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Monday, October 11, 2021

बदलाव की एक पहली शुरुआत: तानिया

बदलाव की पहली शुरुआत 

मीना दीदी ने जबसे इस विद्यालय में पढ़ाना शुरू किया है तब से इनके विद्यालय में काफी चुनौतियां रही हैं। शुरु में तो विद्यालय में पाँच-छ: बच्चे ही आते थे परन्तु अब उपस्थित बच्चों की संख्या 15-20 हो गयी है। 

इनके विद्यालय में अभी बच्चे के उपस्थिति को लेकर समस्याएं हैं और अभिभावक भी जागरूक नहीं है, जो अभिभावक ठीक-ठाक है वो अपने बच्चे को विद्यालय के समय में ट्यूशन भेज देते है और मीना दीदी जब अभिभावकों से बच्चों को विद्यालय भेजने के बारे बात करती हैं तो अभिभावक समझने की बजाय लड़ते-झगड़ते रहते हैं। इसी वजह से और भी समस्याएं इनके विद्यालय में है जिसपर काम करने की जरुरत है।

मुझे जो सबसे बड़ी कमी लगी वो थी समुदाय में शिक्षा के प्रति जागरूकता की। बच्चों के अभिभावकों को अब भी यह लगता है कि विद्यालय में पढ़ाई नहीं होती। 

          (मीना, बैच-7, प्राथमिक विद्यालय बंगालवा मुसहरी में बच्चों को पढ़ाते हुए)

शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने की पहल हमनें “दान-उत्सव” से की। जब मैं विद्यालय पहुँची तो हमेशा की तरह बच्चों की संख्या बहुत कम थी करीब सात-आठ बच्चे ही आए हुए थें । जब उन बच्चों नें मेरे हाथों में किताबें देखीं तो उनके चेहरे से एक प्रश्न जैसा दिख रहा था और उनको लग रहा था कि आज कुछ होने वाला है

फिर मैंने दो-तीन बच्चों से कहा कि आप अपने दोस्तों को भी बुला कर लाइए, जो अब तक विद्यालय नहीं आये हैं। कुछ समय बाद बच्चों की संख्या बीस करीब हो गई। हमनें बच्चों के साथ मिलकर किताबों को सजाया, वकील सर (जो मेरे साथ आये हुए थे) नें मीना दीदी के लाए हुए शिक्षण गतिविधि सामग्री (टी.एल. एम.) को दीवार पर लगाया।

जब किताबें दीवार पर लग गई तो बच्चे इधर-उधर नज़र दौड़ा कर अलग-अलग किताबों को गौर से देख रहें थें और मैंने देखा कि कुछ बच्चे किताबों के बारे में बातचीत भी कर रहे थें। फिर बच्चे व्यवस्थित होकर बैठ गए और मीना दीदी नें बच्चे को कहानी सुनाना शुरू किया। बच्चे बड़े ध्यान से सुन रहे थे और उनकी बातों को दोहरा भी रहें थे। कहानी सुनने के बाद एक बच्चे नें एक और कहानी सुनने की जिद की, उन सब की नज़र एक पुस्तक पर थी जिसमें कुछ अंधेरा था और गुफाएँ बनी हुई थी । वो बच्चे जानना चाहते थे कि उसमें क्या हुआ होगा

बच्चे नें कहा -"दीदी मुझे वो भूत वाली कहानी पसंद है और वो कहानी सुननी है"मैंने उस पुस्तक को उठाया और मैंने देखा कि वो वर्ग-पाँच की पुस्तक थी और लंबी कहानी थी। मैंने उस कहानी को सुनाया पर आधा क्योंकि कहानी बहुत बड़ी थी और उनसे कहा कि आगे की कहानी हम कल सुनेंगे और इसके लिए आप सब को विद्यालय कल भी आना होगा। सभी बच्चों नें जोर से "हाँ आएंगे" कहा। 

फिर मेरा बच्चों के साथ थोड़ा सवाल-जवाब का सत्र हुआ।

जैसे कि आप को किस तरह की कहानी पसंद है?

बच्चों ने जवाब देना शुरू किया कि हमको परी वाली, तो दूसरे नें कहा जादू वाली तो तीसरे ने कहा भूत वाली। फिर मैंने ये पूछा की ऐसी कहानी आपको क्यों पसंद है?

इस सवाल का जवाब कुछ कम बच्चों ने दिया। एक बच्चा जिसका नाम सौरभ था उसने कहा कि हमको भूत वाली कहानी इसलिए पसंद है क्योंकि उसमें लोग डरते है। 

फिर बच्चों नें भी कुछ कहानियां सुनाई पर उनको अभी पढ़ना नहीं आता था तो सिर्फ चित्र देखकर अपनी कल्पनाओं से कहानी बना कर सुनाते गए। 

तब तक वकील सर कुछ अभिभावकों को विद्यालय बुलाकर ले आये और उनसे फिर उनसे बातचीत शुरू हुई। जब हमनें उनसे बातचीत करनी शुरु की तो बहुत शोर होने लगा। महिलाएं आपस में ही बात करने लगीं। वो हमें बोलने का मौका ही नहीं दे रहीं थी।

उनके पास बहुत सारी बातें थीं जो वो कहना चाहती थी, हम थोड़ी देर शांत रहे, उनकी बातों को सुना। अभिभावकों ने अपनी-अपनी बात रखीं। कभी विद्यालय के शिक्षकों के बारे में कुछ कहती, तो कभी पढ़ाई के बारे में, तो कभी साफ-सफाई को लेकर, तो कभी असमानता की बात करने लगती। 

जब सभी अभिभावकों ने अपनी पूरी बात रख ली तो वकील सर और मैंने अपनी बात कही। उन्होंने मीना दीदी के बारे में बताया, शिक्षा की महत्वता को बताया।

इस दान-उत्सव में हुई बैठक से सभी अभिभावक मीना दीदी के बारे में जान पाए और उन्होंने कहा कि हम अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विद्यालय भेजेंगे परन्तु बीच-बीच में कक्षा में आकर जायजा लिया करेंगे। हमारी लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती थी, हमें यह सुनकर काफी अच्छा लगा। 

जब विद्यालय के शिक्षक ने जाना कि बच्चे के अभिभावक आएंगे तो उन्होंने उनके बैठने के लिए दूसरी दरी की व्यवस्था करा दी, वो बैठक में शामिल तो नहीं हो पाये पर उनको दान-उत्सव काफी अच्छा लगा। 

ये पहला प्रयास हमारा काफी अच्छा रहा पर उन अभिभावकों से भी मिलने की कोशिश रहेगी जिनके बच्चे ट्यूशन जाते हैं और वो अपने बच्चे को विद्यालय नहीं भेजते।

Thursday, May 6, 2021

पूजा के लगातार प्रयासों से प्रेरित हुए अभिभावक: स्मृति

जब अप्रैल में लॉकडाउन खुला तो चारों तरफ खुशी की लहर दौड़ उठी; सभी बच्चे फिर से स्कूल जाने लगेI बच्चों केे अभिभावक, एडु-लीडर सभी बहुत खुश थेI लेकिन यह ख़ुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाई l क्योंकि कोरोना पहले केे मामले में ज्यादा रफ़्तार से तेजी से बढ़ने लगी थी जो कि पहले से ज्यादा खतरनाक थाI इसलिए सरकार ने यह देखते हुए एक महीने केे अंदर ही फिर से लॉकडाउन लगा दियाI जिससे एक बार फिर से बच्चों की पढाई में दिक्कत आने लगीI लेकिन एडु-लीडर ने फिर भी हार नहीं मानी और बच्चों से जुड़ने का तरीका ढूंढ ही निकालाI इन परिस्थितियों में हमारी एक एडु-लीडर पूजा ने कैसे अपनी सूझबूझ से बच्चों को शिक्षा से जोड़ें रखाI 

पूजा i-सक्षम बैच-5 की एडु-लीडर हैI वह केनडिह गाँव केे एक मुसहरी टोला (मांझी समुदाय के लोग) केे बच्चों को पढ़ाती है, जहाँ केे लोग शिक्षा के प्रति कम जागरूक हैI यहाँ के लोगों केे पास स्मार्ट फ़ोन की भी कमी हैI पता लगाने केे बाद पता चला कि इस टोला में मात्र एक ही स्मार्टफोन है जिससे बच्चों को पढ़ाया जा सकता है और वह फ़ोन एक बच्चे केे पिता केे पास रहता हैl पूजा ने जब उस नंबर से जुड़ने की कोशिश की तो पता चला कि उनका अधिकतर समय साटा (जो डीजे बजाता है) में चला जाता है जिससे उसे बच्चों केे साथ जुड़ने में दिक्कत होती हैl बच्चों से समय पर बात भी नहीं हो पाती है l 

पूजा ने अपनी परेशानी को अपनी बडि स्मृति केे साथ साझा कियाI स्मृति और प्रिया ने उन्हें बताया कि अगर वे फ़ोन से नही जुड़ पा रहे हैं तो हम उनसे वर्कशीट और लाइब्रेरी केे माध्यम से जुड़ने की कोशिश करेंगेI 

पूजा ने उसी दिन वर्कशीट और लाइब्रेरी लोगों केे घर तक पहुँचाना शुरू किया, अभिभावकों ने इसे लेने से साफ मना कर दिया क्योंकि लोग कोरोना से काफी सहमें हुए थेl बहुत कोशिश केे बाद शुरू में दो-तीन बच्चे ही इसके लिए आगे आयेl 

पहले दिन की निराशा के बाद पूजा ने हार नही मानी और अगली बार वे फिर अभिभावकों के पास गयी। वह लगातार कोशिश करती रहीl इस बार उनके साथ 10 बच्चें जुड़े और धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गईI कुछ ही दिनों में वह 20-21 बच्चों तक जुड़ गयी है। बच्चे भी अब पूजा को देखकर दौड़ते हुए आ जाते है। 

उसी गांव समुदाय में एक पुराना भवन है जो कई दिनों से बंद थाI उसे खोल कर पूजा ने वहाँ साफ-सफाई करवा कर बच्चों के पढ़ने लायक भी बना दिया है ताकि बच्चे वहाँ जाकर पढ़ पाएं। इसके लिए वहाँ उसने कुछ लाइब्रेरी की किताबें भी लगा दी। कुछ वर्कशीट्स रख दिये है ताकि बच्चे जाकर अपने पसन्द की किताबें पढ़ पाएं।

इसमें पूजा की मदद वहाँ के एक निवासी जयकांत मांझी ने भी की है उन्होंने कुछ लोगो से पूजा के साथ मिलकर बात की और कमरे को खुलवाया। वहाँ के समुदाय के लोगो का कहना था कि वह भवन काफी समय से बन्द था। 

(तस्वीर सामुदायिक भवन की है और पूजा द्वारा ली गयी हैI)

अच्छी बात यह है कि अब वो बच्चों के पढ़ने में उपयोग हो रहा हैI पूजा जिस तरह से बच्चों को लगन और मेहनत से पढ़ा रही हैं,  उम्मीद है सभी बच्चे से फिर से वापस जुड़ जायेंगेI