"फिर लड़की हो गई…"
6 फरवरी 2018 को जब मैं अस्पताल से घर लौटी, तो नायरा मेरी गोद में थी और घर में एक अजीब-सी चुप्पी थी। मेरी सास ने बच्ची को देखा, मुँह फेर लिया और बस इतना कहा — "फिर लड़की हो गई।" मेरे पति कुछ नहीं बोले। उनका चुप रहना ही उनका जवाब था। उस दिन मैं समझ गई कि इस घर में नायरा को अपनी जगह खुद बनानी होगी — और शायद मुझे भी।
दरअसल उस दिन से थोड़ा पहले — जब नायरा आने वाली थी — घर में कोई साथ आने की स्थिति में नहीं था। शौर्य, मेरा सात साल का बेटा, घर पर था। मैं अकेले पैदल निकल गई अस्पताल की तरफ। रास्ते में दर्द था, लेकिन रुकने का कोई मतलब नहीं था। और जब वापस लौटी — तो जो स्वागत मिला, वो आप जान ही चुके हैं।
उसी महीने घर में पैसों की तंगी बढ़ गई। काम कम मिल रहा था, और जब भी कोई मुश्किल आती, बात घूम-फिरकर वहीं आ जाती — कि इस बच्ची के आने से सब बिगड़ा है। मैं सुनती रहती थी, कुछ कहती नहीं थी। जानती थी कि शब्दों से यह नहीं बदलेगा। जो बदलना था, वो सिर्फ मेरे हाथों से होगा।
इसलिए मैंने एक-एक करके रास्ते ढूँढे। पहले आसपास के दो घरों में काम करना शुरू किया — सुबह पाँच बजे उठकर, अपना घर निपटाकर, फिर दूसरों का। थोड़े पैसे आने लगे, लेकिन महीना पूरा नहीं होता था। तो फिर एक पड़ोसन से सिलाई सीखी। शुरुआत में कई बार कपड़ा बर्बाद हुआ, लोगों ने डाँटा भी, लेकिन मैंने जारी रखा क्योंकि रुकने का कोई विकल्प नहीं था। धीरे-धीरे हाथ बैठने लगा। फिर मोहल्ले के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया — पहले एक, फिर दो, फिर पाँच। महीने के आखिर में दो-तीन सौ रुपये आने लगे, जो उस वक्त मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।
इन सब के बीच रात को कभी-कभी थकान इतनी होती थी कि रोना आ जाता था। लेकिन बच्चों के सामने कभी नहीं रोई। दिन में जो भी हो — शाम को बच्चों के पास बैठ जाती थी। नायरा को पढ़ाती थी, शौर्य के साथ बात करती थी।
उन्हीं दिनों एक शाम शौर्य ने अचानक पूछा — "माँ, लोग दीदी के बारे में ऐसा क्यों बोलते हैं?" मैंने उसे कहा — "लोग जो नहीं समझते, वही बोलते हैं। हमें अपना काम करना है।" लेकिन उस रात मैं देर तक सोचती रही। शौर्य उस वक्त आठ-नौ साल का था। उसने देख लिया था — वो सब जो घर के बड़े देखकर भी अनदेखा कर रहे थे। अपनी बहन के साथ जो हो रहा था, वो उसे गलत लगता था। उसके पास इसके लिए शब्द नहीं थे, लेकिन सवाल था। और उस एक सवाल ने मुझे और मज़बूत कर दिया — कि नायरा की पढ़ाई पर जितना हो सके, उतना ध्यान देना है।
चाहे दिन कितना भी भारी रहा हो, रात को उसके साथ बैठकर ज़रूर पढ़ाती थी। और नायरा भी थी — जो लगन से पढ़ती रही, आगे बढ़ती रही। धीरे-धीरे स्कूल में नंबर अच्छे आने लगे। और एक दिन वो स्कूल से इनाम लेकर घर आई।
उस दिन कुछ बदला। मेरी सास ने पहली बार नायरा की तारीफ की। पड़ोस में किसी ने कहा — "लड़की पढ़ने मे तेज है।" वही लोग जो कभी उसके आने को बोझ कहते थे, अब उसके नंबर सुनकर सिर हिला रहे थे। जिन्होंने उसे जन्म के दिन गोद तक नहीं लिया था, वो अब उसके इनाम की बात गाँव में करने लगी थीं। मेरे पति — जो उस दिन चुप रहे थे — अब कभी-कभी बच्चों के स्कूल भी जाने लगे।
यह बदलाव किसी बहस से नहीं आया था, किसी के समझाने से नहीं आया था। नायरा की अपनी मेहनत ने वो काम किया जो शायद मेरे किसी भी शब्द से नहीं होता।
आज सब कुछ एकदम ठीक नहीं है। लेकिन उस घर में अब कोई खुलकर नायरा के बारे में कुछ गलत नहीं कहता। वो पढ़ रही है। शौर्य पढ़ रहा है। और मेरी सास — जिन्होंने उस दिन मुँह फेर लिया था — आज नायरा के इनाम की बात गाँव में करती हैं।
लेखिका परिचय:
नाम: चमन लता परिचय: चमन लता मुंगेर के धरहरा गाँव की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हैं। i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2024 में i-Saksham से जुड़ीं। लक्ष्य: चमन लता का लक्ष्य ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और समाज में जेंडर समानता की सोच को मज़बूत करना है।
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