“अब पढ़ाई की क्या ज़रूरत है?”
यह बात सकरा ब्लॉक के मझौलिया गाँव में सवा प्रवीण के घर में कई बार कहा जा चुका था। सवा हर बार चुप रह जाती थी। वह कभी स्कूल की तेज़ छात्रा थी, लेकिन घर की ज़िम्मेदारियाँ और आर्थिक दबाव उसे धीरे-धीरे स्कूल से दूर ले गए। एक दिन उसकी पढ़ाई छूट गई—और सबने मान लिया कि अब यही उसकी कहानी है।
मैं, शालिना खातून, मझौलिया की एडू-लीडर हूँ। सवा से पहली मुलाक़ात में मैंने उसकी आँखों में एक अनकहा-सा डर, लेकिन उसके पीछे एक सपनों से भरी चमक भी देखी।
मैंने तय किया कि मैं सिर्फ सलाह नहीं दूँगी, बल्कि उसे समझने के लिए कोचिंग कौशल का उपयोग करूँगी। मेरे साथ मेरी मम्मी भी थीं, जिन्होंने अनुभव से बात करने में मदद की।
हम दोनों सवा के घर बैठे। मैंने अपनी ट्रेनिंग में सीखे हुए तरीके से सवा से सवाल करने शुरू किए—सवा क्या चाहती है, उसे किस बात का डर है, और घर में पढ़ाई को लेकर सबसे बड़ी चिंता क्या है। मैंने धीमी गति से बातचीत की ताकि सामने वाला अपनी बात पूरी कर सके, जैसा कि सक्रिय श्रवण (Active Listening) में सिखाया जाता है। मेरी मम्मी ने भी अपने जीवन के अनुभव साझा किए।
सवा के माता-पिता, जो अब तक सिर्फ़ परिस्थितियाँ देख रहे थे, पहली बार अपनी बेटी की बात सुन रहे थे। उन्होंने उसी समय निर्णय नहीं लिया।
कुछ ही दिनों बाद परिवार ने तय किया कि सवा दोबारा पढ़ेगी। उसे 11वीं कक्षा में एडमिशन मिला।
यह सिर्फ़ स्कूल लौटना नहीं था, बल्कि उस सामाजिक सोच को चुनौती देना था जहाँ लड़की की पढ़ाई को गैर-ज़रूरी मान लिया जाता है। आज सवा नियमित स्कूल जाती है, नोट्स बनाती है, और सबसे अहम बात—वह फिर से मुस्कुराने लगी है।
मुझे एहसास हुआ कि बदलाव हमेशा बड़े कदमों से नहीं आता। कई बार ध्यान से सुनना, सही सवाल पूछना और सामने वाले को अपनी बात कहने की जगह देना—यही सबसे असरदार कौशल बन जाता है।
लेखिका परिचय:
नाम: शालिना खातून
परिचय: शालिना खातून गाँव मझौलिया, ब्लॉक सकरा, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2025 में i-Saksham के बैच 12 की एडू-लीडर के रूप में जुड़ीं।
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