"बच्चों को छोड़कर बाहर जाना तुम्हें शोभा नहीं देता"
मेरा नाम लखी कुमारी सिंह है। मैं जमुई जिले की रहने वाली हूँ और i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हूँ।
जब मुझे पता चला कि बिहार दिवस के मौके पर पटना के गांधी मैदान में i-Saksham के स्टॉल का प्रतिनिधित्व करने के लिए मेरा नाम चुना गया है, तो पहला एहसास खुशी का था। लेकिन घर में बात रखते ही जो सुना, वो जाना-पहचाना था —
"बच्चों को छोड़कर बाहर जाना तुम्हें शोभा नहीं देता।"
यह पहली बार नहीं था जब यह बात कही गई थी। लेकिन इस बार दाँव ज़्यादा था — तीन दिन, घर से दूर, पति और बच्चों के बिना। मैं दो बच्चों की माँ हूँ। घर की ज़िम्मेदारियाँ, खाना बनाना, बच्चों की देखभाल — यह सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। तीन दिनों के लिए यह सब छोड़कर जाना आसान फैसला नहीं था।
मेरे पति ने कहा कि इतने दिन बाहर रहने की क्या ज़रूरत है। आसपास के लोगों की बातें भी कानों में गूँज रही थीं। मैं समझ सकती थी कि इन बातों में चिंता भी थी और समाज की पुरानी सोच भी। लेकिन इस बार मैंने चुप रहने के बजाय अपनी बात रखी — कि यह सिर्फ यात्रा नहीं है, यह अपने काम को एक बड़े मंच पर ले जाने का मौका है।
बात आसानी से नहीं बनी। तब मैंने अपने ससुर से बात की — जो हमेशा मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उन्होंने सुना और साथ दिया। मेरी Buddy ने भी परिवार से बातचीत की। कई बातचीतों के बाद परिवार तैयार हुआ।
अनुमति मिलने के बाद भी मैं पूरी तरह निश्चिंत नहीं थी।
सामान पैक करते वक्त ध्यान बार-बार बच्चों की तरफ जाता था — समय पर खाना खाएँगे या नहीं, कोई ज़रूरत हुई तो कौन देखेगा। लेकिन एक बात मन में थी — अगर इस बार पीछे हट गई, तो शायद खुद पर भरोसा करने का एक बड़ा मौका खो दूँगी।
जब टीम के साथ निकली, तो मन में उत्साह और चिंता दोनों थे। रास्ते में साथियों से बातें हुईं, हँसी हुई — और देखते-देखते सफर कब बीत गया, पता नहीं चला।
गांधी मैदान में i-Saksham के स्टॉल पर मेरी ज़िम्मेदारी सिर्फ खड़े रहने की नहीं थी। लोगों से बातचीत करनी थी, बताना था कि i-Saksham क्या है, Voice & Choice क्या है, लड़कियों के नेतृत्व के लिए हम क्या करते हैं।
शुरुआत में थोड़ी झिझक हुई। लेकिन धीरे-धीरे सहज होती गई। जब लोग रुककर ध्यान से सुनते थे, तो मुझे अपने वो शुरुआती दिन याद आते थे — जब मैं खुद दस लोगों के सामने बोलने से हिचकिचाती थी।
तीन दिन तक लगातार लोगों से संवाद किया। सवालों के जवाब दिए। अनुभव साझा किए।
घर लौटकर जब बच्चों से मिली, तो एक बात साफ थी।
गांधी मैदान पहुँचना सबसे बड़ी बात नहीं थी।
सबसे बड़ी बात यह थी कि जिस महिला से कहा गया था कि बच्चों को छोड़कर बाहर जाना शोभा नहीं देता — वही महिला तीन दिन तक एक बड़े मंच पर अपने संगठन की आवाज़ बनकर खड़ी रही।
और घर में सब ठीक था।
लेखिका परिचय
नाम: लखी कुमारी सिंह
परिचय: जमुई जिले की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-11 की एडू-लीडर हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: 2024
लक्ष्य: अपने समाज में Voice and Choice को बढ़ावा देना और हर दिन कुछ नया सीखकर अपने गाँव और समुदाय में बदलाव लाना।
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