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Saturday, June 21, 2025

"सुनना भी एक सहयोग है"

10 तारीख को मेरे पति ने थोड़े परेशान होकर मुझसे बात की। उन्होंने बताया कि उनका 2 लाख रुपये का टारगेट अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। मैंने उन्हें ध्यान से सुना और कहा, “चलिए कल एक घंटा बैठते हैं, सिर्फ आपके टारगेट पर बात करेंगे।”
अगले दिन शाम 7 बजे हम दोनों शांत मन से बैठे। मैंने उनसे पूछा —
सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
उन्होंने कहा, “दवाइयों की बिक्री नहीं हो रही। डॉक्टरों से बात नहीं बन पा रही है।
मैंने उन्हें खुलकर बोलने का मौका दिया, उनके जवाबों को गहराई से सुना और फिर साथ बैठकर सोचा कि आगे क्या किया जा सकता है।
उन्होंने खुद ही समाधान निकाले —
 डॉक्टरों से समय पर मिलना होगा,
उनसे अच्छे से संवाद करना होगा,
जरूरत पड़ी तो सीनियर की मदद लेनी होगी।
हमने सिर्फ एक घंटे की बडी टॉक की, लेकिन उस बातचीत का असर ऐसा हुआ कि 22 मई तक उनका टारगेट 3 लाख पार कर गयाकुछ दिन बाद उन्होंने मुस्कराते हुए कहा —
"तुम्हारी वजह से मेरा टारगेट पूरा हुआ... मुझे तुम पर गर्व है।"
यह सुनकर मेरा दिल भर आया। मैंने उस दिन महसूस किया कि कभी-कभी किसी को बस सुन लेना, उसकी बात समझ लेना ही सबसे बड़ी मदद होती है।
 यह मेरा छोटा-सा बडी टॉक अनुभव था, लेकिन मेरे लिए सीख और गर्व से भरा एक बड़ा पल बन गया
पिंकी कुमारी
बैच 10A, जमुई

Friday, April 4, 2025

"मैं बदल गई हूँ!"

अगर पाँच महीने पहले किसी ने मुझसे कहा होता कि मैं आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखूंगी, गाँव के मुखिया और Jeevika के सीएम से मिलूंगी, और लड़कियों को शिक्षित करने के लिए सेशन लूंगी—तो मैं शायद हँस देती! लेकिन I-Saksham से जुड़ने के बाद, मेरा सफर एक रोमांचक मोड़ पर आ गया। तो आइए, मेरी इस जर्नी को मजेदार अंदाज में जानते हैं!

शुरुआत – एक नई दुनिया में कदम 
पहले, मैं संकोची थी। भीड़ में बोलना तो दूर, किसी से अपनी बात साझा करने में भी हिचकिचाती थी। लेकिन जब मैंने I-Saksham ज्वाइन किया, तो मुझे लगा—"वाह! यहाँ तो खुलकर बोलने और सीखने का पूरा मौका है!"
पहली बार जब गाँव में सर्वे करने गई, तो मेरे हाथ-पैर फूल गए थे। लेकिन हिम्मत जुटाई, लोगों से मिली, उनकी समस्याएँ सुनीं और महसूस किया कि बदलाव लाना कितना ज़रूरी है!

मिशन: स्कूल छोड़ चुकी लड़कियों को जागरूक करना!
मुझे पता चला कि गाँव की कई किशोरियाँ स्कूल छोड़ चुकी हैं और घर पर बैठी हैं। अब मेरे दिमाग में एक ही बात थी—"कुछ करना है!"
मैंने उनसे बातचीत शुरू की और धीरे-धीरे उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करने लगी। जब पहली बार मैंने सेशन लिया, तो लगा कि मैं एक टीचर, काउंसलर और दोस्त—तीनों बन गई हूँ! और मज़े की बात ये कि अब वे खुद कहती हैं—"दीदी, सेशन को डेढ़ घंटे से बढ़ाकर तीन घंटे कर दीजिए!"


आत्मविश्वास बढ़ाने वाला गेम चेंजर!
पहले मुझे हमेशा लगता था कि स्कूल में मेरे टीचर्स मुझे किसी प्रतियोगिता में क्यों नहीं भेजते। लेकिन I-Saksham ने मुझे हर मौके पर आगे बढ़ने का अवसर दिया। अब मैं खुलकर बोलती हूँ, अपनी बात रखती हूँ और अपने लिए स्टैंड भी ले सकती हूँ।

सुपरवुमन मोमेंट – महिलाओं को हस्ताक्षर सिखाना!
गाँव की कुछ महिलाएँ हस्ताक्षर तक नहीं कर पाती थीं। मैंने तय किया कि उन्हें सिखाऊँगी। जब पहली बार किसी ने अपने नाम पर साइन किया, तो उनकी आँखों की चमक देखने लायक थी! ऐसा लगा मानो उन्होंने कोई सुपरपावर हासिल कर ली हो।
पटना ट्रिप – जहाँ सपने सच होते है:- I-Saksham की वजह से मुझे पटना के इवेंट्स में जाने का मौका मिला। वहाँ सब कुछ लड़कियाँ ही कर रही थीं—फोटोग्राफी, डेकोरेशन, एंकरिंग, स्पीच! मैं दंग रह गई और सोचा—"अरे, ये तो कमाल की बात है!"

क्लस्टर मीटिंग और नया साल!
हम हर महीने क्लस्टर मीटिंग करते हैं, जहाँ समाज में बदलाव लाने के नए-नए तरीकों पर चर्चा होती है। और सबसे मज़ेदार बात—नए साल के स्वागत के लिए हम I-Saksham की टीम के साथ पिकनिक पर जा रहे हैं!

आज जब मैं अपने पाँच महीने के सफर को देखती हूँ, तो गर्व महसूस होता है। अब मैं सिर्फ सपने नहीं देखती, बल्कि उन्हें पूरा करने के लिए कदम भी उठाती हूँ!

I-Saksham सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया है!

पायल कुमारी
बैच 11
जमुई


Friday, October 18, 2024

एडु-लीडर के भविष्य को संवारने के लिए, दोस्त ने उसकी माँ को मनाया

मेरा नाम खुशबू है। मैं प्रीति की दोस्त हूँ और मैं यह लेख प्रीति के बारे में साझा कर रही हूँ। प्रीति एक चौगाईन गाँव की लड़की है। उसने i-सक्षम संस्था में दो वर्ष की फेलोशिप पूरी की है। फ़ेलोशिप के उपरांत वो कुछ समय घर में रह रही थी। वह कोई जॉब इत्यादि नहीं कर रही थी परन्तु अपनी आगे की पढ़ाई जरुर कर रही थी।

एक शाम की बात है। वह शाम मेरे जीवन की सबसे परेशानी वाला रात में से एक थी। अचानक मेरे फ़ोन में आदित्य सर का कॉल आया। उनके कॉल का मतलब हमेशा किसी न किसी नई चुनौती से होता है। मैंने जैसे ही कॉल उठायी, सर ने मेरी तारीफ की। मुझे एहसास हुआ कि मेरे कार्यों ने उनका विश्वास जीत लिया है।  


उसके बाद सर ने अपनी बात रखी। उन्होंने बोला कि ‘प्रीति को किशनगंज भेजना है’ किसी भी तरह से उसे गाँव से बाहर निकालना हैं। 


आदित्य सर की बातों से मुझे समझ आ रहा था कि वो बहुत चिंतित हैं। मैंने उन्हें अपनी तरफ से हर संभव कोशिश करने का आश्वासन दिया।


मैंने सर को आश्वस्त तो कर दिया परन्तु मैं पूरी रात सो नहीं पायी। क्योंकि मैं भी प्रीति के घरवालों को जानती हूँ। 

पूरी रात मेरा मन बस यही सोचता रहा कि प्रीति की माँ को कैसे मनाया जाए? उन्हें कैसे समझाया जाए?


मैं सुबह 4 बजे ही उठ गयी और प्रीति के घर जाने के लिए तैयार हो गयी। प्रीति की माँ मुझे देखते ही बोली कि आप आ ही गयी! परन्तु उनकी आँखें नम थी और चेहरा उदास था। मैंने उन्हें समझाया कि देखिये आंटी, यदि आज आप प्रीति को मौका देती हैं तो वह जरुर कुछ बड़ा कर सकती है। 

पर वो मान ही नहीं रही थीं। उनके आँसुओ ने मुझे भी हिला कर रख दिया।



जब मैंने देखा की प्रीति की माँ को मनाना इतना आसान नहीं है, तो मैंने आदित्य सर को कॉल किया। सर ने उन्हें समझाने के लिए बहुत तरीकों से प्रयत्न किया। 


उन्होंने यह तक कहा कि याद कीजिये जब प्रीति पेट में थी तब आपने कितने कष्ट सहे? 

कुछ अच्छा करने के लिए थोड़ा-बहुत सहन तो करना पड़ता ही है। आखिरकार सर की बातों का प्रीति की माँ पर प्रभाव पड़ा और प्रीति की माँ मान गई। 


उसी दिन प्रीति और मैं बस में बैठ गए। प्रीति बार-बार पीछे मुड़कर अपनी माँ को देख रही थी, मानो उसका दिल वहाँ छूट गया हो। मुझे डर था कि कहीं वह अपना मन न बदल ले और वापस घर न चली जाए। जब ट्रेन चल पड़ी और मैंने प्रीति को ट्रेन में बैठा हुआ देखा, तब जाकर मुझे संतोष हुआ। 


मैं खुद भूखी-प्यासी थी, लेकिन दिल में एक अजीब सा सुकून था। मुझे खुद पर गर्व महसूस हो रहा था कि मैंने वह काम कर दिखाया, जिसके लिए सर ने मुझ पर भरोसा किया था। 


अगले दिन मुझे यह सुनकर बहुत ख़ुशी हुई कि प्रीति ने वह हासिल कर लिया जिसके लिए हम तीन-चार दिनों से प्रयासरत थे मेरे लिए यह गर्व का पल था कि मैं इस यात्रा में उसकी मदद कर पायी


खुशबू कुमारी 

बडी इंटर्न, गया