नहीं रही हैं। इसलिए हम लोग दूसरे गाँव जा रहे हैं पर इसके लिए हमें ऑटो के किराये की जरूरत है।
बहुत सारी लड़कियों की फाइनेंशियल कंडीशन अच्छी नहीं है, इस वजह से उनको पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
दो ऐसी लड़कियाँ भी मिली, जिनकी उम्र 15 से 18 साल है लेकिन उन्हें अपना नाम भी लिखना नहीं आता।  
बहुत लड़कियों के पास CLC ना होने की वजह से वो आगे की कक्षाओं में नामांकन नहीं करा पा रही हैं।

इन समस्याओं को जानने के बाद हमने अगले एजेंडा पर बात की। हमारा अगला एजेंडा है कि 30 लड़कियों का एनरोलमेंट करवाना। फिर हमने डीब्रीफ किया। अंत में हम सभी ने क्लस्टर फॉर्म भरे।

क्या अच्छा हो सकता था?

हमारे क्लस्टर में बहुत सदस्य ऐसे हैं जो क्लस्टर को सीरियस नहीं ले रहे हैं। जिस दिन मीटिंग होती है उसी दिन वह बताते हैं कि वह नहीं आने वाले हैं। बहुत सारी एडु-लीडर्स और बडी, टाइम पर क्लस्टर में मौजूद नहीं होती हैं।

क्या अच्छा हुआ?

उपस्थित सदस्यों ने अपना बढ़ते कदम अच्छे से शेयर किया।

सभी ने कम्युनिटी के चैलेंज शेयर किये।

सभी कोआपरेट (cooperate) कर रहे थे और सपोर्ट करने के लिए तक तत्पर थे। 


संध्या कुमारी
बैच- 10, बेगूसराय