Friday, April 24, 2026

खिड़की वाली लड़की - बुधनी

 कुछ ज़िंदगियाँ एक नज़र से बच जाती हैं — अगर कोई देखने वाला हो

स्कूल से लौटते वक्त रेखा दीदी की नज़र अक्सर रास्ते के उस घर पर नहीं पड़ती थी।

लेकिन उस दिन पड़ी।

खिड़की पर बुधनी खड़ी थी। चुप। घबराई हुई। जैसे कुछ कहना चाहती हो — और जैसे कहने की हिम्मत जुटा नहीं पा रही हो।

रेखा दीदी रुकीं। पास गईं। और बस इतना पूछा — "क्या हुआ?"

बुधनी ने हिचकते हुए बताया — घर में उसकी शादी की तैयारी हो रही है।


मेरा नाम शिवानी है। मैं मुंगेर के धरहरा ब्लॉक के घटवारी गाँव से हूँ। यह कहानी रेखा दीदी की है — और उस एक पल की, जब उन्होंने चलते-चलते रुकने का फैसला किया।

बुधनी उस वक्त बस इतना जानती थी कि कुछ तय हो रहा है — उसके बारे में, उसके बिना। उसकी पढ़ाई अभी पूरी नहीं हुई थी। उसके सपने अभी बने भी नहीं थे। लेकिन घर में एक फैसला हवा में तैर रहा था।

रेखा दीदी के लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं थी। यह एक ज़िम्मेदारी थी।


उस घर में जाना आसान नहीं था। रेखा दीदी को डर था — कि माता-पिता नाराज़ होंगे, कि वे बाहर वाले की बात क्यों सुनेंगे, कि कहीं बात बिगड़ न जाए।

लेकिन बुधनी की वो आँखें भूली नहीं थीं। वे गईं।

शुरुआत में माहौल भारी था। माता-पिता के पास अपने तर्क थे — पूरे, पक्के, और उनकी अपनी चिंता से निकले हुए। उन्हें डर था कि लड़की बड़ी हो गई तो लोग बातें करेंगे। कोई अनहोनी हो सकती है। इज़्ज़त दाँव पर लग सकती है। और शादी कर दो — तो जिम्मेदारी पूरी।

रेखा दीदी ने उन्हें बीच में नहीं रोका। सुनती रहीं। पूरा सुना।


फिर उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया। बस कुछ सवाल रखे — धीरे से, जैसे कोई अपना पूछता है।

"अगर अभी शादी हो गई — तो क्या बुधनी अपनी पढ़ाई पूरी कर पाएगी?"

"क्या वो इस उम्र में नई ज़िम्मेदारियों के लिए तैयार है?"

"आपने अपने आसपास ऐसी लड़कियाँ देखी हैं जो पढ़-लिखकर अपने घर का सहारा बनीं?"

और फिर उन्होंने उदाहरण दिए — उसी गाँव के, उसी टोले के। पास की एक लड़की जिसने इंटर के बाद आँगनवाड़ी में काम शुरू किया — और आज अपने घर का खर्च खुद उठाती है। एक और लड़की जिसने सिलाई सीखी, छोटा काम शुरू किया — और अब घर में उसकी बात सुनी जाती है।

"समाज की बातें कुछ महीने होती हैं," रेखा दीदी ने कहा। "लेकिन जल्दी में लिया गया एक फैसला — पूरी ज़िंदगी के साथ रहता है।" 

यह बातचीत एक दिन में खत्म नहीं हुई। रेखा दीदी दो बार और गईं। हर बार उसी शांति के साथ। उसी सम्मान के साथ।

उन्होंने माता-पिता को गलत नहीं ठहराया। उन्होंने बस यह कहा — आपका डर गलत नहीं है। लेकिन उसका जवाब जल्दबाज़ी नहीं है।

और एक दिन वो पल आया। माता-पिता ने खुद कहा — "अभी नहीं। बुधनी पढ़ेगी।" 

वो चार शब्द — किसी कानून से नहीं आए थे। किसी अभियान से नहीं आए थे। वो तीन मुलाकातों से आए थे। एक लड़की की खिड़की पर ठहरी एक नज़र से आए थे। बुधनी आज स्कूल जाती है। उसी रास्ते से — जिस रास्ते पर एक दिन रेखा दीदी रुकी थीं।


और मैं सोचती हूँ — कितनी बुधनियाँ हैं जो अभी भी किसी खिड़की पर खड़ी हैं? कितनी चुपचाप इंतज़ार कर रही हैं कि कोई रुके। कोई पूछे। कोई सुने। शायद अगली बार वो कोई — आप हों।


लेखिका परिचय

नाम: शिवानी कुमारी परिचय: घटवारी गाँव, धरहरा ब्लॉक, मुंगेर की रहने वाली हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2021 से i-Saksham के साथ जुड़ी हैं। लक्ष्य: UPSC की तैयारी करना और सामाजिक क्षेत्र में काम करते हुए ज़मीनी बदलाव लाना।

Friday, April 17, 2026

"नहीं। लड़कियाँ ऐसे पैर फैलाकर नहीं बैठतीं।"

 दो पैर, दो पहिये — और एक ज़िद

"नहीं। लड़कियाँ ऐसे पैर फैलाकर नहीं बैठतीं।"

पिता जी के ये शब्द उस दिन मेरे दिल में कहीं गहरे उतर गए। मैं पंद्रह साल की थी और बस इतना चाहती थी कि साइकिल चलाना सीख सकूँ। लेकिन मेरे पिता जी की नज़र में साइकिल की सीट पर दोनों तरफ पैर फैलाकर बैठना किसी लड़की के लिए शर्म की बात थी। उन्होंने कहा, "इससे बेहतर है पैदल जाओ।"

मैं चुप रही। जवाब नहीं दिया। लेकिन मन में एक ज़िद ज़रूर पाल ली।


मेरा नाम नैंसी है। मुजफ्फरपुर के मुरौल ब्लॉक के हसनपुर गाँव में पली-बढ़ी। हमारे घर में एक अनकहा नियम था — लड़कियाँ दायरे में रहें, लड़कों की बराबरी न करें। और इस दायरे की दीवारें हर उस काम के आगे खड़ी हो जाती थीं जिसमें मुझे थोड़ी भी आज़ादी दिखती थी।

पर मैंने छुप-छुपकर साइकिल सीख ली।

जब भी पिता जी देख लेते, डाँट पड़ती। मैं बिना जवाब दिए वहाँ से चली जाती। डर था उनका — लेकिन साइकिल के पहिये भी नहीं रुके।

फिर एक दिन मेरे मन में एक अलग ही विचार आया।

मैंने पिता जी से कहा — "मुझे स्कूटी सीखनी है।"

उन्होंने एक पल रुककर सोचा और... हाँ कर दी।

दरअसल उन्हें यकीन था कि मैं सीख ही नहीं पाऊँगी। स्कूटी खरीदना उनके लिए एक तरह की चुनौती थी — जो उन्हें लगा, मैं हार जाऊँगी।

लेकिन मैंने सीख ली।

पहली बार जब स्कूटी की हैंडल मेरे हाथ में थी और वो आगे बढ़ी, तो मुझे जो महसूस हुआ — उसे मैं आज भी शब्दों में पूरा नहीं बता सकती। वो सिर्फ रफ्तार नहीं थी। वो एक एहसास था — कि मैं खुद अपना रास्ता तय कर सकती हूँ।


कुछ महीने बाद मुझे खुशी और वंदना में वही भूख दिखी — जो कभी मुझमें थी।

दोनों मेरे ही गाँव की लड़कियाँ हैं। उम्र करीब बाईस साल। स्नातक की पढ़ाई कर रही हैं — लेकिन कॉलेज जाने के लिए घंटों सड़क किनारे खड़े होकर गाड़ी का इंतज़ार करना पड़ता है। कभी गाड़ी आती है, कभी नहीं। कभी समय पर पहुँचती हैं, कभी नहीं।

वे स्कूटी सीखना चाहती थीं — ताकि किसी का इंतज़ार न करना पड़े। ताकि अपने आने-जाने की ज़िम्मेदारी खुद उठा सकें।

जब मैं उनके साथ बैठी और उनकी बातें सुनीं, तो मुझे समझ आया कि उन्हें स्कूटी चलाने से ज़्यादा एक चीज़ की ज़रूरत है — भरोसा। खुद पर।

उसी पल मैंने तय किया कि जो ताकत मुझे मिली है, वो मेरे तक नहीं रुकेगी।


मैंने उन दोनों को सिखाना शुरू किया। पर समाज कहाँ चुप रहता है।

लोगों ने कहा — "तुम तो सीख गई, लेकिन ये नहीं सीख पाएँगी।"

मैंने उन आवाज़ों को अनसुना किया। और अपनी आवाज़ से खुशी और वंदना का हौसला बढ़ाती रही। जब वे डगमगाईं, मैं उनके पास खड़ी रही। जब उन्हें लगा कि नहीं होगा, मैंने उन्हें याद दिलाया — "मुझे भी यही कहा गया था।"

धीरे-धीरे डर हटा। हैंडल मज़बूत हुई। और एक दिन वो पल आया — जब खुशी और वंदना बिना किसी के सहारे के, सड़क पर निकल पड़ीं।


आज जब मैं उन्हें कॉलेज की तरफ जाते देखती हूँ — स्कूटी पर, खुद के दम पर — तो मुझे लगता है कि शायद बदलाव ऐसे ही होता है।

एक लड़की के भीतर की ज़िद, दूसरी लड़की का रास्ता बन जाती है।


लेखिका परिचय

नाम: नैंसी कुमारी परिचय: हसनपुर गाँव, मुरौल ब्लॉक, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं। i-Saksham के बैच-11 की एडू-लीडर रह चुकी हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2024 लक्ष्य: उच्च शिक्षा हासिल करना और आगे बढ़ना।

Friday, April 10, 2026

चार साल की चुप्पी, एक शराबी रिश्ता और वो 'ना'

 “अगर मैं ‘ना’ कहूँ, तो क्या मेरी बात सुनी जाएगी?”

तारापुर की रहने वाली फलक के मन में यह सवाल पिछले चार साल से था। 12वीं की परीक्षा के बाद ही उसकी सहमति के बिना उसकी शादी तय कर दी गई थी। फलक को पता चला कि जिस लड़के से रिश्ता जुड़ा है, उसे शराब की लत है, फिर भी वह चुप रही। उसे लगा कि घर के बड़े जो तय करते हैं, उसे मानना ही उसकी नियति है। वह बी.ए. पार्ट-2 की छात्रा थी, पर अपने ही भविष्य के फैसले में उसकी कोई हिस्सेदारी नहीं थी।

मेरा नाम अरज़ू है और मैं i-Saksham में एक कोच (बडी) हूँ। जब मैं फलक से मिली और उसने अपनी परेशानी बताई, तो मेरा पहला मन हुआ कि उसे तुरंत कहूँ कि इस शादी को मना कर दे। लेकिन मैंने खुद को रोका। मुझे याद आया कि हमारी ट्रेनिंग में सिखाया गया था कि नेतृत्व का मतलब दूसरों को निर्देश देना नहीं, बल्कि उनकी सोच को दिशा देना है।

मैंने फलक को सलाह देने के बजाय i-Saksham की ट्रेनिंग में सीखी गई कोचिंग प्रक्रिया का इस्तेमाल किया और उससे कुछ सीधे सवाल पूछे:  

  • “जब तुम्हारी शादी तय हुई, उस समय तुम्हारे मन में कौन-सा डर सबसे बड़ा था?”
  • “तुम पढ़ाई क्यों जारी रखना चाहती हो—सिर्फ डिग्री के लिए या अपने फैसलों में हिस्सेदारी के लिए?”
  • “अगर तुम चुप रहती हो, तो पाँच साल बाद तुम खुद को किस जगह देखती हो?”
  • “तुम्हारी सहमति का तुम्हारे लिए क्या अर्थ है?”
  • “क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारी चुप्पी तुम्हारी सुरक्षा है या तुम्हारी सीमाएँ तय कर रही है?”

इन सवालों के बाद फलक ने खुद अपनी स्थिति और अपनी चुप्पी के नतीजों के बारे में सोचना शुरू किया।


इसके बाद मैं फलक के घर गई। 
वहाँ मैंने माता-पिता से कोई बहस नहीं की, बल्कि 'सक्रिय श्रवण' (Active Listening) के कौशल का उपयोग करते हुए उनसे भी कुछ सवाल पूछे:  

  • “आप फलक को आगे पढ़ते हुए कहाँ देखना चाहते हैं?”
  • “अगर उसकी सहमति के बिना फैसला होगा, तो क्या वह उस रिश्ते को दिल से स्वीकार कर पाएगी?”
  • “क्या हम यह मान सकते हैं कि उसकी पढ़ाई पूरी होने तक निर्णय टालना परिवार के लिए बेहतर हो सकता है?”

इन सवालों ने परिवार को सोचने का मौका दिया। 20 जनवरी 2026 को फलक ने पहली बार अपने माता-पिता के सामने साफ़ शब्दों में कहा कि वह अभी शादी नहीं करना चाहती और अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है।

इस बातचीत का सीधा असर हुआ। परिवार ने वह रिश्ता रोक दिया और यह तय किया कि आगे से फलक की मर्जी के बिना उसकी ज़िंदगी का कोई फैसला नहीं लिया जाएगा।

उस दिन मैंने सीखा कि एक लीडर के रूप में मेरा सबसे प्रभावी काम सही समय पर सही सवाल पूछना है। जब हम समाधान थोपते नहीं हैं, तो सामने वाला अपनी हिम्मत खुद ढूँढ लेता है। अब मेरा संकल्प है—जवाब देने से पहले एक मज़बूत सवाल पूछना।  


लेखिका परिचय:

  • नाम: अरज़ू खातून

  • परिचय: अरज़ू जमुई के बनपुर गाँव की रहने वाली हैं 

  • i-Saksham से जुड़ाव: अरज़ू ने अपना ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद i-Saksham के साथ अपनी नेतृत्व यात्रा शुरू की और वर्तमान मे i-Saksham मे buddy के रूप मे कार्यरत है।

  • लक्ष्य: अरज़ू भविष्य में सहायक शिक्षा विभाग अधिकारी (Assistant Education Department Officer) बनकर समाज में बदलाव लाना चाहती हैं।

Friday, April 3, 2026

लोग क्या कहेंगे

“जाओ घर का काम करो, दिन भर खेलती ही रहती हो!”

यह आवाज़ मैदान के एक कोने से आई, जब हमारी एक किशोरी खेल के बीच में खड़ी थी। वह झिझक कर रुक गई। लेकिन उससे पहले कि मैं (अंशु) कुछ कहती, पास खड़ी दूसरी महिलाओं ने टोक दिया— “भले ही दिन भर खेलती होगी, लेकिन ऐसा मौका बार-बार नहीं आता। आज उसे खेलने दीजिए, घर का काम बाद में भी हो जाएगा।”

मेरा नाम अंशु कुमारी है और मैं बेगूसराय के अम्बा गाँव की एडू-लीडर हूँ। यह घटना 'किशोरी उत्सव' के दौरान हुई, जिसका आयोजन मैंने और मेरी साथी संगीता ने मिलकर गाँव के नवीन स्कूल के मैदान में किया था।

हमारा उद्देश्य किशोरियों को एक ऐसा सुरक्षित और सकारात्मक माहौल देना था, जहाँ वे बिना किसी डर के खुलकर अपनी क्षमताओं को दिखा सकें।

समस्या यह थी कि गाँव की लड़कियाँ सार्वजनिक मैदान में खेलने से झिझक रही थीं। उन्हें डर था कि 'लोग क्या कहेंगे'। कबड्डी का नाम सुनते ही वे पीछे हटने लगीं।

मैंने और संगीता ने हार नहीं मानी; हमने किशोरियों को कबड्डी के खेल को उनके जीवन के संघर्ष से जोड़कर समझाया—कि जैसे कबड्डी में फिनिश लाइन तक पहुँचने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, वैसे ही उन्हें अपने लिए भी लड़ना होगा। हमने खुद आगे बढ़कर खेल की शुरुआत की और फिर अभिभावकों को भी इसका हिस्सा बनाया।

इसका असर जादुई था। जो लड़कियाँ शुरुआत में काँप रही थीं, वे खेल के अंत तक आत्मविश्वास से भरी हुई नज़र आईं। सुई-धागा रेस, कुर्सी रेस और गुब्बारा गेम में न केवल 10-12 किशोरियों ने भाग लिया, बल्कि अभिभावक भी पूरे समय खड़े होकर अपने बच्चों का हौसला बढ़ाते रहे।

उस दिन सबसे बड़ी जीत खेलों में नहीं, बल्कि समुदाय की सोच में हुई। जब अभिभावकों ने खुद आगे बढ़कर दूसरी माँ को अपनी बेटी को खेलने देने के लिए मनाया, तो मुझे लगा कि मेरा 'किशोरी उत्सव' सफल हो गया।

कार्यक्रम आयोजित करना मुश्किल नहीं है, बल्कि एक ऐसा मंच तैयार करना, जहाँ समुदाय खुद अपनी पुरानी रूढ़ियों को तोड़कर अपनी बेटियों के साथ खड़ा हो जाए, बहुत मुश्किल है । 


लेखिका परिचय:

  • नाम: अंशु कुमारी

  • परिचय: गाँव अम्बा, ब्लॉक तेघरा, जिला बेगूसराय की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 से i-Saksham से जुड़ी हुई हैं।

  • लक्ष्य: अंशु भविष्य में बिहार पुलिस में शामिल होकर देश की सेवा करना चाहती हैं।