Tuesday, January 16, 2024

अच्छा तो हम नकली नोटों से भी बच्चों को जोड़-घटाव सिखा सकते हैं! –अभिभावक

 प्रिय दोस्तों,

आज मैं आपके साथ लोहरा गाँव में हुई अभिभावक शिक्षक मीटिंग (PTM) के अनुभव को साझा करने जा रही हूँ। यह PTM उत्क्रमित मध्य विद्यालय लोहरा हिंदी में हुई। PTM का समय प्रातः 11 बजे का रखा गया था। इस PTM में 25 अभिभावक सम्मिलित हुए जो सुनिश्चित समय पर उपस्थित थे।

मैंने अपना सेशन, सभी का स्वागत और समय निकाल कर आने के लिए आभार व्यक्त करते हुए शुरू किया। मीटिंग की शुरुआत हमने एक छोटी सी गतिविधि से की। इस गतिविधि का नाम Number & Clap है। गतिविधि इस प्रकार थी कि हम एक अंक बोलेंगे और सभी प्रतिभागी उतनी ही तालियाँ बजायेंगें। लेकिन शर्त यह है कि तालियों की आवाज एक साथ आनी चाहिए। सभी अभिभावकों ने इस गतिविधि में अच्छे से भाग लिया और इस बात को समझा कि हम कैसे ताली बजाकर भी बच्चों को अंकों का बोध करा सकते हैं।

फिर अभिभावकों कार्ड की मदद से शब्दों को कैसे जोड़ा जाता है, जिससे की बच्चें आसानी से शब्दों को पढ़ सकें, यह गतिविधि की। ये कार्ड टीचिंग लर्निंग मटेरियल (TLM) से लिए गए थे।

इसमें बच्चों ने स्वयं ही आगे आकर ‘अक्षरों से शब्द कैसे बनता है? उसे क्या पढ़ा जायेगा?’ का जीवंत उदाहरण सभी उपस्थित प्रतिभागियों को दिया। यह देखकर अभिभावक ताली बजा कर बच्चों का उत्साह बढा रहे थे।

इसके बाद हमनें TLM से रूपये निकाले और सभी अभिभावकों में बाँटे। रूपये बाँटकर गिनने का अनुरोध किया तो सभी अभिभावकों ने जल्दी-जल्दी रूपये गिन कर बता दिए। यह देखकर बच्चे खुश होकर जोर-जोर से तालियाँ बजाने लगे। अभिभावक स्वयं ही बोलने लगे कि हम लोग पहले इधर-उधर से आये हुए नकली नोटों को फेंक दिया करते थे, अब नहीं फेकेंगें। आज हमने जाना कि हमारे बच्चें इससे भी जोड़ना-घटाना सीख सकते हैं।

अंत में हेडमास्टर सर आये और कुछ आवश्यक बातें अभिभावकों से की। मैंने सभी प्रतिभागियों को धन्यवादज्ञापन देने के साथ इस PTM को विराम दिया।

अंजली
बैच-9, जमुई

“ऐसा लगा कि समय पर दर्पण देख लिया हो”- पहली बड़ी टॉक

 नमस्ते साथियों,

पिछले तीन महीनों से लगातार प्रयासरत होने के बाद मेरा ‘बडी टॉक’ वाला कार्य इस माह सफलतापूर्वक पूरा हो पाया। मेरी बडी मोना दीदी हैं जो बैच-5 की एडू-लीडर रह चुकी हैं और वर्तमान में i-सक्षम टीम का हिस्सा हैं।

वैसे तो मेरे लिए बड़ी बात यह भी है कि जिन दीदी से मैं एक-दो बार ही मिली (परिचय के अलावा ज्यादा बात नहीं हुई थी।) उनके साथ मैंने ‘सवा घंटा’ बातचीत की। दोस्तों, बातचीत का अर्थ यहाँ यह नहीं है कि एकतरफा बात हुई। आप तो जानते ही हैं कि मैं थोडा तेजी से बोलती हूँ। परन्तु उनके प्रश्न, प्रश्न पूछने का तरीका, मैं कुछ बोल रही हूँ तो उसे दोहरा कर भलीभांति पुष्टि करने का तरीका, उनका मेरी बातों को उत्सुकतापूर्वक सुनना, मेरे लिए सुखद अनुभव रहा।

 

मेरे जीवन के लक्ष्यों को सोचने के लिए प्रेरित करना, क्या-क्या अपेक्षित चुनौतियाँ हो सकती हैं- इस सन्दर्भ में उनसे बात करके महसूस हुआ कि जैसे मैं किसी लम्बी यात्रा पर हूँ और बीच रास्ते में कोई मुझे मेरा लक्ष्य याद कराने आया है। वैसे तो हम सभी को अपना लक्ष्य पता होता ही है परन्तु हम कल कहाँ थे? आज कहाँ खड़े हैं? और कल कहाँ पहुँचना चाहेंगे? पर कोई विस्तारपूर्वक बात करता है तो लगता है कि सही समय पर दर्पण देख लिया हो। अब लगता है कि मैं अपने साथियों, बड़ों तथा परिजनों को भी स्पष्टता से समझा पाऊँगी।

 

मेरे लिए पहली बड़ी टॉक बहुत उपयोगी रही। मैं, मेरी बडी (मोना दीदी) और फ़ेलोशिप करिकुलम की इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया के प्रति अपना आभार व्यक्त करती हूँ। मैं अगली बडी टॉक के लिए उत्सुक हूँ और कोशिश करुँगी कि अपनी चुनौतियों को, अपनी सोच को और छोटे-छोटे लक्ष्यों को और बारीकी से अपने बडी के सामने रख सकूँ जिससे मुझे और आप सभी को मेरे अनुभवों को पढने से कुछ सहायता मिल सके।

 

रश्मि रानी
बैच-9, मुँगेर

लक्ष्य रहेगा शौचालय में पानी की व्यवस्था करने के लिए आवाज़ उठाना- क्लस्टर मीटिंग

 

प्रिय साथियों,

मैं, मध्य विद्यालय लठाने में संपन्न हुई क्लस्टर मीटिंग के अनुभव को आपके साथ साझा कर रही हूँ। इस मीटिंग के लिए मैं बहुत दिनों से उत्सुक थी। नयी जगह और अधिक दूरी के कारण हम सभी को पहुँचने में थोडा विलम्ब हुआ। हम लगभग साढ़े दस बजे पहुचें। हेडमास्टर से मिलना चाहा तो पता चला कि वो कक्षा में बच्चों को पढ़ा रहें हैं। कुछ ही देर में हमें उनसे मिलने का अवसर मिला। उन्हें देखते ही याद आया "ये मेरे ही विद्यालय में शिक्षक पद पर कार्यरत थे"। मुझे यह जानकार बहुत प्रसन्नता हुई कि ये वर्तमान में यहाँ हेडमास्टर का कार्यभार संभाल रहे हैं। मैंने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की और उन्हें आज की क्लस्टर मीटिंग के बारे में जानकारी दी। साथ ही कक्षा के बाद मीटिंग में सम्मिलित होने का आग्रह किया।

मीटिंग की शुरुआत मैडिटेशन से करके, हमने मोर्निंग सर्कल किया। इस महीने क्या बेहतर हुआ? क्या सुधार करने की आवश्यकता है? पिछला एक्शन प्लान क्या था? क्या-क्या चुनौतियाँ आयी? सफल पड़ाव क्या थे? अगला एक्शन प्लान क्या होगा? इन सभी बातों पर विस्तारपूर्वक चर्चा हुई।

इस रिफ्लेक्शन के बाद अभिभावक शिक्षक मीटिंग (PTM) विषय केंद्र में रहा। जो नयी एडू-लीडर्स हैं उन्हें PTM को लेकर बहुत चिंता हो रही थी कि हमारे विद्यालय में PTM कैसे संपन्न होगी? अभिभावक कैसे आएंगे? आएंगे भी या नहीं आएंगे? उनके सहयोग में उनकी बडी तो थी ही लेकिन फिर भी उन्हें घबराहट हो रही थी। (यही भाव और प्रश्न मुझे पहली PTM में परेशान कर रहे थे। मुझे पता था कि मेरी बडी और अन्य साथी मेरे सपोर्ट (support) में है लेकिन फिर भी मेरे मन में भी इन लोगों की तरह बहुत सारे प्रश्न थे।) 

हम लोगों ने मिलकर नयी एडू-लीडर्स को समझाया, अपने PTM के अनुभव साझा किये। जिससे उनका मनोबल बढ़ा।

आधी से ज्यादा मीटिंग होने के बाद हेडमास्टर सर आए। हम लोग नीचे दरी पर बैठे थे और पास में तीन कुर्सियां भी थी। हमने सर को कुर्सी पर बैठने के लिए निवेदन किया परन्तु उन्होंने अपने जूते उतार कर हमारे साथ उसी दरी पर बैठना सही समझा। उनका हमारे प्रति इस प्रकार का भाव और व्यव्हार देखकर मुझे काफी प्रसन्नता हुई। मैं आप लोगों को बताना चाहती हूँ कि ये वही सर हैं जो बच्चों को भूख लगने पर अपना लंच निकाल कर खाने के लिए दे दिया करते थे।

हमारी इस मीटिंग को लेकर हेडमास्टर जी के कुछ प्रश्न थे। उदाहरण के लिए कुछ प्रश्न ये हैं- इस मीटिंग को करने का उद्देश्य क्या है? कितने अन्तराल पर यह मीटिंग होती है? हमने सर के सभी प्रश्नों का उत्तर दिया और उनसे आग्रह किया कि विद्यालय में काजल को समयानुकूल आवश्यक सहायता प्रदान की जाए। सर ने सहमति जतायी और बातों-बातों में i-सक्षम के नाम से उन्हें परमजीत भैया की याद आयी। उन्होंने बताया कि HM & ICT Training DIET Gidhaur, Jamui में परमजीत से भेंट हुई, वे प्रशिक्षण देने में निपुण लगे। मैंने उन्हें बताया कि हाँ, वो पहले i-सक्षम में ही कार्यरत थे और अब वे आदित्य बिरला फाउंडेशन में अपनी सेवाएं दे रहें हैं। हेडमास्टर सर ने हम सभी के लिए जल-पान की व्यवस्था की हुई थी, हमारे काफी मना करने के बाद भी सर नहीं माने तो हमें जल-पान करना पड़ा। हमने सर को धन्यवाद दिया।

मैं अपना अगला लक्ष्य यह रखती हूँ कि मेरे विद्यालय के शौचालय में पानी की व्यवस्था हो। साथियों आप मेरे पुराने अनुभवों को पढ़कर जान रहे होंगे कि शौचालय पहले ही बन गया था। टंकी और नल भी लग थे, लेकिन उसमें पानी की व्यवस्था नहीं हुई है तो नवंबर महीने में “पानी की व्यवस्था करवाना” मेरा लक्ष्य रहेगा। ‘बढ़ते कदम’ प्रोजेक्ट के साथ हमारी मीटिंग खत्म हुई। इस बार की मीटिंग बहुत ही ज्यादा आनंदायी रही।

    अनन्या
    बैच-9, जमुई


      Monday, January 15, 2024

      Voice & Choice के sessions से बदल रही है एडू-लीडर और उनके परिवारजनों की सोच

      साथियों,

      मैं आपलोग के साथ निशु दीदी, जो बैच 9 की एडू-लीडर हैं, का अनुभव शेयर करना चाहती हूँ। निशु दीदी में मुझे एक बड़ा बदलाव दिखा कि वो पहले अपनी बातों को सेशन में नहीं रखती थी। लेकिन अब वो अपनी बात रखती हैं।

      साथ ही उनका कहना था कि वो अपनी बात घर में भी नहीं रख पाती थी। 

      जैसे- उन्हें क्या खरीदना है? या क्या पढना है? 

      निशु दीदी का कहना था कि उनकी माँ और भाई हमेशा उनपर अपनी सोच थोपते थे और उनको अपनी बात बोलते समय बोलते थे कि “तुम चुप रहो”!

      इस कारण वो कुछ बोल ही नहीं पाती थी।

      (निशु, बैच-9 कक्षा में बच्चो को पढ़ाते हुए)

      लेकिन दीदी अब अपनी पढाई भी कर रही है और अपनी पसंद की वस्तुएँ भी खरीदती हैं। यह सब हमारे सेशन- “वौइस् एंड चॉइस” के कारण हुआ। दीदी ने जब मुझे बताया कि उनके पास रूपये रहते हैं फिर भी वह अपनी पसंद की कोई चीज नहीं खरीद सकती। तो सुनकर अच्छा महसूस नहीं हुआ।

      उनको कंप्यूटर भी सीखना है, परन्तु भाई के द्वारा मना किये जाने पर वो कर भी नहीं सकती। उस समय मैंने उनसे पूछा भी था कि आपको क्या लगता है कि आपको क्या करना चाहिए?

      तो दीदी ने बोला कि “मुझे, बिना भय के अपनी बात रखना चाहिए और उन्होंने रखी भी”। 

      आज उनका एडमिशन कंप्यूटर क्लास में हो गया है। वो अपनी माँ को समझा पायी कि आज के समय में कंप्यूटर सीखना कितना जरुरी है, बिना इसे सीखे हो सकता है कि आगे कोई जॉब ही ना मिले!

      वॉइस एंड चॉइस सेशन से हो रहे छोटे-छोटे बदलावों में से यह एक बदलाब मैं आपके साथ साझा करके बहुत अच्छा महसूस कर रही हूँ।

      यह लेख लवली दीदी, i-सक्षम मुज़फ्फरपुर ऑफिस की टीम सदस्य द्वारा लिखा गया है।



      पिता जी की सोच और व्यवहार में बदलाव से आगे बढ़ रही है सलोनी- आलोक

       साथियों,

      आज मैं आप सभी को बैच 9 की एडू-लीडर, सलोनी के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ। सलोनी का घर छपरा मेघ है। 

      काफी मेहनती और शांत रहने वाली सलोनी के ऊपर घर की जिम्मेदारी भी है। बचपन में ही माँ का देहांत हो जाने के बाद इनका पालन पोषण इनके पिता जी ने किया।

      दीदी की पढ़ाई भी रुक गयी। दीदी ने जैसे-तैसे बारहवीं की और एडू-लीडर के रूप में i-सक्षम से जुड़ गयी। शुरूआती दौर में दीदी काफी परेशान रहती थी। बहुत से कार्यो में घर से मनाही थी। जैसे- मोबाइल नहीं रख सकते, देर शाम तक घर से बाहर नहीं रह सकते, i-सक्षम परिवार के साथ दूसरी लोकेशन पर नहीं जा सकते। 

      सेशन में आने के लिए मुझे हर बार सलोनी के पापा को फ़ोन करना होता था कि “आज सेशन है, सलोनी को आने दीजिए”। पिछले वर्ष जब हम सारे एडू-लीडर्स को लेकर पटना गये थे तो आने में काफी देर हो गयी थी। जिस कारण उनके पिता जी ने उन्हें लगातार दो सेशन में आने नही दिया।

      मैं सलोनी को लेकर काफी चिंतित था। लेकिन मैं लगातार उनके पिता जी से बातचीत करता रहा। 

      एक बार की बात है, जब दीदी मीडिया वाला सेशन में आयी हुई थी और सेशन में सर्टिफिकेट दिया जा रहा था। सेशन का समय 4 बजे तक था। काफी वर्षा भी हो रही थी। 

      दीदी को घर पहुँचने में देर हो गयी। दीदी, 6:30 में घर पहुँच गयी थी। उसके बाद मुझे सलोनी के पापा का फ़ोन आया और उन्होंने पूछा कि इतनी देर क्यों हुई? 

      अब हम नही जाने देंगे, सेशन में! 

      सिर्फ स्कूल जाने देंगे और मुझसे काफी गुस्से में बात कर रहे थे। 

      मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की। लेकिन अंकल मान ही नहीं रहे थे। मैंने कहा अंकल, मैं आपसे मिलकर बात करूँगा। अगले दिन, जब मैं उनके घर गया तो अंकल बाजार गये हुए थे। मैं बाजार गया और फिर वही अंकल से बात की। उसदिन काफी देर तक बातचीत हुई, मैंने अंकल से एक प्रश्न भी पूछा। मैंने पूछा कि सलोनी को जब घर आने में देर हो भी जाती है तो आप गुस्सा क्यों हो जाते हैं? आपको तो पता है ना कि वह सेशन में आयी है, फिर भी गुस्सा क्यों करते है? 

      अंकल ने कहा कि "नहीं! मैं, देर शाम तक सेशन में जाने नही दूँगा।"

      फिर मैंने उनसे कहा कि सलोनी को थोड़ी देर से घर आने पर इतना गुस्सा कर रहे हैं, क्या आपको हक़ है कि (कभी जरुरत पड़ने पर) आप रात के समय किसी महिला डॉक्टर को ढूंढे?

      मैंने कहा कि मैं, सलोनी को अब कभी लेट नही होने देंगे। लेकिन आप भी मुझसे वादा करें कि मैं कभी भी अपने जीवन में रात होने पर महिला डॉक्टर की मदद नही लूँगा। 

      साथियों मेरी बातचीत बढ़ती रही। अंकल को तो बहस भी लग रही हो सकती है। मैं, उसदिन अंकल को मना नहीं पाया।अगले दिन मैंने ये सभी बातें सलोनी को बतायी। 

      कुछ दिन बाद सलोनी ने मुझे बताया कि मेरे पापा में काफी बदलाव दिख रहा है। अब मुझे घर जाने में देर भी हो तो सिर्फ एक बार फ़ोन कर लेते हैं।

      अब मैं पापा के सामने मोबाइल देख सकती हूँ। पापा मेरी हर बात मानते हैं। अब मैं घर में कैद नही हूँ। अब पापा मुझसे बहुत प्यार करने लगे हैं। इस परिवर्तन की गवाही सलोनी सेशन में देते हुए रो पड़ी। 

      उस समय मैं भी काफी भावुक हो गया था। 

      आज सलोनी अपने जीवन में बहुत खुश है और खुद के साथ-साथ समाज में भी परिवर्तन लाने के लिए कार्य कर रही है।

      (चित्र में सलोनी अपने कक्षा के बच्चो को गतिविधि के माध्यम से लीड करते हुए)

      यह लेख आलोक द्वारा लिखा गया है। आलोक, मुज्ज़फ्फरपुर ऑफिस में टीम सदस्य के रूप में कार्यरत हैं।