Tuesday, July 23, 2024

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला- कविता

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,

सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं।


दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रमाद

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,

उस-उस राही को धन्यवाद।


साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई,

दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।


पथ के पहचाने छूट गए, पर साथ-साथ चल रही याद 

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,

उस-उस राही को धन्यवाद।


आदित्य त्यागी


शिक्षिका को सिखाया Voice & Choice का अर्थ

खुद की आवाज और पसंद को समझना और उसके लिए आवाज उठाना

दोस्तों, मैंने अपने विद्यालय के सेशन प्लान में एक माह के लिए ये एजेंडा रखा था कि मैं हर दिन दो बच्चों से उनकी पसंद जानूँगी और वो अपनी पसंद के लिए क्या करना चाहते हैं या क्या करते हैं पर अपनी समझ बनाऊँगी। 


मैं हर दिन की तरह विद्यालय में अपनी कॉपी में बच्चो की पसंद को जान कर लिख रही थी। तभी एक मैडम ने मुझसे पूछा कि तुम यह रोज क्यों लिखती हो और इससे क्या होगा? 

तब मैंने मैडम को समझाया कि “सबको अपनी पसंद जानना और उसके लिए आवाज उठाना जरूरी है”। मैं उनकी पसंद या नापसंद इसलिए जानती हूँ जिससे कि मैं उन्हें सिखा पाऊं। या यूँ कहा जाए कि अगर वो खुद की पसंद के लिए आवाज नहीं उठा पा रहें हैं, तो मैं उनकी आवाज बनूँ। 


मैडम ने कहा ऐसा सबके साथ थोड़ी होता है! मुझे सूट, कुर्ती पहनाना अच्छा लगता था। परन्तु शादी के बाद मैं ससुराल में नहीं पहन पाई। मैंने अपने घर में पहनने की इच्छा जाहिर भी की। लेकिन मुझे मना कर दिया।  

तब मैंने सोचा और निश्चय किया कि अब तो मैं मैडम को सूट पहनाकर ही दम लूंगी वो भी मेरी फैलोशिप ख़त्म होने से पहले। मैंने मैडम से, उनके घर जाकर इस विषय पर फोन पर काफी देर बात की और उन्हें “voice and choice” से जुड़ी हुईं बातों पर चर्चा की। 


मैडम का कहना था कि उनके पति मना करते हैं, उनका कहना था कि समाज के लोग बहुत तरह की बात बोलेंगे, साड़ी ही अच्छी लगती है। तो मैंने उनको समझाया आप अपनी बात को डट के उनके सामने रखें और उनको एक बार और समझायें। 


दूसरे दिन मैंने मैडम के लिए एक कुर्ती खरीदा और उन्हें उपहार के तौर पर दिया। जब मैडम ने उपहार में कुर्ती मिलने की बात अपने पति को बताई, तो उन्होंने मुझसे बात करने की इच्छा जाहिर की। तब मैडम ने फोन पर उनसे मेरी बात भी करवाई। 


उनके पति मुझसे बोल रहे थे कि “आपने जो तोहफा दिया,वो अच्छा तो हैं,पर ये इसको नहीं पहनेंगी और अगर पहनेंगी तो घर में ही घर से बाहर नहीं जाएंगी”। 


मैंने उनसे पूछा, ऐसा क्यों?

उन्होंने कहा समाज में लोग बाते बनाएंगे।


तो मैंने कहा समाज के लोग बहुत कुछ बोलते है। आप याद किजिए हो सकता है, जब शादी के बाद मैडम शिक्षिका बनी होंगी तब भी आपके समाज के चार लोग उस वक्त कुछ बोले होंगे। 

पर क्या अभी भी बोलते हैं?

तो उन्होंने कहा नहीं। 


मैंने बोला बस वो अभी भी चार दिन बोलेंगे फिर चुप हो जाएंगे।

आप मैडम की पसंद और भावना को समझिए। आप भी जानते हैं कि वो कुछ गलत तो नहीं चाह रही हैं। 


इतनी बात करने के बाद वो मेरी बात से सहमत हुए। 


साथियों मुझे बताते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है कि आज मैडम अपनी पसंद के अनुसार सूट पहन के आई और आते ही मुझे गले लगा के कहा, जो हम इतने दिन में नहीं समझा पाए, वो तुमने फोन पर कुछ देर की बात में समझा दिया।



उन्होंने मुझसे कहा कि आज से मैं तुम्हे दोस्त बोलूंगी और उन्होंने मेरा नंबर दोस्त के नाम से अपने मोबाइल में सेव (save) कर लिया। 


ये पल मेरे जिंदगी की कुछ अहम् उपलब्धियों में जुड़ गया। मुझे खुद पर बहुत गर्व और सुख की अनुभूति महसूस हो रही थी। इसका एक कारण यह भी था कि मैं जिन मैडम से मैं बचपन में पढ़ी, आज मैं अपने मनोबल और इच्छाशक्ति के कारण उनकी दोस्त बन पायी। 


स्मृति

बैच-9, मुँगेर


समुदाय में महिलाओं की दिनचर्या को जाना

नमस्ते साथियों, 

मैं आप सभी के साथ अपने समुदाय (फरदा) में किए काम का अनुभव साझा कर रही हूँ। इस माह समुदाय को लेकर मेरा ये लक्ष्य था कि “समाज की महिलाओं से अलग जुड़ाव बना पाना”। 


हम सभी बच्चों के अभिभावकों से मिलते ही रहते हैं, मगर एक बात जो मैंने अनुभव की कि बच्चे और परिवार से हटकर भी महिलाओं की ‘अपनी जिंदगी’ भी होती है।

  

उनकी जिन्दगी को जानने के लिए मैं अपने गाँव की महिलाओं से मिलने गई थी। इसकी एक खास वजह यह भी थी कि सभी क्षेत्रों में से, एक क्षेत्र के लोग PTM में बहुत कम शामिल होते है। जिसका मुख्य कारण अभिभावक का खेतों में काम करना है। क्योंकि उनका यही रोजगार है, अगर अभिभावक यह नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या? वे सुबह निकलते हैं और रात को लौटते हैं। जिसकी वजह से मैं भी उनसे कभी भी अच्छे से नहीं मिल पाती थी। 

पहले मुझे लगता था कि मैं तो रोज जा रही हूँ मिलने, उन्हीं की गलती है जो नहीं मिलते है!

फिर मैंने खुद को थोड़ा ध्यान देकर सोचने के लिए कहा कि हर बार ऐसा क्यों हो रहा है? 

 

यह सोचते समय, इस बार मैंने खुद के अंदर एक नया बदलाव देखा कि मैंने उनकी गलती न देखकर, उनकी मजबूरी को जाना। समझा और पाया कि यह उनकी दिनचर्या है जिसकी वजह से मैं उनसे नहीं मिल पाती थी। 

मैंने यहाँ खुद को ठीक किया और मैं कल कुल नौ महिलाओं से मिली। मैं अपनी खुशी की बताऊं तो सबसे अलग बात ये रही कि कल मैंने उनके बच्चे को लेकर कोई बात नहीं की। 


मैंने बस उनकी दिनचर्या को जाना। वो कब सबसे ज्यादा खुश थी, कब दुखी थी। मैंने जब उनसे ये सब बात उनके परिवार की सदस्य की तरह पूछा तो उनके चेहरे पर एक अलग ही खुशी थी। जिससे मुझे उनसे जुड़कर बहुत अच्छा महसूस हुआ। इस कार्य के दौरान एक नया पर्सपेक्टिव (perspective) भी मुझे चीजों को देखने समझने का मिला ।

                         

रश्मि  

बैच- 9, मुंगेर


टीम के साथ कलकत्ता की दो संस्थाओं का विजिट किया

आज़ाद फाउंडेशन

जब हम सभी एडु-लीडर्स मोकामा हावड़ा एक्सप्रेस से हावड़ा स्टेशन पर उतरे तो मुँगेर की एडु-लीडर्स वहाँ पहले से पहुँचकर हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। हम सभी एक साथ हुए और खूब बातें की। हमने समय बिताने के लिए अन्ताक्षरी भी खेली। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम, मुँगेर की एडु-लीडर्स से पहली बार मिल रहे हैं। 


जब सभी लोग एक जगह एकत्रित हो गए तो शिवानी दीदी ने कैब (Cab) बुक की और हम कलकत्ता सेवा केंद्र की ओर चल दिए। हम प्रातः नौ बजे वहाँ पहुँचे और देखा कि प्रिंस सर, नम्रता दीदी, गया और मुज्ज़फ्फरपुर के एडु-लीडर्स वहाँ पहले से उपस्थित थे। आज़ाद फाउंडेशन जाने में अभी समय था तो हम सभी ने फ्रेश होकर नाश्ता इत्यादि कर लिया।


फिर हम सभी चल दिए अपनी मंजिल की ओर- जो थी कलकत्ता की आज़ाद फाउंडेशन। हम वहाँ पहुँचे हमारा आदर-सत्कार हुआ और हमें मीटिंग करने के लिए एक कक्ष मिला। मीटिंग की शुरुआत छोटे से इंट्रोडक्शन से हुई। नम्रता दीदी और प्रिंस सर ने i-सक्षम के बारे में जानकारी साझा की।


आज़ाद फाउंडेशन, विज़न और उद्देश्य: 


इसके बाद आज़ाद फाउंडेशन के बैकग्राउंड और वर्तमान कार्यों के बारे में एक प्रेजेंटेशन के माध्यम से हम सभी को बताया गया। हमने जाना आजाद फाउंडेशन की शुरुआत 2008 में दिल्ली से हुई थी। कोलकाता में इसकी शुरुआत 2015 में हुई। यह संस्था महिलाओं और लड़कियों के लिए काम करती है।

वेबसाइट: https://azadfoundation.com/


आजाद फाउंडेशन का विज़न “we envision a world, where all women in particular” था।

(हम एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हैं जहाँ विशेष रूप से सभी महिलाएँ हो।)


इस संस्था में 18 से 35 वर्ष की महिलाओं और लड़कियों को ड्राइविंग (driving) सिखाई जाती है।

इस संस्था में काम करने वाली महिलाओं को leader कहा जाता है। यहाँ महिलाओं को सेल्फ डेवलपमेंट, सेल्फ डिफेन्स, स्पोकन इंग्लिश, मैप रीडिंग, सिक्योरिटी, कम्युनिकेशन ट्रेनिंग, टेक्नीकल और नॉन-टेक्निकल ट्रेनिंग दी भी जाती है। 


इस संस्था का उद्देश्य समाज को यह बताना है कि महिलाएँ वो हर काम कर सकती हैं, जो पुरुष कर सकते हैं। महिलाएँ कमजोर नहीं होती। प्रत्येक महिला अपनी छोटी-बड़ी ख्वाहिशों के लिए पुरुष पर निर्भर न होकर स्वयं आत्मनिर्भर हो। आजाद फाउंडेशन महिलाओं को सक्षम बनाने का कार्य करती है। आजाद फाउंडेशन की कुछ लीडर्स ने अपनी स्टोरी भी बताई, जो बहुत अधिक प्रेरणादायक थी। जैसे- कुछ महिलाओं को ड्राइविंग सीखने के लिए बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा यहाँ तक कि उन्हें घर से बाहर निकाल दिया गया। परिवार,पति सब रिश्ते टूट गए। फिर भी उन महिलाओं ने हार नहीं मानी! 

आज आत्मनिर्भर हैं।


आजाद फाउंडेशन में 1500 महिलाएँ काम करती है। 630 महिलाओं का अब तक परमानेंट लाइसेंस बन चुका है। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि आजाद फाउंडेशन महिलाओं और लड़कियों के साथ-साथ युवा लड़कों पर भी काम करती है। 

संस्था का मानना है कि महिलाओं की स्थिति को बदलने के लिए पुरुष की सोच को बदलना भी आवश्यक है। इसके लिए उनका एक स्पेशल एक वर्षीय फ़ेलोशिप प्रोग्राम भी चलता है। वहाँ के लोगों से मिलकर और उन लोगों के काम के बारे में जानकर मुझे बहुत अच्छा लगा। 


यह सब जानने के बाद हमें कोलकाता की प्रसिद्ध मिठाई रसगुल्ला खाए और कुछ ग्रुप फोटो क्लिक की। अब शाम हो चुकी थी तो हम वापस कलकत्ता सेवा केंद्र की तरफ चल पड़े। अगली सुबह हमें एक और संस्था का विजिट करना था।



NOSKK: Nari-O-Sishu Kalyan Kendra 

वहाँ के लोगों का स्वागत करने का तरीका मुझे बेहद पसंद आया। उन्होंने हम सभी के हाथों में राखी बांधकर हमारा स्वागत किया।  NOSKK Nari -O-shishu kalyan kendra संस्था की शुरुआत 1978 में हुई। जिसमें 9000 महिला, 400 ग्रुप में काम करती है। यह संस्था भी लड़कियों की शिक्षा के लिए काम करती है। जैसे: - ड्रापआउट गर्ल्स (dropout girls) का नामांकन करना, ट्यूशन फीस प्रोवाइड करना, कम कीमत में नैपकिन प्रोवाइड करना। यह संस्था महिलाओं को फ्री में सिलाई, कढ़ाई, ड्राइविंग, ब्यूटीशियन आदि कोर्सेज में भी प्रशिक्षित करती है। 

वेबसाइट: http://www.noskk.org.in/index.html


फिर हम लोग फील्ड विजिट करने के लिए टोटो से उनकी बस्ती पहुंचे। मैंने पहली बार किसी महिला को टोटो चलाते देखा, और मैं उनके साथ टोटो पर बैठी भी। उन्हें टोटो चलाना भी इसी संस्था ने सिखाया।


 


इस बस्ती में हम उन लोगों से मिलने गए थे जो इस संस्था जुड़कर आगे बढ़े हैं। जिन लोगों को रुपयों की आवश्यकता होती है यह संस्था उन्हें लोन भी दिलाती है। लोन की शुरुआत 10000 रूपये से होती है और पूरे साल का 12% इंटरेस्ट देना पड़ता है। 


बस्ती के लोगो से मिलकर हमने यह जाना कि यहाँ से बहुत लोग लोन लेकर बिजनेस में लगाते हैं। यहाँ हमने ये भी देखा कि नैपकिन कैसे बनते हैं? हमने कपड़ों पर की गयी कढ़ाई को बारीकी से देखा, जो बहुत ही सुन्दर दिख रही थी। सभी लोगो को यहाँ का काम पसंद आया और हमने कुछ फ़ोटो भी क्लिक करवाई। 


इसके बाद हम अपने विश्रामगृह सेवा केंद्र की ओर चल दिए। 


अगली सुबह तैयार होकर हम सभी विक्टोरिया महल की तरफ चल दिए। यहाँ हमने बहुत सारी ऐतिहासिक चीजें देखीं। हमने पूरा विक्टोरिया महल घूमा। फिर हम अपने अगले पड़ाव साइंस सिटी (Science City) की ओर चल दिए। यहाँ स्पेस थिएटर (space theatre) के अन्दर हमने 3-डी शो (3-D show) देखा। जिसे देख कर लगा था कि मानों मैं पूरे अन्तरिक्ष में घूम रही हूँ। मैंने सारे प्लानेट्स (planets) देख लिए हैं। मैं खुद को वहाँ पर महसूस कर पा रही थी कि मैं वहाँ मौजूद हूँ। 


वहाँ से निकलने के बाद हम लोग शॉपिंग करने के लिए मार्केट गए। थोड़ी-बहुत शॉपिंग की और फिर चल पड़े अपने-अपने घर की ओर उसे समय मुझे बहुत दुःख महसूस हो रहा था। क्योंकि हम लोग कुछ ही पल में एक-दूसरे से दूर हो जाएंगे। हम लोगों ने हावड़ा जंक्शन पहुँचकर अपनी ट्रेन का इंतज़ार किया। जो साढ़े ग्यारह बजे रात में थी। अगली सुबह मैं आठ बजे स्टेशन पर उतर गई और साढ़े आठ बजे तक अपने घर आ गईं। घर आने के बाद भी मैंने इस यात्रा को और सभी साथियों को बहुत मिस किया। 


शीतल कुमारी

बैच 10, जमुई


अपनी खुद की पहचान बनाने का सफ़र- दिव्या

जब मैंने i-सक्षम की फ़ेलोशिप में चयन के लिए एग्जाम दिया था तब मुझे इस बात का बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि इस फ़ेलोशिप के माध्यम से मुझे मेरी पहचान मिलेगी।

पहचान क्या होती है? इस बात का अर्थ भी मैं नहीं जानती थी।

सरल शब्दों में कहा जाए तो पहले लोग मुझे किसी की बेटी, किसी की बहन के रूप में पहचानते थे। परन्तु अब मुझे मेरे नाम और मेरे काम से पहचानते हैं।


पहले मुझे अकेले कहीं जाने में घबराहट होती थी। सोचना पड़ता था कि कैसे जाउंगी!

अब बिना किसी डर के अकेले कहीं भी आ-जा सकती हूँ। फ़ेलोशिप से जुड़ने के बाद एक बड़ा बदलाव मेरे अन्दर यह भी आया कि मैं निसंकोच अपनी बात किसी के भी सामने रख सकती हूँ। जबकि पहले मेरे अन्दर बहुत घबराहट और झिझक थी। पहले कम्युनिटी में भी मुझे कोई नहीं जानता था। परन्तु अब लोग मुझे मेरे नाम से जानते हैं।


 

मेरे अन्दर की घबराहट और झिझक को दूर करने में मेरी बडी (मोनिका दीदी) ने मेरा बहुत साथ दिया। उन्होंने कभी मुझे दोस्त बनकर तो कभी मेरी बड़ी बहन बनकर मुझे समझाया और सही रास्ता दिखाया। उनसे मैंने यह भी सीखा कि यदि कोई समस्या है तो उसका समाधान भी आस-पास ही है। हमें बस उसे खोजने की जरुरत है।

                   

मेरे अन्दर इतने सारे बदलाव, मुझे मेरी पहचान दिलाने और मेरा आत्म-विश्वास बढ़ाने के लिए मैं i-सक्षम को धन्यवाद देना चाहती हूँ।

 

दिव्या वर्मा

बैच 10