Friday, September 18, 2026

"नहीं देख पाते कि बच्चा स्कूल गया या नहीं।"

"दीदी, हम सुबह काम पर निकल जाते हैं और शाम को लौटते हैं। कई बार यह भी नहीं देख पाते कि बच्चा स्कूल गया या नहीं।"

यह बात उस अभिभावक ने बहुत सहजता से कही थी। जैसे यह कोई शिकायत नहीं, बस जीवन की एक हकीकत थी।

मेरा नाम अर्चना है। मैं बेगूसराय के सिंघौल गाँव की रहने वाली हूँ और बैच-10 की एडू-लीडर हूँ। उस दिन मैं और रोहिणी दी मिलकर घर-घर PTM कर रही थीं। स्कूल के HM ने हमें उन बच्चों की सूची दी थी जो नियमित नहीं आ रहे थे। HM ने कहा था - "सिर्फ यह जानना काफी नहीं कि बच्चा नहीं आ रहा। यह भी जानना ज़रूरी है कि क्यों नहीं आ रहा।"

वो बात मन में थी जब हम पहले घर पहुँचे।

बारिश हो रही थी। सभी को एक जगह बुलाना संभव नहीं था। इसलिए हमने तय किया कि हम जाएँगे।


हर घर में हमने पढ़ाई से शुरुआत नहीं की।

पहले हाल-चाल पूछा। परिवार के बारे में जाना। जब उन्हें लगा कि हम सिर्फ बच्चे की गैरहाज़िरी गिनने नहीं आए, तब उन्होंने खुलकर बात करना शुरू किया।

एक अभिभावक ने कहा - "कई बार यह भी नहीं देख पाते कि बच्चा स्कूल गया या नहीं।" दूसरे ने कहा - "रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियों के बीच उतना ध्यान नहीं दे पाते जितना देना चाहते हैं।"

उनकी बातें सुनकर समझ आया कि बच्चों के स्कूल न आने के पीछे अक्सर उनकी इच्छा नहीं, परिवार की परिस्थितियाँ होती हैं।

मैंने उनसे कहा - "अगर रोज़ पाँच मिनट बच्चे के साथ बैठकर पूछें कि आज स्कूल में क्या हुआ, तो उसे लगेगा कि उसकी पढ़ाई आपके लिए भी ज़रूरी है।" कुछ घरों में इंतज़ार करना पड़ा। कुछ जगह दरवाज़ा बंद मिला। लेकिन जहाँ भी बातचीत हुई, वो असली थी।

कुल तीस घर। कुल तीस अलग कहानियाँ।


लौटते वक्त रोहिणी दी ने कहा - "इस बार की PTM अलग रही।"

मुझे भी ऐसा ही लगा।

स्कूल में बुलाकर बात करने और घर जाकर बात करने में जो फर्क होता है, वो उस दिन समझ आया। जब हम उनके दरवाज़े पर जाते हैं, तो वे अपनी असली बात कहते हैं।

और वही असली बात सबसे ज़रूरी होती है।


लेखिका परिचय

नाम: अर्चना कुमारी
परिचय: सिंघौल, सुशील नगर, बेगूसराय की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-10 की एडू-लीडर हैं।
लक्ष्य: सिविल सेवा में शामिल होकर महिलाओं के अधिकार, शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए काम करना।

Friday, September 11, 2026

"हस्ताक्षर नहीं आता तो लोन नहीं मिलेगा।"

"हस्ताक्षर नहीं आता तो लोन नहीं मिलेगा।"

CRO के मुँह से यह सुनते ही रानी देवी के पाँव जहाँ थे, वहीं रुक गए। सिर पर बेटी की शादी की ज़िम्मेदारी थी। हाथ में पैसे नहीं थे। और अब यह।

मेरा नाम गुड़िया है। मैं मुजफ्फरपुर के राजवाड़ा गाँव की रहने वाली हूँ और बैच-12 की एडू-लीडर हूँ। उस दिन मैं उसी महिला समूह की बैठक में थी जब रानी देवी लोन लेने आई थीं। CRO सर ने आगे कहा - "अगर आपको हस्ताक्षर करना नहीं आता, तो हम लोन नहीं दे सकते। बैंक भी पैसे नहीं देगा।"

रानी देवी 38 साल की हैं। बेटी की शादी तय हो चुकी थी। पैसों की तंगी और समाज का दबाव - इन दोनों के बीच उन्होंने लोन का रास्ता चुना था। और अब यह रास्ता भी बंद लग रहा था।

मुझसे रहा नहीं गया।

मैंने CRO सर से पूछा - "सर, क्या अगले हफ्ते इनका लोन पास हो सकता है?"

उन्होंने कहा - "हाँ, जब तैयार हों तब हो सकता है।"

मैं रानी देवी के पास गई और बोली - "चाची, मैं आपको हस्ताक्षर करना सिखाऊँगी।"

उन्होंने झट से कहा - "बेटा, अगर तुम सिखा दोगी तो जितना कहोगी उतने पैसे दूँगी।"

मैंने कहा - "मुझे पैसे नहीं चाहिए। बस आप सीख जाइए।"


अगले दिन से शुरुआत हुई।

पहले एक-एक अक्षर। फिर धीरे-धीरे पूरा नाम। रानी देवी रोज़ अभ्यास करतीं। हाथ काँपता था, अक्षर टेढ़े-मेढ़े बनते थे। लेकिन वो रुकती नहीं थीं।

चार-पाँच दिनों की मेहनत के बाद वो अपना नाम लिख पाईं।

जिस दिन उन्होंने पहली बार खुद अपने दम पर कागज़ पर नाम लिखा, उनके चेहरे पर जो था उसे मैं शब्दों में नहीं रख सकती। उन्होंने बस इतना कहा - "अब मुझे लोन मिल जाएगा। मेरी बेटी की शादी अच्छे से होगी।"

अगली बैठक में लोन पास हो गया।


लेखिका परिचय

नाम: गुड़िया कुमारी
परिचय: रजवाड़ा गाँव, मशहरी, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-12 की एडू-लीडर हैं।
लक्ष्य: शिक्षा के ज़रिये समुदाय में बदलाव लाना।

Friday, September 4, 2026

"पढ़ाई करके क्या करेगी?"

 "पढ़ाई करके क्या करेगी?"

"दीदी, मम्मी बोलती हैं कि पढ़ाई करके क्या करेगी? आखिर में तो घर का काम, चूल्हा-बर्तन ही करना है।"

किरण ने यह बात बहुत सामान्य तरीके से कही थी। लेकिन उसके चेहरे की उदासी बता रही थी कि वह खुद ऐसा नहीं सोचती।

मेरा नाम सोनम है। मैं जमुई जिले के कश्मीर गाँव की रहने वाली हूँ और i-Saksham में Buddy की भूमिका में कार्यरत हूँ। किरण से मेरी पहली मुलाकात सेशन में हुई थी। वो कम बोलती थी, लेकिन हर गतिविधि में ध्यान से हिस्सा लेती थी। जब दूसरे बच्चे अपने स्कूल के किस्से सुनाते, तो वो चुपचाप सुनती रहती।

आठवीं के बाद उसका नौवीं में नामांकन नहीं हुआ था। करीब एक साल से वो घर पर थी। माँ के साथ खेत जाती, जंगल से लकड़ी लाती, छोटे भाई-बहनों की देखभाल करती। फिर भी हमारे सेशन में नियमित आती थी। जब भी स्कूल की बात होती, वो बस इतना कहती - "मैं तो पढ़ना चाहती हूँ दीदी, लेकिन मम्मी नहीं मानतीं।"

एक दिन बहुत धीरे से उसने कहा - "दीदी, मुझे भी ड्रेस पहनकर स्कूल जाना है। बाकी लड़कियों को देखकर मन करता है।"


होम विज़िट के दौरान जब मैं उसकी माँ से मिली, तो उन्होंने बिना झिझक कहा - "हमारे यहाँ लड़कियाँ ज़्यादा नहीं पढ़तीं। आठवीं तक पढ़ ली, वही बहुत है। उसके बाद तो घर का काम सीखना होता है। आखिर में घर ही संभालना है।"

उस दिन मैंने उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की।

बस उनकी बात सुनी।

और जाती रही। हर बार। कभी किरण की पढ़ाई की बात होती, कभी घर-परिवार की। कई बार बातचीत जल्दी खत्म हो जाती। लेकिन धीरे-धीरे हमारे बीच कुछ बनने लगा था।


फिर एक दिन मदर मीटिंग में सबसे हस्ताक्षर करवाए जा रहे थे।

किरण की माँ ने कहा - "हमें तो साइन करना भी नहीं आता।"

मैंने उनसे बस इतना कहा - "आंटी, आज आपको साइन न कर पाने की कमी महसूस हो रही है। अगर किरण की पढ़ाई भी यहीं रुक गई, तो आगे चलकर उसे भी यही महसूस हो।"

उस समय उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

अगले दिन जब मैं सेशन लेने पहुँची, तो उन्होंने खुद मुझे दूर से बुलाया और पूछा - "नौवीं में एडमिशन के लिए क्या-क्या लगेगा?"

मैंने पूरी प्रक्रिया समझाई। उन्होंने बताया कि इन सब चीजों की जानकारी ही नहीं थी।

कुछ दिनों बाद किरण का नौवीं कक्षा में नामांकन हो गया।


आज किरण नियमित स्कूल जाती है। ट्यूशन भी जाती है। जब भी मिलती है, उसके चेहरे पर पहले जैसी झिझक नहीं होती।

और वही माँ, जिन्होंने कहा था - "पढ़ाई करके क्या करेगी?" - उन्होंने खुद आकर नामांकन का रास्ता पूछा था।


लेखिका परिचय

नाम: सोनम कुमारी
परिचय: कश्मीर गाँव, जमुई जिले की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-9 की एडू-लीडर रह चुकी हैं और वर्तमान में Buddy की भूमिका में कार्यरत हैं।
i-Saksham से जुड़ाव: बैच-9
लक्ष्य: शिक्षक बनना। वर्तमान में B.Sc. Geology Honours की पढ़ाई कर रही हैं।