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Friday, August 28, 2026

"इंटर कर ली हो, अब शादी करवा देंगे।"

 "इंटर कर ली हो, अब तुम्हारी शादी करवा देंगे।"

यह बात मैं कई बार सुन चुकी थी। और हर बार चुप हो जाती थी।

मेरा नाम सुप्रिया है। मैं जमुई जिले के काकन गाँव की रहने वाली हूँ। किसान परिवार की सबसे बड़ी बेटी। बारहवीं के बाद रिश्ते आने लगे थे। जब भी शादी की बात होती, मैं कमरे से बाहर निकल जाती या सिर झुका लेती। मुझे आगे पढ़ना था, कुछ करना था - लेकिन अपनी बात रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। रात को सोचती थी कि क्या मेरी पढ़ाई बारहवीं तक ही थी। सुबह उठकर फिर चुप हो जाती थी।

यह चुप्पी मेरी आदत नहीं थी। यह डर था।

इसी दौरान मैं i-Saksham से जुड़ी और एडू-लीडर बनी।


पहले-पहले समुदाय में काम करना भी आसान नहीं था। लोगों के सामने बोलने में हाथ काँपते थे। सवाल पूछना हो तो दो बार सोचती थी। लेकिन बच्चों और किशोरियों के साथ काम करते हुए धीरे-धीरे कुछ बदला। मैंने देखा कि जिन लड़कियों को मैं आगे बढ़ने के लिए कह रही थी, उनके लिए मैं खड़ी हो सकती थी - लेकिन खुद के लिए नहीं।

यह बात मन में अटक गई।

एक दिन सत्र के बाद घर लौटते हुए मैंने तय किया कि शादी की बात जब भी आएगी, इस बार चुप नहीं रहूँगी। माँ के पास गई। डरते-डरते कहा कि मुझे और पढ़ना है, अभी शादी नहीं करनी। माँ ने सुना, कुछ नहीं बोलीं। पापा के पास गई - वो भी चुप रहे। लेकिन उस दिन के बाद घर में शादी की बात थोड़ी धीमी हो गई। एक बार बोलने से सब नहीं बदला, लेकिन एक दरवाज़ा खुला।


समुदाय में काम करने के लिए रोज़ कई किलोमीटर का सफर था। कभी धूप में पैदल, कभी ऑटो का लंबा इंतज़ार। एक दिन समय पर पहुँचने के लिए बहुत दूर तक पैदल चली। घर लौटते वक्त एक ही बात मन में थी - अगर अपनी स्कूटी होती तो।

उस दिन से थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाने लगी।

जब घर में स्कूटी लेने की बात की, तो वही हुआ जो मुझे पता था होगा। माँ ने कहा लड़की अकेले स्कूटी लेकर कहाँ जाएगी। पापा ने कहा ज़रूरत नहीं है, ऑटो से काम चल जाता है। रिश्तेदारों की बातें अलग थीं। एक बार फिर वही दबाव था - चुप हो जाओ, मान लो।

लेकिन इस बार मैंने अलग तरीका अपनाया।

नाराज़ नहीं हुई। माँ से अलग बैठकर बात की, उनकी चिंता सुनी - कि सड़क पर अकेली लड़की, कुछ हो गया तो। पापा को बताया कि यह शौक नहीं है, यह काम का साधन है और इसके लिए मैंने खुद पैसे बचाए हैं। यह बातचीत एक दिन में नहीं हुई। हफ्तों हुई। कई बार लगा कि नहीं होगा। लेकिन हर बार थोड़ा और बोली, थोड़ा और समझाया।

और एक दिन घरवाले मान गए।


जिस दिन शोरूम से स्कूटी घर आई, मैं बार-बार बाहर जाकर उसे देख रही थी। शुरुआत में भाई पीछे बैठकर रास्ता समझाता था। डर लगता था कि कहीं गाड़ी बंद न हो जाए। लेकिन धीरे-धीरे हाथ पक्के होते गए।

और एक दिन मैं पहली बार अकेले स्कूटी चलाकर समुदाय पहुँची।

काम खत्म होने के बाद कुछ देर वहीं खड़ी रही। उसी रास्ते पर जहाँ कभी ऑटो का इंतज़ार किया करती थी।


आज मैं अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाती हूँ। छोटी बहन की ज़रूरतों में मदद कर पाती हूँ। समुदाय में समय पर पहुँचती हूँ।

और उस घर में जहाँ बारहवीं के बाद शादी की बात होती थी, आज मेरी पढ़ाई और काम की चर्चा होती है।

पहले लोग पूछते थे - "इतना बाहर क्यों जाती हो?"

आज कहते हैं - "अच्छा है, लड़की अपने पैरों पर खड़ी हो रही है।"

वही लोग।


लेखिका परिचय

नाम: सुप्रिया कुमारी
परिचय: काकन गाँव, जमुई जिले की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-10 की एडू-लीडर रह चुकी हैं और वर्तमान में Buddy Intern के रूप में कार्यरत हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2023
लक्ष्य: सरकारी नौकरी प्राप्त कर समाज के विकास में योगदान देना।

Friday, August 21, 2026

"देखते हैं।"

"सत्र में टी-शर्ट पहनकर आइए।"

काजल दीदी ने सीधे मना नहीं किया। बस इतना बोलीं - "देखते हैं।"

अगले हफ्ते सलवार-कमीज़ में आईं। उसके अगले हफ्ते भी।

मेरा नाम शिवानी है। मैं मुंगेर के धरहरा ब्लॉक के घटवारी गाँव की रहने वाली हूँ। काजल दीदी उम्र में 29 साल की हैं, दो बच्चे हैं। घर, बच्चे, खाना - बस यही दुनिया है उनकी। जब मैंने एक दिन पूछा कि रुकती क्यों हैं, तो थोड़ी देर चुप रहीं। फिर बोलीं - "ससुर और सास हैं घर में। पहले से ही कहती हैं कि बाहर जाने का क्या फायदा। अगर ऊपर से ये सब दिखा, तो बस बहाना मिल जाएगा।"

यह डर काल्पनिक नहीं था। यह असली था।

उनकी साथी चमनलता दीदी की बात अलग थी।

चमनलता दीदी 34 साल की हैं। बारह साल का बेटा है, एक बेटी नायरा है। उन्हें लगता था कि बेटा इतना बड़ा हो गया है, अब माँ का टी-शर्ट पहनना अच्छा लगेगा क्या। मन था पहनने का, लेकिन घर में टी-शर्ट थी ही नहीं। खरीदने जाना मतलब पैसे खर्च करना, मतलब घर में बताना, मतलब सवाल।

एक दिन उन्होंने बस इतना कहा - "मेरे पास अपने पैसे नहीं हैं कि जो चाहूँ वो लूँ।"

इस एक लाइन में कितनी बड़ी बात थी।


उस दिन सत्र में एक सवाल पूछा गया - "आपको क्या पसंद है, सिर्फ घर को नहीं, आपको खुद को?" और "आखिरी बार कब कुछ आपने अपने लिए चुना था?"

ये सवाल छोटे लगते हैं। लेकिन जिस महिला ने सालों से सिर्फ दूसरों की पसंद के हिसाब से जिया हो, उसके लिए ये सवाल बहुत गहरे होते हैं।

काजल दीदी घर गईं। अपनी बहन की एक पुरानी जींस थी - साइज़ में फिट थी। रात को निकाली, देखती रहीं।

अगले दिन पहनकर आईं।

चेहरे पर हँसी थी, थोड़ी झिझक भी थी। बोलीं - "दीदी, सब देख रहे थे, अच्छा नहीं लग रहा था।"

इतने में चमनलता दीदी आईं और पूछा - "दीदी, मैं कैसी लग रही हूँ आज?"

सबने दोनों को देखा। सराहना हुई। चमनलता दीदी अपने बारह साल के बेटे की जींस पहनकर आई थीं - एकदम फिट। बार-बार खुद को देखकर मुस्कुरा रही थीं।

और जिनका डर था कि घरवाले क्या कहेंगे - किसी ने ज़्यादा कुछ नहीं कहा।

वो जो बड़ा तूफान आने का डर था, वो आया ही नहीं।


उस दिन जब सत्र खत्म हुआ, काजल दीदी जाते-जाते मुड़कर बोलीं - "अगले हफ्ते फिर पहनकर आऊँगी।"

वही काजल दीदी, जिन्होंने पहले दिन कहा था - "देखते हैं।"


लेखिका परिचय

नाम: शिवानी कुमारी
परिचय: घटवारी गाँव, धरहरा ब्लॉक, मुंगेर की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-7 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2021
लक्ष्य: समाज में सकारात्मक बदलाव लाना।

Friday, August 14, 2026

वो सामने भी नहीं आती थी

"इससे क्या फायदा? यह पढ़ नहीं सकती।"

यह सादिया की माँ ने पहली बार मुझसे कहा था। न गुस्से में, न दुख में, बस इतनी सहजता से, जैसे यह कोई तय बात हो। जैसे उन्होंने बहुत पहले ही मान लिया था कि उनकी बेटी की कहानी यहीं खत्म होती है।

मेरा नाम सलिना खातून है। मैं मुजफ्फरपुर के सकरा प्रखंड के मझौलिया गाँव की रहने वाली हूँ और बैच-12 की एडू-लीडर हूँ।

पहली बार जब मैंने सादिया को देखा, तो वो किशोरी सेशन में किसी कोने में खड़ी थी। जैसे ही कोई उसकी तरफ देखता, वो और सिकुड़ जाती। मैंने उससे बात करने की कोशिश की, लेकिन वो डर के कारण बोली ही नहीं। बस खड़ी रही।

सादिया पाँचवीं पास कर चुकी थी, लेकिन पढ़ना-लिखना नहीं आता था। इस वजह से छठी में दाखिला नहीं हुआ था और दो साल से पढ़ाई छूटी हुई थी। घर के बाहर किसी से बात करना तो दूर, वो सामने भी नहीं आती थी।

मैंने तय किया कि पहले उसकी माँ से बात करूँगी।


माँ से पहली बार मिली तो उन्होंने सुना, लेकिन भरोसा नहीं किया। शायद उन्हें लगा कि यह भी एक और आने-जाने वाली लड़की है जो कुछ दिन बाद भूल जाएगी।

लेकिन मैं जाती रही।

दूसरी बार, तीसरी बार, चौथी बार। हर बार उनसे बात की, उनकी बात सुनी, सादिया के बारे में पूछा। धीरे-धीरे उन्होंने महसूस किया कि मेरा आना रुकने वाला नहीं है। और धीरे-धीरे उन्होंने यह भी महसूस किया कि उनकी बेटी की पढ़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, बस रुकी हुई है।

जब माँ का मन बदला, तो सादिया को सेशन में भेजना शुरू किया। पहले जबरदस्ती। फिर खुद से। और जब उन्होंने देखा कि सादिया घर लौटकर कुछ बताती है, कुछ बोलती है, कुछ सीखकर आती है, तो उनका भरोसा और पक्का होता गया।

सादिया की चचेरी बहनें भी उसे साथ लाने लगीं।

महीने बीते। सात-आठ महीने।


और फिर एक दिन सेशन में सादिया ने खुद हाथ उठाया।

वही सादिया, जो कभी सामने नहीं आती थी, अब गतिविधियों में हिस्सा ले रही थी। दूसरों को भी बुला रही थी। AG टॉक में खुद आगे आकर अपनी बात रख रही थी, अपने लक्ष्य बना रही थी।

जो A, B, C नहीं पहचानती थी, अब वर्णमाला लिखती है। किताब से देखकर लिख लेती है।

इस साल उसका छठी कक्षा में दाखिला हो गया। वो अपनी सहेली के साथ रोज़ पैदल स्कूल जाती है।

और जब भी वो मुझे देखती है, तो खुद आगे बढ़कर बात करती है।

उसकी माँ भी अब खुद पूछती हैं कि अगला सेशन कब है।


लेखिका परिचय

नाम: सलिना खातून
परिचय: मझौलिया गाँव, सकरा प्रखंड, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।
लक्ष्य: शिक्षा के माध्यम से समुदाय में बदलाव लाना।

Friday, August 7, 2026

"तुम्हें कोई काम-धाम नहीं है क्या?"

"तुम्हें कोई काम-धाम नहीं है क्या?"

मेरा नाम रिया है। मैं पूर्णा खैरा की रहने वाली हूँ और बैच-11 की एडू-लीडर हूँ।

जब लोग यह कहते थे, तो मैं मुस्कुरा देती थी। लेकिन घर लौटते वक्त मन में एक ही सवाल होता था — क्या यह सब कभी बदलेगा?

शुरुआत में PTM का नाम सुनते ही लोग बहाने बनाने लगते थे। किसी के पास समय नहीं था, किसी को लगता था कि इससे कुछ फायदा नहीं। माइंडफुलनेस की बात करती तो लोग हँस देते — "ये सब करने से क्या होगा?" और कभी-कभी सीधे कह देते — "तुम्हें कोई काम-धाम नहीं है क्या? बार-बार घर बुलाने चली आती हो!"

मैं चुप रहती। मुस्कुराकर कहती — "चलिए ना, थोड़ी देर बैठकर बात करेंगे।" 

और फिर अगली बार फिर जाती।


i-Saksham में एक बात समझ आई थी — लोगों को बदलने से पहले उनसे जुड़ना ज़रूरी है। इसलिए मैंने हार नहीं मानी। घर-घर जाती रही। उनकी चिंताएँ सुनती रही। बच्चों की पढ़ाई पर बात करती रही। हर बार उसी उम्मीद के साथ — "आज की बैठक में ज़रूर आइए।"

धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा।

पहले जो अभिभावक आने से बचते थे, वो खुद पूछने लगे — "मीटिंग आज ही है ना?" और अगर किसी महीने बैठक नहीं हो पाती, तो फोन आता — "इस बार PTM कब होगी?"



उस दिन की PTM में मैंने शुरुआत माइंडफुलनेस से की।

यही गतिविधि जिसे कभी लोग बेकार समझते थे — उस दिन सब शांत होकर उसमें शामिल हुए। गतिविधि के बाद एक अभिभावक ने मुस्कुराते हुए कहा —

"अब इससे मन हल्का लगता है।"

मुझे अपने वो शुरुआती दिन याद आ गए जब यही लोग इसे मज़ाक में उड़ा देते थे।

बातचीत में बच्चों की पढ़ाई, मोबाइल, खान-पान, दिनचर्या — सब पर खुलकर बात हुई। पहले जो कहते थे कि स्कूल बंद है तो पढ़ाई भी बंद है, वो अब खुद बच्चों की आदतों के बारे में पूछ रहे थे। उत्कर्ष की मम्मी ने बताया कि उनका बेटा अब रोज़ स्कूल जाने से पहले उन्हें प्रणाम करके जाता है। यह सुनकर मुझे पता चला कि जो बातें हम बच्चों के साथ करते हैं, वो घर तक पहुँच रही हैं।

बैठक के अंत में एक अभिभावक ने कहा — "आप महीने में दो बार आइए। आपसे बात करके अच्छा लगता है।"

मैं भावुक हो गई। यही वो लोग थे जो कभी कहते थे — "तुम्हें कोई काम-धाम नहीं है क्या?"


दो साल पहले PTM एक बैठक थी जिसमें कोई नहीं आना चाहता था।

आज वही लोग फोन करके पूछते हैं कि अगली बैठक कब है।


लेखिका परिचय

नाम: रिया सिंह
परिचय: पूर्णा खैरा की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हैं। B.A. पूरी की है।
i-Saksham से जुड़ाव: बैच-11
लक्ष्य: सरकारी नौकरी प्राप्त कर आत्मनिर्भर बनना और शिक्षा के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाना।

Friday, July 17, 2026

इस उम्र में बचत करके क्या करना...

अपनी पेंशन भी बेटे को दे देती हैं

मेरा नाम शिवानी है। मैं बेगूसराय के पिढ़ौली गाँव की रहने वाली हूँ और बैच-12 की एडू-लीडर हूँ।

उस दिन मैं गाँव में घर-घर जाकर लोगों से मिल रही थी। एक घर के बाहर एक बुज़ुर्ग महिला बैठी थीं — आशा देवी। मैं उनके पास बैठ गई। पहले उनके स्वास्थ्य की बात की, घर के हालचाल पूछे। धीरे-धीरे बातचीत खुलने लगी। उन्होंने बताया कि दो बेटे हैं, छोटे के साथ रहती हैं। जब भी ज़रूरत होती है, वही पैसे दे देता है।

जब मैंने पूछा कि क्या वो अपनी पेंशन में से कुछ बचाकर रखती हैं, तो वो थोड़ा मुस्कुराईं और बोलीं —

"नहीं बेटी, इस उम्र में बचत करके क्या करना। जब ज़रूरत पड़ती है, बेटा दे देता है।"

और फिर जो बताया उसने मुझे एक पल के लिए रोक दिया — जो पेंशन हर महीने आती है, वो भी बेटे को दे देती हैं।

वो बात बहुत सहज तरीके से कही गई थी। जैसे इसमें कोई सवाल ही नहीं था। जैसे यही सबसे स्वाभाविक बात है — कि एक बुज़ुर्ग औरत के पास अपना एक रुपया भी न हो, और यह ठीक है।

मैं थोड़ी देर चुप रही।


फिर मैंने पूछा —

"दादी, अगर कभी ऐसा वक्त आ जाए कि आपके बेटे के पास भी पैसे न हों और आपके पास भी एक रुपया न हो — उस दिन क्या करेंगी?"

दादी कुछ नहीं बोलीं। बस सोचने लगीं।

उनकी वो चुप्पी देखकर मैंने आगे कहा — "जब आपका बेटा छोटा था, हर ज़रूरत में आप उसके लिए खड़ी रहती थीं। आज वो आपकी मदद करता है — लेकिन अगर आपके पास भी कुछ होगा, तो जब उसे ज़रूरत पड़ेगी, आप उसका सहारा बन सकती हैं।"

मैंने उनसे कहा कि पेंशन के एक हज़ार एक सौ रुपयों में से दो सौ रुपए भी अलग रख दें हर महीने — बस इतना काफी है शुरुआत के लिए।

दादी थोड़ी देर और चुप रहीं। फिर बोलीं — "ठीक है बेटी, कोशिश करूँगी।" मुझे उस वक्त नहीं पता था कि वो सच में करेंगी या नहीं।

लेकिन उस महीने जब मैं दोबारा उनके घर गई, तो उन्होंने बताया कि उन्होंने दो सौ रुपए अलग रख दिए हैं। पहली बार — अपने लिए।


लेखिका परिचय

नाम: शिवानी कुमारी
परिचय: पिढ़ौली गाँव, बेगूसराय की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2025
लक्ष्य: पुलिस विभाग में जाकर देश और समाज की सेवा करना।

Friday, July 10, 2026

चूल्हा-चौका संभालना है

"चूल्हा-चौका संभालना है"

मेरा नाम श्रृंखला है। मैं गया के बाँके बाज़ार ब्लॉक के टंडवा गाँव की रहने वाली हूँ।

परसा चुआं एक छोटा-सा गाँव है। पाँचवीं तक का स्कूल गाँव में था — उसके बाद आगे पढ़ना हो तो परसावां खुर्द जाना पड़ता था, जो दस किलोमीटर दूर है। बीच में जंगल है। बस नहीं चलती, ऑटो का किराया देने के पैसे नहीं हैं। तो लड़के साइकिल लेकर जाते थे।

और लड़कियाँ घर पर रहती थीं।

जब भी कोई लड़की माता-पिता से साइकिल माँगती, तो एक ही जवाब आता — "तुम्हें साइकिल नहीं मिलेगी। तुम्हारे भाई को दे दी है। तुम पढ़कर क्या करोगी — आखिर दूसरे घर जाकर चूल्हा-चौका ही संभालना है।" और इसके पीछे एक डर भी था — जंगल का रास्ता, दस किलोमीटर, अकेली लड़की।

यह जवाब इतनी बार दिया गया था कि लड़कियाँ खुद भी माँगना बंद कर चुकी थीं।



इसी गाँव में सुमन होम विज़िट के दौरान पहुँची थीं।

जब उन्होंने लड़कियों से बात की, तो सबने एक ही बात कही — पढ़ना चाहती हैं, लेकिन साइकिल नहीं है। सुमन ने सुना। और फिर अभिभावकों के घर जाना शुरू किया — एक बार नहीं, बार-बार। PTM करवाई। घर-घर बैठकर बात की। अपना उदाहरण दिया। यह नहीं कहा कि आप गलत हैं — बस यह पूछती रहीं कि अगर आपकी बेटी पढ़ ले, तो क्या बुरा है।

शुरुआत में कोई नहीं माना।

सुमन फिर भी जाती रहीं।

धीरे-धीरे कुछ हिला। छह लड़कियों में से तीन के घर वाले साइकिल देने के लिए तैयार हुए।

तीन साइकिलें। छह लड़कियाँ।


उन्होंने तय किया — दो-दो मिलकर एक साइकिल पर जाएँगी। जब एक थक जाए, दूसरी चलाएगी। और वे निकल पड़ीं — हर सुबह, जंगल पार करके, दस किलोमीटर।

बाद में उन लड़कियों ने सुमन से कहा —


"दीदी, जब हम थक जाती हैं तो दूसरी साइकिल संभाल लेती है। हम रुकती नहीं।"

वो एक साइकिल की बात नहीं थी। वो छह लड़कियाँ थीं जो एक-दूसरे का सहारा बनकर हर सुबह दस किलोमीटर का जंगल पार कर रही थीं — उस जवाब के बावजूद जो उन्हें बचपन से सुनाया गया था।


उनकी लगन देखकर गाँव की पाँच और लड़कियाँ आगे आईं। जिन घरों में जल्दी शादी की बात चलती थी, वहाँ थोड़ा रुकाव आया। जो बच्चे ईंट-भट्ठों पर काम करते थे, उनमें से कुछ स्कूल में दिखने लगे।

और वो छह लड़कियाँ — जिन्हें बताया गया था कि साइकिल उनके लिए नहीं है, कि पढ़ाई उनके लिए नहीं है, कि उन्हें तो बस चूल्हा-चौका संभालना है — उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास कर ली।



लेखिका परिचय

नाम: श्रृंखला कुमारी
परिचय: टंडवा गाँव, बाँके बाज़ार ब्लॉक, गया की रहने वाली हैं। i-Saksham में Buddy के रूप में कार्यरत हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2021
लक्ष्य: लाइब्रेरियन बनना।

Thursday, July 2, 2026

"बच्चों को छोड़कर बाहर जाना तुम्हें शोभा नहीं देता"

 "बच्चों को छोड़कर बाहर जाना तुम्हें शोभा नहीं देता"

मेरा नाम लखी कुमारी सिंह है। मैं जमुई जिले की रहने वाली हूँ और i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हूँ।

जब मुझे पता चला कि बिहार दिवस के मौके पर पटना के गांधी मैदान में i-Saksham के स्टॉल का प्रतिनिधित्व करने के लिए मेरा नाम चुना गया है, तो पहला एहसास खुशी का था। लेकिन घर में बात रखते ही जो सुना, वो जाना-पहचाना था —

"बच्चों को छोड़कर बाहर जाना तुम्हें शोभा नहीं देता।"

यह पहली बार नहीं था जब यह बात कही गई थी। लेकिन इस बार दाँव ज़्यादा था — तीन दिन, घर से दूर, पति और बच्चों के बिना। मैं दो बच्चों की माँ हूँ। घर की ज़िम्मेदारियाँ, खाना बनाना, बच्चों की देखभाल — यह सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। तीन दिनों के लिए यह सब छोड़कर जाना आसान फैसला नहीं था।

मेरे पति ने कहा कि इतने दिन बाहर रहने की क्या ज़रूरत है। आसपास के लोगों की बातें भी कानों में गूँज रही थीं। मैं समझ सकती थी कि इन बातों में चिंता भी थी और समाज की पुरानी सोच भी। लेकिन इस बार मैंने चुप रहने के बजाय अपनी बात रखी — कि यह सिर्फ यात्रा नहीं है, यह अपने काम को एक बड़े मंच पर ले जाने का मौका है।

बात आसानी से नहीं बनी। तब मैंने अपने ससुर से बात की — जो हमेशा मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उन्होंने सुना और साथ दिया। मेरी Buddy ने भी परिवार से बातचीत की। कई बातचीतों के बाद परिवार तैयार हुआ।


अनुमति मिलने के बाद भी मैं पूरी तरह निश्चिंत नहीं थी।

सामान पैक करते वक्त ध्यान बार-बार बच्चों की तरफ जाता था — समय पर खाना खाएँगे या नहीं, कोई ज़रूरत हुई तो कौन देखेगा। लेकिन एक बात मन में थी — अगर इस बार पीछे हट गई, तो शायद खुद पर भरोसा करने का एक बड़ा मौका खो दूँगी।

जब टीम के साथ निकली, तो मन में उत्साह और चिंता दोनों थे। रास्ते में साथियों से बातें हुईं, हँसी हुई — और देखते-देखते सफर कब बीत गया, पता नहीं चला।



गांधी मैदान में i-Saksham के स्टॉल पर मेरी ज़िम्मेदारी सिर्फ खड़े रहने की नहीं थी। लोगों से बातचीत करनी थी, बताना था कि i-Saksham क्या है, Voice & Choice क्या है, लड़कियों के नेतृत्व के लिए हम क्या करते हैं।

शुरुआत में थोड़ी झिझक हुई। लेकिन धीरे-धीरे सहज होती गई। जब लोग रुककर ध्यान से सुनते थे, तो मुझे अपने वो शुरुआती दिन याद आते थे — जब मैं खुद दस लोगों के सामने बोलने से हिचकिचाती थी।

तीन दिन तक लगातार लोगों से संवाद किया। सवालों के जवाब दिए। अनुभव साझा किए।


घर लौटकर जब बच्चों से मिली, तो एक बात साफ थी।

गांधी मैदान पहुँचना सबसे बड़ी बात नहीं थी।

सबसे बड़ी बात यह थी कि जिस महिला से कहा गया था कि बच्चों को छोड़कर बाहर जाना शोभा नहीं देता — वही महिला तीन दिन तक एक बड़े मंच पर अपने संगठन की आवाज़ बनकर खड़ी रही।

और घर में सब ठीक था।


लेखिका परिचय

नाम: लखी कुमारी सिंह
परिचय: जमुई जिले की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2024
लक्ष्य: अपने समाज में Voice and Choice को बढ़ावा देना और हर दिन कुछ नया सीखकर अपने गाँव और समुदाय में बदलाव लाना।

Monday, June 15, 2026

जिस वजन को मैं हिला नहीं पाई

मेरा नाम शिवानी है। मैं मुंगेर के धरहरा ब्लॉक के घटवारी गाँव की रहने वाली हूँ।

पेशरा गाँव पहुँचने से पहले ही रास्ता बताने लगा था कि यहाँ ज़िंदगी कैसी है। सड़क कहीं-कहीं थी, कहीं-कहीं नहीं। हम स्कूटी से गए थे — इसलिए पहुँच पाए। लेकिन पूरे रास्ते एक सवाल मन में आता रहा — अगर स्कूटी नहीं होती, तो क्या मैं भी वहाँ तक पहुँच पाती?

गाँव में पहुँचकर पता चला कि वहाँ न ऑटो चलता है, न ई-रिक्शा। लोगों के लिए पैदल चलना ही सबसे बड़ा सहारा है। और यह भी पता चला कि गाँव की कई महिलाएँ हमें देखकर रुक गई थीं — क्योंकि उन्होंने पहली बार किसी लड़की को स्कूटी चलाते देखा था।

यह सुनकर कुछ देर के लिए मैं भी रुक गई।


प्रमिला दीदी के घर पहुँची तो देखा कि खाना आज भी चूल्हे पर बनता है। घर के बाहर लकड़ियों का एक गट्ठर रखा था। मैंने उसे उठाने की कोशिश की — वो मुझसे हिला तक नहीं।

वही गट्ठर प्रमिला दीदी रोज़ पहाड़ों और जंगलों से ढोकर लाती हैं।

उनकी दिनचर्या यह है — सुबह उठकर घर का काम, फिर जंगल जाकर लकड़ी लाना, खाना बनाना, दो बच्चों की देखभाल, बुज़ुर्ग सास की जिम्मेदारी जो काम के बाद भी कहती हैं कि समय पर खाना नहीं मिला, और पति जो बाहर काम करते हैं और खुद भी बीमार रहते हैं। इन सबके बीच प्रमिला दीदी अपने घर से आधे घंटे पैदल पहाड़ी रास्तों पर चलकर गोरैया के सामुदायिक भवन पहुँचती हैं — जहाँ वो किशोरियों के साथ सेशन करती हैं।

कभी-कभी छोटे बच्चे को गोद में लेकर।



प्रमिला दीदी ST समुदाय से आती हैं। उनके समुदाय में लड़कियों का आगे बढ़ना आसान नहीं रहा — कम उम्र में शादी, पढ़ाई का जल्दी छूटना, और यह जुमला जो बार-बार सुनाई देता था — "ज़्यादा पढ़ोगी तो ठीक नहीं होगा।"

i-Saksham से जुड़ने से पहले भी उन्होंने कोशिश की थी — कहीं काम करने की, कुछ करने की। लेकिन धमकियाँ आईं, रुकावटें आईं। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी बात कहना ही कम कर दिया था।

फिर i-Saksham से जुड़ीं। जमालपुर में ट्रेनिंग के लिए पहुँचीं।

शुरुआत में लोगों के सामने बोलना मुश्किल था। लेकिन उनकी Buddy शिवानी लगातार साथ रहीं। धीरे-धीरे एक बात समझ आई — कि अगर वो खुद नहीं बोलेंगी, तो उनके समुदाय की लड़कियाँ कैसे बोलना सीखेंगी।


उन्होंने सेशन शुरू किए। शुरुआत में एक लड़की आती थी, कभी दो। कई लड़कियाँ यह नहीं समझती थीं कि इन बैठकों का क्या फायदा।

प्रमिला दीदी फिर भी जाती रहीं।

धीरे-धीरे लड़कियाँ आने लगीं। सवाल पूछने लगीं। अपने भविष्य के बारे में सोचने लगीं। और एक दिन वो भी हुआ जो उस समुदाय में पहले कभी नहीं हुआ था — कुछ किशोरियाँ i-Saksham का इंटरव्यू देने जमालपुर तक पहुँचीं।

आज उनके समुदाय से दस-बारह किशोरियाँ नियमित रूप से सीखने की प्रक्रिया से जुड़ी हैं।


जब मैं वापस लौट रही थी, तो मुझे वो गट्ठर याद आया जो मुझसे हिला नहीं था। प्रमिला दीदी उसे रोज़ उठाती हैं।

और उसके बाद भी — चलती रहती हैं।


लेखिका परिचय

नाम: शिवानी कुमारी परिचय: घटवारी गाँव, धरहरा ब्लॉक, मुंगेर की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-7 की एडू-लीडर रह चुकी हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2021 लक्ष्य: समाज में सकारात्मक बदलाव लाना।

Friday, June 12, 2026

"दीदी ने आज क्या पढ़ाया"

मेरा नाम ज़ीनत है। मैं बेगूसराय के रतगाँव की रहने वाली हूँ।

जब गुड़िया पहली बार मंसूरीटोल के उस स्कूल में बच्चों के साथ काम करने गईं, तो जो दिखा वो कुछ ऐसा था जो उन्हें जाना-पहचाना लगा। बच्चे ध्यान नहीं देते थे। होमवर्क अधूरा रहता था। कक्षा में शोर रहता था। समय पर कोई नहीं आता था।

गुड़िया यह सब देखती थीं — और चुपचाप सोचती थीं। क्योंकि यह माहौल उन्हें याद था। यही माहौल उनके अपने स्कूल का भी था। किताब थी, डाँट थी — और बस।

उन्होंने तय किया कि वो इन बच्चों के साथ वैसा नहीं करेंगी।


शुरुआत में बच्चे उनकी बात नहीं मानते थे। गुड़िया ने डाँटा नहीं। उन्होंने कहानियाँ सुनाईं। खेल करवाए। बच्चों को छोटे-छोटे समूहों में बाँटकर एक-दूसरे से सीखने दिया। साफ-सफाई की आदत बनाई। समय पर आने की तरीफ की — डाँट से नहीं, नाम लेकर।

यह एक दिन का काम नहीं था। गुड़िया हर दिन आती थीं। हर दिन कुछ नया लाती थीं। और हर दिन थोड़ा-थोड़ा देखती थीं कि बच्चे बदल रहे हैं।

धीरे-धीरे बच्चे साफ यूनिफॉर्म पहनकर आने लगे। कक्षा में एक-दूसरे की मदद करने लगे। जो बच्चा पहले कोने में बैठता था, वो अब हाथ उठाने लगा था।

स्कूल के HM और दूसरे शिक्षक देख रहे थे। उन्होंने गुड़िया से कहा कि बदलाव सिर्फ उनकी कक्षा में नहीं, दूसरी कक्षाओं में भी दिखने लगा है।


फिर एग्ज़ाम के बाद PTM हुई।

माता-पिता आए। रिज़ल्ट देखा। और कई माँ-बाप ने वो बात कही जो गुड़िया के लिए सबसे बड़ा पल था।

उन्होंने कहा — "अब बच्चे घर आकर बताते हैं — दीदी ने आज क्या पढ़ाया, कौन-सी गतिविधि हुई, स्कूल में क्या हुआ।"

एक माँ ने कहा — "पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। अब बच्चा खुद से स्कूल जाने की ज़िद करता है।"

गुड़िया यह सुन रही थीं। और शायद उस पल वो अपने उस बचपन के बारे में सोच रही थीं — जब स्कूल सिर्फ किताब और डाँट था। जब कोई गतिविधि नहीं थी, कोई कहानी नहीं थी, कोई यह नहीं पूछता था कि आज कैसा लगा।

उन्होंने वो सब इन बच्चों को दिया — जो उन्हें खुद कभी नहीं मिला था।



आज मंसूरीटोल के उस स्कूल में बच्चे जब सुबह आते हैं, तो एक लड़की का इंतज़ार करते हैं जो उनके साथ खेलेगी, पढ़ाएगी और उनकी बात सुनेगी।

गुड़िया ने किसी को नहीं बताया कि वो यहाँ अपनी पहचान बना रही हैं।

लेकिन बच्चों ने बना दी।


लेखिका परिचय

नाम: ज़ीनत परिचय: रतगाँव, बेगूसराय की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-10 की एडू-लीडर हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2023 लक्ष्य: सामाजिक क्षेत्र में कार्य करना।

Monday, June 8, 2026

पापा ने आज खुद चाय बना ली

सुबह का समय था। मैं उस दिन घर पर ही थी। पापा ने सहजता से पूछा — "आज तुम नहीं गई?"

यह वही पापा थे जिन्हें दो साल पहले मेरा घर से बाहर निकलना असुविधाजनक लगता था। जिन्हें लगता था कि मेरे बिना घर का काम नहीं चलेगा। जो पहले मेरे जाने पर बेचैन हो जाते थे — अब खुद चाय बना लेते हैं। और जब मैं किसी दिन घर पर रुकती हूँ, तो बस इतना पूछते हैं — "आज तुम नहीं गई?"

उस एक सवाल में मुझे दो साल की पूरी यात्रा दिखी।


मेरा नाम जुली कुमारी है। मैं सिंगारपुर गाँव की रहने वाली हूँ। दो साल पहले तक मेरी दुनिया घर, बच्चे और परिवार की ज़िम्मेदारियों तक सीमित थी। मन में इच्छा थी — कुछ और करने की, कहीं और जाने की — लेकिन उसे कहने का साहस नहीं था। मुझे लगता था कि घर ही मेरी प्राथमिक जगह है और वहीं रहना सही है।

फिर मैं i-Saksham की फेलोशिप से जुड़ी।

शुरुआत में बैठकों में कम बोलती थी। अपनी बात रखने से पहले कई बार सोचती थी। लेकिन मुझे समझ आने लगा था कि मेरी बात का भी मूल्य  है। कि मैं जो देख रही हूँ, जो सोच रही हूँ — वो कहने लायक है।

और एक दिन मैंने अपने परिवार के साथ बैठकर सीधे कहा — कि मैं शिक्षा के क्षेत्र में काम करना चाहती हूँ। और इसके लिए घर की ज़िम्मेदारियाँ साझा करनी होंगी।

वो बातचीत आसान नहीं थी। और बदलाव धीरे-धीरे आया — एक झटके में नहीं।

पहले बदले मेरे पति। घर के वो काम जो कभी सिर्फ मेरे हिस्से थे — उन्होंने चुपचाप उठाने शुरू किए। कोई बड़ा एलान नहीं हुआ। बस एक दिन मैंने देखा कि वो खुद कर रहे हैं।

फिर बच्चों ने देखा। और बच्चे भी बदले। अपना बिस्तर खुद ठीक करने लगे। छोटे कामों में हाथ बँटाने लगे। घर में जो ज़िम्मेदारी हमेशा से अदृश्य रही थी — सिर्फ एक इंसान की — वो धीरे-धीरे बँटने लगी।

और पापा — जो पहले मेरे बाहर जाने पर असहज होते थे — अब खुद छोटे काम निपटा लेते हैं। चाय बना लेते हैं। और जब मैं किसी दिन घर पर रुकती हूँ तो बस पूछते हैं — "आज तुम नहीं गई?" उनके उस सवाल में अब रोक नहीं होती। सिर्फ जिज्ञासा होती है।



आज मैं समुदाय में अभिभावकों से बात करती हूँ। बच्चों की उपस्थिति और पढ़ाई पर ध्यान देती हूँ। बैठकों में वो जुली नहीं हूँ जो पहले बोलने से पहले कई बार सोचती थी — अब मैं अपनी बात स्पष्ट रखती हूँ।

और जब भी कोई थकान होती है या लगता है कि बहुत मुश्किल है — तो मुझे वो सुबह याद आती है।

पापा का वो सवाल। उसमें रोक नहीं थी।


लेखिका परिचय

नाम: जुली कुमारी परिचय: सिंगारपुर गाँव की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2024–2026 लक्ष्य: सरकारी नौकरी प्राप्त कर समाज के विकास में योगदान देना।

Friday, May 29, 2026

लड़की का स्कूल छूटना कोई बड़ी बात नहीं

"पढ़ना चाहती हूँ।"

यह इच्छा थी निशा की, जो समूह में एकदम कोने में बैठी थी। 

मेरा नाम चंदा है। 

हर महीने मैं अपने किशोरी समूह की माँओं को भी एक साथ बुलाती हूँ। यह कोई औपचारिक बैठक नहीं होती — बस एक जगह जहाँ माँएँ अपनी बेटियों के बारे में खुलकर बात कर सकें, जहाँ कोई जल्दी नहीं होती, कोई दबाव नहीं होता। इसी बैठक में मुझे पहली बार निशा की माँ से उनकी बेटी के बारे में पता चला था ।

जब मैं पहली बार निशा से मिली, तो वो किशोरी समूह की बैठक में एकदम कोने में छुपी हुई थी। बाकी लड़कियाँ बोल रही थीं, हँस रही थीं — निशा बस देख रही थी। जब मैंने उससे पूछा कि उसे क्या पसंद है, क्या करना चाहती है आगे — तो उसने धीरे से - फुसफुसाते हुए अपनी पढ़ने की इच्छा बताई।

जैसे यह इच्छा उसकी अपनी नहीं थी। जैसे इसे ज़ोर से कहने का हक उसे नहीं था।

उसने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। तीन साल पहले। घर के काम थे, परिवार की ज़िम्मेदारियाँ थीं, और गाँव का वो माहौल था जिसमें लड़की का स्कूल छूटना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती। तीन साल में वो इतनी चुप हो गई थी कि खुद को भी भूलने लगी थी कि कभी पढ़ना चाहती थी।

मैंने तय किया कि मैं उसके साथ बैठती रहूँगी। हर बैठक में। चाहे वो बोले या न बोले।

धीरे-धीरे मैंने उससे उसके सपनों के बारे में बात करना शुरू किया — न एक बार, न दो बार, बल्कि हर बार जब भी हम मिलते। मैंने उससे पूछा कि अगर कोई रोक न हो, तो वो क्या करना चाहेगी। उसने पहले कुछ नहीं कहा। फिर धीरे-धीरे बोलने लगी। मैंने सुना — बस सुना, बीच में कुछ नहीं कहा।

एक दिन मैंने उसे एक काम दिया। कागज़ पर लिखो — इस महीने तुम क्या करना चाहती हो। छोटा-सा, जो सच में हो सके। निशा ने काफी देर सोचा। फिर लिखा — "घर में माँ से बात करूँगी पढ़ाई के बारे में।"

उस लाइन में तीन साल की चुप्पी टूट रही थी।

अगली बैठक में मैंने उससे पूछा — "हुआ?" उसने हाँ कहा। और पहली बार उसके चेहरे पर एक अलग भाव था।

उसी महीने Mothers Meeting में निशा की माँ आईं। मैंने उन्हें कुछ नहीं बताया। बस उनसे पूछा — "निशा कैसी है? आजकल घर में क्या कर रही है?" उन्होंने बताया कि घर के काम और गाँव का माहौल, इसीलिए पढ़ाई छुड़वाई। बातचीत लंबी चली। उन्होंने सुना। और धीरे-धीरे उनकी सोच में कुछ हिला।

उन्होंने कहा — अगर नामांकन हो जाए तो वो उसे भेजने के लिए तैयार हैं।

किशोरी समूह की बैठकों में मैं लगातार निशा के पास बैठती रही। उसे बोलने की जगह देती रही। एक दिन मैंने उससे कहा — "इस बार का लक्ष्य क्या है?" उसने सोचा और कहा — "घर में खुलकर अपनी बात रखूँगी। और दोबारा स्कूल जाऊँगी।"

उसके बाद निशा ने हर दिन अपनी माँ से एक ही बात कही — "मेरा फिर से स्कूल में दाखिला करवा दीजिए।" एक दिन नहीं, दो दिन नहीं — हर दिन। और उसकी माँ ने एक दिन हाँ कर दी।

अप्रैल में निशा का नौवीं कक्षा में नामांकन हो गया।

जिस दिन वो पहली बार स्कूल गई, मैंने उसे देखा। वही निशा थी — लेकिन वो कोने वाली लड़की नहीं थी अब।

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लेखिका परिचय

नाम: लव्ली सिंह

परिचय: मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं। i-Saksham में Buddy के रूप में कार्यरत हैं। 

i-Saksham से जुड़ाव: 2022

लक्ष्य: शिक्षिका बनना।

Friday, May 22, 2026

गंगा पार से स्कूल तक

गंगा पार से स्कूल तक

मेरा नाम सपना है। यह कहानी एक ऐसी लड़की की है जिसे मैंने पहली बार एक किशोरी सेशन में देखा था — चुप, सिकुड़ी हुई, कोने में बैठी। लेकिन कुछ था उसमें जो मुझे रुकने पर मजबूर कर गया।

किशोरी सेशन के दौरान मैं एक-एक लड़की के पास बैठकर यह समझने की कोशिश कर रही थी कि किनका स्कूल में नामांकन है और किनका नहीं। तभी रीमा से मुलाकात हुई। 

ग्यारह साल की रीमा मुंगेर के कल्याण टोला गाँव की रहने वाली थी। बातों-बातों में पता चला कि उसकी पढ़ाई बीच में छूट गई थी और स्कूल में उसका नाम नहीं था।

रीमा की दिनचर्या यह थी — सुबह अपने माता-पिता के साथ गंगा नदी के उस पार जाकर सात-आठ बकरियाँ चराना, शाम को घर लौटकर दो छोटे भाई-बहनों की देखभाल करना और घर के बाकी काम निपटाना। माता-पिता मज़दूरी और पशुओं की देखभाल से घर चलाते थे। इतनी ज़िम्मेदारियों के बीच भी रीमा के मन में पढ़ने की इच्छा कहीं बची हुई थी — भले ही वो खुलकर कह नहीं पाती थी।


और यही सबसे बड़ी चुनौती थी।

रीमा बहुत डरी हुई और संकोची थी। जब भी मैं और ऋतु दीदी उससे बात करते, वह सिमट जाती थी। एक दिन जब हम उसे स्कूल के प्रिंसिपल सर के सामने ले गए, तो वह इतनी घबरा गई कि अपने पिता का सही नाम तक नहीं बता पाई — गाँव का नाम भी ठीक से नहीं निकला उसके मुँह से। उस पल मुझे समझ आया कि रीमा को सिर्फ स्कूल से जोड़ना काफी नहीं है — पहले उसके भीतर इतना भरोसा बनाना होगा कि वो बिना डरे एक कमरे में खड़ी होकर अपना नाम कह सके। और यह भरोसा एक दिन में नहीं बनता।

इसलिए मैंने और ऋतु दीदी ने तय किया कि हम लगातार उसके साथ रहेंगे। 

हर किशोरी सेशन में उसके पास बैठना, उसकी बातें सुनना, उसे बोलने की जगह देना — यह सिलसिला जारी रहा। साथ ही होम विज़िट भी शुरू हुए ताकि उसके घर और परिवार को करीब से समझ सकें। लेकिन रीमा की माँ से मुलाकात होना आसान नहीं था। कई बार घर गई, कई बार लौट आई। यह सिलसिला करीब तीन महीने चला। तीन महीने की लगातार कोशिश के बाद आखिरकार उनसे ठीक से बात हो पाई। जब मैंने रीमा की पढ़ने की इच्छा और उसकी काबिलियत उनके सामने रखी, तो उन्होंने कहा — अगर नामांकन हो जाए तो वो उसे भेजने के लिए तैयार हैं।

यह पहली बड़ी जीत थी। लेकिन अभी रास्ता लंबा था।

विद्यालय में नामांकन के लिए कोशिशें शुरू हुईं — छह महीने तक बातचीत चलती रही, प्रयास होते रहे। इसी बीच प्रिंसिपल सर ने कहा कि नामांकन अप्रैल में होगा, लेकिन तब तक रीमा स्कूल आना शुरू कर दे। रीमा जाने लगी। और तब मुझे पहली बार लगा कि वो लड़की जो कभी अपने पिता का नाम नहीं बता पाई थी, अब रोज़ सुबह उठकर स्कूल का रास्ता नाप रही है — यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव था।

लेकिन कक्षा में बैठते-बैठते रीमा को लगने लगा कि वो बाकी बच्चों से पीछे है, कि वो पढ़ाई में कमज़ोर है। वो डर जो धीरे-धीरे कम हो रहा था, फिर से लौटने लगा था। 

जब यह दिखा, तो मैं फिर से उसे लेकर प्रिंसिपल सर के पास गई। इस बार मैंने सिर्फ नामांकन की बात नहीं की — मैंने रीमा की पूरी कहानी उनके सामने रखी। सर ने सब सुना। और फिर उन्होंने रीमा का निशुल्क नामांकन कर दिया। इतना ही नहीं — उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई शिक्षक रीमा की पढ़ाई में सहयोग नहीं करेगा, तो वो खुद उसे पढ़ाएंगे।

जिस दिन नामांकन हुआ, रीमा के चेहरे पर जो भाव था — वो मैं शब्दों में नहीं रख सकती। 

वो लड़की जो कुछ महीने पहले प्रिंसिपल के सामने अपने पिता का नाम नहीं बता पाई थी, उस दिन अपना नामांकन फॉर्म हाथ में थामे खड़ी थी। उसकी माँ की आँखें भरी हुई थीं।

नौ महीने। तीन महीने माँ को ढूँढने में, छह महीने नामांकन के लिए। इस पूरे वक्त में कई बार लगा कि शायद अब नहीं होगा। लेकिन हर बार रीमा की वो आँखें याद आ जाती थीं — जिनमें पढ़ने की इच्छा थी, भले ही शब्द नहीं थे। और मैं फिर निकल पड़ती थी।


लेखिका परिचय

नाम: सपना कुमारी परिचय: उदयपुर, कलारामपुर, जमालपुर ब्लॉक, मुंगेर की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-7 की एडू-लीडर रह चुकी हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2021 लक्ष्य: समाज में सकारात्मक बदलाव लाना।

Friday, May 15, 2026

"फिर लड़की हो गई…"

"फिर लड़की हो गई…"

6 फरवरी 2018 को जब मैं अस्पताल से घर लौटी, तो नायरा मेरी गोद में थी और घर में एक अजीब-सी चुप्पी थी। मेरी सास ने बच्ची को देखा, मुँह फेर लिया और बस इतना कहा — "फिर लड़की हो गई।" मेरे पति कुछ नहीं बोले। उनका चुप रहना ही उनका जवाब था। उस दिन मैं समझ गई कि इस घर में नायरा को अपनी जगह खुद बनानी होगी — और शायद मुझे भी।

दरअसल उस दिन से थोड़ा पहले — जब नायरा आने वाली थी — घर में कोई साथ आने की स्थिति में नहीं था। शौर्य, मेरा सात साल का बेटा, घर पर था। मैं अकेले पैदल निकल गई अस्पताल की तरफ। रास्ते में दर्द था, लेकिन रुकने का कोई मतलब नहीं था। और जब वापस लौटी — तो जो स्वागत मिला, वो आप जान ही चुके हैं।

उसी महीने घर में पैसों की तंगी बढ़ गई। काम कम मिल रहा था, और जब भी कोई मुश्किल आती, बात घूम-फिरकर वहीं आ जाती — कि इस बच्ची के आने से सब बिगड़ा है। मैं सुनती रहती थी, कुछ कहती नहीं थी। जानती थी कि शब्दों से यह नहीं बदलेगा। जो बदलना था, वो सिर्फ मेरे हाथों से होगा।

इसलिए मैंने एक-एक करके रास्ते ढूँढे। पहले आसपास के दो घरों में काम करना शुरू किया — सुबह पाँच बजे उठकर, अपना घर निपटाकर, फिर दूसरों का। थोड़े पैसे आने लगे, लेकिन महीना पूरा नहीं होता था। तो फिर एक पड़ोसन से सिलाई सीखी। शुरुआत में कई बार कपड़ा बर्बाद हुआ, लोगों ने डाँटा भी, लेकिन मैंने जारी रखा क्योंकि रुकने का कोई विकल्प नहीं था। धीरे-धीरे हाथ बैठने लगा। फिर मोहल्ले के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया — पहले एक, फिर दो, फिर पाँच। महीने के आखिर में दो-तीन सौ रुपये आने लगे, जो उस वक्त मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।

इन सब के बीच रात को कभी-कभी थकान इतनी होती थी कि रोना आ जाता था। लेकिन बच्चों के सामने कभी नहीं रोई। दिन में जो भी हो — शाम को बच्चों के पास बैठ जाती थी। नायरा को पढ़ाती थी, शौर्य के साथ बात करती थी।

उन्हीं दिनों एक शाम शौर्य ने अचानक पूछा — "माँ, लोग दीदी के बारे में ऐसा क्यों बोलते हैं?" मैंने उसे कहा — "लोग जो नहीं समझते, वही बोलते हैं। हमें अपना काम करना है।" लेकिन उस रात मैं देर तक सोचती रही। शौर्य उस वक्त आठ-नौ साल का था। उसने देख लिया था — वो सब जो घर के बड़े देखकर भी अनदेखा कर रहे थे। अपनी बहन के साथ जो हो रहा था, वो उसे गलत लगता था। उसके पास इसके लिए शब्द नहीं थे, लेकिन सवाल था। और उस एक सवाल ने मुझे और मज़बूत कर दिया — कि नायरा की पढ़ाई पर जितना हो सके, उतना ध्यान देना है।

चाहे दिन कितना भी भारी रहा हो, रात को उसके साथ बैठकर ज़रूर पढ़ाती थी। और नायरा भी थी — जो लगन से पढ़ती रही, आगे बढ़ती रही। धीरे-धीरे स्कूल में नंबर अच्छे आने लगे। और एक दिन वो स्कूल से इनाम लेकर घर आई।

उस दिन कुछ बदला। मेरी सास ने पहली बार नायरा की तारीफ की। पड़ोस में किसी ने कहा — "लड़की पढ़ने मे तेज है।" वही लोग जो कभी उसके आने को बोझ कहते थे, अब उसके नंबर सुनकर सिर हिला रहे थे। जिन्होंने उसे जन्म के दिन गोद तक नहीं लिया था, वो अब उसके इनाम की बात गाँव में करने लगी थीं। मेरे पति — जो उस दिन चुप रहे थे — अब कभी-कभी बच्चों के स्कूल भी जाने लगे।

यह बदलाव किसी बहस से नहीं आया था, किसी के समझाने से नहीं आया था। नायरा की अपनी मेहनत ने वो काम किया जो शायद मेरे किसी भी शब्द से नहीं होता।

आज सब कुछ एकदम ठीक नहीं है। लेकिन उस घर में अब कोई खुलकर नायरा के बारे में कुछ गलत नहीं कहता। वो पढ़ रही है। शौर्य पढ़ रहा है। और मेरी सास — जिन्होंने उस दिन मुँह फेर लिया था — आज नायरा के इनाम की बात गाँव में करती हैं।


लेखिका परिचय:

  • नाम: चमन लता

  • परिचय: चमन लता मुंगेर के धरहरा गाँव की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2024 में i-Saksham से जुड़ीं।

  • लक्ष्य: चमन लता का लक्ष्य ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और समाज में जेंडर समानता की सोच को मज़बूत करना है।

Monday, May 11, 2026

मुंबई जाने से एक रात पहले

 जब सबसे करीबी इंसान रास्ता रोके — तब असली इम्तिहान शुरू होता है

रात के दस बज रहे थे। मुंबई की फ्लाइट सुबह थी। बैग पैक था। कागज़ात तैयार थे। 

और तभी पति ने कहा — "नहीं जाना है।"


मेरा नाम रुखसाना है। मुजफ्फरपुर के मुशहरी प्रखंड के बुधनगरा गाँव में मेरा घर है। एक मुस्लिम परिवार में पली-बढ़ी — जहाँ लड़कियों की दुनिया घर की चारदीवारी और पास के बाज़ार तक सीमित होती है। बिना बुर्क़े के बाहर निकलना ठीक नहीं माना जाता। अकेले कहीं जाना — वो तो कल्पना से भी बाहर था।

लेकिन i-Saksham से जुड़ने के बाद कुछ बदला था। सोच खुलने लगी थी। और जब India Exim Bank की मीटिंग के लिए मुंबई जाने का मौका मिला — मैंने हाँ कर दी।

पति पहले तैयार थे। उन्होंने साथ देने का वादा किया था।


लेकिन जाने से पहले के दिनों में मोहल्ले की बातें शुरू हो गईं।

कोई कह रहा था — "एयरपोर्ट पर घंटों रुकना होगा।" कोई कह रहा था — "अकेली औरत, इतनी दूर।" कोई कह रहा था — "पता नहीं वहाँ कैसे लोग होंगे।" 

किसी ने कुछ नहीं देखा था। कोई गया नहीं था। लेकिन बातें — बातें सबके पास थीं।

और वो बातें धीरे-धीरे पति के मन में उतरती गईं।


जाने से एक रात पहले उन्होंने i-Saksham के कई लोगों को फोन किया। कहा — रुखसाना नहीं जाएगी। प्लान कैंसिल। सबने समझने कि पूरी कोशिश की । आखिरी वक्त मे ऐसा नहीं करना चाहिए । 

India Exim Bank की मीटिंग में i-Saksham को बुलाया गया था — छह संगठनों में से एक के तौर पर। यह कोई छोटी बात नहीं थी। यह एक बड़े donor के सामने i-Saksham की साख का सवाल था। और अब — एक रात पहले — सब कुछ अधर में था।


जब मुझे यह पता चला — मेरे मन में पहले तूफान आया। गुस्सा। दुख। और एक सवाल — क्या यही होता है? क्या हर बार कोई न कोई आकर रास्ता रोक देता है?

लेकिन फिर एक और बात आई — और वो ज़्यादा तेज़ थी।

"अगर मैं नहीं गई — तो संगठन की क्या इज़्ज़त रहेगी? donor के सामने क्या जवाब होगा? और जो लड़कियाँ आगे इस तरह के मौके माँगेंगी — उनके लिए दरवाज़ा बंद हो जाएगा।"

यह सिर्फ मेरी उड़ान का सवाल नहीं था। यह उन तमाम लड़कियों के भविष्य का सवाल था —  जो मेरे जैसी हैं, मेरे गाँव जैसी जगहों में हैं, और जिनके लिए यह संगठन एक रास्ता खोलता है।

मैं यह रास्ता बंद होने नहीं दे सकती थी।


मैं पति के पास गई। इस बार लड़ाई नहीं की। भाषण नहीं दिया। बस इतना कहा —

"आपको डर है — मैं समझती हूँ। लेकिन आपने जो सुना, वो अधूरी बातें थीं। अगर आप चाहें तो पूरे रास्ते वीडियो कॉल पर रह सकते हैं। हर कदम देख सकते हैं।"

वे नहीं माने। 

तब मैंने कहा —"ठीक है। आप आइए या न आइए। लेकिन मैं जाऊँगी। क्योंकि यह सिर्फ मेरा मौका नहीं है — यह उन लड़कियों की उम्मीद है जो मुझे देख रही हैं। मैं संगठन की इज़्ज़त को इस तरह नहीं जाने दे सकती।"

उसके बाद मैंने बात करना बंद कर दिया।

वो चुप्पी मेरे लिए आसान नहीं थी। जिस इंसान के साथ ज़िंदगी बनाई हो — उससे इस तरह रुकना — वो भीतर से तोड़ता है।

लेकिन कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो सिर्फ अपने लिए नहीं लिए जाते।

अगली सुबह। दरवाज़े पर दस्तक हुई।

पति खड़े थे — बैग उठाने के लिए। कुछ नहीं बोले। बस आए। और छोड़ने चल दिए।

शायद उन्हें रात भर में समझ आ गया था। शायद मेरी चुप्पी ने वो कहा जो शब्द नहीं कह पाए थे। शायद उन्हें समझ हो कि यह ज़िद नहीं — यह ज़िम्मेदारी है।


एयरपोर्ट पर कदम रखा — सब कुछ नया था। भीड़। सिक्योरिटी चेक। अनाउंसमेंट। भागते लोग।

मैं घबराई भी। लेकिन डरी नहीं।जब फ्लाइट ने उड़ान भरी और खिड़की से ज़मीन छोटी होती दिखी — तो मुझे लगा कि मैं सिर्फ आसमान में नहीं उठ रही। मैं उन तमाम बातों से ऊपर उठ रही हूँ — जो रात भर मुझे रोकने की कोशिश करती रहीं।


मुंबई में India Exim Bank की मीटिंग में छह संगठन थे। मैंने i-Saksham का काम रखा। रवि सर के साथ। अपने गाँव की कहानियाँ — उस बड़े कमरे में, उन बड़े लोगों के सामने। Exim Bank के सदस्यों ने सुना। सराहा। हौसला दिया। और उस पल मैं सोच रही थी — कि अगर एक रात पहले मैं रुक गई होती — तो यह पल नहीं होता। यह दरवाज़ा नहीं खुलता।


जब मैं अपने गाँव वापस लौटी, तो मैं वही रुखसाना थी, लेकिन मेरी सोच बदल चुकी थी। पति ने भी कुछ नहीं पूछा। लेकिन कुछ तो बदला था। मे हमेशाअपने जैसी और लड़कियों के लिए  कुछ करना चाहती हूँ—ताकि वे भी अपने सपनों को पहचान सकें और उन्हें पूरा करने की हिम्मत जुटा सकें। और ये मे जरूर करूंगी एक दिन । 


लेखिका परिचय

नाम: रुख़साना ख़ातून परिचय: बुधनगरा गाँव, मुशहरी ब्लॉक, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2024 लक्ष्य: भविष्य में एक Software Engineer के रूप में अपनी पहचान बनाना — और अपने जैसी लड़कियों के लिए रास्ता खुला रखना।

Friday, May 1, 2026

"मैं जाऊँगी।"

कुछ फैसले एक बार नहीं, बार-बार लेने पड़ते हैं

घर में वही सवाल था जो हमेशा से था।

"लड़की अकेले इतनी दूर जाएगी? अगर कुछ हो गया तो?"

मोनी कुछ देर के लिए चुप हो जाती। फिर अंदर से एक आवाज़ आती — वही आवाज़, वही जवाब।

"मैं जाऊँगी।"


मेरा नाम मोनिका है। मैं खैरमा की रहने वाली हूँ और 2022 से i-Saksham से जुड़ी हूँ। यह कहानी मोनी की है — सिकंदरा गाँव की उस लड़की की, जिसने एक दिन तय किया कि वो रुकेगी नहीं।

मोनी का घर सात लोगों का था। तीन बहनों की शादी हो चुकी थी। एक बड़ा भाई। पिता का कोई स्थायी काम नहीं — और शराब की लत। माँ एक छोटे काम से घर संभालती थीं।

ऐसे घर में लड़कियों के फैसले अक्सर उनके अपने नहीं होते।

लेकिन मोनी के अंदर एक सीधी-सी चाह थी — अपने पैरों पर खड़ा होना। कुछ कमाना। अपना घर बनाना।

और जब उसे महाराष्ट्र के नव गुरुकुल जाने का मौका मिला — उसने हाँ कह दी। खुद से।


घर और आस-पड़ोस तुरंत विरोध में खड़े हो गए।

"लड़की इतनी दूर अकेले नहीं जाती।" "कुछ गलत हो गया तो?" "कौन जाने वहाँ कैसे लोग हों।"

ये आवाज़ें उसके फैसले को रोक रही थीं। और कहीं न कहीं उसके अंदर भी डर पैदा कर रही थीं।

लेकिन मोनी ने रुकने के बजाय एक काम किया — उसने i-Saksham में सीखे कोचिंग के तरीके से पहले खुद से सवाल पूछा।

"अगर मैं नहीं गई — तो क्या मैं आगे बढ़ पाऊँगी?"

जवाब साफ था।

फिर उसी स्पष्टता के साथ वो परिवार के पास गई। बार-बार गई। उसने भाषण नहीं दिया — उसने बातचीत की। और एक ठोस प्रस्ताव रखा —

"मैं एक महीने के लिए जाऊँगी। अगर सही नहीं लगा — वापस आ जाऊँगी।"

यह समझौता नहीं था। यह भरोसा बनाने की प्रक्रिया थी।

धीरे-धीरे परिवार मान गया।


लेकिन सफर उसका अपना था — और वो उसे खुद तय करना था।

मोनी ने i-Saksham की फेलोशिप से बचाए अपने पैसों से यात्रा का खर्च उठाया। खुद तैयारी की। और पहली बार — अकेले ट्रेन में बैठी।

रास्ते में अजनबियों से बात करना, मदद माँगना, रास्ता समझना — हर छोटे कदम पर उसने अपनी झिझक तोड़ी।

पुणे पहुँचकर उसने खुद Rapido बुक किया।

यह छोटी-सी बात थी। लेकिन उस पल वो जानती थी — यह अपने फैसले खुद लेने की शुरुआत है।


कैंपस पहुँचने के बाद चुनौतियाँ खत्म नहीं हुईं।

नए लोग। नया माहौल। नई भाषा। नए नियम।

और एक दिन — खाने में कॉकरोच।

एक पल के लिए लगा कि शायद घरवालों का डर सही था। शायद यहाँ आना गलत था।

लेकिन इस बार मोनी चुप नहीं रही।

उसने अपने साथियों और सीनियर्स से बात की। और फिर Discord पर पूरी feedback लिखकर डाली — समस्या क्या है, क्या बदलना चाहिए, और क्यों।

यह एक लड़की की शिकायत नहीं थी।

यह एक आवाज़ थी — जो अपनी जगह माँग रही थी।

असर हुआ। खाने में सुधार हुआ। व्यवहार बदला। लोग उसे गंभीरता से लेने लगे।

वो अब चुप रहने वाली लड़की नहीं थी।


धीरे-धीरे कैंपस उसका हो गया।

अलग-अलग राज्यों के लोगों से दोस्ती हुई। नई भाषाएँ आईं। नए नज़रिए आए।

जब भी कुछ समझ नहीं आता — वो सीनियर्स से पूछती। सीखती रहती।

आर्थिक चुनौतियाँ आज भी हैं। परिवार से नियमित मदद नहीं आती। कभी-कभी जीजू या कोई दोस्त सहारा दे देता है। लेकिन अपने सफर की ज़िम्मेदारी उसने खुद उठाई है — और उसे किसी और को सौंपने का इरादा नहीं है।


मोनी सिकंदरा की वो पहली लड़की है जो वहाँ से इतनी दूर — अकेले — पढ़ने गई।

यह कोई बड़ा आंदोलन नहीं है।

यह बस एक लड़की है — जिसने तय किया कि उसकी ज़िंदगी का फैसला उसका अपना होगा। और जब-जब डर आया, उसने उससे लड़ने के बजाय उसे समझा — और आगे बढ़ गई।

अब उसके अंदर सिर्फ एक बात साफ है।

रुकना नहीं है।

जो रास्ता उसने खुद के लिए बनाया है — उस पर चलते रहना है।


लेखिका परिचय

नाम: मोनिका परिचय: खैरमा की रहने वाली हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2022 से i-Saksham से एक Buddy के रूप में जुड़ी हैं। भूमिका: मोनिका का काम सिर्फ मार्गदर्शन देना नहीं — बल्कि बच्चों और समुदाय के साथ एक दोस्त, सहयोगी और प्रेरक बनकर आगे बढ़ना है।

Friday, April 24, 2026

खिड़की वाली लड़की - बुधनी

 कुछ ज़िंदगियाँ एक नज़र से बच जाती हैं — अगर कोई देखने वाला हो

स्कूल से लौटते वक्त रेखा दीदी की नज़र अक्सर रास्ते के उस घर पर नहीं पड़ती थी।

लेकिन उस दिन पड़ी।

खिड़की पर बुधनी खड़ी थी। चुप। घबराई हुई। जैसे कुछ कहना चाहती हो — और जैसे कहने की हिम्मत जुटा नहीं पा रही हो।

रेखा दीदी रुकीं। पास गईं। और बस इतना पूछा — "क्या हुआ?"

बुधनी ने हिचकते हुए बताया — घर में उसकी शादी की तैयारी हो रही है।


मेरा नाम शिवानी है। मैं मुंगेर के धरहरा ब्लॉक के घटवारी गाँव से हूँ। यह कहानी रेखा दीदी की है — और उस एक पल की, जब उन्होंने चलते-चलते रुकने का फैसला किया।

बुधनी उस वक्त बस इतना जानती थी कि कुछ तय हो रहा है — उसके बारे में, उसके बिना। उसकी पढ़ाई अभी पूरी नहीं हुई थी। उसके सपने अभी बने भी नहीं थे। लेकिन घर में एक फैसला हवा में तैर रहा था।

रेखा दीदी के लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं थी। यह एक ज़िम्मेदारी थी।


उस घर में जाना आसान नहीं था। रेखा दीदी को डर था — कि माता-पिता नाराज़ होंगे, कि वे बाहर वाले की बात क्यों सुनेंगे, कि कहीं बात बिगड़ न जाए।

लेकिन बुधनी की वो आँखें भूली नहीं थीं। वे गईं।

शुरुआत में माहौल भारी था। माता-पिता के पास अपने तर्क थे — पूरे, पक्के, और उनकी अपनी चिंता से निकले हुए। उन्हें डर था कि लड़की बड़ी हो गई तो लोग बातें करेंगे। कोई अनहोनी हो सकती है। इज़्ज़त दाँव पर लग सकती है। और शादी कर दो — तो जिम्मेदारी पूरी।

रेखा दीदी ने उन्हें बीच में नहीं रोका। सुनती रहीं। पूरा सुना।


फिर उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया। बस कुछ सवाल रखे — धीरे से, जैसे कोई अपना पूछता है।

"अगर अभी शादी हो गई — तो क्या बुधनी अपनी पढ़ाई पूरी कर पाएगी?"

"क्या वो इस उम्र में नई ज़िम्मेदारियों के लिए तैयार है?"

"आपने अपने आसपास ऐसी लड़कियाँ देखी हैं जो पढ़-लिखकर अपने घर का सहारा बनीं?"

और फिर उन्होंने उदाहरण दिए — उसी गाँव के, उसी टोले के। पास की एक लड़की जिसने इंटर के बाद आँगनवाड़ी में काम शुरू किया — और आज अपने घर का खर्च खुद उठाती है। एक और लड़की जिसने सिलाई सीखी, छोटा काम शुरू किया — और अब घर में उसकी बात सुनी जाती है।

"समाज की बातें कुछ महीने होती हैं," रेखा दीदी ने कहा। "लेकिन जल्दी में लिया गया एक फैसला — पूरी ज़िंदगी के साथ रहता है।" 

यह बातचीत एक दिन में खत्म नहीं हुई। रेखा दीदी दो बार और गईं। हर बार उसी शांति के साथ। उसी सम्मान के साथ।

उन्होंने माता-पिता को गलत नहीं ठहराया। उन्होंने बस यह कहा — आपका डर गलत नहीं है। लेकिन उसका जवाब जल्दबाज़ी नहीं है।

और एक दिन वो पल आया। माता-पिता ने खुद कहा — "अभी नहीं। बुधनी पढ़ेगी।" 

वो चार शब्द — किसी कानून से नहीं आए थे। किसी अभियान से नहीं आए थे। वो तीन मुलाकातों से आए थे। एक लड़की की खिड़की पर ठहरी एक नज़र से आए थे। बुधनी आज स्कूल जाती है। उसी रास्ते से — जिस रास्ते पर एक दिन रेखा दीदी रुकी थीं।


और मैं सोचती हूँ — कितनी बुधनियाँ हैं जो अभी भी किसी खिड़की पर खड़ी हैं? कितनी चुपचाप इंतज़ार कर रही हैं कि कोई रुके। कोई पूछे। कोई सुने। शायद अगली बार वो कोई — आप हों।


लेखिका परिचय

नाम: शिवानी कुमारी परिचय: घटवारी गाँव, धरहरा ब्लॉक, मुंगेर की रहने वाली हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2021 से i-Saksham के साथ जुड़ी हैं। लक्ष्य: UPSC की तैयारी करना और सामाजिक क्षेत्र में काम करते हुए ज़मीनी बदलाव लाना।