Friday, April 10, 2026

चार साल की चुप्पी, एक शराबी रिश्ता और वो 'ना'

 “अगर मैं ‘ना’ कहूँ, तो क्या मेरी बात सुनी जाएगी?”

तारापुर की रहने वाली फलक के मन में यह सवाल पिछले चार साल से था। 12वीं की परीक्षा के बाद ही उसकी सहमति के बिना उसकी शादी तय कर दी गई थी। फलक को पता चला कि जिस लड़के से रिश्ता जुड़ा है, उसे शराब की लत है, फिर भी वह चुप रही। उसे लगा कि घर के बड़े जो तय करते हैं, उसे मानना ही उसकी नियति है। वह बी.ए. पार्ट-2 की छात्रा थी, पर अपने ही भविष्य के फैसले में उसकी कोई हिस्सेदारी नहीं थी।

मेरा नाम अरज़ू है और मैं i-Saksham में एक कोच (बडी) हूँ। जब मैं फलक से मिली और उसने अपनी परेशानी बताई, तो मेरा पहला मन हुआ कि उसे तुरंत कहूँ कि इस शादी को मना कर दे। लेकिन मैंने खुद को रोका। मुझे याद आया कि हमारी ट्रेनिंग में सिखाया गया था कि नेतृत्व का मतलब दूसरों को निर्देश देना नहीं, बल्कि उनकी सोच को दिशा देना है।

मैंने फलक को सलाह देने के बजाय i-Saksham की ट्रेनिंग में सीखी गई कोचिंग प्रक्रिया का इस्तेमाल किया और उससे कुछ सीधे सवाल पूछे:  

  • “जब तुम्हारी शादी तय हुई, उस समय तुम्हारे मन में कौन-सा डर सबसे बड़ा था?”
  • “तुम पढ़ाई क्यों जारी रखना चाहती हो—सिर्फ डिग्री के लिए या अपने फैसलों में हिस्सेदारी के लिए?”
  • “अगर तुम चुप रहती हो, तो पाँच साल बाद तुम खुद को किस जगह देखती हो?”
  • “तुम्हारी सहमति का तुम्हारे लिए क्या अर्थ है?”
  • “क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारी चुप्पी तुम्हारी सुरक्षा है या तुम्हारी सीमाएँ तय कर रही है?”

इन सवालों के बाद फलक ने खुद अपनी स्थिति और अपनी चुप्पी के नतीजों के बारे में सोचना शुरू किया।


इसके बाद मैं फलक के घर गई। 
वहाँ मैंने माता-पिता से कोई बहस नहीं की, बल्कि 'सक्रिय श्रवण' (Active Listening) के कौशल का उपयोग करते हुए उनसे भी कुछ सवाल पूछे:  

  • “आप फलक को आगे पढ़ते हुए कहाँ देखना चाहते हैं?”
  • “अगर उसकी सहमति के बिना फैसला होगा, तो क्या वह उस रिश्ते को दिल से स्वीकार कर पाएगी?”
  • “क्या हम यह मान सकते हैं कि उसकी पढ़ाई पूरी होने तक निर्णय टालना परिवार के लिए बेहतर हो सकता है?”

इन सवालों ने परिवार को सोचने का मौका दिया। 20 जनवरी 2026 को फलक ने पहली बार अपने माता-पिता के सामने साफ़ शब्दों में कहा कि वह अभी शादी नहीं करना चाहती और अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है।

इस बातचीत का सीधा असर हुआ। परिवार ने वह रिश्ता रोक दिया और यह तय किया कि आगे से फलक की मर्जी के बिना उसकी ज़िंदगी का कोई फैसला नहीं लिया जाएगा।

उस दिन मैंने सीखा कि एक लीडर के रूप में मेरा सबसे प्रभावी काम सही समय पर सही सवाल पूछना है। जब हम समाधान थोपते नहीं हैं, तो सामने वाला अपनी हिम्मत खुद ढूँढ लेता है। अब मेरा संकल्प है—जवाब देने से पहले एक मज़बूत सवाल पूछना।  


लेखिका परिचय:

  • नाम: अरज़ू खातून

  • परिचय: अरज़ू जमुई के बनपुर गाँव की रहने वाली हैं 

  • i-Saksham से जुड़ाव: अरज़ू ने अपना ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद i-Saksham के साथ अपनी नेतृत्व यात्रा शुरू की और वर्तमान मे i-Saksham मे buddy के रूप मे कार्यरत है।

  • लक्ष्य: अरज़ू भविष्य में सहायक शिक्षा विभाग अधिकारी (Assistant Education Department Officer) बनकर समाज में बदलाव लाना चाहती हैं।

Friday, April 3, 2026

लोग क्या कहेंगे

“जाओ घर का काम करो, दिन भर खेलती ही रहती हो!”

यह आवाज़ मैदान के एक कोने से आई, जब हमारी एक किशोरी खेल के बीच में खड़ी थी। वह झिझक कर रुक गई। लेकिन उससे पहले कि मैं (अंशु) कुछ कहती, पास खड़ी दूसरी महिलाओं ने टोक दिया— “भले ही दिन भर खेलती होगी, लेकिन ऐसा मौका बार-बार नहीं आता। आज उसे खेलने दीजिए, घर का काम बाद में भी हो जाएगा।”

मेरा नाम अंशु कुमारी है और मैं बेगूसराय के अम्बा गाँव की एडू-लीडर हूँ। यह घटना 'किशोरी उत्सव' के दौरान हुई, जिसका आयोजन मैंने और मेरी साथी संगीता ने मिलकर गाँव के नवीन स्कूल के मैदान में किया था।

हमारा उद्देश्य किशोरियों को एक ऐसा सुरक्षित और सकारात्मक माहौल देना था, जहाँ वे बिना किसी डर के खुलकर अपनी क्षमताओं को दिखा सकें।

समस्या यह थी कि गाँव की लड़कियाँ सार्वजनिक मैदान में खेलने से झिझक रही थीं। उन्हें डर था कि 'लोग क्या कहेंगे'। कबड्डी का नाम सुनते ही वे पीछे हटने लगीं।

मैंने और संगीता ने हार नहीं मानी; हमने किशोरियों को कबड्डी के खेल को उनके जीवन के संघर्ष से जोड़कर समझाया—कि जैसे कबड्डी में फिनिश लाइन तक पहुँचने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, वैसे ही उन्हें अपने लिए भी लड़ना होगा। हमने खुद आगे बढ़कर खेल की शुरुआत की और फिर अभिभावकों को भी इसका हिस्सा बनाया।

इसका असर जादुई था। जो लड़कियाँ शुरुआत में काँप रही थीं, वे खेल के अंत तक आत्मविश्वास से भरी हुई नज़र आईं। सुई-धागा रेस, कुर्सी रेस और गुब्बारा गेम में न केवल 10-12 किशोरियों ने भाग लिया, बल्कि अभिभावक भी पूरे समय खड़े होकर अपने बच्चों का हौसला बढ़ाते रहे।

उस दिन सबसे बड़ी जीत खेलों में नहीं, बल्कि समुदाय की सोच में हुई। जब अभिभावकों ने खुद आगे बढ़कर दूसरी माँ को अपनी बेटी को खेलने देने के लिए मनाया, तो मुझे लगा कि मेरा 'किशोरी उत्सव' सफल हो गया।

कार्यक्रम आयोजित करना मुश्किल नहीं है, बल्कि एक ऐसा मंच तैयार करना, जहाँ समुदाय खुद अपनी पुरानी रूढ़ियों को तोड़कर अपनी बेटियों के साथ खड़ा हो जाए, बहुत मुश्किल है । 


लेखिका परिचय:

  • नाम: अंशु कुमारी

  • परिचय: गाँव अम्बा, ब्लॉक तेघरा, जिला बेगूसराय की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 से i-Saksham से जुड़ी हुई हैं।

  • लक्ष्य: अंशु भविष्य में बिहार पुलिस में शामिल होकर देश की सेवा करना चाहती हैं।