“दुपट्टा न हो तो कुछ अधूरा है।”
यह बात कोमल ने हल्की मुस्कान के साथ तब कही, जब हमारे सत्र में शरीर में होने वाले बदलावों और पहचान पर बात हो रही थी। मेरा नाम मोनिका है और मैं जमुई से 'बडी' के रूप में जुड़ी हूँ।
कोमल ने कहा था: “मुझे सब ठीक लगता है… जब मैं दुपट्टा ओढ़कर चलती हूँ, तब मुझे बहुत अच्छा लगता है।”
मैंने पूछा कि क्या वह हमेशा से दुपट्टा पहनती थी।
कोमल ने धीरे से कहा: "नहीं। पहले नहीं पहनती थी। जब शरीर में बदलाव आने लगे, तब घर में बार-बार टोका जाने लगा—‘दुपट्टा ठीक से लो।’ शुरू में यह बोझ जैसा लगता था, लेकिन धीरे-धीरे आदत बन गई।"
उसने आगे जोड़ा: "अब ऐसा लगता है कि दुपट्टा न हो तो कुछ अधूरा है। मैं इसमें ही ठीक हूँ।"
उस पल मुझे एहसास हुआ कि यह कहानी सिर्फ कोमल की नहीं, बल्कि समाज के गहरे अनुकूलन की है।
यह मेरे अवलोकन का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु था। मैंने समझा कि समाज छोटी-छोटी हिदायतों के माध्यम से एक विचार को बार-बार दोहराता है, और यह विचार अंततः हमारे मस्तिष्क में बैठ जाता है। यही कारण है कि मजबूरी कब आदत और आदत कब हमारी अपनी 'पसंद' बन जाती है, हमें पता ही नहीं चलता।
कोमल की सहजता दिखाती है कि दुपट्टा अब सिर्फ कपड़ा नहीं रहा, वह 'अच्छी लड़की' होने की शर्त बन गया है।
यह अवलोकन मुझे सिखाता है कि एक लीडर के रूप में हमारा काम सिर्फ़ लड़कियों को बोलना सिखाना नहीं है, बल्कि उन्हें यह जानने में मदद करना है कि जो वे महसूस करती हैं, वह वास्तव में उनकी अपनी 'पसंद' है या समाज का थोपा हुआ नियम। बदलाव वहीं से शुरू होगा, जहाँ वे इन सूक्ष्म रूढ़ियों को पहचानेंगी।
लेखिका परिचय:
नाम: मोनिका कुमारी
परिचय: मोनिका खैरमा, जमुई की रहने वाली हैं और वर्ष 2022 से ‘आई सक्षम’ संस्था से एक 'बडी' के रूप में जुड़ी हुई हैं।
लक्ष्य: मेरा सपना है कि मैं आगे भी सोशल सेक्टर से जुड़कर, बच्चों की शिक्षा और महिलाओं के सशक्तिकरण में अपना योगदान देती रहूँ।
West of luck🤞 aap aisehi Kam karte rahiye or samaj me badlab karte rahiye thank you❤️
ReplyDeleteYe story mere life se v releted h -so padh kr main khud reflect kr pa rhi thi✨
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