Saturday, April 20, 2024

अभिभावक, बच्चे और बाल-उत्सव

नमस्ते साथियों,

कुछ दिन पहले बरमसिया प्राथमिक विद्यालय में बाल-उत्सव हुआ। जहाँ करीब 70 बच्चे और 30 अभिभावक शामिल हुए थे। सराहने वाली बात यह थी कि हमारी प्रतियोगिता में अभिभावक भी बच्चों का मनोबल बढ़ा रहे थे। उपस्थित महिला अभिभावकों ने विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लिया।

वकील भैया, सुनीता और मैं, हम तीनों ने अभिभावकों को बुलाने में काफी मेहनत की थी। गाँव जाकर एक-एक अभिभावक को आमंत्रित किया था। जिस कारण वो लोग आ पाये। 

विद्यालय के शिक्षक राजीव सर और दिलीप सर ने भी विद्यालय में सामान कलेक्ट करने में बहुत सहायता की

जब अभिभावकों के लिए निर्धारित एक गतिविधि करने की बारी आयी तो महिलायें शर्मा रही थी। बहुत मनाने के बाद वो खेलने के लिए आगे बढ़ी।

लगभग 16 महिलाओं ने खेलों में भाग लिया। जब उनसे मैंने पूछा कि आपको कैसा लगा खेलकर? तो सभी ने बहुत ख़ुशी के साथ जवाब दिया और बोली कि बचपन के बाद आज खेलें हैं। बहुत मज़ा आया। बाल-उत्सव समाप्त होने पर विजयी प्रतिभागियों को ईनाम दिया गया और अभिभावकों को भी पुरस्कृत किया गया।

अलका कुमारी

 टीम सदस्य, मुंगेर


पहली बार बाल-उत्सव में दो विद्यालय शामिल हुए

साथियों मैं मुज्ज़फरपुर टीम द्वारा कराये गए बाल उत्सव के एक वृतांत को आपके साथ साझा कर रही हूँ। इस बाल-उत्सव की तैयारी, प्रिंस सर की गाइडेंस में हमारी पूरी टीम ने बहुत जोर-शोर के साथ की थी। यह बाल-उत्सव बांद्र ब्लॉक के मध्य विद्यालय हरपुर में हुआ।

 
विशेष बात यह थी कि पहली बार किसी बाल-उत्सव में दो विद्यालयों के बच्चे और शिक्षक शामिल हुए। दूसरा विद्यालय, उत्क्रमित मध्य विद्यालय सिमरा मल्लाह्टोला था। इन दोनों विद्यालयों में हमारी बैच-10 की एडु-लीडर्स, नीतू दीदी और उषा दीदी पढ़ाती हैं। MS हरपुर स्कूल के प्रधानाध्यापक, श्री अमरनाथ सिंह जी और अन्य शिक्षकों ने हमें बाल-उत्सव की तैयारी करने में भरपूर सहयोग दिया। जैसे- TLM लगाना, लाइब्रेरी लगाना, माइक-साउंड बॉक्स सेट करना, टेबल चेयर सेट करना, बच्चों को बैठने के लिए दरी भी प्रदान करना आदिबाल-उत्सव के पश्चात उन्होंने UMS सिमरा मल्लाह्टोला के बच्चों को भोजन भी कराया, जो आसान कार्य नहीं था। इसकी वहज से हमें बहुत सहयोग हुआ।

इस बाल उत्सव में 50-60 बच्चे शामिल हुए। प्रतिभागियों ने विभिन्न तरह की एक्टिविटी की।

जैसे- विपरीत शब्द, गणित में जोड़, घटाव, भाग, word-meaning, अपोजिट word, चित्रकला, बालगीत हिंदी व इंग्लिश में, निबंध और म्यूजिकल चेयर भी हमने खेला। जिसमें बच्चे, स्कूल के शिक्षक और टीम के सभी साथियों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।




इस बाल उत्सव से यह पता चला कि हमारे स्कूल के बच्चे कितने प्रतिभाशाली हैं और उनके अन्दर छुपी हुई प्रतिभा भी बाहर आ रही थी।


इस बाल उत्सव में बच्चे, समुदाय के लोगो के बीच एक्टिविटी और बालगीत एक्शन के साथ कर पा रहे थे। इस समुदाय के लिए यह विटनेस कर पाना बहुत बड़ी बात है।

इस बाल उत्सव का फोटो देखकर अन्य स्कूल के प्रधानाध्यापक और बच्चे भी बोल रहे है कि दीदी मेरे स्कूल में आप बाल-उत्सव कब करवा रहे हैं? यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा और अपनी टीम पर गर्व महसूस हुआ।

राधा, कम्युनिकेशन बडी, मुज्ज़फ्फरपुर

        

Friday, April 19, 2024

बाल-उत्सव के कुछ ऑब्जरवेशन पॉइंट्स

नमस्ते साथियों,

मैं 6 फरवरी को बाँके बाज़ार प्रखंड के प्राथमिक विद्यालय सिंधपुर में मनाये गए बाल-उत्सव के कुछ ऑब्जरवेशन पॉइंट्स लिख रही हूँ।

·       कुर्सी रेस, टॉफी रेस तथा अन्य भाग-दौड़ वाली गतिविधियों में बच्चों के भाग लेने से, कुछ बच्चे बहुत सक्रीय एवं खुश दिखे।

·       प्रधानाध्यापक और शिक्षक हमारी टीम के प्रयास की सराहना कर रहे थे। उन्होंने इस बाल-उत्सव को कराने में बहुत सहयोग भी किया।

·       अभिभावक बोल रहे थे कि अब जिस बच्चे का विद्यालय आने का मन नहीं भी करता होगा, वो भी आएगा। इस तरीके के प्रोग्राम बच्चों के लिए जरुरी होते हैं।

·       प्रधानाध्यापक का मानना था कि i-सक्षम टीम की वजह से बच्चे नई-नई चीजें सीख रहें हैं। बच्चों का ड्राप-आउट रेट कम हो रहा है और लगातार फॉलो-अप करते रहना कोई आसन कार्य नहीं है।


  अंजना 

   मैत्री टीम, गया

जैसे कि बच्चों ने भूत देख लिया हो!

नमस्ते साथियों

मैं 20 फरवरी को, गया ज़िले के बांके बाज़ार स्थित परसाचुआ गाँव में रिटेंशन करने के लिए गया था। इस गाँव के चारों तरफ पहाड़ ही पहाड़ हैं और बीच में यह गाँव बसा हुआ है।

जब मैं गाँव में पहुँचा तो मैंने देखा कि सभी बच्चे एक जगह इकट्ठे होकर सड़क पर खेल रहे थे। मुझे देखकर सभी बच्चे इधर-उधर भागने लगे। कोई अपने घर में छुपकर जा दुबका तो कोई अपनी छत पर चढ़ गया! जैसे कि इन्होनें भूत देख लिया हो।

यह सब देखकर मैं सोचने लगा कि अब इन बच्चों को कैसे समझाया जाए?

तब हम एक-एक बच्चे के घर गए, उनके अभिभावकों से मिले। उनके बच्चों को बुलाने को कहा, तो बच्चे आ भी गए। हमने सभी से प्रश्न करना शुरू किया, कि आप विद्यालय क्यों नहीं गए हो?


कोई बच्चा बोला कि कॉपी-कलम नहीं है, कोई बोला कि ड्रेस साफ़ नहीं है और भी अन्य बहाने बनाने लगे।

अभिभावक भी बोलने लगे कि विद्यालय से आकर बच्चे अपनी कॉपी, जहाँ-तहाँ रख देतें हैं। मैंने बच्चों को समझाने का प्रयास किया कि ऐसा नहीं करते हैं। ऐसा करने से विद्या नहीं आती है।

मैंने इस टोले से दो बच्चों का एडमिशन कराया था। अन्य अभिभावकों को कहीं यह न लगे कि मैं बस इन्ही दो बच्चो के बारे में चिंतित हूँ। यह सोचकर मैंने सभी बच्चों को समझाना शुरू किया। उन्हें रोज़ विद्यालय जाने के लिए मोटीवेट किया।

मेरा अनुभव यह भी है कि महादलित टोले के बच्चे, दूसरे बच्चों को देखा-देखी विद्यालय जाते हैं। कितने बच्चे यह भी बोलते हैं कि इस टोले के बच्चे रोज़ विद्यालय नहीं जाते हैं। उनके मन में इस तरह की बात घर कर लेती है।

हमने सबको समझाने के बाद अभिभावकों से बच्चों को रोज़ विद्यालय भेजने का आग्रह किया। सभी ने हाँ कहा कि हम कल से बच्चे को विद्यालय भेजने की पूरी कोशिश करेंगें।

प्रमोद कुमार
मैत्री टीम, गया

 


Thursday, April 18, 2024

बैठने के लिए दरी माँगी थी, मिले बेंच

 
साथियों, आपने पिछले माह, रीतू (बेगूसराय) का अनुभव- “दरी की व्यवस्था” तो पढ़ा ही होगा। अब पढ़िए काजल (जमुई) द्वारा दरी की व्यवस्था की माँग का अनुभव।

नमस्ते साथियों,


मैं अपने स्कूल का अनुभव साझा करने जा रही हूँ। मैं बहुत दिनों से अपने स्कूल के प्रधानाध्यापक से दरी मँगाने के लिए अनुरोध कर रही थी। मैंने उन्हें बहुत बार  रिक्वेस्ट की कि सर, बच्चों के लिए दरी की व्यवस्था करा दीजिये, बहुत सर्दी है।

सर कुछ नहीं बोलते थे।
 
जब मैं फरवरी के अंतिम सप्ताह में स्कूल गयी तो मैंने अपनी क्लास में बेंच लगे हुए देखे। बच्चे भी खुश थे।
मैं तुरंत सर के पास दौड़कर गयी और उन्हें प्रणाम किया। सर ने पूछा कि अब तो तुम खुश हो न? क्योंकि मैंने तुम्हारी बात मान ली है। बच्चों के लिए दरी नहीं, बेंच ला दियें हैं।


मैंने उन्हें हाँ में उत्तर दिया।




और साथियों ये ख़ुशी मेरे फेस पर पूरे दिन रही। मुझे अच्छा लगा कि मैं बच्चों के लिए कुछ कर पायी।
 

  काजल कुमारी, बैच-10, जमुई