“अम्मी, आप भेदभाव कर रही हैं।”
यह वह आवाज़ है जो अब मुज़फ्फरपुर के एक घर में सुनाई देती है। मेरा नाम लाडली खातून है और मैं i-Saksham की एडू-लीडर हूँ।
हम नाजरीन और नाजनी की अम्मी से मिलने गए थे। अम्मी ने बहुत ईमानदारी से अपनी परेशानी रखी: "नाजनी पढ़ाई में बैठती तो है, लेकिन थोड़ी देर में उठ जाती है। ध्यान नहीं टिक पाता, इसलिए मैं उससे घर का काम करवा लेती हूँ।" यह एक आम समस्या थी—पढ़ाई और काम के बीच बेटियों की प्राथमिकता का संघर्ष।
मैंने उनकी बातों को ध्यान से सुना और उनकी ही प्राथमिकता को स्पष्ट करने के लिए सवाल पूछा: 'वो ऐसा क्या कर सकती है जिससे पढ़ाई मे बच्ची का मन ज़्यादा लगे?'
थोड़ी देर सोचने के बाद अम्मी ने खुद फैसला लिया: “अब मैं कोशिश करूँगी कि जब नाजनी पढ़ाई करे, उस समय उससे कोई काम न करवाऊँ। बार काम के लिए उठाने से लय और ध्यान टूटता है”
बातचीत यहीं नहीं रुकी। अम्मी ने खुद बदलाव की बात कही। उन्होंने बताया कि अब जब भी नाजरीन लंच में स्कूल से घर आती है, वह उसे दुबारा स्कूल भेज देती हैं।
इस बातचीत का सबसे गहरा असर तब सामने आया, जब अम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा कि लैंगिक भेदभाव पर होने वाली सत्रों की चर्चाओं का असर अब घर में दिखने लगा है। उन्होंने कहा कि अगर वह बेटे को ज़रा-सा भी ज्यादा महत्व देती हैं, तो उनकी तीनों बेटियाँ उन्हें टोक देती हैं और कहती हैं: “अम्मी, आप भेदभाव कर रही हैं।”उस पल यह साफ़ हो गया कि हमारा काम सिर्फ किशोरियों तक सीमित नहीं रहा। बेटियाँ अब बराबरी को समझने लगी हैं और घर के भीतर ही अपनी आवाज़ उठाने लगी हैं।
लेखिका परिचय:
नाम: लाडली खातून
परिचय: लाडली गाँव मझौलिया, ब्लॉक सकरा, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 में i-Saksham के बैच 12 की एडू-लीडर हैं।
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