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Wednesday, December 25, 2024

हिचकिचाहट से आत्मविश्वास तक का सफर: गुड्डी

 हिचकिचाहट से आत्मविश्वास तक का सफर: गुड्डी

आई-सक्षम: एक नई दिशा

आई-सक्षम केवल एक प्लेटफॉर्म नहीं है, यह एक ऐसा वातावरण है जहाँ हर व्यक्ति की बात सुनी जाती है, समझी जाती है, और जरूरत पड़ने पर उसे पूरा समर्थन मिलता है। यहाँ मैंने अपने व्यक्तित्व और क्षमताओं को समझने और निखारने का अनमोल अवसर पाया।

पहले और अब के बीच का बदलाव

दो साल पहले, मैं एक ऐसी लड़की थी जो लोगों से जुड़ने में हिचकिचाती थी। अपनी बातें दूसरों के सामने रखने की हिम्मत नहीं थी और समूह में कार्य करना तो दूर की बात थी। लेकिन जब मैंने आई-सक्षम के साथ अपनी यात्रा शुरू की, तो मेरे अंदर अद्भुत बदलाव आया।

अब मैं न केवल लोगों से जुड़ने लगी हूँ, बल्कि शिक्षकों, प्रिंसिपल, बच्चों, उनके अभिभावकों और अपने समाज से भी सक्रियता से संवाद करने लगी हूँ। क्लस्टर के माध्यम से मैं समूह में कार्य करने और सहयोग निभाने का आनंद ले रही हूँ।
बच्चों के जीवन में बदलाव
जो बच्चे स्कूल आने से कतराते थे, पढ़ाई से दूर भागते थे या खेल को प्राथमिकता देते थे, उन्हें मैंने खेल-खेल में शिक्षा से जोड़ा। इस प्रक्रिया में बच्चे खेलते भी हैं और सीखते भी हैं। उनका उत्साह और रुचि देखकर मुझे अपने प्रयासों पर गर्व होता है।

लाइब्रेरी: शिक्षा का नया केंद्र
हमारे क्लस्टर के प्रयास से फर्दा में एक लाइब्रेरी की स्थापना की गई है। यह केवल किताबों का घर नहीं, बल्कि एक दोस्ताना माहौल, शिक्षा के संसाधन, और सीखने के नए तरीकों का केंद्र है। यहाँ बच्चे और समुदाय के लोग समान रूप से लाभान्वित हो रहे हैं।

मेरी सीख और आगे का रास्ता
आई-सक्षम ने मुझे आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझने का अवसर दिया। यह यात्रा न केवल मेरे लिए बल्कि उन सभी के लिए प्रेरणादायक है, जिनके जीवन को मैंने छूने का प्रयास किया।
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गुड्डी कुमारी
बैच-10, मुंगेर



Thursday, April 6, 2023

लड़कियों को पुस्तकालय से जोड़ना एडुलीडर्स की पहल का एक अहम हिस्सा है

मैं अंशिका बैच-7 की एडुलीडर हूं। मैं आज आपके साथ अपने कलस्टर बैठक का अनुभव साझा कर रही हूं। कलस्टर बैठक में हमने समझा कि हम अपने क्षेत्र में एक पुस्तकालय बनाना चाहते हैं ताकि गांव के बच्चे पुस्तकालय का लाभ उठा सकें क्योंकि अधिकांश बच्चे हर पुस्तक को खरीदने में समर्थ नहीं होते। ऐसे में अगर गांव में एक पुस्तकालय हो, तो बच्चों को काफी लाभ होगा। 

इसके लिए हमारे क्लस्टर से कुछ लोग बेगूसराय भी गए थे। वहां जाने के बाद मेरी यह समझ बनी कि एक पुस्तकालय बनाने के लिए जरूरी नहीं कि हमारे पास एक रूम ही हो। हम एक वृक्ष के नीचे या फिर किसी के आंगन में भी पुस्तकालय खोल सकते हैं। साथ ही मैंने जाना कि काल्पनिक और वास्तविक कहानियों में क्या अंतर है। 

इस सत्र के दौरान मैंने सीखा गतिविधि क्या है, किसे हम गतिविधि कह सकते हैं, गतिविधि कराने के कौन-कौन से तरीके होते हैं इत्यादि। पुस्तकालय का आयाम, कैसे पाठक को किताबों तक पहुंचाया जाए इत्यादि मेरे लिए लर्निंग रही। मैंने वहां पर कुछ किताबें भी पढ़ी जो मुझे काफी पसंद आई। जैसे - बेटी करे सवाल। 

मैंने महसूस किया कि एक लड़की का सवाल करना अनेक सवालों को खड़ा कर देता है। जैसे- लड़कियां ये नहीं पूछ सकती कि उनकी शादी कम उम्र में क्यों कर दी जाती हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि उन्हें एक ही जवाब मिलेगा कि एक अच्छा घर परिवार मिल रहा है लेकिन लड़कियों को कभी अपने दम पर अपना घर बनाने या अपनी पहचान बनाने की आजादी नहीं मिल पाती। 

एडुलीडर के इस अनुभव से हमें यह पता चला कि पुस्तकालय के लिए सही जगह की जरुरत होती है। जगह चाहे कहीं भी हो सकती है लेकिन जगह का माहौल अच्छा होना चाहिए ताकि बच्चे एकत्रित होकर पढ़ सकें और किताबों को रखने की सुविधा भी हो। वहीं दूसरी ओर हमें यह भी एहसास हो रहा है कि लड़कियों के लिए पढ़ना कितना जरुरी है ताकि वे अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकें और अपनी जिंदगी के निर्णय स्वयं लें , मतलब बागडोर उनके ही हाथों में होनी चाहिए। 

किसी गांव में पुस्तकालय की नींव रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो सकता है क्योंकि गांवों में ग्रामीण सोच में बदलाव अचानक संभव नहीं है। जैसे- हो सकता है कि वे अपनी बेटियों को पुस्तकालय में पढ़ने के लिए ना भेजें क्योंकि वहां लड़के भी हो सकते हैं मगर एडुलीडर्स इन्हीं मानसिकता के खिलाफ खड़ी हैं ताकि हर एक लड़की शिक्षित हो सके और अपने अधिकारों के प्रति जागरुक हो सके।