Wednesday, February 21, 2024

PTM में सिखाया गया हस्ताक्षर करना

 प्रिय साथियों, 

आज मैं आप लोगों के साथ अपने स्कूल में हुई PTM का अनुभव साझा करने जा रही हूँ। आज की PTM 11:00 बजे से शुरू हुई। सभी अभिभावक समय से आये। इस बैठक में मेरे स्कूल के प्रिन्सिपल सर और वाईस-प्रिन्सिपल सर और क्लास टीचर भी शामिल हुए।

बैठक में कुल 32 पेरेंट्स को आना था, लेकिन 26 पेरेंट्स ही शामिल हुए। बैठक का मुख्य उद्देश्य निन्मलिखित बातों को जानना था:

बच्चे रेगुलर स्कूल क्यों नहीं आते है?
आते भी हैं तो समय से क्यों नहीं आते हैं?
बच्चे जब स्कूल से घर जाते हैं तो आपलोग उनकी कॉपी चेक करते है कि बच्चे ने आज क्या पढ़ा?
मेरे बच्चों को और क्या सीखने की जरूरत है?

सभी पेरेंट्स ने कुछ उत्तर दिये। कुछ पेरेंट्स बोले कि ठंड के कारण बच्चा लेट आता है। आज से हम कोशिश करेंगे कि मेरा बच्चा रेगुलर स्कूल आए और समय से आए तभी तो मेरा बच्चा कुछ सीख पायेगा।

कुछ पेरेंट्स बोले हम तो पढ़े लिखे नहीं हैं, तो हम किस तरह जान पायेंगें कि मेरा बच्चा क्या सीख रहा है? और क्या नहीं?

मेरा मन यह बात सुनकर थोड़ा उदास हुआ, मैं सोचने लगी कि काश ये लोग भी पढ़े लिखे होते तो जान पाते कि मेरा बच्चा क्या सीख रहा है!

मैंने उनसे एक प्रश्न किया कि क्या आप सभी हस्ताक्षर करना जानते हैं? 
वो बोले, नहीं। 

तो मैंने फिर से प्रश्न किया, क्या आप सीखना चाहेंगे? 
सभी ने हाँ कहा। 

उसी समय मैं सभी को कॉपी-कलम (उनके बच्चों से ली हुई) देकर उनके नाम और हस्ताक्षर की प्रैक्टिस कराने लगी। सभी पेरेंट्स मेरे चारों तरफ बैठ गए। सभी अपना नाम सीखने के लिए उत्साहित थे, यह देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही थी। 

प्रिंसिपल सर को भी मेरा यह कार्य बहुत अच्छा लगा, उन्होंने मुझे धन्यवाद भी किया।

सपना कुमारी
बैच-10, बेगूसराय 


दूसरी PTM सोमवार को हुई

 नमस्ते साथियों, 

मैं अपनी PTM का अनुभव आप सभी के साथ साझा कर रही हूँ। यह मेरी करवायी हुई दूसरी PTM है। वैसे तो PTM शनिवार को होती है परन्तु सभी बच्चों के द्वारा मैंने यह सन्देश पहुँचा दिया था कि इस बार PTM सोमवार को सुबह 10 बजे से होगी। 

सोमवार को 10 बजे जब हम स्कूल पहुँचे तो पेरेंट्स (parents) नहीं आये थे। मैंने कुछ देर इंतज़ार भी किया। इतने में ही रोज़ी दीदी आयीं। उन्होंने हमें सलाह दी कि सभी पेरेंट्स को कॉल किया जाए।
 
मैंने और अंजली ने मिलकर सभी पेरेंट्स को कॉल लगाना शुरू किया। थोड़ी देर में कुछ पेरेंट्स आ गए। मुझे थोड़ा डर लग रहा था कि कहाँ से शुरू किया जाये? 

फिर रोज़ी दीदी ने गाइड (guide) किया कि पहले स्वागत कीजिये, उसके बाद सेशन प्लान के अनुसार चलिये। मैंने वैसा ही किया। सेशन प्लान के अनुसार पहले माइंडफुलनेस कराया। पिछली PTM का एक रिकैप (recap) किया। 

उसके बाद रोज़ी दीदी ने रट्टा लगाने और समझकर पढ़ने में अंतर को लेकर एक वीडियो दिखायी। सभी पेरेंट्स ने उस वीडियो को ध्यान से देखा और सुना। पूरा वीडियो देखने के बाद दीदी ने उनसे प्रश्न पूछे। सभी ने अपनी समझ के अनुसार उत्तर दिये। 


कुछ पेरेंट्स ने यह भी बोला कि बच्चे खेल-खेल के माध्यम से ज्यादा सीखते हैं। पेरेंट्स खुद ही प्रश्न पूछ रहे थे। रोज़ी दीदी की हेल्प (help) से हमारी PTM बहुत अच्छे से हो गया। रोज़ी दी को बहुत-बहुत धन्यवाद, हमारी PTM में आने के लिए और इसे सफल बनाने के लिए।

सुप्रीति 
बैच-10, तेघड़ा  

PTM के दसवें सेशन में 14 अभिभावक शामिल हुए

 प्रिय साथियों, 

मैं आज की PTM का अनुभव साझा कर रही हूँ। आज, PTM में 14 अभिभावक शामिल हुए थे। ठंड की वजह से सभी अभिभावक बहुत लेट आए थे। यह PTM का दसवाँ सेशन था। 

सबसे पहले मैंने सभी को आने के लिए धन्यवाद किया, उनका स्वागत किया। फिर हमने “बूझो तो जाने” गेम खेला। यह गेम सभी को अच्छा लग रहा था। सभी जवाब भी दे रहे थे। 

फिर चित्र-पठन हुआ। उसके बाद हम सभी अभिभावकों के साथ कविता-पठन किये। वो लोग कविता करने में झिझक रहे थे। कुछ-कुछ अभिभावक तो अच्छे से कर रहे थे। 

सभी अभिभावकों को घर जाने की बहुत जल्दी थी। वो लोग जाने की जिद्द करने लगे, मैंने उन्हें किसी तरह रोका फिर कविता और चित्र-पठन पर बात हुई। 



PTM में अच्छा हुआ:
14 लोग शामिल हुए। सभी parents इसमें सक्रिय थे और कविता कर रहे थे। 

PTM में अच्छा हो सकता था:
सभी parents टाइम पर आते और सभी मीटिंग के अंत तक रुक सकते थे।

गौशिया प्रवीन
बैच- 9, जमुई 


समुदाय में PTM- उद्देश्य था CRA पर समझ

नमस्ते साथियों,

मैं, जमुई के भंडरा गॉंव से हूँ। मैं आप सभी के साथ अपने समुदाय में करायी हुई PTM का अनुभव साझा कर रही हूँ। 

अधिक सर्दी के कारण कोई अभिभावक स्कूल में PTM में पार्टिसिपेट करने नहीं आये। यह सातवीं PTM थी और इस PTM का उद्देश्य था- CRA (Concrete, Representational & Abstract) पर समझ बनाना। इसमें कुल 16 अभिभावक ही सम्मिलित हुए। 


मैं डोर-टू-डोर (door-to-door) सभी अभिभावकों को उनके घर बुलाने गयी थी। कोई महिला बोल रही थी कि मेरी तबियत ठीक नहीं हैं, किसी ने बोला कि बहुत ठंड हैं और किसी को घर में बहुत काम था। बहुत विनती करने पर कुछ लोग PTM में शामिल हुए और मैं इसे करा पायी। 

संध्या कुमारी
बैच-9, जमुई

Short-Notice पर PTM करवायी

प्रिय दोस्तों,

आज मैं आपके साथ PTM का अनुभव साझा कर रही हूँ। वैसे तो आज हमें क्लस्टर मीटिंग करनी थी परन्तु मुझे मेरी बडी से सूचना मिली कि आज हमें अपने विद्यालय में अभिभावक शिक्षक बैठक (PTM) करवानी है। 

जब मैं कक्षा में पहुँची और मैंने अपनी क्लास-टीचर (Class Teacher) को बताया कि आज PTM करवानी है तो उन्होंने बोला कि ऐसे बिना सूचना के हम बच्चो को नहीं छोडेंगें, कि घर जाकर वो अपने अभिभावकों को बुला कर लायें!

कुछ ही देर में मैंने उन्हें PTM के लिए मनाया। 

विद्यालय के ही शिक्षक गोपाल सर ने बच्चों के अभिभावकों को घर से बुलाने में सहायता की और मैंने पहली बार PTM का नेतृत्व किया। मैंने Save Water के बारे में अभिभावकों को जागरूक किया।  

मेरा इस PTM को करवा कर आत्मविश्वास (confidence) बढ़ा कि अब मैं PTM कराने में सक्षम हो गयी हूँ।

प्रतिमा कुमारी
बैच- 10, तेघड़ा 



क्लस्टर मीटिंग और Fun

 नमस्ते साथियों,

मैं आज आप सभी के साथ कलस्टर मीटिंग का अनुभव साझा कर रही हूँ। हमारे कलस्टर का नाम 'अवसरों की दुनिया’ हैं और यह कलस्टर मीटिंग अरहरा पाटम मंदिर के पास एक स्कूल मे हुई थी। हमारे कलस्टर मे कुल 16 दीदी थी, जिसमें से 12 एडु-लीडर्स थी।

हमारी कलस्टर मीटिंग 10 बजे से शुरू हुई और सभी साथी समय पर पहुँच गये थे। ठंड बहुत ज्यादा होने के कारण एक-दो साथी थोड़ा लेट से पहुँचे। फिर सभी साथी एक जगह पर बैठ गये और हमने माइंडफुलनेस और एक गतिविधि की। 

फिर हमने अपने पिछले महीने के लक्ष्य (goal), “लाइब्रेरी के लिए जगह खोजना” पर बात की। ये लक्ष्य कितना पूरा हो पाया, किसे क्या-क्या चुनौतियाँ आयीं, यह सब जाना। उदयपुर की एडु-लीडर्स ने लाइब्रेरी के लिए स्थान खोज लिया था और फरवरी में लाइब्रेरी का उद्घाटन करने का प्लान है।

हमने अगले महीने का गोल भी यही रखा कि “लाइब्रेरी के लिए जगह खोजना”। क्योंकि पिछले महीने का गोल अधिकतर लोगों का पूरा नहीं हो पाया है।

इसके बाद हमने दो समूह बनाये और बढ़ते कदम पर बात की। अपना-अपना बढ़ते कदम जो साथी बना कर ले गये थे उन्होंने सभी के साथ साझा किया। एक-दूसरे को फीडबैक भी दिया और खुद के फीडबैक पर भी विचार किया। 

हमलोग जो बढ़ते कदम बनाते हैं तो उसे हम कितना स्मार्ट बना पाए? और कहाँ सुधार की जरूरत है? वो सब फीडबैक एक-दूसरे से मिलता है। आज सभी सदस्य अपना बढ़ते कदम बना कर आयी थी और सभी ने साझा भी किया कि हर बार की तरह इस बार भी यह बहुत अच्छा लगा।

उसके बाद मोना दीदी ने स्कूल में ही लाइब्रेरी के लिए एक जगह दिखायी। जगह देखकर हम मोना दीदी के घर गए। सभी ने भर-पेट खाना खाया। सभी को बहुत अच्छा लगा, बहुत मज़ा आया। हमने दीदी को धन्यवाद किया और अपने घर लौट आये। 


सोनम खातून
बैच- 10 (A), मुँगेर 



क्लस्टर मीटिंग का अनुभव और समस्याएँ

 प्रिय साथियों,

मैं आप सभी के साथ अपने क्लस्टर का अनुभव साझा करने जा रही हूँ। मेरे क्लस्टर का नाम पावर ऑफ एडु-लीडर्स है। हमने मीटिंग की शुरुआत मेडिटेशन से की। ज़ेबा दीदी, सुप्रिया दीदी और मैंने सांझा किया कि पिछ्ले महीने ऐसा कौन सा पल था, जिसे याद करके हमें खुद पर बहुत ज्यादा प्राउड (proud) फील हुआ। 

उसके बाद हम सभी ने एक-दूसरे से बढ़ते कदम शेयर किया। एक-दूसरे को फीडबैक देकर पिछले एजेंडा पर बातचीत करने लगे। पिछले महीने हमारा एजेंडा था कि हम 30 किशोरियों को पढ़ाई से जोड़ें,उनका नामांकन (enrolment) करवायें। 


सभी के अनुभव सुनकर निन्मलिखित चैलेंज निकल कर आये:

गाँव में वैसी लड़कियाँ नहीं मिली जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी।
बहुत सारी लड़कियों का आधार कार्ड नहीं बना है।
बहुत सारी लड़कियों का बैंक में अकाउंट नहीं बना है।
मुझे भी अपनी कम्युनिटी में एक भी ऐसी लड़की नहीं मिली जिसने पढ़ाई छोड़ दी हो लेकिन मुझे दूसरी समस्या का सामना करना पड़ा। मुझे 20-22 बच्चे ऐसे मिले जो आंगनवाड़ी भी नहीं जाते थे।
हमारे गाँवों में हम अपना एजेंडा कंप्लीट नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि लड़कियाँ मिल नहीं रही हैं। इसलिए हम लोग दूसरे गाँव जा रहे हैं पर इसके लिए हमें ऑटो के किराये की जरूरत है।
बहुत सारी लड़कियों की फाइनेंशियल कंडीशन अच्छी नहीं है, इस वजह से उनको पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
दो ऐसी लड़कियाँ भी मिली, जिनकी उम्र 15 से 18 साल है लेकिन उन्हें अपना नाम भी लिखना नहीं आता।  
बहुत लड़कियों के पास CLC ना होने की वजह से वो आगे की कक्षाओं में नामांकन नहीं करा पा रही हैं।

इन समस्याओं को जानने के बाद हमने अगले एजेंडा पर बात की। हमारा अगला एजेंडा है कि 30 लड़कियों का एनरोलमेंट करवाना। फिर हमने डीब्रीफ किया। अंत में हम सभी ने क्लस्टर फॉर्म भरे।

क्या अच्छा हो सकता था?

हमारे क्लस्टर में बहुत सदस्य ऐसे हैं जो क्लस्टर को सीरियस नहीं ले रहे हैं। जिस दिन मीटिंग होती है उसी दिन वह बताते हैं कि वह नहीं आने वाले हैं। बहुत सारी एडु-लीडर्स और बडी, टाइम पर क्लस्टर में मौजूद नहीं होती हैं।

क्या अच्छा हुआ?

उपस्थित सदस्यों ने अपना बढ़ते कदम अच्छे से शेयर किया।

सभी ने कम्युनिटी के चैलेंज शेयर किये।

सभी कोआपरेट (cooperate) कर रहे थे और सपोर्ट करने के लिए तक तत्पर थे। 


संध्या कुमारी
बैच- 10, तेघड़ा 


क्या आप सही में आगे पढ़ना चाहते हैं?

प्रिय साथियों, 

मैं और सत्यम स्वाति कम्युनिटी का एक छोटा सा अनुभव साझा करने जा रहें हैं। 

जैसा कि आप सभी को पता होगा कि हमारे क्लस्टर का गोल था वैसी 10 महिलाओं से मिलना जिन्होंने आठवीं कक्षा के पहले या बाद की पढ़ाई छोड़ दी है। उनसे बातचीत कर उन्हें आगे की पढ़ाई में उनकी मदद करना।

आज हम दोनों फिर 5 वैसी लड़कियों से मिले जिन्होंने आठवीं के बाद की पढ़ाई छोड़ दी है। उनसे बात करने पर पता चला कि उन्होंने अभी तक विद्यालय से त्याग पत्र नहीं लिया है। हम दोनों ने बोला कि आप स्कूल आओ, हम प्रधानाध्यापक सर से बात करके टी.सी. दिला देंगे। 

फिर हमने प्रवेश सम्बन्धी डाक्यूमेंट्स माँगे तो पता चला कि कुछ लड़कियों के पास पासपोर्ट साइज़ फोटो नहीं था। हम दोनों से उनसे फिर पूछा कि आप सही में आगे पढ़ना चाहते हैं न? 

कुछ ने तुरंत हाँ बोला और कुछ ने सोचकर बतायेंगें कहा।

हमने स्कूल जाकर प्रधानाध्यापक सर को ये सभी बातें बतायी। वो टी.सी. देने के लिए तैयार थे। हम दोनों आज के अपने प्रयास से बहुत खुश हुए और अपने घर लौट आये।

मौसम कुमारी, सत्यम स्वाति
बैच-9, जमुई


समझ ही नहीं आ रहा था कि हम कैसे रिएक्ट करें!

प्रिय साथियों, 

आप लोगों के साथ अपना कम्युनिटी विजिट का एक्सपीरियंस शेयर करना चाहती हूँ। हमारा दो महीनों का एजेंडा है कि वैसी किशोरी लड़कियाँ जो किसी वजह से स्कूल या कॉलेज नहीं जा पा रही हैं उनको स्कूल और कॉलेज से जोड़ना। 

हम लोग पहले दिन से ही इस काम में जुड़ चुके थे। सबसे पहले हम सभी ने यह सोचा कि यदि हम लोग अकेले-अकेले काम करेंगे तो फिर काम थोड़ा काम हो पाएगा। और यदि हम साथ में काम करेंगे तो काम ज्यादा होगा क्योंकि कहते हैं ना, एक से भले दो!

पिछली बार जब हम ज़ेबा के क्षेत्र में गए तो वहाँ हमें 14 लड़कियाँ वैसी मिली जो आगे पढ़ाई करना चाहती थी परन्तु किसी वजह से वह नहीं कर पायीं।

आज हम लोग संध्या के क्लस्टर में गए थे तो हमने बहुत सारी किशोरी लड़कियों से बातचीत की। सभी ने यही बताया कि हम अभी 10th में पढ़ रहे हैं, 12th में पढ़ रहे हैं। वहाँ पर जितनी भी लड़कियाँ थी सब पढ़ाई कर रही थी और लगभग दो घंटे घूमने के बाद भी हमें एक भी वैसी लड़की नहीं मिली जिसने पढ़ाई छोड़ दी हो। 

हमें समझ नहीं आ रहा था कि उस वक्त हम कैसे रिएक्ट करें!

बहुत खुशी हो रही थी कि सब पढ़ाई कर रही है। किसी को भी कोई प्रॉब्लम नहीं है। पर खुद के लिए बुरा लग रहा था कि पता नहीं एजेंडा कैसे कंप्लीट होगा? हम लोग किसी का हेल्प कर भी पाएंगे या नहीं?

फिर हम सभी एक टोले में गए, जहाँ पर बहुत सारे छोटे-छोटे बच्चे थे। जब हमने उनसे पूछा कि कोई ऐसी किशोरी लड़की है जिसने पढ़ाई छोड़ दी हो? उन्होंने बोला कि इस टोले में तो कोई ऐसी लड़की है ही नहीं। लेकिन हाँ, आंगनवाड़ी के कम से कम 20 बच्चे ऐसे हैं जो आंगनवाड़ी नहीं जाते हैं। 

फिर हम लोग उनसे बातचीत की कि आंगनवाड़ी क्यों नहीं जाते हैं? उन्होंने बताया कि आंगनवाड़ी सेविका बोलती है कि 40 बच्चे यहाँ पर हो गए हैं, इस वजह से हम और बच्चों को नहीं ले सकते हैं। 

हम लोगो ने सोचा कि अगर हम लोग किशोरी पर काम कर ही रहे हैं तो क्यों ना हम इन बच्चों के बारे में भी सोचे? तो हम लोग वहाँ की आंगनवाड़ी में गए। वहाँ की सेविका से बात की। वो भी यही बात बोल रही थी कि 40 बच्चे पूरे हो गये हैं, हम और बच्चों को नहीं ले सकते!

कुछ देर बात करने के बाद हमने सोचा कि हम यहाँ मिनी आंगनवाड़ी खोल सकते हैं। फिर हमने देखा कि वहाँ पर जगह बहुत ही छोटी थी और उसी रूम में खाना भी बनाया जाता था। खाना भी गैस पर नहीं बनाया जाता था, मिट्टी का चूल्हा था। 

हम सेविका से जानना चाह रहे थे कि हम लोग कैसे उन बच्चों को मदद कर सकते हैं? तो फिर वह बोली कि इसमें हम तो कुछ नहीं कर सकते हैं।

एक अजीब बात यह थी कि सेविका को हम पर भरोसा नहीं हो रहा था। शायद इसलिए क्योंकि वह हमें नहीं जानती थी। उन्होंने हमसे पूछा कि हमारी क्या पहचान हैं? हम कहाँ से आए हैं? हम कौन सी संस्था से हैं? वह संस्था किस क्षेत्र में काम कर रही है? 

हमें बहुत खुशी भी हो रही थी कि हम अपनी संस्था के बारे में किसी को बता रहे हैं। हम देख पा रहे थे कि उन्हें अभी भी हम पर विश्वास नहीं था। उन्होंने हमारा नंबर, हमारे एड्रेस, हमारा नाम, सब कुछ नोट किया। 

मुझे अन्दर से बहुत अच्छा महसूस हो रहा था कि हम अपनी कम्युनिटी के लिए कुछ कर पा रहे हैं। यह पहल उनके भविष्य को बदलेगी। हमने उन बच्चों के नाम की एक सूचि बनायी जो एडमिशन करवाना चाहते थे परन्तु आंगनवाड़ी ना होने की वजह से नहीं करवा पाए। उसके बाद फिर हम लोग अपने घर की ओर आ गए। 

धन्यवाद- संध्या दीदी, अंजली दीदी और ज़ेबा कि आपने मुझे अपने क्षेत्र में बुलाया, हम लोग के साथ आज पूरा टाइम बिताया। हमारे साथ कम्युनिटी गयी। आज अपने साथियों के बारे में भी हमें बहुत कुछ पता चला। 

सबसे बड़ा वाला धन्यवाद i-सक्षम संस्था को क्योंकि उन्होंने मुझ जैसी लड़कियों को जोड़ा जिससे आज हम आज अन्य लोगों की मदद कर पा रहे हैं।


सुप्रिया कुमारी
बैच- 10, तेघड़ा 


उन बच्चों के घर पर गये जो 10-15 दिनों से विद्यालय नहीं आ रहे थे

 नमस्ते साथियों,  

आशा करती हूँ कि आप अच्छे होंगें। मैं आप सभी के साथ फील्ड वर्क का अनुभव साझा कर रही हूँ। साथियों मेरा नाम अमृता है और आज सभी को कल के फील्ड वर्क का अनुभव साझा कर रही हूँ। कल प्रीति (मेरे गाँव की) और आरती (जो गोविंदपुर गाँव से है) हम तीनों अपने गाँव सुशीलनगर मे ही कम्युनिटी विजिट के लिए गये थे।

लास्ट क्लस्टर मीटिंग में बात हुई ही थी कि 13 जनवरी को हम सुशीलनगर में विजिट करने जायेंगे। हमारे दो एजेंडे थे। पहला ये कि “विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति को बढ़ाना है और दूसरा यह कि वैसे किशोर-किशोरियों से बात करना (जागरूक करना) और उन्हें नामांकन करने के लिए समझाना जिन्होंने किसी कारणवश पढ़ायी छोड दी है”। 

इसी एजेंडे को लेकर हमने बच्चो की उपस्थिति पर अभिभावकों से बात की और उन्हें प्रतिदिन विद्यालय भेजने के लिए समझाया।

साथियों, हम उन बच्चों के घर पर गए जो लगभग 10-15 दिनों से विद्यालय नहीं आ रहे थे और पढ़ने मे भी बहुत कम ध्यान देते थे। एक बच्चे के घर जाकर पता चला कि उसके मम्मी-पापा काम करने गये थे पर एक बड़ी बहन थी, मैंने उसे ही समझाया। प्रीति की कक्षा का भी एक बच्चा, पास में ही रहता था। हम उसके घर भी गए। उसकी दादी और मम्मी को समझाया।

लगभग सभी अभिभावक बोल रहे थे कि “हम तो काम करने चले जाते है। बच्चों को स्कूल जाने को बोलते हैं तो जाना नहीं चाहते”।

हम लोगो ने उन्हें उत्तर दिया कि अगर आपकी बात नहीं मानता है और आप काम करने चले जाते है तो हमें फोन करके बोल सकते है।

हमलोग खुद ही चले आएंगे और उन्हे समझा कर स्कूल ले जाने की कोशिश करेंगे। यह बात सुनकर बच्चों की माँ बहुत ही खुश हुई और बोली कि हाँ अब से कॉल कर दिया करेंगे।

फिर वो अपनी आर्थिक स्थिति के बारे बताने लगी। जिस पर हम लोगो ने संवेदना जतायी। हमने मिलकर उनको विश्वाश दिलाया कि उनका बच्चा वैसा जरूर बनेगा जो वो चाहते हैं। हम उन बच्चों पर जरूर ध्यान देंगे।


अमृता 
बैच- 10, बेगूसराय 


‘दरी’ के लिए आवाज़ उठायी

नमस्ते साथियों,

मैं आप सभी के साथ अपनी कक्षा का अनुभव शेयर करने जा रही हूँ। जनवरी माह की बढ़ती सर्दी को देखकर मैंने प्रधानाध्यापक सर से बच्चों के लिए दरी की व्यवस्था करने की माँग की (अपनी voice रखी)। 

मैंने उन्हें समझाया कि बच्चे जमीन पर बैठेगें तो ठंड में बीमार पड़ जाएंगे। सर ने बोला कि मैं विद्यालय कमिटी से दरी के बारे में जल्दी ही बात करता हूँ। दरी की व्यवस्था तो होनी चहिये। 

मैं फिर घर चली आयी। परन्तु दो दिन पहले जब मेरी कक्षा में दरी आयी, तो मुझे बहुत अच्छा लगा। मेरी बात सही थी और उसे सुनकर उस पर विचार किया गया, इस बात से मैं बहुत खुश थी। 

रीतु
बैच- 10, तेघड़ा 

दम है तो, “रुक कर दिखाओ”!

 प्रिय दोस्तों,

आज मैं आप सभी को अपना पर्सनल अनुभव साझा कर रही हूँ। 9 जनवरी की रात में, मैं मेडिकल से अपनी बहन के साथ आ रही थी।  तभी बीच रास्ते में तीन लड़के खड़े थे, मैंने हॉर्न बजाकर उन्हें हटाना चाहा। फिर भी वो रस्ते से नहीं हटे तो मैंने उन्हें बोला कि “हटो न! चोट लग जायेगी तो फिर मुझे ही बोलोगे”!

इतने में एक लड़का बोला, “दम है तो रुक कर दिखाओ! अभी तुम्हें तुम्हारी औकात दिखाता हूँ”! हम रुके और बोले आओ, रुक गए हैं। वो दौड़कर आया और बोला एक थप्पड़ मारूँगा न तो होश उड़ जायेगा। 

मैंने बोला कि तुम छू-कर तो दिखाओ। तुम्हारे हाथ-पैर यहीं पर तोड़ कर रख दूँगी। वहाँ मैंने अपनी वॉइस (voice) बुलंद रखी, ताकि सामने वाले व्यक्ति को यह नहीं पता चले कि हम उससे डर गए हैं।

फिर दूसरा लड़का दौड़ के आया और उसके कान में कुछ बोला। हमसे बोलने लगा कि दीदी गलती हो गयी है। हम इसको समझा देंगें। आप जाइये। इसको माफ़ कर दीजिये।

(रेफरेंस तस्वीर प्रियंका कुमारी की क्लासरूम से)

इस अनुभव से मुझे यह समझ आया कि समस्या चाहे कैसी भी हो, आप यदि गलत नहीं है तो आपको अपनी आवाज को बुलंद रखना चाहिए। कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा।

प्रियंका कुमारी
बैच-9, मुँगेर


एडु-लीडर की दृष्टि से, संस्था के रूप में...

 • हमें अपने साथियों का सहयोग करना और समाज की महिलाओं की मदद करनी चाहिए। विशेषकर वो महिलाएँ जो अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठा पाती हैं। सामाजिक, मानसिक और शारीरिक रूप से जिनका शोषण किया जाता है।
i-सक्षम के विज़न “voice & choice for every woman” को बरकरार रखना चाहिए।
सभी महिलाओं को एक एडु-लीडर के रूप में, एक-साथ मिलकर बच्चों और समाज के लिए कार्य करते रहना चाहिए। 
हम एक संस्था के रूप में जिस तरह महिलाओं को आगे बढ़ाने, सीखने और सिखाने का काम कर रहे हैं, उसे जारी रखना चाहिए।
हमें भेदभाव नहीं करना चाहिए, हमें एकता बनाकर रखनी चाहिए।
हम जब महिलाओं की मदद करने जायें तो वहाँ हमें सबको एक-बराबर मानकर आगे बढ़ाना चाहिए। ना कि हमें वहाँ जाति, रंग, रूप के आधार पर भेदभाव करके उनकी मदद करनी चाहिए।
जब हम साथ मिलकर काम करते हैं तो उस समय हमें अपनी साथी की बातों को नहीं काटना चाहिए और उसे पूरी तरह से सुनकर ही फिर कुछ बोलना चाहिए।
हम सभी महिलाओं और बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए एकजुट होकर काम कर रहे हैं, यह हमें याद रखना चाहिए।
i-सक्षम के माध्यम से हम एक एडु-लीडर के रूप में समाज कल्याण में अपना योगदान करना कर रहे हैं।
i-सक्षम एक ऐसी संस्था है जहाँ हमें सिखाते भी हैं और सीखते भी हैं। यहाँ सबसे पहले तो हम अपने अधिकारों के बारे में जानते हैं और अपनी voice and choice को पहचानते हैं। फिर हम अन्य महिलाओं को इसके बारे में बता पाते हैं।

ज़ीनत बानो 
बैच-10 (बी), मुँगेर

अब रिमझिम को बाहर आने-जाने से रोका नहीं जाता

प्रिय साथियों,

मैं आप सभी के साथ अपनी कम्युनिटी के एक अनुभव को साझा करना चाहती हूँ। मेरी कम्युनिटी में एक रिमझिम नाम की लड़की है, जो वर्तमान में बी.ए. कर रही हैं। उसे अंग्रेजी की कक्षा के लिए पहर्रम जाना था परन्तु उसके घरवाले उसे अकेले नहीं जाने देना चाहते थे।

कारण तो मैं पहले से जानती हूँ। इस कम्युनिटी में ऐसा ही होता है, यह इसलिए लिख रही हूँ क्योंकि मैं भी यहाँ से ही हूँ। यहाँ लड़की अकेले बाहर नहीं जा सकती। यदि किसी महत्वपूर्ण काम से या पढ़ने-लिखने जाना भी है तो घर के किसी सदस्य को साथ भेजते हैं। यही रीति चली आ रही है।

अपनी अंग्रेज़ी की कक्षा को लेकर रिमझिम बहुत सोच में थी। उसके परिवारजन भी उसे अकेले नहीं जाने देना चाहते थे। उसने अपनी पीड़ा मुझसे साझा की और मैंने उसकी मम्मी से बात करने का निर्णय लिया। 

उसकी मम्मी को समझाते हुए मैंने कहाँ कि आंटी अगर आप इसे पढ़ाना चाहते हैं तो अकेले भेजने में क्या समस्या है? 

उनकी चिंता थी कि अकेले कैसे जाएगी? कुछ हो गया तो? 

मैंने उन्हें समझाते हुए कहा कि आंटी आजकल तो बहुत सारी लड़कियाँ बाहर जाकर पढ़ती हैं। कोई मुँगेर, कोई पटना तो कोई दिल्ली जाकर पढ़ती है। आप इसे पढ़ने जाने दीजिये तभी आपका और इसके मन का भी डर निकलेगा। आगे पढ़ेगी, कुछ बनेगी, अच्छा करेगी तो आप ही का नाम रौशन होगा ना? 

मैंने आंटी को दो-तीन दिन समझाया। इसके उपरांत ही रिमझिम को एक साईकिल दिलायी गयी और वो अकेले पढ़ने जाने लगी। अब उसके परिवारजन उसे अकेले बाहर जाने देते हैं। वो एग्जाम भी अकेले ही देने जाती है। 

रिमझिम से बात करके पता चलता है कि “उसके अन्दर का डर निकल चुका है और वो बहुत खुश है कि वो सब काम खुद से ही कर लेती है। उसके मम्मी-पापा अब उसकी बात मानते हैं, वो कुछ भी बोलती है तो उसे सुना जाता है, उस पर विचार किया जाता है और पूरा भी किया जाता है। रिमझिम को कहीं जाने देने से रोका भी नहीं जाता”।

मुझे ख़ुशी है कि रिमझिम को फ्रीडम (freedom) मिली और उसकी Voice & Choice को सुना जा रहा है। 

सपना
टीम सदस्य, मुँगेर 


I-सक्षम संस्था एवं Voice & Choice

 प्रिय दोस्तों,

मैं आप सभी के साथ voice and choice का अनुभव साझा करने जा रही हूँ। मैं, आप सभी को बताना चाहूँगी कि i–सक्षम की ओर से हर साल टीम को कहीं न कहीं ट्रिप (trip) पर ले जाया जाता है। ताकि हमलोग गुरजने वाले साल को मजेदार और यादगार तरीके से विदा कर सकें।

हर साल की भांति इस साल भी हम सभी को i-सक्षम की ओर से घूमने जाने का मौका मिला। पहले हम सभी से पूछा गया कि आप लोग क्लस्टर ग्रुप से जाना चाहते हैं या i-सक्षम की पूरी टीम के साथ जाना चाहते हैं तो हम सभी के कहे अनुसार टीम ने एक साथ घूमने जाने का तय किया।

सभी लोग अपना तर्क-वितर्क रख रहे थे। कोई राजगीर जाने के लिए बोल रहा था तो कोई पटना म्यूजियम तो कोई बोल रहा था कि मंदार पर्वत जाना है। पर सबसे ज्यादा लोग मंदार पर्वत को मिली। दीदी भी बोली कि ठीक है, हम सभी मंदार पर्वत ही चलेंगे।

मैं बहुत ज्यादा खुश हुई क्योंकि हम सभी के विचार-विमर्श से निकल कर आया कि मंदार पर्वत घूमने जाएंगे। फिर कुछ दिन बाद एक कॉल रखा गया और हमें बताया गया कि हम लोगों को मंदार पर्वत नहीं बल्कि कुप्पाघाट जाना हैं।

साक्षी दीदी सभी से पूछ रही थी कि किस-किस को कुप्पाघाट जाना है? मैंने उसमें अपनी राय देते हुए अपना पक्ष रखा कि मुझे कुप्पाघाट नहीं जाना है, “मुझे मंदार पर्वत जाना है”। 

साक्षी दीदी ने मुझे बहुत समझाया। आप तो जिद करके बैठ गयी हैं!

क्या आपको मंदार पर्वत ही जाना है?

साक्षी दीदी के द्वारा समझाए जाने के बाद भी मैं अपनी बातों पर अड़ी रही। मेरा कहना था कि जाएंगे तो मंदार पर्वत ही जाएंगे! नहीं तो कहीं नहीं!

उसी शाम को मेरी बड़ी नाज़िया दीदी की कॉल आया। उन्होंने मुझे समझाने के लिए ही कॉल किया था। वो बहुत प्यार से मुझे समझा रही थी और मुझे जिद ना करने की सलाह भी दे रही थी। वो बोल रही थी कि हम सभी एक टीम हैं, 150 एडु-लीडर्स की जिम्मेदारी हम लोगो पर है। 

उन्हें उत्तर देते हुए मैंने कहा कि मेरी समझ के अनुसार तो i-सक्षम Voice & Choice for every women पर काम कर रही है। लेकिन यहाँ तो उल्टा ही हो रहा है। मेरी ही बातों को दबाया जा रहा है। और जब टीम मेम्बेर्स की बातों को दबाया जा रहा है तो फिर हमारी संस्था Voice & Choice पर काम कर ही क्यों रही हैं? 

ये सब बात मेरी, नाज़िया दीदी से हो रही थी। नाज़िया दीदी ने मुझे बहुत समझाया। फिर भी मैं अपनी बात पर अड़ी रही। 

अगले दिन हमारी क्लस्टर मीटिंग थी। मीटिंग समाप्त होने के बाद जब हम घर पहुँचे तो मेसेज से पता चला कि हम सभी कुप्पाघाट नहीं, मंदार पर्वत जा रहे हैं। मुझे यह सुनकर बहुत ख़ुशी हुई कि voice को सुना गया और उसे ही choose किया गया।


इस लेख के माध्यम से मैं, i-सक्षम संस्था की सम्पूर्ण टीम को मेरी voice सुनने के लिए आभार व्यक्त करना चाहती हूँ।

सरिता कुमारी 
बैच- 9, मुँगेर


i-सक्षम बेगूसराय ऑफिस के डेस्क से- तनुज

किसी ने बहुत खूब कहा है कि “किसी भी किताब को उसके पहले पन्ने से जज (judge) नहीं करना चाहिए”!

मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, 5 दिसंबर 2022 को मैंने बेगूसराय में i-सक्षम ऑफिस की बुनियाद के साथ अपना मन और कदम दोनों रखे। ऐसा नहीं है कि मैं पहली बार बेगूसराय आ रहा था, पर जानता था कि अब मेरा एक घर (i-सक्षम ऑफिस) बेगूसराय भी होगा।

आने से पहले मैंने बेगूसराय के बारे में कुछ नकारात्मक बातें सुनी थी, जिसे कहीं न कहीं मेरे मन में घबराहट थी। परन्तु एक वर्ष यहाँ रहकर मैं बोल सकता हूँ कि मेरा अनुभव पूरी तरह से विपरीत निकला। यहाँ के लोग बहुत विनम्र और सहयोगी स्वभाव के हैं, जिनसे हमेशा सहयोग मिला है, चाहे कोई ग्रामीण हो या कोई सरकारी पदाधिकारी! सभी ने फ़ेलोशिप प्रोग्राम को शुरू करने में काफी मदद की है और ये बदलाव और उन्नति चाहते हैं, जो शिक्षा और महिलाओं को हर क्षेत्र में सशक्त करने से ही संभव होगा।

पिछले एक साल में, मैं यहाँ के युवाओं के साथ काम कर, उनको समझ पाया हूँ। मैंने पाया है कि उनमें बहुत ऊर्जा है। जिसे उचित दिशा देने की आवश्यकता है और फिर वे खुद से ही अपनी मंजिल तक पहुँच पाने में सक्षम होंगे। जिसके लिए एक साल से i-सक्षम की पूरी टीम दिन-रात कार्य कर रही है और मैं मानता हूँ कि हम इसमें शत-प्रतिशत सफल भी हो रहे हैं।

वर्तमान में हम बेगूसराय के दो प्रखंड- तेघड़ा और बेगूसराय सदर में हमारे फ्लैगशिप प्रोग्राम ‘फ़ेलोशिप’ को संचालित कर रहे हैं। जिसमें कुल 53 एडु-लीडर्स (फेलो) हैं।

बेगूसराय में, इस वर्ष एक और नए बैच की शुरुआत करना हमारी योजना रहेगी। वर्तमान में जुड़े एडु-लीडर्स तथा सम्बन्धी जनों (दोस्तों, शिक्षकों, आंगनवाड़ी दीदियों, प्रधानाध्यापकों, पंचायत सदस्यों एवं ब्लॉक के पदाधिकारियों) से अधिक से अधिक एडु-लीडर्स को फॉर्म भरने के लिए प्रेरित करने का अनुरोध करता हूँ।

मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी भी महसूस हो रही है और गर्व भी हो रहा है कि हमारे यहाँ से दो एडु-लीडर्स (ज़ेबा और आरती) APU के लिए चयनित हुई हैं। आने वाले समय में, मैं और अधिक एडु-लीडर्स को हायर स्टडीज (higher studies) के लिए बाहर जाने के लिए कमर कसते हुए देख पा रहा हूँ। राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ जी कि ‘कृष्ण की चेतावनी’ की कुछ पंक्तियों के साथ अपने यहाँ तक के सफ़र को विराम देना चाहूँगा।

मैत्री की राह बताने को,

सबको सुमार्ग पर लाने को,

दुर्योधन को समझाने को,

भीषण विध्वंस बचाने को,

भगवान् हस्तिनापुर आये,

पांडव का संदेशा लाये।

तनुज
टीम सदस्य, बेगूसराय



Thursday, January 18, 2024

Reflection of Book कर्ट वॉनेगट

कर्ट वॉनेगट, अमेरिकी लेखक थे। अपने 50 वर्ष के जीवन में उन्होंने 14 किताबें लिखी। विश्व युद्ध द्वितीय में इन्हें जर्मन सेना द्वारा हिरासत में ले लिया गया था और यातनागृह में डाल दिया गया था। इस अनुभव का इनके जीवन और लेखनी पर गहरा प्रभाव पड़ा। इनकी सबसे महत्वपूर्ण किताब Slaughterhouse Five जो युद्ध के खिलाफ थी, वियतनाम युद्ध के दौरान युद्ध विरोधी आंदोलनकारियों के बीच काफी लोकप्रिय हुई। आज, इनके द्वारा ज़ेवियर हाई स्कूल के विद्यार्थियों को लिखी एक चिट्ठी आपके साथ साझा कर रहा हूँ। 

Make your soul grow- अपनी आत्मा का विकास करें (कर्ट वॉनेगट)

नवंबर 5, 2006 

प्रिय ज़ेवियर हाई स्कूल के विद्यार्थियों और प्रिन्सपल मिस लोककवूड एवं अन्य शिक्षकों।  आपकी चिट्ठियों ने 84 वर्षीय एक बुजुर्ग व्यक्ति मे जोश भर दिया। 

बच्चों, मैं आज आपको जो कहने जा रहा हूँ वो बहुत समय नहीं लेगा। किसी भी तरह के आर्ट का अभ्यास करें चाहे वो नाचना हो या फिर लिखना, या फिर पेंटिंग, या संगीत, या नाटक, मूर्ति बनाना या कुछ और।

फर्क नहीं पड़ता आप इसे कितने अच्छे से कर रहें हैं, महत्वपूर्ण है कि आप इसे बार-बार कर रहे हैं। यह भी ध्यान हो कि आप यह पैसे कमाने के लिए नहीं कर रहे, पर इसलिए क्योंकि आप स्वयं को कुछ नया बनते, अनुभव करना चाहते हैं, आप पहचानना चाहते हैं कि आपके अंदर क्या है? जो छुपा था अब तक!  

इसलिए क्योंकि आप अपनी आत्मा का विकास करना चाहते हैं।

मैं बहुत गंभीर हूँ, जब मैं यह कहता हूँ कि आप आज से ही एक कला का अभ्यास शुरू करें। आप अपनी प्रिन्सपल मिस लोककवूड की तस्वीर बनाने के अभ्यास से शुरू कर सकते हैं। आप इसे बनाएं और उन्हें दें। स्कूल से वापस नाचते हुए जाएँ और नहाते समय जोर-जोर से गायें। आलुओ मे अपनी तस्वीर बनाएं, सोचें कि आप एक बहुत अछे पेंटर है। 

चलिए, आज के लिए आपसे एक होमवर्क साझा करता हूँ, और आशा करता हूँ कि प्रिन्सपल मिस लोककवूड आपको दंड दे अगर आपने यह नहीं किया।

एक 6 लाइन की कविता बनाएं- बस ध्यान रहे इस कविता को rhyme करना चाहिए।

जैसे- एक आलू है बड़ा,

ठेले किनारे यूं तना खड़ा।

शर्त है कि आप इसे जोर-जोर से गायें, किसी को इसे दिखाने की जरूरत नहीं। न तो अपने माता-पिता को न भाई-बहन और न ही किसी साथी को। एक बार जब आप जोर-जोर से इसे गा लें तो जिस कागज पर यह कविता लिखी हो उसे छोटे-छोटे टुकड़ों मे फाड़ हवा मे उड़ा दें। मेरा विश्वास है कि आप स्वयं को कुछ नया बनते अनुभव करेंगे, आप जान सकेंगे कि आपके अंदर क्या क्षमता है और आप अपनी आत्मा का विकास होते देखेंगे।

मेरे एक चाचा थे, जिन्हें लोगों के बारे मे एक बात पसंद न थी। उनका कहना था कि हम शायद ही कभी रुक कर यह ध्यान देते हैं कि इस पल, इस क्षण मे मैं खुश हूँ। इसलिए कभी-कभी जब हम परिवार के साथ बैठ मजे से खा-पी रहे होते थे और एक अच्छा समय बीता रहा होता है, तो वो हमें रोक कर कहते  रुको, और ध्यान दो कि अगर यह अच्छा नहीं है तो फिर क्या है जिसे अच्छा कह सकते हैं?”

और वह यह हमेशा करते थे। मुझे विश्वास है कि आप भी यह करेंगे और जब भी कभी ऐसे मौके आए जब आप खुश है तो आप रुक कर उस पल को जरूर जियेंगे।  

एक बार आप सभी सोचें, आपके पूरे शिक्षण अनुभवों मे चाहे वो विद्यालय रहा हो या कॉलेज या कोई और जगह, जब आपको कोई एक शिक्षक मिले हो, जिन्होंने आपको इस जीवन के लिए गर्व महसूस करने का मौका दिया हो। जिन्होंने आपको अनेकों खुशियों के मौके दिए हों। जिन्होंने आपको अपने ऊपर विश्वास करने का मौका दिया हो। उस शिक्षक का ध्यान करें और उनका नाम जोर से बोलें। अब सोचें  अगर यह अच्छा नहीं है तो फिर क्या है जिसे अच्छा कह सकते हैं?”

श्रवण

टीम सदस्य

तोत्तो-चान से दोबारा मुलाकात- पुस्तक सारांश

साथियों, इस महीने की शुरुआत में मैंने अपने लिए तोत्तो-चान किताब पढने का लक्ष्य रखा था। हमने जबसे फेलोशिप यात्रा की शुरुआत की है, तबसे ही तोत्तो-चान पढना एडू-लीडर्स के लिए एक महत्वपूर्ण अनुभव रहा है। इस बार मैंने सोचा कि फिर से इस किताब को पढूँ। तोत्तो-चान द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत में जापान की कहानी है। यह एक वास्तविक आत्म कथा है। 

तोत्तो-चान एक ऐसी बच्ची है, जिसे उसकी उत्सुकता के कारण विद्यालय से निकाल दिया गया और अब वो एक नए विद्यालय तोंमोए मे दाखिल हुई। देखने में इस विद्यालय का नाम अर्धविराम के चिन्ह सा दिखता था, जिसका जापानी मतलब शरीर व मस्तिष्क का समान विकास होता है। 

अपने परिवार की इकलौती बच्ची तोत्तो-चान के माता-पिता एक बेटा चाहते थे, और तोत्तो-चान का उसका असली नाम भी तेतसूकों-चान था, जहाँ चान किसी भी लड़की के नाम से जुड़ा होता था। पर तोत्तो को तेतसूकों चान सुनने मे तोत्तो चान ही लगता था, और वो सबको अपना नाम यही बताती। 

तोत्तो-चान के विद्यालय  तोंमोए में पढने और पढाने का ढंग निराला था। कक्षाएं रेल की बोगी सी थी और हर समय के अनेकों गीत थे। जिसमें कुछ पहाड़ से कुछ समुद्र से जाते समय गाया जाने वाला गीत भी था।

सुनने मे तो यह गीत सा लगता है, पर यह बच्चों को पहाड़ और समुद्र से मिलने वाले पौष्टिक खाने की ओर ले जाता था। मुझे तो यह किताब पढ कर बहुत मजा आया। साथ ही मैं इस कहानी में छुपी एक मुख्य बात से भी खुद को जोड़ पाया जो इस बात पर जोर देती है कि बच्चों की क्षमताओं पर यकीन करना बहुत जरूरी है। 
 

इस किताब की अनेकों अंश मुझे बहुत अच्छे लगे, और मैं इसे पढते समय इनके नाम लिखता गया। विद्यालय से निकाला जाना, डिब्बे वाला विद्यालय, पढाने का तरीका, सैर... यह लिखते-लिखते लिस्ट लंबी होती गई। इनमें से एक अनुभव को वापस डालना मुझे सबसे ज्यादा पसंद आया। 

कहानी कुछ ऐसी है जो हम सभी ने अनुभव की है। तोत्तो-चान का बटुआ नाले मे गिर जाता है। वो इस बटुए को ढूँढने के लिए नाले मे एक लकड़ी की मदद से सारा कचरा निकालना शुरू कर देती है। उसके पास कचरे का एक बड़ा ढेर लग जाता है। कुछ देर मे प्रिन्सपल सोशकू उधर से गुजरते हैं। अपने जीवन मे जब हम छोटे थे हमेशा बड़ों से "यह सही नहीं, वो सही" कहते सुना। 

और जब खुद बड़े हुए, खुद को भी बच्चों को "यह सही नहीं, वो सही" कहने से रोक न पाने की आदत से लड़ते पाया। पर इस विद्यालय में यही तो अलग था। 

प्रिन्सपल सोशकू ने तोत्तो-चान से यह सब नहीं कहा। उन्होंने न तोत्तो-चान को टोका, न गंदे नाले से जूझते देख डाँटा। उन्होंने सिर्फ एक बात कही "जब तुम्हारा काम खत्म हो जाएगा तो तुम वापस से यह कचरा नाले मे डाल दोगी ना!" 

यह कह वो आगे बढ गए। तोत्तो-चान को पहली बार लगा कि किसी बड़े ने उसपर इतना भरोसा किया है। उसने पूरी मेहनत से अपना बटुआ ढूंढा पर वो न मिला। अंत मे उसने जैसा वादा किया था वही किया और पूरा कचरा वापस से नाले मे डाल दिया। 

यह अनुभव बहुत महत्वपूर्ण है। यह एक सीख देता है कि हमें बच्चों और उनके प्रयासों के आकलन से परे हट उनपर विश्वास दिखाना चाहिए। मैं आप सभी साथियों को भी यह किताब पढने का और तोतो-चान से जुड़ने के लिए आग्रह करता हूँ।  इसे पढ़ें और अपनी पसंद की कोई एक कहानी हमसे साझा करें।

श्रवण 
टीम सदस्य 

सावित्रीबाई फुले, जिन्होंने भारत में पहली बार स्त्रियों के लिए विद्यालय खोला

सावित्रीबाई फुले का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले में 3 जनवरी 1831 को हुआ था। इनके पिता जी का नाम खन्दोजी नेवसे और माता जी का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 9 साल की उम्र में ज्योतिराव फुले से हो गया था। सावित्रीबाई बचपन से ही गलत के खिलाफ अपनी आवाज उठाती रहती थीं, उनको पढ़ने-लिखने का भी शौक था। इसी लगन को देखते हुए ज्योतिराव फुले ने उनको आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर महिलाओं के अधिकार एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए, साथ ही में उनको मराठी काव्य का अग्रदूत भी माना जाता है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सावित्रीबाई फुले ने जनवरी 1848 को महाराष्ट्र के पुणे जिले में लड़कियों के लिए देश के पहले बालिका स्कूल की स्थापना की। यह बड़ा काम इसलिए था क्योंकि उस दौर में लड़कियों के लिए स्कूल खोलना इतना आसान नहीं था।

 

सावित्रीबाई और उनके पति के इस काम को समाज के लोगों ने अच्छा नहीं समझा और जमकर विरोध किया, जो उस वक्त लड़कियों की शिक्षा के खिलाफ थे। जब सावित्रीबाई स्कूल जाती थीं तो लोग उनको पत्थर से मारते थे, उन पर गंदगी फेंकते थे।

 

सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थी और स्कूल पहुंच कर गंदी हुई साड़ी बदल लेती थी। उन्होंने समाज के बहुत ताने भी सुने।

 

उनके पहले स्कूल में विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं का नामांकन था। एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पांच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। तत्कालीन सरकार ने इन्हे सम्मानित भी किया। एक महिला प्रिंसिपल के लिये सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती।

 

आज से 175 साल पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था, आप सोच कर देखिये कि कितनी सामाजिक मुश्किलों से खोला गया होगा- देश में एक अकेला बालिका विद्यालय

 

लेकिन वह उन चीजों से कभी नहीं रुकीं और उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले और अठारहवां स्कूल भी पुणे में खोला गया।


जब लोगों को लगा कि इन सब चीजों से वह रुकने वाली नहीं हैं तो तब ज्योतिराव के पिता गोविंदराव पर यह कहकर दबाव डाला गया कि ज्योतिराव और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले धर्म के खिलाफ काम कर रहे हैं और इससे उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा सकता है।

तब ज्योतिराव के पिता ने दोनों को समझाने की कोशिश की लेकिन जब वह नहीं माने तो उन दोनों को घर से निकाल दिया। इसके बाद भी समाज की उन्नति और लड़कियों को पढ़ाने का कार्य उन्होंने नहीं छोड़ा।


फुले दंपति ने महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए कई सराहनीय कार्य किए। उस समय विधवा महिलाओं के सिर मुंडवा दिए जाते थे, गर्भवती विधवा महिलाओं का समाज से बहिष्कार कर दिया जाता था।

बाल विवाह, सती प्रथा, छुआ छूत, दलित उत्थान और न जाने कितनी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ दोनों पति पत्नी लड़े और महिलाओं के लिए कई कार्य किए। ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने गर्भवती महिलाओं के लिए बालहत्या प्रतिबंधक गृह भी खोला। यह ऐसी गर्भवती महिलाओं का घर था, जिनको समाज में प्रताड़ित किया जाता था। यहां बच्चों को शिक्षा और उज्जवल भविष्य दिया जाता था।

 

एक बार सावित्रीबाई ने आत्महत्या करने जा रही एक विधवा महिला काशीबाई को रोका और उससे वादा किया कि बच्चा होने के बाद वह उस बच्चे को अपना नाम देंगे। जब महिला ने उस बच्चे को जन्म दिया तो फुले दंपति ने बच्चे को अपना नाम (यशवंतराव फुले) देकर परवरिश की और पढ़ा-लिखाकर डॉक्टर बनाया।

 

विद्या को श्रेष्ठ धन बताते हुए सावित्रीबाई अपने काव्य में कहती हैं-

विद्या ही सर्वश्रेष्ठ धन है

सभी धन-दौलत से

जिसके पास है ज्ञान का भंडार

है वो ज्ञानी जनता की नज़रो में

अपने एक अन्य बालगीत में बच्चों को समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देते हुए कहती है-

काम जो आज करना है, उसे करें तत्काल

दोपहर में जो कार्य करना है, उसे अभी कर लो

पल भर के बाद का सारा कार्य इसी पल कर लो

काम पूरा हुआ या नहीं

न पूछे मौत आने से पूर्व कभी

 

आप इस लेख में चॉइस एंड वौइस् को कैसे देख पा रहें है? क्लस्टर मीटिंग में 5 मिनट का समय निकालकर इस पर चर्चा करें और अपने साथियों के विचार सुने।

 

प्रियंका कौशिक

टीम, i-सक्षम

हिन्दी वर्तनी से संबंधित ध्यान देने योग्य बिंदु

बिंदु और चंद्रबिंदु में अंतर और इनका प्रयोग

हिंदी भाषा सरलतम भाषाओं में से एक है, परन्तु इसके कुछ पहलुओं को लेकर हमारे मन में दुविधा की स्थिति बनी रहती है। ऐसी ही दुविधा का विषय है ये प्रश्न कि आखिर शब्द में कहाँ बिंदु लगेगा और कहाँ चंद्रबिंदु? जैसे- ‘हंस’ और ‘हँस’ में बिंदु के प्रयोग से अर्थ ही बदल गया है।

आमतौर पर इसे बिंदु और चंद्रबिंदु कहते हैं, लेकिन व्याकरण की भाषा में इसे अनुस्वार और अनुनासिक कहा जाता है। इस लेख के माध्यम से आज हम कुछ आसान उपायों से यह समझने की कोशिश करेंगे कि कहाँ अनुस्वार या बिंदु का प्रयोग होता है और कहाँ अनुनासिक यानी चंद्रबिंदु का।

अनुस्वार या बिंदु

अनुस्वार जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, अनुस्वार स्वर का अनुसरण करने वाला व्यंजन। इसके उच्चारण के समय नाक का उपयोग होता है। उच्चारण के समय वो व्यंजन वर्ण उच्चारित होता है, जो अनुस्वार या बिंदु की तरह लिखा गया हो। अनुस्वार को समझने के लिए हमें सबसे पहले हिंदी वर्णमाला के वर्ग को समझना होगा। हिंदी वर्णमाला के पांच वर्ग हैं और प्रत्येक वर्ग के पांचवें वर्णों के समूह को ‘पंचमाक्षर' कहते हैं (पञ्चमाक्षर = पञ्चम अक्षर = पाँचवाँ अक्षर)

इस प्रकार क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग और प वर्ग के पाँचवे वर्ण को पंचमाक्षर कहा जाता है जो क्रमशः ङ, , , न तथा म हैं।

·       कवर्ग के साथ (ङ) अङ्क = अंक, अङ्ग = अंग; दिनाङ्क = दिनांक;

·       च-वर्ग के साथ (ञ) पञ्च = पंच, झञ्झट = झंझट;

·       ट-वर्ग के साथ (ण) घण्टा = घंटा, कण्ठ = कंठ, मण्डी = मंडी;

·       त-वर्ग के साथ (न्) हिन्दी = हिंदी, अन्धा = अंधा, किष्किन्धा = किष्किंधा;

·       प-वर्ग के साथ (म्) कम्पन = कंपन, अम्बा = अंबा, आरम्भ = आरंभ;

नोट-

1. अनुस्वार के बाद आने वाला वर्ण, क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग और प वर्ग में जिस वर्ग से संबंधित होता है अनुस्वार उसी वर्ग के पंचम वर्ण के लिए प्रयुक्त होता है।

जैसे- कंधा शब्द में के ऊपर लगा है और उसके बाद है- , जो कि त वर्ग में आने वाला अक्षर है। इसलिए जब हम कंधा शब्द को पंचम वर्ण के साथ लिखना चाहें तो वहां त वर्ग के लिए पंचम वर्ण यानी ‘न’ का प्रयोग होगा और उसे लिखा जाएगा- "कन्धा"

इसी तरह अगर शब्द हो मंगल को अनुस्वार के ऊपर और उसके बाद आ रहा है ग, जो कि क वर्ग का अक्षर है, तो जब इसे पंचम अक्षर के साथ लिखना होगा तब क वर्ग का पांचवां वर्ण यानी '' का प्रयोग होगा और उसे लिखा जाएगा 'ङ्ग'

2. यदि पंचम वर्ण के बाद किसी दूसरे वर्ग का कोई पंचम वर्ण आए तो अनुस्वार नहीं लगेगा, बल्कि पंचम वर्ण ही लगता है।

जैसे- वाड़्मय को वांमय, तन्मय को तंमय, उन्मुख को उंमुख नहीं लिखा जा सकता।

3. इसी तरह अगर कोई पंचम वर्ण किसी शब्द में तुरंत ही दोबारा आ रहा हो तो भी अनुस्वार का प्रयोग नहीं होगा। जैसे- चम्मच को चंमच, उन्नति को उंनति, अक्षुण्ण को अक्षुंण नहीं लिखा जा सकता।

जैसे—वाङ्मय, जन्म, निम्न, मृण्मय आदि।

4. अनुस्वार के बाद अगर , ,,,,ष,स, वर्ण आते हैं यानी कि ऐसे वर्ण जो किसी वर्ग में शामिल नही हैं तो अनुस्वार को बिंदु के रूप में ही प्रयोग किया जाता है और उसे किसी वर्ण में नहीं बदला जाता।

जैसे- संयम, संशय, संरक्षण, संवाद और संसार। यहां अनुस्वार के बाद य अक्षर है, जो किसी वर्ग के अंतर्गत नहीं आता इसलिए यहां बिंदु ही लगेगा।

5. व्याकरण के अनुसार यदि किसी शब्द में दो अर्द्ध-अनुनासिक लगातार आ रहे हों, तो उसमें एक के लिए बिंदु और दूसरे के लिए अर्द्धवर्ण का उपयोग व्याकरण सम्मत नहीं है। व्याकरण कहता है कि दोनों नासिक्य को वर्ण रूप में ही लिखेंगे, मात्रा रूप में नहीं। इसी नियम के तहत ‘संबन्ध’ या ‘सम्बंध’ लिखना अशुद्ध है, इसे या तो ‘संबंध’ लिखेंगे या ‘सम्बन्ध’। वैसे ही ‘पञ्चाङ्ग’ या ‘पंचांग’ लिखना शुद्ध है।

दोस्तों के समूह में चर्चा योग्य:

1.       क्या हां, यहां, वहां, चांद, पांच, हूं, गांव आदि शब्द सही हैं? या हाँ, यहाँ, वहाँ, चाँद, पाँच, हूँ, गाँव सही हैं?

2.       हिन्दी वर्तनी में सन्यासी, संन्यासी और सन्न्यासी में से कौन सा शुद्ध रूप है?

प्रियङ्का कौशिक
टीम, i-सक्षम