"दीदी, हम सुबह काम पर निकल जाते हैं और शाम को लौटते हैं। कई बार यह भी नहीं देख पाते कि बच्चा स्कूल गया या नहीं।"
यह बात उस अभिभावक ने बहुत सहजता से कही थी। जैसे यह कोई शिकायत नहीं, बस जीवन की एक हकीकत थी।
मेरा नाम अर्चना है। मैं बेगूसराय के सिंघौल गाँव की रहने वाली हूँ और बैच-10 की एडू-लीडर हूँ। उस दिन मैं और रोहिणी दी मिलकर घर-घर PTM कर रही थीं। स्कूल के HM ने हमें उन बच्चों की सूची दी थी जो नियमित नहीं आ रहे थे। HM ने कहा था - "सिर्फ यह जानना काफी नहीं कि बच्चा नहीं आ रहा। यह भी जानना ज़रूरी है कि क्यों नहीं आ रहा।"
वो बात मन में थी जब हम पहले घर पहुँचे।
बारिश हो रही थी। सभी को एक जगह बुलाना संभव नहीं था। इसलिए हमने तय किया कि हम जाएँगे।
हर घर में हमने पढ़ाई से शुरुआत नहीं की।
पहले हाल-चाल पूछा। परिवार के बारे में जाना। जब उन्हें लगा कि हम सिर्फ बच्चे की गैरहाज़िरी गिनने नहीं आए, तब उन्होंने खुलकर बात करना शुरू किया।
एक अभिभावक ने कहा - "कई बार यह भी नहीं देख पाते कि बच्चा स्कूल गया या नहीं।" दूसरे ने कहा - "रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियों के बीच उतना ध्यान नहीं दे पाते जितना देना चाहते हैं।"उनकी बातें सुनकर समझ आया कि बच्चों के स्कूल न आने के पीछे अक्सर उनकी इच्छा नहीं, परिवार की परिस्थितियाँ होती हैं।
मैंने उनसे कहा - "अगर रोज़ पाँच मिनट बच्चे के साथ बैठकर पूछें कि आज स्कूल में क्या हुआ, तो उसे लगेगा कि उसकी पढ़ाई आपके लिए भी ज़रूरी है।" कुछ घरों में इंतज़ार करना पड़ा। कुछ जगह दरवाज़ा बंद मिला। लेकिन जहाँ भी बातचीत हुई, वो असली थी।
कुल तीस घर। कुल तीस अलग कहानियाँ।
लौटते वक्त रोहिणी दी ने कहा - "इस बार की PTM अलग रही।"
मुझे भी ऐसा ही लगा।
स्कूल में बुलाकर बात करने और घर जाकर बात करने में जो फर्क होता है, वो उस दिन समझ आया। जब हम उनके दरवाज़े पर जाते हैं, तो वे अपनी असली बात कहते हैं।
और वही असली बात सबसे ज़रूरी होती है।
लेखिका परिचय
नाम: अर्चना कुमारी
परिचय: सिंघौल, सुशील नगर, बेगूसराय की रहने वाली हैं। i-Saksham बैच-10 की एडू-लीडर हैं।
लक्ष्य: सिविल सेवा में शामिल होकर महिलाओं के अधिकार, शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए काम करना।
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