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Wednesday, February 8, 2023

एडुलीडर निधि कुमारी के प्रयासों से बच्चों ने जाना क्या है शिक्षा का अधिकार



नोट-ये वही बच्चे हैं, जिनका नामांकन 06.02.23 को हुआ है । बाएं से दाएं- एक का विजय,दूसरे का धर्मेंद्र और तीसरे का रविन्द्र है।

मैं निधि कुमारी (जमालपुर,मुंगेर) से ताल्लुक रखती हूं। आज दिनांक 07-02-2023 को मुस्कान बैच-9 मुंगेर की एडु-लीडर के क्लासरूम ऑब्जर्वेशन के लिए उनके स्कूल जतकुटिया, पंचायत-महगामा, प्रखंड-धरारा, जिला मुंगेर गई हुई थी। उनके क्लासरूम में हमेशा लगभग 55 से 60 बच्चे रहते हैं। इतने सारे बच्चों का विद्यालय आने का कारण है कि जब मुस्कान अपने घर से स्कूल आती हैं, तब वे सभी बच्चों के अभिभावकों से मिलकर स्कूल आती हैं। 


आज जब मैं स्कूल 10:15 AM में पहुंची तो बच्चे मुझे देख कर बहुत खुश थे। मैं सबसे पहले स्कूल के प्रिंसिपल से मिली और उनसे बातचीत की तो मुझे पता चला कि उस स्कूल में दिनांक 06-02-2023 को एजुकेट गर्ल के टीम ने 11 बच्चों का नामांकन करवाया है। स्कूल के प्रिंसिपल ने कहा, “जिन बच्चों का नामांकन हुआ है, वे लोग कुछ दिन पहले ही यहां आकर जतकुटिया में बसे हैं। वे प्रवासी थे, जो अब नया टोला जतकुटिया में आकर बसे हैं।” 


करीब सात लड़कियों का हुआ नामांकन 


जब सर ने मुझे बताया तो मुझे बहुत खुशी हुई कि करीब 11 बच्चों में से 4 लड़के और 7 लड़कियों का एडमिशन हुआ है। जब मैं क्लास में गई तो मैंने देखा कि सारे नए बच्चे एक जगह बैठे हैं और कोई उनसे बात नहीं कर रहा था मगर वे बच्चे इतने समझदार थे कि उसमें भी बहुत खुश थे। वे आपस में ही बात कर रहे थे। जब मुस्कान ने सभी बच्चों से पूछा कि क्यों बात नहीं कर रहे हैं, तो पता चला कि वे उनको अभी नहीं जानते हैं। इसके बाद मुस्कान ने सभी बच्चों को मिलाकर बैठाया ताकि सारे बच्चे घुल मिल सकें। मैं जितने समय विद्यालय में रही, मुझे एक चीज़ ने बहुत ज्यादा प्रभावित किया कि इतने समय से जो बच्चे क्लासरूम में आ रहे हैं, वे मुस्कान की बात को अनसुना कर रहे थे लेकिन उन सभी बच्चों में मैंने ये देखा कि वे मुस्कान की हर बात को सुन रहे थे। मुस्कान ग्रुप में वर्क दे रही थी, तो वे खुद से पढ़ रहे थे और बाकी उसके साथ जो थे उनको भी पढ़ा रहे थे।


एक बच्चे ने कहा (विजय कुमार), “अरे इसको ऐसे लिखो। यहां पर ये होगा।” क्लास में जब मैंने सभी बच्चों को उन सभी बच्चों के बारे में बताया कि देखिए ये सब अभी आए हैं मगर मुस्कान दीदी की हर बात को सुन रहे हैं और बिल्कुल भी शैतानी नहीं कर रहे हैं और बहुत अच्छे से पढ़ाई भी कर रहे हैं। आप लोग इतने दिन से मुस्कान को जान रहे हैं फिर भी उनकी बात को बिल्कुल नहीं सुन रहे हैं और हल्ला कर रहे हैं।


बच्चों ने दी चौंकाने वाली प्रक्रिया 


‘बच्चे मन के सच्चे गीत’ तो सबने सुना ही होगा लेकिन मेरी इस बात पर जिस प्रकार बच्चों ने प्रतिक्रिया दी, वो बेहद चौंकाने वाली थी। मेरे इतना बोलने के बाद ही सभी बच्चों ने खुद अपनी गलती को माना और कहा, दीदी अब से बदमाशी नहीं करेंगे। उन सभी बच्चों के व्यवहार को देख कर, उनकी लगन को देखकर बाकी बच्चों में भी थोड़ा बदलाव दिखा। सभी बच्चों को समझाने के बाद वे सभी हमारी बाते सुन रहे थे और हल्ला भी थोड़ा कम कर रहे थे।


मैंने महसूस किया कि सभी बच्चों में कुछ सीखने की जिज्ञासा थी, वे पढ़ना चाहते हैं, वे कुछ सीखना चाहते हैं। हालांकि मन में थोड़ी झिझक थी कि वे बोलना चाहते थे लेकिन बोल नहीं पा रहे थे मगर मुझे ऐसा लग रहा था कि जब मैं अगली बार स्कूल आऊंगी तब ये झिझक भी खत्म हो जाएगी।


स्कूल के टीचर और प्रिंसिपल भी बहुत ज्यादा सपोर्टिव लगे। वे मुस्कान को आकार बोले कि नए बच्चे पर भी थोड़ा ज्यादा ध्यान दीजिएगा। साथ ही प्रिंसिपल भी उन सभी से बहुत प्यार से बर्ताव कर रहे थे। लंच के समय भी उन सभी को बोल रहे थे कि यहां बैठकर खाना खाओ। स्कूल के टीचर, प्रिंसिपल और मुस्कान सभी बच्चों के साथ एक समान व्यवहार कर रहे थे।




निधि कुमारी (जमालपुर,मुंगेर) की रहने वाली हैं और बैच-9 मुंगेर की बड्डी हैं।

Monday, February 6, 2023

मां ने कहा था कि नहीं पढ़ेगी बेटी लेकिन हमारी कोशिश काम आई



हर साल ना जाने कितनी लड़कियां शिक्षा से वंचित रह जाती हैं। इसके पीछे की वजह अगर कोई एक हो, तो ही बताया जा सके लेकिन अगर वजहों की गिनती करने बैठूं, तो ऊंगलियां कम पड़ जाएंगी। साल 2002 में संविधान (86 संशोधन) अधिनियम शिक्षा के अधिकार के माध्यम से एक मौलिक अधिकार के रूप में पहचाना जाने लगा है। लेख 21A का सम्मिलित होना, जिसमें कहा गया है, "राज्य राज्य के रूप में इस तरीके से, विधि द्वारा, निर्धारित कर सकते में छह से चौदह वर्ष की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा।" अब शिक्षा निशुल्क हो गई है, तब भी लोग अपनी बेटियों को शिक्षित नहीं करना चाहते।


सेंटर फॉर बजट एंड पॉलिसी स्टडीज (CBPS) ने मलाला फंड के सहयोग से बिहार में एक स्टडी की, जिसमें सामने आया कि लगभग 47% बच्चों के पास ही फोन की सुविधा है, जिनमें से 31% के पास स्मार्ट फोन है। इसमें भी ज्यादातर लड़कियों को पढ़ने के लिए फोन नहीं मिला। अगर किसी घर में एक ही शख्स के पास है और पढ़ने वाले लड़के और लड़की दोनों ही हैं, तो लड़के की पढ़ाई को प्राथमिकता मिलती है। ऐसे में लड़कियों का यह सत्र एक तरह से बेकार जा रहा है। केवल इसी उदाहरण से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि लड़कियों की शिक्षा में स्थिति कैसी है। इतना ही नहीं शादी, परिवार, आर्थिक एवं कई कारणों से लड़कियां पढ़ नहीं पा रही। इसी विषय पर अंजना ने अपना एक एक्सपीरियंस साझा किया है, जब वे लड़कियों के नामांकन को प्रोत्साहित करने निकली, तब उनके साथ क्या हुआ?

अंजना का अनुभव

मैं अंजना वर्मा, आज एक छोटा सा अनुभव बताने जा रही हूं। आज जब मैं फील्ड में नामांकन के लिए  बच्चे के माता- पिता से बात की, तो वे नामांकन के लिए तैयार हो गए लेकिन घर परिवार ने एक जैसा रिएक्शन नहीं दिया। 

जब मैं एक घर गई ताकि बच्चे का नामांकन करा सकूं तो एक बच्चे की मां ने कहा, "बच्ची घर पर नहीं है। किसी के साथ जंगल चली गई है।" हमलोगों ने पूछा, "कब तक आएगी, तो उन्होंने कहा, 2 बजे तक आ जाएगी।" हमलोगों ने उनकी इस बात पर कहा, "जब आपकी बेटी आ जाएगी, तब आप हमें कॉल कीजिएगा तो उन्होंने हामी भर दी और इसके बाद हमलोग अन्य अभिभावकों से मिलने चले गए, और वहां भी हमें संघर्ष करना पड़ा मगर बच्ची से मुलाकात नहीं हो सकी और लगभग अधिकांश घरों का यही हाल था। हमें अनेक बहाने सुनने को मिले, जैसे- बच्ची घर पर नहीं है, बाद में आइएगा आदि लेकिन एक घर की कहानी एकदम अजीब थी, जहां लड़की के नामांकन को सिरे से नकार दिया गया।" 

मां ने कहा, “नहीं पढेगी बेटी” 

मैं और सीमा दीदी साथ एक घर में गए, जहां नामांकन की बात करने पर लड़की की मां ने कहा, "मेरी बेटी अभी घर पर नहीं है। हमलोगों ने उनकी बेटी को बुलाने के लिए कहा क्योंकि हमें ऐसा लग रहा था कि लड़की घर पर ही है। इस पर लड़की की मां ने कहा, "अब लड़की नहीं पढ़ेगी। इसके पापा से पूछेंगे, तब नाम लिखावाएंगे। उनकी बातों से हमें विश्वास हो गया कि लड़की घर पर ही थी औऱ उन्होंने भी स्वीकार कर लिया कि लड़की घर पर ही थी।" 

इसके बाद मैंने और सीमा दीदी ने उन्हें बहुत समझाया लेकिन वे तैयार ही नहीं हुई फिर श्रृंखला दीदी ने भी आकर समझाया मगर कोई असर नहीं हुआ। इसके अलावा वे महिला हमें वहां से जाने के लिए बार-बार बोल रही थीं लेकिन हम वहीं अड़े रहे। 

वहां एक दादी भी थी, "उन्होंने भी बच्ची का नामांकन कराने के लिए कहा लेकिन तब भी बच्ची की मां तैयार नहीं हुई। मुझे बहुत ताज्जुब हुआ कि दादी एक लड़की की शिक्षा को लेकर कितनी चिंतित है लेकिन मां ना जाने क्यों इंकार रही है? इसी बीच उनकी एक बेटी कमरे से निकलकर सामने आई, जिसका नाम खुशी थी और कुछ देर बाद एक और लड़की वापस आ गई। हमने साथ मिलकर उनकी मां को बहुत समझाया और अंत में वे तैयार हुई और हम उन्हें स्कूल लेकर गए, जहां अंततः हमने चार बच्चियों का नामांकन कराया।"


अंजना, बिहार युनिवर्सिटी से हिंदी विषय में एम.ए कर रही हैं और उन्हें सामाजिक मुद्दों पर काम करना बेहद पसंद है।