जब सबसे करीबी इंसान रास्ता रोके — तब असली इम्तिहान शुरू होता है
रात के दस बज रहे थे। मुंबई की फ्लाइट सुबह थी। बैग पैक था। कागज़ात तैयार थे।
और तभी पति ने कहा — "नहीं जाना है।"
मेरा नाम रुखसाना है। मुजफ्फरपुर के मुशहरी प्रखंड के बुधनगरा गाँव में मेरा घर है। एक मुस्लिम परिवार में पली-बढ़ी — जहाँ लड़कियों की दुनिया घर की चारदीवारी और पास के बाज़ार तक सीमित होती है। बिना बुर्क़े के बाहर निकलना ठीक नहीं माना जाता। अकेले कहीं जाना — वो तो कल्पना से भी बाहर था।
लेकिन i-Saksham से जुड़ने के बाद कुछ बदला था। सोच खुलने लगी थी। और जब India Exim Bank की मीटिंग के लिए मुंबई जाने का मौका मिला — मैंने हाँ कर दी।
पति पहले तैयार थे। उन्होंने साथ देने का वादा किया था।
लेकिन जाने से पहले के दिनों में मोहल्ले की बातें शुरू हो गईं।
कोई कह रहा था — "एयरपोर्ट पर घंटों रुकना होगा।" कोई कह रहा था — "अकेली औरत, इतनी दूर।" कोई कह रहा था — "पता नहीं वहाँ कैसे लोग होंगे।"
किसी ने कुछ नहीं देखा था। कोई गया नहीं था। लेकिन बातें — बातें सबके पास थीं।
और वो बातें धीरे-धीरे पति के मन में उतरती गईं।
जाने से एक रात पहले उन्होंने i-Saksham के कई लोगों को फोन किया। कहा — रुखसाना नहीं जाएगी। प्लान कैंसिल। सबने समझने कि पूरी कोशिश की । आखिरी वक्त मे ऐसा नहीं करना चाहिए ।
India Exim Bank की मीटिंग में i-Saksham को बुलाया गया था — छह संगठनों में से एक के तौर पर। यह कोई छोटी बात नहीं थी। यह एक बड़े donor के सामने i-Saksham की साख का सवाल था। और अब — एक रात पहले — सब कुछ अधर में था।
जब मुझे यह पता चला — मेरे मन में पहले तूफान आया। गुस्सा। दुख। और एक सवाल — क्या यही होता है? क्या हर बार कोई न कोई आकर रास्ता रोक देता है?
लेकिन फिर एक और बात आई — और वो ज़्यादा तेज़ थी।
"अगर मैं नहीं गई — तो संगठन की क्या इज़्ज़त रहेगी? donor के सामने क्या जवाब होगा? और जो लड़कियाँ आगे इस तरह के मौके माँगेंगी — उनके लिए दरवाज़ा बंद हो जाएगा।"
यह सिर्फ मेरी उड़ान का सवाल नहीं था। यह उन तमाम लड़कियों के भविष्य का सवाल था — जो मेरे जैसी हैं, मेरे गाँव जैसी जगहों में हैं, और जिनके लिए यह संगठन एक रास्ता खोलता है।
मैं यह रास्ता बंद होने नहीं दे सकती थी।
मैं पति के पास गई। इस बार लड़ाई नहीं की। भाषण नहीं दिया। बस इतना कहा —
"आपको डर है — मैं समझती हूँ। लेकिन आपने जो सुना, वो अधूरी बातें थीं। अगर आप चाहें तो पूरे रास्ते वीडियो कॉल पर रह सकते हैं। हर कदम देख सकते हैं।"
वे नहीं माने।
तब मैंने कहा —"ठीक है। आप आइए या न आइए। लेकिन मैं जाऊँगी। क्योंकि यह सिर्फ मेरा मौका नहीं है — यह उन लड़कियों की उम्मीद है जो मुझे देख रही हैं। मैं संगठन की इज़्ज़त को इस तरह नहीं जाने दे सकती।"उसके बाद मैंने बात करना बंद कर दिया।
वो चुप्पी मेरे लिए आसान नहीं थी। जिस इंसान के साथ ज़िंदगी बनाई हो — उससे इस तरह रुकना — वो भीतर से तोड़ता है।
लेकिन कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो सिर्फ अपने लिए नहीं लिए जाते।
अगली सुबह। दरवाज़े पर दस्तक हुई।
पति खड़े थे — बैग उठाने के लिए। कुछ नहीं बोले। बस आए। और छोड़ने चल दिए।
शायद उन्हें रात भर में समझ आ गया था। शायद मेरी चुप्पी ने वो कहा जो शब्द नहीं कह पाए थे। शायद उन्हें समझ हो कि यह ज़िद नहीं — यह ज़िम्मेदारी है।
एयरपोर्ट पर कदम रखा — सब कुछ नया था। भीड़। सिक्योरिटी चेक। अनाउंसमेंट। भागते लोग।
मैं घबराई भी। लेकिन डरी नहीं।जब फ्लाइट ने उड़ान भरी और खिड़की से ज़मीन छोटी होती दिखी — तो मुझे लगा कि मैं सिर्फ आसमान में नहीं उठ रही। मैं उन तमाम बातों से ऊपर उठ रही हूँ — जो रात भर मुझे रोकने की कोशिश करती रहीं।
मुंबई में India Exim Bank की मीटिंग में छह संगठन थे। मैंने i-Saksham का काम रखा। रवि सर के साथ। अपने गाँव की कहानियाँ — उस बड़े कमरे में, उन बड़े लोगों के सामने। Exim Bank के सदस्यों ने सुना। सराहा। हौसला दिया। और उस पल मैं सोच रही थी — कि अगर एक रात पहले मैं रुक गई होती — तो यह पल नहीं होता। यह दरवाज़ा नहीं खुलता।
जब मैं अपने गाँव वापस लौटी, तो मैं वही रुखसाना थी, लेकिन मेरी सोच बदल चुकी थी। पति ने भी कुछ नहीं पूछा। लेकिन कुछ तो बदला था। मे हमेशाअपने जैसी और लड़कियों के लिए कुछ करना चाहती हूँ—ताकि वे भी अपने सपनों को पहचान सकें और उन्हें पूरा करने की हिम्मत जुटा सकें। और ये मे जरूर करूंगी एक दिन ।
लेखिका परिचय
नाम: रुख़साना ख़ातून परिचय: बुधनगरा गाँव, मुशहरी ब्लॉक, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2024 लक्ष्य: भविष्य में एक Software Engineer के रूप में अपनी पहचान बनाना — और अपने जैसी लड़कियों के लिए रास्ता खुला रखना।
No comments:
Post a Comment