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Wednesday, July 16, 2025

"ख़ुशी की जिद और वर्षा की जीत"

आज सुबह मै हमेशा की तरह ऑफिस के लिए निकली थी। टोटो में बैठकर अपने-अपने ख्यालों में थी की तभी मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी, वो साईकिल चला कर स्कूल जा रही थी। पर वो कोई साधारण लड़की नहीं थी। वो थी वर्षा।

आप पूछेंगे - वर्षा कौन हैं ? - तो सुनिए , वर्षा की कहानी है, जिसने हालातो से हार मान ली थी। लेकिन फिर किसी और लड़की की हिम्मत ने उसे दोबारा खड़ा कर दिया। 

वर्षा , मुंगेर के एक गॉव रामनगर (भागिचक) की लड़की है। सातवीं कक्षा के बाद उसकी पढाई छुट गई थी। उसी समय वर्षा के पिता का देहांत हो गया था ,घर में बस माँ और दो बहनें थी। माँ एक छोटी सी दुकान चलाकर जैसे-तैसे घर चलाते थे। पढाई फिर से शुरू करने का न तो हौसला था न ही कोई सहारा। 

और फिर उसकी जिंदगी में आई-सक्षम की एडू-लीडर ख़ुशी जो बैच-11 की है, यह आई-सक्षम संस्था में काम करती हैं। ख़ुशी बहुत ही मेहनती और जिद्दी लड़की, जिस काम को ले कर ठान लेती है, तो पीछे नहीं हटती हैं। 

अक्टूबर-नवंबर का महीना था। हमारे क्लस्टर में तय हुआ कि हम उन किशोरियों को फिर से स्कूल भेजेंगे, जिन्होंने किसी कारण से पढ़ाई छोड़ दी है। उसी अभियान के दौरान खुशी को वर्षा मिली।
जब खुशी ने वर्षा की माँ से बात की तो जवाब साफ थी। अब क्या पढ़ेगी? सात साल हो गए। मुश्किल से घर चलता है, पढ़ाई के लिए समय और पैसे कहाँ हैं?
लेकिन खुशी हार मानने वालों में से नहीं थी। उसने समझाया कि सरकार की तरफ़ से लड़कियों को छात्रवृत्तियाँ मिलती हैं, कई योजनाएं हैं। फिर उसने वर्षा से सीधा पूछा। क्या तुम फिर से पढ़ना चाहती हो?
वर्षा की आँखों में हल्की-सी चमक आई। वो बोली। मन तो है दीदी, पर स्कूल में दाखिला मिलेगा क्या? मेरे पास तो टीसी भी नहीं है। खुशी मुस्कराई और कहा , तुम साथ दो, बाकी मै आपको मदद करूंगी। खुशी ने स्कूल से लेकर DRCC ऑफिस और कोर्ट तक पहुँची । चार दिन DRCC के ऑफिस में, तीन दिन कोर्ट में — वो तब तक नहीं रुकी जब तक वर्षा की टीसी नहीं मिल गई। कुछ दिन बाद मिलने के बाद ख़ुशी ने वर्षा का मई में स्कूल में दाख़िला करवाए , तो जून की गर्मियों में, सात साल बाद, वर्षा फिर से स्कूल गई। 
आज जब मैंने उसे साइकिल से स्कूल जाते देखा, तो ऐसा लगा जैसे उम्मीद सचमुच साइकिल चला रही है। खुशी ने सिर्फ़ एक बच्ची की पढ़ाई शुरू नहीं करवाई। उसने उसके भविष्य का रास्ता खोला।
हम एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ हर लड़की के पास अपनी आवाज़ हो, अपनी पसंद हो, और वह किसी दूसरी लड़की की ताक़त भी बन सके।
स्मृति , बड्डी
मुंगेर





Wednesday, July 2, 2025

"सोच में बदलाव" – एक बहू, एक सास और तीन पीढ़ियों की कहानी

सुनिए  साथियों, जमाना कितना बदल रहा है ना... लेकिन असली बदलाव तब दिखता है जब घर-परिवार के लोग अपनी सोच बदलें। ऐसा ही कुछ मैंने खुद अपनी आँखों से देखा और दिल से महसूस किया।

हमलोग हाल ही में जमुई में i-सक्षम में “बडी प्रशिक्षण” में गए थे। चार दिन का प्रशिक्षण था। बहुत कुछ नया सीखने को मिला। लेकिन सबसे बड़ी सीख तो एक कहानी ने दी... एक सास, एक बहू और एक प्यारी सी पोती की।
हमारी साथी नेहा दी भी वहाँ आई थीं। लेकिन अकेली नहीं — अपनी सासू माँ और बेटी रूपम के साथ। पहले तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मन में सवाल उठा कि अरे, नेहा दी की सासू माँ भी यहाँ? वो भी ट्रेनिंग में?

क्योंकि मैं नेहा दी की कहानी पहले से जानती थी। याद है, 2024 के फाउंडेशन डे पर मैंनें उनके जीवन पर नाटक लिखा था। तब जान पाई थी कि नेहा दी की पढ़ाई एक वक्त पर रोक दी गई थी। दसवीं में थीं तब उनकी सासू माँ ने साफ कहा थे,

"दसवीं पढ़कर क्या करेगी? बकरी ही तो चराएगी!"
सोचिए, कैसी तकलीफ हुई होगी नेहा दी को। लेकिन वक़्त बदला... हालात बदले... और सबसे बड़ी बात — सोच बदली।
अब वही सासू माँ... अपनी बहू का हाथ पकड़कर जमुई ले आईं। बोलीं
"तू सीख, मैं रूपम को संभाल लूंगी।"

ये सिर्फ साथ आना नहीं था दीदी... ये था तीन पीढ़ियों का बदलाव। सासू माँ ने पूरे मन से नेहा दी का साथ दिया। पोती रूपम उनके गोद में खेलती रही और नेहा दी सारा ध्यान लगाकर ट्रेनिंग में सीखती रहीं।


ट्रेनिंग खत्म होने के बाद मैं उनके पास गई। धीरे-धीरे बातें होने लगीं। और उनकी बात सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। वो बोलीं —
"हाँ, पहले गलती हुई हमसे। सोचा था पढ़ाई से क्या होगा। पर अब समझ आई है। चाहे बेटी हो या बहू, पढ़ाई सबसे जरूरी है। आज गांव में लोग कहते हैं — देखो, आपकी बहू समाज में काम करती है, लड़कियों को समझाती है, लोगों की मदद करती है। तो मन गर्व से भर जाता है।"

नेहा की सासु माँ ने पिछले बातो को कहते-कहते उनकी आँखें भर आईं। फिर बोलीं —
"नेहा ने हमारे घर की सोच बदल दी है।"
सच कहूँ साथियों, उस दिन मैंने महसूस किया कि बदलाव सिर्फ किताबों में नहीं होता। जब हम किसी की कहानी को जीते हैं, उसे अपने आस-पास होते हुए देखते हैं, तब असली असर होता है।
ये सिर्फ नेहा दी का सफर नहीं था... ये हर उस लड़की की कहानी है जो लड़ती है, सीखती है और समाज की सोच बदल देती है।
"जब सोच बदले, तब ही असली बदलाव आता है"
स्मृति, टीम मुंगेर।

Thursday, June 5, 2025

"पहले खुद जागी, अब पूरे गांव को जगा रही है"

हर गांव की गलियों में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं
जो चुपचाप अपनी राह बनाते हैं —
न कोई शोर, न कोई शिकायत।
लेकिन उनके कदम इतने मजबूत होते हैं कि पीछे आने वालों को रास्ता साफ दिखने लगता है।
हमारे फरदा गांव की ऐसी ही एक शख्सियत हैं — प्रेरणा कुमारी
एक आम-सी लड़की, जो एक छोटे से गांव से निकल कर आई थी,
जिसने दुनिया को वैसा ही देखा था जैसा उसके घरवालों ने दिखाया था।

उसकी सोच की सीमाएं भी वहीं तक थीं, जहां तक उसने अपने घर के आंगन से झांका था।

मगर आज प्रेरणा वहां है, जहां वो अकेले ही 60 से ज़्यादा बच्चों को अपने शिक्षण केंद्र में उनके हुनर और  आत्मविश्वास के लिए तैयार कर रही हैं।

जब मैं पहली बार उनके लर्निंग सेंटर पहुंची, तो मन में एक साधारण-सी छवि थी —
सोचा था, एक छोटा-सा कमरा होगा, कुछ कुर्सियाँ होंगी, और कुछ बच्चे पढ़ते मिलेंगे।

लेकिन जो वहां देखा... वो दिल को छू गया।
वो सिर्फ एक क्लासरूम नहीं था —
वो एक ऐसी जगह थी, जहां हर बच्चा खुलकर सोच रहा था,
अपने मन की कह रहा था, और
जहां एक लड़की — प्रेरणा — चुपचाप हर दिल को छू रही थी।


मैंने एक ऐसी लड़की को देखा, जो दिखने में तो बिल्कुल साधारण थी, लेकिन उसके भीतर
आत्मविश्वास और समझ की एक खास चमक थी। वह जिस सादगी से बच्चों से जुड़ती, उन्हें सिखाती, और हर बच्चे की छिपी क्षमता को पहचानती थी — उसे देखकर लगा, ये सिर्फ पढ़ाना नहीं, बल्कि ज़िंदगी को एक नई दिशा देना है।
आज प्रेरणा कुमारी, FEA (Freedom Employability Academy) संस्था के साथ मिलकर फरदा गांव में एक शिक्षण केंद्र चला रही हैं। यहां केवल अंग्रेज़ी बोलना नहीं सिखाया जाता, बल्कि ये सिखाया जाता है कि खुद पर भरोसा कैसे किया जाए, और दुनिया के सामने खड़े होकर अपने हक की बात कैसे कही जाए। प्रेरणा हर बच्चे के भीतर कुछ खास देखती हैं — और उसी हुनर को निखारने में जी-जान लगा देती हैं।


लेकिन प्रेरणा का यह सफर कभी आसान नहीं रहा।
सीमित संसाधन, घरेलू जिम्मेदारियां और समाज की संकीर्ण सोच — इन सबके बीच उन्होंने पढ़ाई का दामन थामे रखा।जब आसपास की दुनिया लड़कियों को सिर्फ रसोई और चौखट तक सीमित रखने की बातें कर रही थी,तब प्रेरणा ने i-Saksham से जुड़कर न सिर्फ खुद को बदला,बल्कि यह ठान लिया कि अब अपने गांव में भी बदलाव लाना है —और आज, वो वही कर रही हैं... पूरे संकल्प और सच्ची नीयत के साथ।


प्रेरणा से मिलकर मुझे महसूस हुआ कि असली बदलाव भाषणों से नहीं, बल्कि अपने काम से आता है।
उनकी हर छोटी कोशिश, हर एक शब्द गांव के युवाओं में आत्मविश्वास जगाता है।
अब लड़कियां खुलकर सपने देखती हैं, और लड़के अपने भविष्य को लेकर जागरूक होते जा रहे हैं —
क्योंकि किसी ने उन्हें दिखा दिया है कि ये सच में मुमकिन है।


प्रेरणा — एक उम्मीद की मिसाल हैं।
वो हमारे गांव की वह पहली लड़की हैं, जिसने हिम्मत जुटाई, अपनी राह बनाई —

और आज उसी राह पर कई और कदम बढ़ाने लगे हैं।

प्रेरणा की तरह, फरदा गांव की कई महिलाएं और लड़कियां भी अब आगे बढ़ रही हैं।
हमें पूरा विश्वास है कि ये बदलाव हमारे समाज के लिए एक नया सूरज लेकर आएगा —
जो हर अंधेरे को दूर करेगा, और नई रोशनी बिखेरेगा

प्रेरणा कुमारी
जिला- मुंगेर

Monday, June 2, 2025

"नई राह की ओर: एक बेटी के सपनों को फिर से जगाने की कोशिश”

आज मैं गुड़िया के घर गई थी। पिछली मुलाकात में हमें पता चला था कि गुड़िया की बड़ी बहन ने 8वीं तक पढ़ाई की है, लेकिन आगे की पढ़ाई नहीं कर पाई।

इसलिए हमने तय किया कि इस बार उनसे बैठकर ठीक से बात की जाए और उनकी चिंताओं को समझने की कोशिश की जाए।
जब हमने उनसे पूछा कि "आप आगे पढ़ाई क्यों नहीं करना चाहतीं?", तो उन्होंने बड़ी सादगी से जवाब दिया—
"मेरी उम्र की सभी सहेलियों की शादी हो चुकी है, और अब मुझे अकेले पढ़ने जाने में अच्छा नहीं लगता।"

हमने उन्हें बहुत प्यार से समझाया —

"ज़िंदगी में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं जहाँ हमें अकेले ही कदम बढ़ाने पड़ते हैं।"
जैसे हम अकेले इस दुनिया में आते हैं, और अकेले ही एक दिन चले भी जाते हैं,
उसी तरह कुछ फैसले भी ऐसे होते हैं, जिन्हें हमें अपने दम पर लेना होता है — बिना किसी का इंतज़ार किए। हमने कहा, "हर रास्ते पर भीड़ नहीं चलती बहन, कुछ रास्ते अकेले तय करने पड़ते हैं — और वही सबसे मजबूत बना देते हैं।"

हमने उन्हें अपने और प्रियंका दीदी के जीवन से एक छोटी सी अनुभव बताई।
हमने कहा,
"पहले हम भी एक-दूसरे को नहीं जानते थे। लेकिन किसी एक ने पहल की, और आज हमारे बीच इतना अपनापन है कि लगता ही नहीं कभी अजनबी थे।"
फिर मुस्कराकर जोड़ा,
"अगर आप भी एक बार घर से बाहर निकलेंगी और पढ़ाई शुरू करेंगी, तो यकीन मानिए — नए दोस्त, नई बातें और एक नई दुनिया आपका इंतज़ार कर रही है।"
"कभी-कभी बस एक कदम ही काफी होता है जुड़ने के लिए — जैसे हम जुड़ गए।"
उन्होंने फिर कहा,
“अब पढ़ाई कर के क्या होगा? मम्मी तो मेरा रिश्ता देखने में लगी हैं।”
इस पर प्रियंका दीदी ने बड़ी सादगी से जवाब दिया,
“शादी के बाद क्या लड़कियां पढ़ाई नहीं करतीं? मैं खुद शादी के बाद ग्रेजुएशन की और i-सक्षम से जुड़ कर आपके सामने हूं।”
हमने उन्हें बताया कि
शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह जीवन को बेहतर समझने का तरीका है।
शिक्षा हमें आत्मनिर्भर बनाती है, सोचने की शक्ति देती है, और समाज में अपनी पहचान बनाने में मदद करती है।
गुड़िया की मम्मी हमारी बातों से बहुत प्रभावित हुईं और अपनी बेटी से बोलीं,
“अब एडमिशन करवा दूं? ”बेटी ने थोड़ी नाराजगी में कहा,
“जब करवाना था तब नहीं करवाया, अब क्या फायदा? मम्मी ने भावुक होकर जवाब दिया, “जब बच्चे सवाल पूछते हैं और मैं जवाब नहीं दे पाती, तो बहुत दुख होता है। इसलिए मैं चाहती हूं कि मेरी बेटी पढ़े और ऐसा खालीपन न महसूस करे।”

हमने उनकी हर चिंता को धैर्य से सुना और कहा, “अब 9वीं में नामांकन हो रहा है। अगर आप पढ़ाई जारी रखेंगी तो आपके परिवार और हमें भी गर्व होगा।”हमारी बातों का असर हुआ, और उन्होंने कहा,
“ठीक है दी, मैं दो-तीन दिन में एडमिशन करवाने की कोशिश करूंगी।”यह बातचीत हमारे लिए भी बहुत प्रेरणादायक रही। हमने जाना कि सच्चे मन से और धैर्य से समझाने पर बदलाव जरूर आता है।

नाजिया , टीम 

मुंगेर ।







Tuesday, March 18, 2025

हलीमपुर गाँव की पहली झलक

आज मैं आप सभी के साथ अपने समुदाय के काम (हलीमपुर) के अनुभव को साझा करना चाहती हूँ, जहाँ मैं एडु लीडर रश्मि (बैच 10A) के साथ गई थी।
जैसे ही हम उस गाँव में पहुँचे, वहाँ की कई चीज़ों ने मेरा मन मोह लिया—मिट्टी के घरों पर बनी सुंदर पेंटिंग, पुराने जमाने में उपयोग होने वाली चीज़ें, खेतों के बीच से गुजरती कच्ची-पक्की सड़कें, और हर ओर फैली हरियाली। गाँव का यह सरल, पर मनमोहक दृश्य मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था।
शिवम के परिवार से मुलाकात:- आज के समुदाय में काम के दौरान, हमें एडु लीडर द्वारा पढ़ाए जाने वाले एक छात्र, शिवम, के अभिभावकों से मिलने का अवसर मिला। सबसे पहले, हमें शिवम के दादा जी मिले, जिन्होंने बड़े ही स्नेह से हमें घर के अंदर बुलाया और बैठने के लिए कहा। कुछ देर बाद, शिवम की माँ और दादी भी आ गईं।
एडु लीडर, शिवम की माँ से उनकी पढ़ाई को लेकर बात कर रही थीं। उसी दौरान, उनकी दादी, कमला देवी जी, मुझसे बहुत आत्मीयता से बातचीत करने लगीं। उन्होंने मुझसे पूछा—
"बेटी, तुम कहाँ से आई हो?" "तुम्हारा नाम क्या है?" "तुम क्या करती हो, क्या पढ़ाई कर रही हो?"
उनका बात करने का आत्मीय अंदाज मुझे बहुत अच्छा लगा। बातचीत के दौरान, उन्होंने अपने पोते की पढ़ाई को लेकर अपनी इच्छाएँ और विचार साझा किए, जिससे उनकी शिक्षा के प्रति जागरूकता स्पष्ट झलक रही थी।
बातचीत के दौरान, कमला देवी जी ने अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण अनुभव साझा किए, जो मुझे बहुत प्रेरणादायक लगे। उन्होंने बताया कि उनकी शादी 1968 में हो गई थी, लेकिन उससे पहले वे 7वीं कक्षा में फर्स्ट डिवीजन से पास हुई थीं। इसके लिए उन्हें छात्रवृत्ति (scholarship) भी मिली थी, जिससे उन्होंने अपने लिए एक नोज़ पिन खरीदी थी, जिसे वे आज भी पहनती हैं।

उन्होंने आगे बताया कि उनका सरकारी शिक्षिका के पद पर चयन भी हो गया था, लेकिन उनके पति ने उन्हें नौकरी करने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि उस समय घर की बहूओं का बाहर जाकर काम करना समाज में स्वीकार्य नहीं था। हालाँकि, उन्होंने अपने बच्चों और बहू की पढ़ाई को हमेशा प्राथमिकता दी।

उनकी बहू ने शादी के बाद स्नातक पूरा किया और बिहार पुलिस तथा एसएससी की परीक्षाओं के लिए आवेदन भी किया, लेकिन सफल नहीं हो सकीं। इसके बाद, पारिवारिक जिम्मेदारियों में व्यस्त होने के कारण उनकी पढ़ाई छूट गई।

शिक्षा के प्रति जागरूकता और आत्मनिर्भरता

कमला देवी जी की बातचीत में कई अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग सुनकर मैं हैरान रह गई, जैसे अंडरलाइन, सब्जेक्ट आदि। जब मैंने जिज्ञासावश पूछा, तो उन्होंने बताया कि 1980 में जब एक साक्षरता कार्यक्रम आया था, तो वे भी उसमें शामिल हुई थीं। वे गाँव की महिलाओं को घर बुलाकर पढ़ाती थीं, जिससे उन्हें बहुत खुशी मिलती थी।
उनकी सोच, शिक्षा के प्रति जागरूकता, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास ने मुझे बहुत प्रभावित किया। बातचीत के अंत में, उन्होंने मुझसे कहा—
"बहुत दिनों बाद मैंने खुलकर अपने मन की बात की,"
जो सुनकर मेरे मन में उनके प्रति और भी सम्मान बढ़ गया।

जब हम वहाँ से जाने लगे, तो उन्होंने प्यार भरे शब्दों में कहा—
"बेटी, फिर जरूर आइएगा,"

जिससे मुझे बहुत अपनापन और आत्मीयता का एहसास हुआ, जैसे कोई हमारे दोबारा लौटने का बेसब्री से इंतजार कर रहा हो। इस पूरे अनुभव ने मुझे शिक्षा के महत्व और उसके प्रभाव को गहराई से समझने का अवसर दिया। कमला देवी जी जैसी प्रेरणादायक महिलाओं से मिलकर मुझे महसूस हुआ कि सच्ची शिक्षा केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि सोच और जागरूकता में होती है।


स्मृति कुमारी
बड़ी इंटर्न, मुंगेर

Tuesday, January 28, 2025

शादी के बाद शिक्षा की जरूरत पर सवाल

आज मैं अपनी चाची के लिए "वॉइस एंड चॉइस" का उपयोग कर उनके प्रेरणादायक अनुभव को साझा करना चाहती हूँ। यह कहानी एक ऐसे सपने की है, जिसे समाज ने नामुमकिन बना दिया था, लेकिन चाची की लगन और हमारे प्रयासों ने इसे हकीकत में बदल दिया।

मेरी चाची का हमेशा से सपना था कि वे पढ़ाई करें और अपनी शिक्षा पूरी करें। लेकिन उनकी शादी के बाद, उनके परिवार ने यह कहकर उनका सपना तोड़ दिया कि "अब पढ़ाई का कोई मतलब नहीं। शादी के बाद शिक्षा की जरूरत किसे है?" उनके दिल में कहीं यह बात घर कर गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

जब मैंने उनके मन में छिपी इस इच्छा को देखा, तो मैंने ठान लिया कि उनकी पढ़ाई को लेकर मैं उनका साथ दूँगी। मैंने उन्हें समझाया, "पहले आप अपने पति से बात करें और अपनी पढ़ाई की इच्छा जाहिर करें। यह आपका अधिकार है।"



उन्होंने हिम्मत करके अपने पति (मेरे चाचा) से बात की, लेकिन उन्हें भी मना कर दिया गया। चाचा ने साफ कहा, "अब पढ़ाई का क्या फायदा? शादी के बाद पढ़ाई की जरूरत ही क्या है?"
यह सुनकर मैं चुप नहीं बैठी। मैंने चाचा से व्यक्तिगत रूप से बात करने का फैसला किया। मैं उनके पास गई और कहा, "चाचा, आपकी बेटी अभी सिर्फ दो साल की है। जब वह बड़ी होकर आपसे पूछेगी कि 'पापा, आप कितनी पढ़ाई किए हैं?' तो आप गर्व से कहेंगे, 'हम इंटर तक पढ़े हैं।' लेकिन जब वह मम्मी से पूछेगी, 'मम्मी, आप कितनी पढ़ी हैं?' और मम्मी सिर्फ 9वीं तक पढ़ी होंगी, तो इसका क्या जवाब देंगे? क्या आप नहीं चाहेंगे कि चाची अपनी बेटी के लिए एक प्रेरणा बनें? क्या आप नहीं चाहेंगे कि आपकी बेटी अपनी माँ को भी पढ़ा-लिखा और आत्मनिर्भर देखे?"
मेरी इन बातों ने चाचा को सोचने पर मजबूर कर दिया। कुछ दिनों बाद, उन्होंने बात मान गए। उसके मैं चाची को एक स्कूल में नामांकन कराया।

शुरुआत में यह सफर चाची के लिए आसान नहीं था। घर के कामों और पढ़ाई के बीच तालमेल बैठाना एक बड़ा संघर्ष था। लेकिन उनकी मेहनत और जज़्बे ने हर मुश्किल को आसान बना दिया।


आज, मैं गर्व से कह सकती हूँ कि मेरी चाची ने 10वीं की परीक्षा पास कर ली है। यह सिर्फ एक परीक्षा पास करना नहीं था, बल्कि उनके सपनों की पहली सीढ़ी थी। अब हम उन्हें आगे पढ़ाई के लिए प्रेरित कर रहे हैं ताकि वे अपने सपनों को पूरी तरह से साकार कर सकें।
चाची की यह कहानी सिर्फ उनके सपनों की नहीं, बल्कि हर उस महिला की है, जो अपने हक के लिए खड़ी होती है। जब उन्हें सही समर्थन और मौका मिलता है, तो वे हर असंभव को संभव बना सकती हैं।

मोंटी कुमारी 
बैच 10 
मुंगेर

Wednesday, December 25, 2024

हिचकिचाहट से आत्मविश्वास तक का सफर: गुड्डी

 हिचकिचाहट से आत्मविश्वास तक का सफर: गुड्डी

आई-सक्षम: एक नई दिशा

आई-सक्षम केवल एक प्लेटफॉर्म नहीं है, यह एक ऐसा वातावरण है जहाँ हर व्यक्ति की बात सुनी जाती है, समझी जाती है, और जरूरत पड़ने पर उसे पूरा समर्थन मिलता है। यहाँ मैंने अपने व्यक्तित्व और क्षमताओं को समझने और निखारने का अनमोल अवसर पाया।

पहले और अब के बीच का बदलाव

दो साल पहले, मैं एक ऐसी लड़की थी जो लोगों से जुड़ने में हिचकिचाती थी। अपनी बातें दूसरों के सामने रखने की हिम्मत नहीं थी और समूह में कार्य करना तो दूर की बात थी। लेकिन जब मैंने आई-सक्षम के साथ अपनी यात्रा शुरू की, तो मेरे अंदर अद्भुत बदलाव आया।

अब मैं न केवल लोगों से जुड़ने लगी हूँ, बल्कि शिक्षकों, प्रिंसिपल, बच्चों, उनके अभिभावकों और अपने समाज से भी सक्रियता से संवाद करने लगी हूँ। क्लस्टर के माध्यम से मैं समूह में कार्य करने और सहयोग निभाने का आनंद ले रही हूँ।
बच्चों के जीवन में बदलाव
जो बच्चे स्कूल आने से कतराते थे, पढ़ाई से दूर भागते थे या खेल को प्राथमिकता देते थे, उन्हें मैंने खेल-खेल में शिक्षा से जोड़ा। इस प्रक्रिया में बच्चे खेलते भी हैं और सीखते भी हैं। उनका उत्साह और रुचि देखकर मुझे अपने प्रयासों पर गर्व होता है।

लाइब्रेरी: शिक्षा का नया केंद्र
हमारे क्लस्टर के प्रयास से फर्दा में एक लाइब्रेरी की स्थापना की गई है। यह केवल किताबों का घर नहीं, बल्कि एक दोस्ताना माहौल, शिक्षा के संसाधन, और सीखने के नए तरीकों का केंद्र है। यहाँ बच्चे और समुदाय के लोग समान रूप से लाभान्वित हो रहे हैं।

मेरी सीख और आगे का रास्ता
आई-सक्षम ने मुझे आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझने का अवसर दिया। यह यात्रा न केवल मेरे लिए बल्कि उन सभी के लिए प्रेरणादायक है, जिनके जीवन को मैंने छूने का प्रयास किया।
,
गुड्डी कुमारी
बैच-10, मुंगेर



Tuesday, October 22, 2024

हिम्मत के साथ नई शुरुआत: रूचि

हिम्मत के साथ नई शुरुआत : रूचि 

आज हम सुनते हैं एक ऐसी निडर लड़की की कहानी, जिसकी जिंदगी संघर्ष और साहस की मिसाल बन गई। यह कहानी है रूचि की, एक ऐसी लड़की जिसकी उम्र केवल 17 साल है। कल्पना कीजिये की आपकी माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं, पिता जी घर से दूर रहते हैं, और आप अकेले एक परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी उठाने को मजबूर हैं

रूचि, मुंगेर बैच-10 की एडू लीडर, ने कम उम्र में ही ऐसी परिस्थितियों का सामना किया जिनसे बड़े-बड़े भी घबरा जाएं।जहाँ अधिकतर लोग गरीब होते हुए भी अपने माता-पिता के संरक्षण में सुरक्षित रहते हैं, वहीं रूचि अपने माँ के बिना और पिता की अनुपस्थित में घर की अकेली जिम्मेदार बन गई

दो साल पहले उसकी माँ की देहांत हो गया उस समय से, रूचि को अपने दो भाइयों और घर का पूरा भार उठाना पड़ाएक शांत, डरपोक और कमजोर लड़की के लिए यह काम बेहद कठिन था धीरे-धीरे, वह मानसिक तनाव की शिकार हो गई रूचि की जिंदगी जीना आसान नहीं था

जब रूचि के पिता ने उसकी कठिनाइयों को देखकर उसकी शादी कराने का निर्णय लिया, तो उसकी दुनिया और उलट-पुलट हो गई। रूचि ने दसवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की थी और वह आगे पढ़कर एक अच्छी नौकरी करना चाहती थी। लेकिन शादी के बात ने उसे अंदर से तोड़ दियावह अकेले घर से बाहर जाने में डरने लगी, उसकी हालत इतनी ख़राब हो गई कि वह रोते-रोते अचानक चिल्लाने लगती। आस-पड़ोस की लोग समझने की बजाय आलोचना करते, जिससे उसकी हालत और बिगड़ती गई

पर रूचि की जिंदगी में एक रोशनी की किरण आई। जब उसके दोस्तों और ऑफिस के सहकर्मियों ने उसकी स्थिति के बारे में जाना, तो उन्होंने उसे साहस दिया और समझायाउन्होंने कहा, "जब भी रोना आए, तो बिना रोए लोगों के बिच अपनी बातों को हिम्मत से रखो। "इस बात ने रूचि को एक नई राह दी उसने अपनी साथी रश्मि दीदी को सहारा लिया और अपनी समस्याओं को उनके साथ साझा करना शरू किया

धीरे-धीरे रूचि ने अपने भीतर की कमजोरी को हरा दिया।की कमजोर समझी जाने वाली एक लड़की कैसे अपने साहस से सबकुछ बदल सकती हैअब अपने पढाई पर ध्यान केन्द्रित कर रही है और अपने आत्म-सम्मान को बढ़ा रही है। वह अब दूसरों की बातों को सुनकर चुपचाप नहीं रोती, बल्कि मजबूती से उनका सामना करती है

कहते हैं:

"नारी, तू सबकुछ कर सकती है।
तू पत्थर से भी ज्यादा कठोर है,
हर बंधन-रुकावट तोड़ सकती है।
तेरी राह चाहे कितनी मुश्किल हो,
तू अपने दम पर नया रास्ता बना सकती है।
तू शांति भी है, और जंग की तलवार भी,
हर मुश्किल का हल तू खुद निकाल सकती है।
नारी, तुझमें बेमिसाल ताकत का दरिया बहता है,
बस खुद पर भरोसा रख,तू हर सपना साकार कर सकती है।"

रुचि
बैच-10, मुंगेर
(रुचि कुमारी बांक टोला फ़रदा की रहने वाली है । रुचि मुंगेर विश्वविद्यालय में पॉलिटिकल विषय से स्नातक की पढ़ाई कर रही है । वह 2023 में i - सक्षम में जुड़ी है, जो बैच 10 की एड़ू लीडर है ।  यह i सक्षम में जुड़ने से पहले बस एक आम लड़कियों की तरह घर में चूल्हा चौका करती थी , और कम उम्र में शादी का बोझ था । आज ये i सक्षम के साथ मिलकर खुद को और अपने जैसी लड़कियों को हौसलों के साथ उभारना चाहती है।)

Friday, October 18, 2024

मैत्री प्रोजेक्ट में दो वर्षों का अनुभव- अभिषेक

नमस्ते साथियों,

मैं बैच पाँच का फेलो था। फेल्लोशिप समाप्त होने के बाद मेरा चयन मैत्री प्रोजेक्ट में हुआ। मुझे अभी भी याद है कि इस प्रोजेक्ट में चयन होने के कारण मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी। शुरूआत में गाँव में सर्वे (survey) करने में कठिनाई हो रही थी परन्तु धीरे-धीरे मुझे यह कार्य करने में मज़ा आने लगा।

मैत्री प्रोजेक्ट: आउट ऑफ़ स्कूल (Out of school) लड़कियों को स्कूल से जोड़ना और उनका रिटेंशन (retention) करना इस प्रोजेक्ट का अहम उद्देश्य है। 

प्रोजेक्ट की अवधि 21 सितम्बर 2022 से 31 अगस्त 2024 थी। मैंने अपनी पञ्चायत तक के सभी गाँव नहीं देखे थे, और मैत्री प्रोजेक्ट के अंतर्गत मैंने मुंगेर जिले के चार ब्लॉक क्रमशः बरियारपुर, धरहरा, मुंगेर सदर, और जमालपुर के लगभग एक सौ गाँवों का सर्वे किया। जमुई के कुछ गाँव भी मेरे सर्वे का हिस्सा रहे। 

समस्याएँ और समाधान: 

सर्वे करने के दौरान हमारी टीम के साथियों को बहुत परेशानियाँ हो रही थी। जैसे- सर्वे के दौरान, सम्मानपूर्वक बात ना करना, डांट कर भगा देना और बदतमीज़ी करना आदि। 

  • परेशानियों के साथ-साथ मदद के हाथ भी आगे आये। मदद करने वाले लोगो में मुखिया, वार्ड सदस्य और आम ग्रामीण लोग थे। 

  • शिक्षा के प्रति बच्चों और अभिभावकों में जागरुकता की कमी भी एक अहम समस्या रही।

  • हम ऐसे गाँवों में भी गए जहाँ तक किसी प्रकार की कोई सड़क नहीं जाती है, पक्के घर नहीं हैं। इस प्रकार के कुछ गाँव मन कोटिया, गोपाली चेक, ब्लॉक धरहरा में है। यहाँ लड़कियों को विद्यालय आने-जाने को लेकर अलग समस्याएँ थी। उनके अभिभावक भी इन समस्याओं के बारे में नहीं जानते थे। जिसको हमने अभिभावकों से लगातार बात करके हल किया।

  • जब हम आर.एन. मुसहरी टोला (बदला हुआ नाम) की दो बच्चियों का नामांकन कराने के लिए उन्हें विद्यालय लेकर गए तो वहाँ के प्रधानाध्यापक का कहना था कि आप दोनों गोरा होने वाली क्रीम (Fair&Lovely) लगा कर ही विद्यालय आ सकते हैं। ऐसे शब्द सुनकर किसी भी बच्ची का मनोबल टूट जाता। हमारी टीम ने दोनों पक्ष के साथ लगातार समय दिया और जातिवाद को किनारे करने के लिए बहुत समझाया।

  • गौरीपुर में हमारे काम करने के तरीके को लेकर भी प्रश्न उठाये गए। हम बच्चियों को स्कूल पहुँचाने के लिए जिस शिद्दत से लगे थे, उसे देखकर ग्रामीणों को लगने लगा कि अवश्य ही इन लोगो को (मैत्री टीम के सदस्यों) बच्चों के नाम पर विद्यालय में आने वाली राशि, अन्य सामान इत्यादि का हिस्सा मिलता होगा। उनका यह भी कहना था कि आधा तो विद्यालय के शिक्षक ही खा जाते हैं। हमने इस मानसिकता पर चोट की। अपने प्रयासों की एक विडियो बनाकर, सभी ग्रामीणों को उसे दिखाया। तब जाकर विश्वास अर्जित किया।

हितधारकों का व्यवहार: 

विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों का अधिकतार बार ऐसा व्यवहार दिखा कि इस कम्युनिटी विशेष के बच्चों का नामांकन नहीं करते हैं। जिसके कई कारण पाए गए- 

  • बच्चे भट्टे पर मजदूरी करने चले जाते थे। अभिभावकों को इससे सहूलियत होती थी। क्योंकि घर पर उनकी देखभाल करने के लिए कोई नहीं बचता था।

  • अभिभावकों को नामांकन कराने हेतु लगने वाले दस्तावेजों का ज्ञान नहीं था।

  • आधार कार्ड ना बना होने के कारण विद्यालय बच्चे का नामांकन नहीं लेते थे।

  • बच्चियों के पास वर्दी ना होने के कारण उन्हें शिक्षक और प्रधानाध्यापक द्वारा कक्षा में बैठने नहीं दिया जाता था। 

  • जब हम किसी गाँव में सर्वे (survey) करने जाते थे तो कभी-कभी हमें आउट ऑफ़ स्कूल गर्ल्स (Out of School Girls) का डाटा देने से मना कर देते थे और तरह-तरह के झूठें आरोप भी हम पर लगाये जाते थे। उदाहरण के लिए जैसे कि हम डेटा बेच देंगें, या हमें कुछ आर्थिक रूप से कोई पैसा मिलने वाला हो!

क्या पद्धतियाँ काम आयीं?

  • गतिविधि के माध्यम से कम्युनिटी के लोगो को जोड़ना काफी कारगर साबित हुआ। 

  • बच्चियों का रिटेंशन (retention) करने में बाल-उत्सव, ग्राम सभा, शिक्षक-अभिभावक बैठक (PTM) जैसे इवेंट्स (events) काम आये।

  • अभिभावकों और ग्रामीणों के साथ ज्यादा समय और शिक्षा की जागरूकता सम्बंधित जानकारी देकर इंटरवेंशन (intervention) करना पड़ा। 

  • गर्मियों की छुट्टियों में जब बिहार सरकार द्वारा मिशन दक्ष चलाया जा रहा था, तब हमारी टीम भी दोपहर में दो घंटे बच्चियों को समुदाय में जाकर पढ़ाते थे।

  • अभिभावकों और विद्यालयों के बीच बातचीत करने से थोड़ा गैप (gap) कम हुआ।

इतना सब करने के बाद भी बच्चों के लिए प्रतिदिन विद्यालय जाना सरल नहीं था। हर गाँव-टोले की अलग-अलग समस्याएँ हैं, रिटेंशन के लिए निरंतर प्रयास करते रहना आवश्यक है। जो मैं और मेरी टीम कर ही रहे हैं।

मैत्री प्रोजेक्ट के दो वर्ष मेरे लिए मेरी लर्निंग जर्नी (learning journey) के अहम वर्ष रहेंगें। इन दो वर्षो में मैंने कम्युनिटी को, कम्युनिटी की समस्याओं को करीब से जाना है, जो मुझे जीवन पर्यंत इनके समाधानों पर विचार करने के लिए प्रेरित करेगा।

अभिषेक

टीम सदस्य, मुंगेर