मेरा नाम सपना है। यह कहानी एक ऐसी लड़की की है जिसे मैंने पहली बार एक किशोरी सेशन में देखा था — चुप, सिकुड़ी हुई, कोने में बैठी। लेकिन कुछ था उसमें जो मुझे रुकने पर मजबूर कर गया।
किशोरी सेशन के दौरान मैं एक-एक लड़की के पास बैठकर यह समझने की कोशिश कर रही थी कि किनका स्कूल में नामांकन है और किनका नहीं। तभी रीमा से मुलाकात हुई।
ग्यारह साल की रीमा मुंगेर के कल्याण टोला गाँव की रहने वाली थी। बातों-बातों में पता चला कि उसकी पढ़ाई बीच में छूट गई थी और स्कूल में उसका नाम नहीं था।
रीमा की दिनचर्या यह थी — सुबह अपने माता-पिता के साथ गंगा नदी के उस पार जाकर सात-आठ बकरियाँ चराना, शाम को घर लौटकर दो छोटे भाई-बहनों की देखभाल करना और घर के बाकी काम निपटाना। माता-पिता मज़दूरी और पशुओं की देखभाल से घर चलाते थे। इतनी ज़िम्मेदारियों के बीच भी रीमा के मन में पढ़ने की इच्छा कहीं बची हुई थी — भले ही वो खुलकर कह नहीं पाती थी।
और यही सबसे बड़ी चुनौती थी।
रीमा बहुत डरी हुई और संकोची थी। जब भी मैं और ऋतु दीदी उससे बात करते, वह सिमट जाती थी। एक दिन जब हम उसे स्कूल के प्रिंसिपल सर के सामने ले गए, तो वह इतनी घबरा गई कि अपने पिता का सही नाम तक नहीं बता पाई — गाँव का नाम भी ठीक से नहीं निकला उसके मुँह से। उस पल मुझे समझ आया कि रीमा को सिर्फ स्कूल से जोड़ना काफी नहीं है — पहले उसके भीतर इतना भरोसा बनाना होगा कि वो बिना डरे एक कमरे में खड़ी होकर अपना नाम कह सके। और यह भरोसा एक दिन में नहीं बनता।
इसलिए मैंने और ऋतु दीदी ने तय किया कि हम लगातार उसके साथ रहेंगे।
हर किशोरी सेशन में उसके पास बैठना, उसकी बातें सुनना, उसे बोलने की जगह देना — यह सिलसिला जारी रहा। साथ ही होम विज़िट भी शुरू हुए ताकि उसके घर और परिवार को करीब से समझ सकें। लेकिन रीमा की माँ से मुलाकात होना आसान नहीं था। कई बार घर गई, कई बार लौट आई। यह सिलसिला करीब तीन महीने चला। तीन महीने की लगातार कोशिश के बाद आखिरकार उनसे ठीक से बात हो पाई। जब मैंने रीमा की पढ़ने की इच्छा और उसकी काबिलियत उनके सामने रखी, तो उन्होंने कहा — अगर नामांकन हो जाए तो वो उसे भेजने के लिए तैयार हैं।
यह पहली बड़ी जीत थी। लेकिन अभी रास्ता लंबा था।विद्यालय में नामांकन के लिए कोशिशें शुरू हुईं — छह महीने तक बातचीत चलती रही, प्रयास होते रहे। इसी बीच प्रिंसिपल सर ने कहा कि नामांकन अप्रैल में होगा, लेकिन तब तक रीमा स्कूल आना शुरू कर दे। रीमा जाने लगी। और तब मुझे पहली बार लगा कि वो लड़की जो कभी अपने पिता का नाम नहीं बता पाई थी, अब रोज़ सुबह उठकर स्कूल का रास्ता नाप रही है — यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव था।
लेकिन कक्षा में बैठते-बैठते रीमा को लगने लगा कि वो बाकी बच्चों से पीछे है, कि वो पढ़ाई में कमज़ोर है। वो डर जो धीरे-धीरे कम हो रहा था, फिर से लौटने लगा था।
जब यह दिखा, तो मैं फिर से उसे लेकर प्रिंसिपल सर के पास गई। इस बार मैंने सिर्फ नामांकन की बात नहीं की — मैंने रीमा की पूरी कहानी उनके सामने रखी। सर ने सब सुना। और फिर उन्होंने रीमा का निशुल्क नामांकन कर दिया। इतना ही नहीं — उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई शिक्षक रीमा की पढ़ाई में सहयोग नहीं करेगा, तो वो खुद उसे पढ़ाएंगे।
जिस दिन नामांकन हुआ, रीमा के चेहरे पर जो भाव था — वो मैं शब्दों में नहीं रख सकती।
वो लड़की जो कुछ महीने पहले प्रिंसिपल के सामने अपने पिता का नाम नहीं बता पाई थी, उस दिन अपना नामांकन फॉर्म हाथ में थामे खड़ी थी। उसकी माँ की आँखें भरी हुई थीं।
नौ महीने। तीन महीने माँ को ढूँढने में, छह महीने नामांकन के लिए। इस पूरे वक्त में कई बार लगा कि शायद अब नहीं होगा। लेकिन हर बार रीमा की वो आँखें याद आ जाती थीं — जिनमें पढ़ने की इच्छा थी, भले ही शब्द नहीं थे। और मैं फिर निकल पड़ती थी।
लेखिका परिचय
नाम: सपना कुमारी परिचय: उदयपुर, कलारामपुर, जमालपुर ब्लॉक, मुंगेर की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-7 की एडू-लीडर रह चुकी हैं। i-Saksham से जुड़ाव: 2021 लक्ष्य: समाज में सकारात्मक बदलाव लाना।
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