Thursday, August 26, 2021

एस. एम. सी. (S.M.C.) मीटिंग सराधी का अनुभव : तानिया

जब मैं मध्य विद्यालय सराधी पहुँची तो वहाँ एस. एम. सी. मीटिंग चल रही थी। मैं उस विद्यालय के प्रधानाध्यापक से मिली और मैंने उनसे इस मीटिंग में सम्मिलित होने की अनुमति ली। उन्होंने तुरंत हाँ कर दिया और यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा। वैसे मैंने पहले भी कई बार इस विद्यालय के शिक्षक तथा अभिभावकों के साथ बैठक में भाग लिया है, पर आज की एस. एम. सी. मीटिंग में जो चर्चा हुई उसे भी सुनकर बहुत अच्छा लगा, कुछ नया लगा। 

बैठक में विद्यालय के शिक्षक, एच. एम., सी. आर. सी. के सदस्य, गांव की 25 महिलाएं और अन्य सहायक गण मौजूद थें। 

बात यहाँ से शुरू हुई कि विद्यालय की स्थिति अभी कैसी है? 
यह किसकी जिम्मेवारी है? 
इसे कैसे सुधारा जा सकता है?

 बैठक में ज्यादातर ग्रामीण महिलाएँ ही मौजूद थीं , वो सभी चुपचाप सुन रहीं थी । कई बार मेरा मन किया कि मैं भी कुछ बोलूँ पर शिक्षक लगातार बोल रहे तो मुझे बीच में टोकना उचित नहीं लगा । मैं थोड़ा रुकी और इन सारी बातों को ध्यान से सुना। फिर बात शुरू हुई कि अब इस विद्यालय को व्यवस्थित रूप से चलाये जाने के लिए एक कमेटी बनाई जाएगी जिसकी सदस्य वो महिलाएं होंगी जिनके बच्चे इस विद्यालय में पढ़ रहें हैं।

कमेटी के सदस्यों की सूचि इस प्रकार है: 

  • पिछड़े वर्ग से - सोगरा खातून 
  • अत्यंत पिछड़े वर्ग से - सरोजनी देवी और पिंकी देवी 
  • अनुसूचित/अनु-जनजाति से - सुगिया देवी और सुलेखा देवी 
  •  निःशक्त से - गुड़िया खातून 
  •  जीविका से जुड़ी महिलाओं से - रूबी देवी और सुलेखा देवी

इतनी बात हो जाने के बाद फिर मुद्दा उठा कि इस बार विद्यालय के सचिव कौन बनेंगे? फिर इस बात को लेकर महिलाओं के बीच चर्चा होनी शुरू हो गयी। इतने में प्रधानाध्यापक ने समझाया कि सचिव बनने से बहुत सारी जिम्मेवारी भी आती है। विद्यालय के हर छोटे-बड़े काम में उनका हस्क्षेप होगा, चाहे वो बिजली पानी की हो या बच्चों के लिए दरी बेंच की व्यवस्था की। 

हेडमास्टर, बिना सचिव की सहमति के और बिना हस्ताक्षर लिए यह कार्य नहीं कर सकेंगे। काफी देर तक बातचीत के बाद अंतिम फैसला मीणा देवी के पक्ष में लिया गया। वो अध्यक्ष बनेंगी और एस. एम. सी. सदस्यों में से एक महिला सुगिया देवी को चुना गया और दोनों ने अपने हस्ताक्षर किये। इन सब के बीच मुझे लगा महिलाएं कम्युनिटी की सदस्य तो बन गयी है लेकिन अब भी उनके मन में ये सवाल चल रहा था के उनको करना क्या है तो मैंने फिर अपनी बात रखी कि उनका कार्य या जिम्मेवारी क्या-क्या होगी? मैंने उन्हें इसकी जानकारी दी और इसे प्रधानाध्यापक नें भी समापन में जिक्र किया कि वो हर 15 दिन में या कभी भी आ कर देख सकते है कि विद्यालय में क्या हो रहा है, बच्चे पढ़ रहें हैं या नहीं , मध्याह्न भोजन को लेकर कुछ दिक्कत तो नहीं आ रही , विद्यालय में किसी चीज की जरूरत तो नहीं , विद्यालय के शिक्षक समय आते-जाते है या नहीं, आप जिस टोले में रह रहे है क्या वहाँ के हर बच्चे विद्यालय रोज आ रहें है ये ध्यान देना और उनके अभिभावकों को समझाना। 

जब मैं बाहर आई तो एक महिला जो मीटिंग में थीं वो फिर मुझे अलग से बोलीं भी के हमको आपकी बात समझ आ गयी कि ये कमेटी किसलिए बनायीं जा रही है, ये सब तो होना ही चहिये। आज मुझे बहुत खुशी महसूस हो रही है क्योंकि मैं इस विद्यालय के हर एक सदस्य को जान पाई और आगे के लिए मेरा और एडु-लीडर का प्लान होगा कि जब भी किसी समुदाय में हमें मिलना होगा तो पहले उस टोले के एस. एम. सी. सदस्य से जरूर मिलेंगे जिससे वो भी लीड करना शुरू कर सकें और उनको भी चीज़ों की जानकारी हो।

Saturday, August 21, 2021

पुस्तकालय का हमारे जीवन पर प्रभाव : विपिन

दोस्तों मैं "पुस्तकालय" के बारे में एक पुस्तक का अनुभव आप लोगों के साथ साझा करने जा रहा हूँ। 

पुस्तकालय एक सामाजिक संस्था है जो कि मनुष्य को पुस्तकालय प्रशिक्षारथी के रूप में उभारती है। एक जन पुस्तकालय निरन्तर समाज में कल्याणरत रहते हुए बिना किसी भेद-भाव के सभी वर्ग के लोगों को निःशुल्क ज्ञान वितरण करती है, और मानव की साहित्यिक एवं बौद्धिक उपलब्धियों को आगे आने वाली पीढियों के उपयोग के लिए सदेव सुरक्षित रखता है। 

पुस्तकालय के उपयोग एवं विकास और कायम रखने के लिए सरकार और जनता को हमेशा बढ़-चढ़ कर आगे आना चाहिए। दोस्तों आइये जानते हैं कि पुस्तकालय हमारे जीवन पर कैसे प्रभाव डालता है। 

  • पुस्तकालय में संगृहीत पाठ्य - सामग्री का अध्ययन कर के कोई भी व्यक्ति अपने कार्य में दक्षता प्राप्त कर के व्यक्तिगत उन्नती के साथ-साथ राष्ट्रीय प्रगति मे सहायक सिद्ध होता है। 
  • पुस्तकालय द्वारा जन साधारण को अपने अवकाश के समय का सदुपयोग और मनोरंजन प्राप्त होता है। पुस्तकालय के द्वारा निष्पक्ष रूप से सभी विषयों का आधुनिकतम सूचना और पाठ्य-सामग्री प्राप्त होती है। 
  • पुस्तकालय जनसाधारण को आजीवन स्वशिक्षा प्राप्त करने में सहायक होता है। पुस्तकालय जनसाधारण को भली-भांति सूचित करता है ताकि वह अपने अधिकारों और कर्तव्यों का ठीक प्रकार से निर्वहन कर सके। 
  • पुस्तकालय बिना किसी भेद-भाव के सभी वर्ग के लोगों को निःशुल्क ग्रंथ और सूचना प्रदान करता है। पुस्तकालय जनसाधारण को कुशल नागरिक बनाता है एवं कौशल निखारने में योगदान करता है।

Wednesday, August 18, 2021

बच्चे तो चंचल होते ही हैं : शिवदानी

बच्चे स्वभाव से चंचल ही होते हैं। चंचलता के बिना बचपन भी क्या बचपन रह जाता और उनमें यह गुण प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है। 

इसलिए कहा भी जाता है कि बच्चे मन के सच्चे। यही कारण भी है कि सबको बच्‍चों की चंचलता लुभाती भी है और वे सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर ही लेते हैं। एक शिक्षक के लिए कितना खुबसूरत पल होता है जब बच्चे सक्रिय होकर कक्षा में भाग लेता है। कक्षा का माहौल ही बदल जाता है। परन्तु कभी- कभी उनकी यही चंचलता एक शिक्षक के लिए परेशानी का सबब बन जाती है और उसके लिए सिखाने में बाधा भी। क्यूँकि इसी चंचलता के कारण बच्चे कक्षा में अपनी ध्यान स्थिर नहीं कर पाते है। अनेकों शिक्षक कई बार उनके ध्यान को स्थिर करने के लिए भय और दण्ड का सहारा लेते है। 

इस तरह से वह कक्षा में शान्ति का माहौल बनाने में तो कामयाब हो जाते है परन्तु इस तरह से बच्चे अपना ध्यान पढ़ाई में केन्द्रित करने और पढ़े हुए की समझ बनाने में कितना सफल हो पाते हैं, यह शायद ही कोई पूरे विश्वास के साथ कह सकता है। यह अनुभव है बैच-7 की पूजा रॉय ईकेरिया के सेंटर का जब मैं और बिपिन जी उनके सेंटर पर गए जब मैं पूजा दी की कक्षा में पहुँचा तो देखा कि सभी बच्चे प्रसन्न मुद्रा में बैठे थे। पूजा दी ने जैसे ही मुझे देखा, वो बोली, भैया! आप यहाँ, फिर तो अब मैं नही पढ़ा पाऊँगी। 

 मैने बोला क्यों क्या बात है? बस आप जैसे बच्चे को पढ़ा रही है, आपको वैसे ही पढ़ाते रहना है। आपको डरना नही है। आप कैसे पढ़ाती हैं, इस बात की परख करने मैं यहाँ नही आया हूँ। बस यूँ ही देखने चला आया। फिर पूजा दी ने बच्चों को पढ़ाना जारी रखा... बोर्ड पर तिथि लिखी हुई थी। 

पूजा दी बोर्ड पर अ-आ की समझ बच्चों को बता रही थी। अ-आ से कौन-कौन सी वस्तुओँ का नाम होता है? पूजा दी चित्र के माध्यम से बच्चों को परिचित कराने की यथा संभव प्रयास कर रही थी। पूजा दी जब पूछती तो बच्चे जोर-जोर बोलने लगते। पूजा दी ने बच्चे को बोर्ड के पास बुलाकर चित्र पहचाने /अक्षर लिखने के लिए बोला तो पायल नाम की एक बच्ची बोर्ड पर नही पहुँच रही थी। 

तभी वह पूजा दी से बोली, मैं कैसे बताऊँ मुझे गोद मे उठाइये और पूजा दी ने उसे उठाकर इस गतिविधि में शामिल किया। उसके बाद पूजा दी ने सभी बच्चो को बालगीत करने के लिए प्रेरित किया। जिसमे फिर से पायल बालगीत करने की जिद्द करने लगी। पूजा दी ने उसे बहुत समझाया परन्तु वह तो बैठने के लिए तैयार ही नही हो रही थी। किसी और बच्चे की बारी आये इससे पहले ही पायल झट से बालगीत करने लगी। उसकी तीखी आवाज सारी कक्षा में गूँजने लगी। पूजा दी बार-बार उसको बिठाती वह झट से खड़े होकर बालगीत करने लगती। मैंने देखा कि पूजा दी मन ही मन गुस्सा कर रही थी। कभी पायल के हाथों को पकड़कर बिठाती , तो कभी पास में जाकर मना भी करती कि पायल किसी और को बोलने का मौका क्यो नही दे रही हो तो तुम? देखिये सर ये मेरी बात नहीं मान रही है। 

अंततः पायल नही मानी और अपनी जिद्द पर अड़ी रही। फिर पूजा दी ने से ही बालगीत कराने दिया और अच्छे से सब बच्चो ने बालगीत सक्रियता के साथ किया। 

आप लोग सोच कर यह बताइये कि- 

 1.पायल की चंचलता को एडु-लीडर कैसे दिशा दें? 
 2.सोचिए यदि आप उस कक्षा में होते तो क्या करते?

Tuesday, August 17, 2021

अभिवावकों ने सुझायी बच्चो को पढ़ाने की जगह : आँचल

मैं और परमजीत भैया सुभाष नगर गए थे। वहाँ छोटी (बैच-5) के सेंटर को विजिट किया। इस लेख में मैं वहाँ के कुछ अनुभव साझा करने जा रही हूँ। पिछले सप्ताह जब मैं छोटी से बड़ी टॉक कर रही थी तो छोटी ने अपने सेंटर को लेकर एक चैलेंज बताया था वह चैलेंज यह था कि वह जिस गांव में बच्चों को पढ़ाने जाती है। उस गांव में विद्यालय नहीं है। 

वहाँ एक समुदाय भवन है, उस भवन को ही इस गाँव का प्राथमिक विद्यालय माना जाता है, और वहाँ सरकारी शिक्षक एक से पाँच तक के बच्चों को पढ़ाते हैं। इस बात को बताकर छोटी पूछती है कि इस समस्या में दीदी मैं बच्चों को कैसे पढ़ाऊं? जबकि सुभाष नगर में जो विद्यालय के शिक्षक हैं वह मुझे बच्चो को पढ़ाने में सहयोग करते हैं, लेकिन वहाँ जगह ही नहीं है। एक ही कमरा है जहाँ हेड-मास्टर भी एक कोने में अपना ऑफिस समेटे हुए है और एक से पांच तक के बच्चे भी पढ़ते हैं। कुछ दिन पहले शिवदानी भैया हमारे गांव में आए थे, तो बातचीत के दौरान पास के एक घर के बाहर की कोठरी वहाँ के मालिक, बच्चो को पढ़ाने के लिए दे दिए थे। 

लेकिन लड़ाई झगड़ा के दौरान वह कोठरी भी आपसी मामले में तोड़ दिया गया। ऐसी परिस्तिथियों में मैं बच्चों को कैसे पढ़ाऊं और कहाँ पढ़ाऊं? 

कुछ समझ नहीं आता है, मैं अगर शिक्षक के साथ पढ़ा भी लेती हूं तो हमारे बच्चे जो हमारे डैशबोर्ड में है वह बच्चे के प्रोग्रेस को मैं एड्रेस नहीं कर पाऊंगी और हमारे बच्चे किस तरह से आगे बढ़ रहे हैं यह भी हमें पता नहीं चलेगा।

आज मैं जब वहाँ गयी तो वहाँ के आसपास के नजरिए को देखकर लगा कि वाकई में वहाँ पर हरिजन कम्युनिटी रहती है जहाँ के लोगों के पास ना तो पक्का मकान है और ना ही अच्छा घर है जहाँ छोटी, बच्चों को पढ़ा सके। 

जब मैं, परमजीत भैया और छोटी सुभाष नगर पहुँचे तो उस विद्यालय में बैठक चल रही थी बैठक के दौरान सभी पेरेंट्स से छोटी की दिक्कतों को और i -सक्षम के कार्यों को सभी के सामने परमजीत भैया ने रखा, जहाँ सभी अभिभावक भी ध्यान से सुन रहे थे। 

अभिभावकों को छोटी का कार्य अच्छा लगा और एक अभिभावक अपने दूर के घर पर छोटी को पढ़ाने के लिए कह रहे थे लेकिन उस विद्यालय के जो शिक्षक थे उनका कहना था कि आप विद्यालय के समय में बच्चों को कैसे ले जा सकते हैं? अगर यहाँ पर कोई चेकिंग करने आ गया तो हम क्या बताएंगे? अगर आपको विद्यालय के समय छोड़कर सुबह का समय और शाम का समय पढ़ाना हो तो आप इसी समुदाय भवन की चाबी ले लीजिये और बच्चों को पढ़ा लीजिये। लेकिन दिक्कत यहाँ यह है कि हरिजन कम्युनिटी में अगर छोटी सुबह में पढ़ाती है तो उनके अभिवावकों का कहना था कि कई ऐसे बच्चे हैं जो कहीं और ट्यूशन पढ़ने जाते हैं तो अटेंडेंस बहुत नीचे हो जाएगा। शाम में भी इसीलिए नहीं पढ़ा सकते क्योंकि अगर बच्चा सुबह 9:00 से 4:00 तक विद्यालय में रहेगा उसके बाद उसको दो घंटा अलग से टाइम दिया जाए तो बच्चे पढ़ने नहीं आएंगे क्योंकि बच्चे का खेलने का समय होता है।

 परमजीत भैया ने शिक्षा के महत्व, i-सक्षम के कार्यों, और छोटी के प्रयासों के बारे में सभी को बताया। अभिभावकों द्वारा किये गये अनेकों सफल प्रयासों के उदाहरण भी दिए। इस बातचीत के दौरान कई ऐसे अभिभावक थे जो बच्चों के पढ़ाने के लिए सकारात्मक हो गए। उनकी बातें सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे कि आने वाले दिनों में बच्चे खुद ही छोटी के पास पढने आयेंगे।

Thursday, May 6, 2021

पूजा के लगातार प्रयासों से प्रेरित हुए अभिभावक: स्मृति

जब अप्रैल में लॉकडाउन खुला तो चारों तरफ खुशी की लहर दौड़ उठी; सभी बच्चे फिर से स्कूल जाने लगेI बच्चों केे अभिभावक, एडु-लीडर सभी बहुत खुश थेI लेकिन यह ख़ुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाई l क्योंकि कोरोना पहले केे मामले में ज्यादा रफ़्तार से तेजी से बढ़ने लगी थी जो कि पहले से ज्यादा खतरनाक थाI इसलिए सरकार ने यह देखते हुए एक महीने केे अंदर ही फिर से लॉकडाउन लगा दियाI जिससे एक बार फिर से बच्चों की पढाई में दिक्कत आने लगीI लेकिन एडु-लीडर ने फिर भी हार नहीं मानी और बच्चों से जुड़ने का तरीका ढूंढ ही निकालाI इन परिस्थितियों में हमारी एक एडु-लीडर पूजा ने कैसे अपनी सूझबूझ से बच्चों को शिक्षा से जोड़ें रखाI 

पूजा i-सक्षम बैच-5 की एडु-लीडर हैI वह केनडिह गाँव केे एक मुसहरी टोला (मांझी समुदाय के लोग) केे बच्चों को पढ़ाती है, जहाँ केे लोग शिक्षा के प्रति कम जागरूक हैI यहाँ के लोगों केे पास स्मार्ट फ़ोन की भी कमी हैI पता लगाने केे बाद पता चला कि इस टोला में मात्र एक ही स्मार्टफोन है जिससे बच्चों को पढ़ाया जा सकता है और वह फ़ोन एक बच्चे केे पिता केे पास रहता हैl पूजा ने जब उस नंबर से जुड़ने की कोशिश की तो पता चला कि उनका अधिकतर समय साटा (जो डीजे बजाता है) में चला जाता है जिससे उसे बच्चों केे साथ जुड़ने में दिक्कत होती हैl बच्चों से समय पर बात भी नहीं हो पाती है l 

पूजा ने अपनी परेशानी को अपनी बडि स्मृति केे साथ साझा कियाI स्मृति और प्रिया ने उन्हें बताया कि अगर वे फ़ोन से नही जुड़ पा रहे हैं तो हम उनसे वर्कशीट और लाइब्रेरी केे माध्यम से जुड़ने की कोशिश करेंगेI 

पूजा ने उसी दिन वर्कशीट और लाइब्रेरी लोगों केे घर तक पहुँचाना शुरू किया, अभिभावकों ने इसे लेने से साफ मना कर दिया क्योंकि लोग कोरोना से काफी सहमें हुए थेl बहुत कोशिश केे बाद शुरू में दो-तीन बच्चे ही इसके लिए आगे आयेl 

पहले दिन की निराशा के बाद पूजा ने हार नही मानी और अगली बार वे फिर अभिभावकों के पास गयी। वह लगातार कोशिश करती रहीl इस बार उनके साथ 10 बच्चें जुड़े और धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गईI कुछ ही दिनों में वह 20-21 बच्चों तक जुड़ गयी है। बच्चे भी अब पूजा को देखकर दौड़ते हुए आ जाते है। 

उसी गांव समुदाय में एक पुराना भवन है जो कई दिनों से बंद थाI उसे खोल कर पूजा ने वहाँ साफ-सफाई करवा कर बच्चों के पढ़ने लायक भी बना दिया है ताकि बच्चे वहाँ जाकर पढ़ पाएं। इसके लिए वहाँ उसने कुछ लाइब्रेरी की किताबें भी लगा दी। कुछ वर्कशीट्स रख दिये है ताकि बच्चे जाकर अपने पसन्द की किताबें पढ़ पाएं।

इसमें पूजा की मदद वहाँ के एक निवासी जयकांत मांझी ने भी की है उन्होंने कुछ लोगो से पूजा के साथ मिलकर बात की और कमरे को खुलवाया। वहाँ के समुदाय के लोगो का कहना था कि वह भवन काफी समय से बन्द था। 

(तस्वीर सामुदायिक भवन की है और पूजा द्वारा ली गयी हैI)

अच्छी बात यह है कि अब वो बच्चों के पढ़ने में उपयोग हो रहा हैI पूजा जिस तरह से बच्चों को लगन और मेहनत से पढ़ा रही हैं,  उम्मीद है सभी बच्चे से फिर से वापस जुड़ जायेंगेI