मुंगेर ।
Wednesday, July 16, 2025
"ख़ुशी की जिद और वर्षा की जीत"
मुंगेर ।
Wednesday, July 2, 2025
"सोच में बदलाव" – एक बहू, एक सास और तीन पीढ़ियों की कहानी
"तू सीख, मैं रूपम को संभाल लूंगी।"
"नेहा ने हमारे घर की सोच बदल दी है।"
Thursday, June 5, 2025
"पहले खुद जागी, अब पूरे गांव को जगा रही है"
जो चुपचाप अपनी राह बनाते हैं —
न कोई शोर, न कोई शिकायत।
लेकिन उनके कदम इतने मजबूत होते हैं कि पीछे आने वालों को रास्ता साफ दिखने लगता है।
हमारे फरदा गांव की ऐसी ही एक शख्सियत हैं — प्रेरणा कुमारी।
एक आम-सी लड़की, जो एक छोटे से गांव से निकल कर आई थी,
जिसने दुनिया को वैसा ही देखा था जैसा उसके घरवालों ने दिखाया था।
उसकी सोच की सीमाएं भी वहीं तक थीं, जहां तक उसने अपने घर के आंगन से झांका था।
जब मैं पहली बार उनके लर्निंग सेंटर पहुंची, तो मन में एक साधारण-सी छवि थी —
सोचा था, एक छोटा-सा कमरा होगा, कुछ कुर्सियाँ होंगी, और कुछ बच्चे पढ़ते मिलेंगे।
वो सिर्फ एक क्लासरूम नहीं था —
वो एक ऐसी जगह थी, जहां हर बच्चा खुलकर सोच रहा था,
अपने मन की कह रहा था, और
जहां एक लड़की — प्रेरणा — चुपचाप हर दिल को छू रही थी।
उनकी हर छोटी कोशिश, हर एक शब्द गांव के युवाओं में आत्मविश्वास जगाता है।
अब लड़कियां खुलकर सपने देखती हैं, और लड़के अपने भविष्य को लेकर जागरूक होते जा रहे हैं —
क्योंकि किसी ने उन्हें दिखा दिया है कि ये सच में मुमकिन है।
और आज उसी राह पर कई और कदम बढ़ाने लगे हैं।
प्रेरणा की तरह, फरदा गांव की कई महिलाएं और लड़कियां भी अब आगे बढ़ रही हैं।हमें पूरा विश्वास है कि ये बदलाव हमारे समाज के लिए एक नया सूरज लेकर आएगा —
जो हर अंधेरे को दूर करेगा, और नई रोशनी बिखेरेगा।
Monday, June 2, 2025
"नई राह की ओर: एक बेटी के सपनों को फिर से जगाने की कोशिश”
"मेरी उम्र की सभी सहेलियों की शादी हो चुकी है, और अब मुझे अकेले पढ़ने जाने में अच्छा नहीं लगता।"
"ज़िंदगी में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं जहाँ हमें अकेले ही कदम बढ़ाने पड़ते हैं।"
जैसे हम अकेले इस दुनिया में आते हैं, और अकेले ही एक दिन चले भी जाते हैं,
उसी तरह कुछ फैसले भी ऐसे होते हैं, जिन्हें हमें अपने दम पर लेना होता है — बिना किसी का इंतज़ार किए। हमने कहा, "हर रास्ते पर भीड़ नहीं चलती बहन, कुछ रास्ते अकेले तय करने पड़ते हैं — और वही सबसे मजबूत बना देते हैं।"
हमने कहा,
"पहले हम भी एक-दूसरे को नहीं जानते थे। लेकिन किसी एक ने पहल की, और आज हमारे बीच इतना अपनापन है कि लगता ही नहीं कभी अजनबी थे।"
फिर मुस्कराकर जोड़ा,
"अगर आप भी एक बार घर से बाहर निकलेंगी और पढ़ाई शुरू करेंगी, तो यकीन मानिए — नए दोस्त, नई बातें और एक नई दुनिया आपका इंतज़ार कर रही है।"
"कभी-कभी बस एक कदम ही काफी होता है जुड़ने के लिए — जैसे हम जुड़ गए।"
“अब पढ़ाई कर के क्या होगा? मम्मी तो मेरा रिश्ता देखने में लगी हैं।”
इस पर प्रियंका दीदी ने बड़ी सादगी से जवाब दिया,
“शादी के बाद क्या लड़कियां पढ़ाई नहीं करतीं? मैं खुद शादी के बाद ग्रेजुएशन की और i-सक्षम से जुड़ कर आपके सामने हूं।”
हमने उन्हें बताया कि
शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह जीवन को बेहतर समझने का तरीका है।
“अब एडमिशन करवा दूं? ”बेटी ने थोड़ी नाराजगी में कहा,
“जब करवाना था तब नहीं करवाया, अब क्या फायदा? ”मम्मी ने भावुक होकर जवाब दिया, “जब बच्चे सवाल पूछते हैं और मैं जवाब नहीं दे पाती, तो बहुत दुख होता है। इसलिए मैं चाहती हूं कि मेरी बेटी पढ़े और ऐसा खालीपन न महसूस करे।”
हमने उनकी हर चिंता को धैर्य से सुना और कहा, “अब 9वीं में नामांकन हो रहा है। अगर आप पढ़ाई जारी रखेंगी तो आपके परिवार और हमें भी गर्व होगा।”हमारी बातों का असर हुआ, और उन्होंने कहा,
“ठीक है दी, मैं दो-तीन दिन में एडमिशन करवाने की कोशिश करूंगी।”यह बातचीत हमारे लिए भी बहुत प्रेरणादायक रही। हमने जाना कि सच्चे मन से और धैर्य से समझाने पर बदलाव जरूर आता है।
नाजिया , टीम
मुंगेर ।
Tuesday, March 18, 2025
हलीमपुर गाँव की पहली झलक
जैसे ही हम उस गाँव में पहुँचे, वहाँ की कई चीज़ों ने मेरा मन मोह लिया—मिट्टी के घरों पर बनी सुंदर पेंटिंग, पुराने जमाने में उपयोग होने वाली चीज़ें, खेतों के बीच से गुजरती कच्ची-पक्की सड़कें, और हर ओर फैली हरियाली। गाँव का यह सरल, पर मनमोहक दृश्य मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था।
एडु लीडर, शिवम की माँ से उनकी पढ़ाई को लेकर बात कर रही थीं। उसी दौरान, उनकी दादी, कमला देवी जी, मुझसे बहुत आत्मीयता से बातचीत करने लगीं। उन्होंने मुझसे पूछा—
"बेटी, तुम कहाँ से आई हो?" "तुम्हारा नाम क्या है?" "तुम क्या करती हो, क्या पढ़ाई कर रही हो?"
उनका बात करने का आत्मीय अंदाज मुझे बहुत अच्छा लगा। बातचीत के दौरान, उन्होंने अपने पोते की पढ़ाई को लेकर अपनी इच्छाएँ और विचार साझा किए, जिससे उनकी शिक्षा के प्रति जागरूकता स्पष्ट झलक रही थी।
उन्होंने आगे बताया कि उनका सरकारी शिक्षिका के पद पर चयन भी हो गया था, लेकिन उनके पति ने उन्हें नौकरी करने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि उस समय घर की बहूओं का बाहर जाकर काम करना समाज में स्वीकार्य नहीं था। हालाँकि, उन्होंने अपने बच्चों और बहू की पढ़ाई को हमेशा प्राथमिकता दी।
उनकी बहू ने शादी के बाद स्नातक पूरा किया और बिहार पुलिस तथा एसएससी की परीक्षाओं के लिए आवेदन भी किया, लेकिन सफल नहीं हो सकीं। इसके बाद, पारिवारिक जिम्मेदारियों में व्यस्त होने के कारण उनकी पढ़ाई छूट गई।
शिक्षा के प्रति जागरूकता और आत्मनिर्भरता
उनकी सोच, शिक्षा के प्रति जागरूकता, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास ने मुझे बहुत प्रभावित किया। बातचीत के अंत में, उन्होंने मुझसे कहा—
जो सुनकर मेरे मन में उनके प्रति और भी सम्मान बढ़ गया।
जब हम वहाँ से जाने लगे, तो उन्होंने प्यार भरे शब्दों में कहा—
"बेटी, फिर जरूर आइएगा,"
स्मृति कुमारी
बड़ी इंटर्न, मुंगेर
Tuesday, January 28, 2025
शादी के बाद शिक्षा की जरूरत पर सवाल
आज मैं अपनी चाची के लिए "वॉइस एंड चॉइस" का उपयोग कर उनके प्रेरणादायक अनुभव को साझा करना चाहती हूँ। यह कहानी एक ऐसे सपने की है, जिसे समाज ने नामुमकिन बना दिया था, लेकिन चाची की लगन और हमारे प्रयासों ने इसे हकीकत में बदल दिया।
जब मैंने उनके मन में छिपी इस इच्छा को देखा, तो मैंने ठान लिया कि उनकी पढ़ाई को लेकर मैं उनका साथ दूँगी। मैंने उन्हें समझाया, "पहले आप अपने पति से बात करें और अपनी पढ़ाई की इच्छा जाहिर करें। यह आपका अधिकार है।"
शुरुआत में यह सफर चाची के लिए आसान नहीं था। घर के कामों और पढ़ाई के बीच तालमेल बैठाना एक बड़ा संघर्ष था। लेकिन उनकी मेहनत और जज़्बे ने हर मुश्किल को आसान बना दिया।
बैच 10
मुंगेर
Wednesday, December 25, 2024
हिचकिचाहट से आत्मविश्वास तक का सफर: गुड्डी
हिचकिचाहट से आत्मविश्वास तक का सफर: गुड्डी
आई-सक्षम: एक नई दिशा
आई-सक्षम केवल एक प्लेटफॉर्म नहीं है, यह एक ऐसा वातावरण है जहाँ हर व्यक्ति की बात सुनी जाती है, समझी जाती है, और जरूरत पड़ने पर उसे पूरा समर्थन मिलता है। यहाँ मैंने अपने व्यक्तित्व और क्षमताओं को समझने और निखारने का अनमोल अवसर पाया।
दो साल पहले, मैं एक ऐसी लड़की थी जो लोगों से जुड़ने में हिचकिचाती थी। अपनी बातें दूसरों के सामने रखने की हिम्मत नहीं थी और समूह में कार्य करना तो दूर की बात थी। लेकिन जब मैंने आई-सक्षम के साथ अपनी यात्रा शुरू की, तो मेरे अंदर अद्भुत बदलाव आया।
अब मैं न केवल लोगों से जुड़ने लगी हूँ, बल्कि शिक्षकों, प्रिंसिपल, बच्चों, उनके अभिभावकों और अपने समाज से भी सक्रियता से संवाद करने लगी हूँ। क्लस्टर के माध्यम से मैं समूह में कार्य करने और सहयोग निभाने का आनंद ले रही हूँ।हमारे क्लस्टर के प्रयास से फर्दा में एक लाइब्रेरी की स्थापना की गई है। यह केवल किताबों का घर नहीं, बल्कि एक दोस्ताना माहौल, शिक्षा के संसाधन, और सीखने के नए तरीकों का केंद्र है। यहाँ बच्चे और समुदाय के लोग समान रूप से लाभान्वित हो रहे हैं।
आई-सक्षम ने मुझे आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझने का अवसर दिया। यह यात्रा न केवल मेरे लिए बल्कि उन सभी के लिए प्रेरणादायक है, जिनके जीवन को मैंने छूने का प्रयास किया।
गुड्डी कुमारी
बैच-10, मुंगेर
Tuesday, October 22, 2024
हिम्मत के साथ नई शुरुआत: रूचि
हिम्मत के साथ नई शुरुआत : रूचि
आज हम सुनते हैं एक ऐसी निडर लड़की की कहानी, जिसकी जिंदगी संघर्ष और साहस की मिसाल बन गई। यह कहानी है रूचि की, एक ऐसी लड़की जिसकी उम्र केवल 17 साल है। कल्पना कीजिये की आपकी माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं, पिता जी घर से दूर रहते हैं, और आप अकेले एक परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी उठाने को मजबूर हैं।
रूचि, मुंगेर बैच-10 की एडू लीडर, ने कम उम्र में ही ऐसी परिस्थितियों का सामना किया जिनसे बड़े-बड़े भी घबरा जाएं।जहाँ अधिकतर लोग गरीब होते हुए भी अपने माता-पिता के संरक्षण में सुरक्षित रहते हैं, वहीं रूचि अपने माँ के बिना और पिता की अनुपस्थित में घर की अकेली जिम्मेदार बन गई।
दो साल पहले उसकी माँ की देहांत हो गया। उस समय से, रूचि को अपने दो भाइयों और घर का पूरा भार उठाना पड़ा। एक शांत, डरपोक और कमजोर लड़की के लिए यह काम बेहद कठिन था। धीरे-धीरे, वह मानसिक तनाव की शिकार हो गई। रूचि की जिंदगी जीना आसान नहीं था।
जब रूचि के पिता ने उसकी कठिनाइयों को देखकर उसकी शादी कराने का निर्णय लिया, तो उसकी दुनिया और उलट-पुलट हो गई। रूचि ने दसवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की थी और वह आगे पढ़कर एक अच्छी नौकरी करना चाहती थी। लेकिन शादी के बात ने उसे अंदर से तोड़ दिया। वह अकेले घर से बाहर जाने में डरने लगी, उसकी हालत इतनी ख़राब हो गई कि वह रोते-रोते अचानक चिल्लाने लगती। आस-पड़ोस की लोग समझने की बजाय आलोचना करते, जिससे उसकी हालत और बिगड़ती गई।
पर रूचि की जिंदगी में एक रोशनी की किरण आई। जब उसके दोस्तों और ऑफिस के सहकर्मियों ने उसकी स्थिति के बारे में जाना, तो उन्होंने उसे साहस दिया और समझाया। उन्होंने कहा, "जब भी रोना आए, तो बिना रोए लोगों के बिच अपनी बातों को हिम्मत से रखो। "इस बात ने रूचि को एक नई राह दी। उसने अपनी साथी रश्मि दीदी को सहारा लिया और अपनी समस्याओं को उनके साथ साझा करना शरू किया।
धीरे-धीरे रूचि ने अपने भीतर की कमजोरी को हरा दिया।की कमजोर समझी जाने वाली एक लड़की कैसे अपने साहस से सबकुछ बदल सकती है। अब अपने पढाई पर ध्यान केन्द्रित कर रही है और अपने आत्म-सम्मान को बढ़ा रही है। वह अब दूसरों की बातों को सुनकर चुपचाप नहीं रोती, बल्कि मजबूती से उनका सामना करती है।
कहते हैं:
तू पत्थर से भी ज्यादा कठोर है,
हर बंधन-रुकावट तोड़ सकती है।
तेरी राह चाहे कितनी मुश्किल हो,
तू अपने दम पर नया रास्ता बना सकती है।
तू शांति भी है, और जंग की तलवार भी,
हर मुश्किल का हल तू खुद निकाल सकती है।
नारी, तुझमें बेमिसाल ताकत का दरिया बहता है,
बस खुद पर भरोसा रख,तू हर सपना साकार कर सकती है।"
रुचि
बैच-10, मुंगेर
Friday, October 18, 2024
मैत्री प्रोजेक्ट में दो वर्षों का अनुभव- अभिषेक
नमस्ते साथियों,
मैं बैच पाँच का फेलो था। फेल्लोशिप समाप्त होने के बाद मेरा चयन मैत्री प्रोजेक्ट में हुआ। मुझे अभी भी याद है कि इस प्रोजेक्ट में चयन होने के कारण मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी। शुरूआत में गाँव में सर्वे (survey) करने में कठिनाई हो रही थी परन्तु धीरे-धीरे मुझे यह कार्य करने में मज़ा आने लगा।
मैत्री प्रोजेक्ट: आउट ऑफ़ स्कूल (Out of school) लड़कियों को स्कूल से जोड़ना और उनका रिटेंशन (retention) करना इस प्रोजेक्ट का अहम उद्देश्य है।
प्रोजेक्ट की अवधि 21 सितम्बर 2022 से 31 अगस्त 2024 थी। मैंने अपनी पञ्चायत तक के सभी गाँव नहीं देखे थे, और मैत्री प्रोजेक्ट के अंतर्गत मैंने मुंगेर जिले के चार ब्लॉक क्रमशः बरियारपुर, धरहरा, मुंगेर सदर, और जमालपुर के लगभग एक सौ गाँवों का सर्वे किया। जमुई के कुछ गाँव भी मेरे सर्वे का हिस्सा रहे।
समस्याएँ और समाधान:
सर्वे करने के दौरान हमारी टीम के साथियों को बहुत परेशानियाँ हो रही थी। जैसे- सर्वे के दौरान, सम्मानपूर्वक बात ना करना, डांट कर भगा देना और बदतमीज़ी करना आदि।
परेशानियों के साथ-साथ मदद के हाथ भी आगे आये। मदद करने वाले लोगो में मुखिया, वार्ड सदस्य और आम ग्रामीण लोग थे।
शिक्षा के प्रति बच्चों और अभिभावकों में जागरुकता की कमी भी एक अहम समस्या रही।
हम ऐसे गाँवों में भी गए जहाँ तक किसी प्रकार की कोई सड़क नहीं जाती है, पक्के घर नहीं हैं। इस प्रकार के कुछ गाँव मन कोटिया, गोपाली चेक, ब्लॉक धरहरा में है। यहाँ लड़कियों को विद्यालय आने-जाने को लेकर अलग समस्याएँ थी। उनके अभिभावक भी इन समस्याओं के बारे में नहीं जानते थे। जिसको हमने अभिभावकों से लगातार बात करके हल किया।
जब हम आर.एन. मुसहरी टोला (बदला हुआ नाम) की दो बच्चियों का नामांकन कराने के लिए उन्हें विद्यालय लेकर गए तो वहाँ के प्रधानाध्यापक का कहना था कि आप दोनों गोरा होने वाली क्रीम (Fair&Lovely) लगा कर ही विद्यालय आ सकते हैं। ऐसे शब्द सुनकर किसी भी बच्ची का मनोबल टूट जाता। हमारी टीम ने दोनों पक्ष के साथ लगातार समय दिया और जातिवाद को किनारे करने के लिए बहुत समझाया।
गौरीपुर में हमारे काम करने के तरीके को लेकर भी प्रश्न उठाये गए। हम बच्चियों को स्कूल पहुँचाने के लिए जिस शिद्दत से लगे थे, उसे देखकर ग्रामीणों को लगने लगा कि अवश्य ही इन लोगो को (मैत्री टीम के सदस्यों) बच्चों के नाम पर विद्यालय में आने वाली राशि, अन्य सामान इत्यादि का हिस्सा मिलता होगा। उनका यह भी कहना था कि आधा तो विद्यालय के शिक्षक ही खा जाते हैं। हमने इस मानसिकता पर चोट की। अपने प्रयासों की एक विडियो बनाकर, सभी ग्रामीणों को उसे दिखाया। तब जाकर विश्वास अर्जित किया।
हितधारकों का व्यवहार:
विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों का अधिकतार बार ऐसा व्यवहार दिखा कि इस कम्युनिटी विशेष के बच्चों का नामांकन नहीं करते हैं। जिसके कई कारण पाए गए-
बच्चे भट्टे पर मजदूरी करने चले जाते थे। अभिभावकों को इससे सहूलियत होती थी। क्योंकि घर पर उनकी देखभाल करने के लिए कोई नहीं बचता था।
अभिभावकों को नामांकन कराने हेतु लगने वाले दस्तावेजों का ज्ञान नहीं था।
आधार कार्ड ना बना होने के कारण विद्यालय बच्चे का नामांकन नहीं लेते थे।
बच्चियों के पास वर्दी ना होने के कारण उन्हें शिक्षक और प्रधानाध्यापक द्वारा कक्षा में बैठने नहीं दिया जाता था।
जब हम किसी गाँव में सर्वे (survey) करने जाते थे तो कभी-कभी हमें आउट ऑफ़ स्कूल गर्ल्स (Out of School Girls) का डाटा देने से मना कर देते थे और तरह-तरह के झूठें आरोप भी हम पर लगाये जाते थे। उदाहरण के लिए जैसे कि हम डेटा बेच देंगें, या हमें कुछ आर्थिक रूप से कोई पैसा मिलने वाला हो!
क्या पद्धतियाँ काम आयीं?
गतिविधि के माध्यम से कम्युनिटी के लोगो को जोड़ना काफी कारगर साबित हुआ।
बच्चियों का रिटेंशन (retention) करने में बाल-उत्सव, ग्राम सभा, शिक्षक-अभिभावक बैठक (PTM) जैसे इवेंट्स (events) काम आये।
अभिभावकों और ग्रामीणों के साथ ज्यादा समय और शिक्षा की जागरूकता सम्बंधित जानकारी देकर इंटरवेंशन (intervention) करना पड़ा।
गर्मियों की छुट्टियों में जब बिहार सरकार द्वारा मिशन दक्ष चलाया जा रहा था, तब हमारी टीम भी दोपहर में दो घंटे बच्चियों को समुदाय में जाकर पढ़ाते थे।
अभिभावकों और विद्यालयों के बीच बातचीत करने से थोड़ा गैप (gap) कम हुआ।
इतना सब करने के बाद भी बच्चों के लिए प्रतिदिन विद्यालय जाना सरल नहीं था। हर गाँव-टोले की अलग-अलग समस्याएँ हैं, रिटेंशन के लिए निरंतर प्रयास करते रहना आवश्यक है। जो मैं और मेरी टीम कर ही रहे हैं।
मैत्री प्रोजेक्ट के दो वर्ष मेरे लिए मेरी लर्निंग जर्नी (learning journey) के अहम वर्ष रहेंगें। इन दो वर्षो में मैंने कम्युनिटी को, कम्युनिटी की समस्याओं को करीब से जाना है, जो मुझे जीवन पर्यंत इनके समाधानों पर विचार करने के लिए प्रेरित करेगा।
अभिषेक
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