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Friday, April 18, 2025

क्या आपने कभी बच्चों को खुद की पसंद-नापसंद समझते देखा है? मीना मंच ने यह मुमकिन कर दिखाया!

मैं पूनम कुमारी, गया ज़िले से हूँ। इस समय मैं एडू लीडर का भूमिका में काम कर रही हूँ और आज मैं आप सबके साथ मीना मंच का एक खास पल साझा कर रही हूँ।
दिन था शुक्रवार। उस दिन शेरघाटी ब्लॉक के मध्य विद्यालय ब्राउन स्कूल में मीना मंच का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। 
जब मै क्लास में गए तो वहां पर दो लड़की जो की ब्लैक बोर्ड पर मीना मंच का पोस्टर बना रहे थे। 
जब मै पिछले बार मीना मंच करवाए थे , तो उस समय 13 से 15 लड़कियां के साथ मीना मंच करवाए थे इस फ़रवरी महीने में कुल मिलाकर 30 किशोरी लड़कियां ने मीना मंच में शामिल हुए हैं।  कार्यक्रम की शुरुआत हुई — सभी लड़कियाँ गोल घेरे में बैठ गईं। फिर मैंने उनसे पूछा, "आप लोग जानती हैं हम आज यहाँ क्यों इकट्ठा हुए हैं?"
एक-एक करके लड़कियाँ बोलने लगीं — "दीदी, आज मीना मंच का कार्यक्रम है... दीदी, इसमें क्या होता है?... ये क्यों ज़रूरी है?"  मैंने उन्हें समझाया कि मीना मंच के ज़रिए हम नई-नई बातें सीखते हैं, अपने अंदर की ताक़त को पहचानते हैं, और एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
मीना मंच में कक्षा 6th से 8th लड़कियाँ के साथ करते हैं-
इसके बाद हमने एक माइंडफुलनेस एक्टिविटी की जिसका नाम था — इंद्रधनुष के रंगइसमें लड़कियाँ को इंद्रधनुष के सात रंगों में से किसी एक रंग का नाम लेना था, फिर उस रंग की कोई वस्तु ढूंढ़कर उसे छूना और उसका नाम बताना था। जैसे ही मैंने शुरुआत की, सारी लड़कियाँ खड़ी हो गईं और बहुत उत्साह से हिस्सा लेने लगीं। स्कूल की मैडम भी वहाँ आकर देखने लगीं और उन्होंने भी बच्चों को बहुत सहयोग किया।
मजेदार गतिविधि की
पसंद और नापसंद वाला खेल। दो कोने बनाए गए — एक 'हाँ' वाला और एक 'ना' वाला।मैंने सवाल पूछे —"सुबह उठना पसंद है?" "डांस करना पसंद है?", "लड़ाई करना पसंद है?" जो लड़कियाँ पसंद करती थीं, वो 'हाँ' वाले कोने में जातीं और जो नहीं, वो 'ना' वाले में।
इस खेल से लड़कियाँ बहुत खुश हुईं और बार-बार बोलने लगें — "दीदी, और करवाईए ! बहुत मजा आ रहा है!"इसके बाद मैंने सबको कहा कि अब आप लोग कागज़ पर चित्र बनाइए — "जो चीज़ पसंद है, वो बनाओ और जो नहीं पसंद है, वो भी।
"एक लड़की बोली — "दीदी, मै चित्र  बनाएंगे और लिखेंगे भी।"मैंने कहा —"बिलकुल! जो तुम्हें ठीक लगे, वैसे  ही बनाई

उसके बाद ,
तीन-तीन लड़की के समूह बनाए। सबने अपने चित्र दिखाए, एक-दूसरे की पसंद-नापसंद को समझा।जब मैंने पूछा कि इस गतिविधि को करके कैसा लग रहा है, तो एक लड़की ने बोली —

"दीदी, अब समझ में आया कि मुझे क्या पसंद है और क्या नहीं, और साथ ही दूसरों के बारे में भी जाना— अच्छा लगा,  एक और बोली — "उत्साहित महसूस हुआ, प्रेरणा मिली।"
आखिरी में मैंने पूछा — "जो चीज़ आपको पसंद नहीं है, क्या आप चाहेंगी कि उसे पसंद में बदलें?" सभी लडकियाँ जोर से बोले "हाँ दीदी" एक लड़की बोली — "दीदी, मुझे खाना बनाना पसंद नहीं था, लेकिन अब मैं इसे पसंद करना चाहती हूँ।" इसी तरह सभी लडकियाँ बोली मै अपना ना पसंद को कॉपी में लिखेंगे, और पसंद में बदलेंगे,
मुझे ना पसंद है, उसके बारे में मम्मी को बतायेंगे और बोलेंगे आप मुझे मदद कीजियेगा इसे मै अपना पसंद में बदलूंगी।जैसे:- मुझे पढने का मन नहीं करता हैं,मुझे खाना बनाना पसंद नहीं है, मै सुबह जल्दी नहीं उठ पाती हूँ,
मेरा भी यहीं उदेश्य था, की लडकियाँ अपने पसंद के बारे में खुद से सोच पाए और समझ पाए। मुझे बहुत ख़ुशी मिली और मै अगली बार लडकियाँ के माता-पिता से मिलूंगी, और मै फिर से एक नया कहानी लायेंगेमीना मंच के ज़रिए लडकियाँ ना सिर्फ़ खुद को बेहतर समझ पाईं, बल्कि एक-दूसरे से भी सीखने लगीं।आइए हम सब मिल कर मीना मंच करवाए।
पूनम कुमारी , बैच-11
एडू लीडर , गया


Wednesday, January 29, 2025

शिक्षा से बदली दो लड़कियों की जिवन

एक छोटे से गांव (विकोपुर) की रहने वाली रिंकी, कठिन परिस्थितियों में भी अपनी उम्मीद और जज़्बे को बनाए रखने का उदाहरण हैं। रिंकी का जन्म एक निम्न वर्गीय परिवार में हुआ। वे तीन बहनों और दो भाइयों में सबसे छोटी थीं। रिंकी का बचपन सामान्य बच्चों की तरह शुरू हुआ, लेकिन पांचवीं कक्षा के बाद उनकी जिंदगी ने एक कठिन मोड़ लिया।

उनके चाचा की बेटी की शादी होने वाली थी, और उसी समय उनके चाचा ने सुझाव दिया कि रिंकी की भी शादी कर दी जाए। इस विचार ने रिंकी को झकझोर दिया। वह अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थीं और अपनी माँ के भाई (मामा) से मदद की विनती माँगी, बोली मामा मुझे अभी पढ़ाई करना है। मामा ने रिंकी की पढ़ाई के लिए रिंकी की घर में बातचीत किये लेकिन घर वाले नहीं माने तो, रिंकी के मामा खुद पे जिम्मेदारी उठाए और बोले मै रिंकी को अपने घर ले गए। इस तरह रिंकी की छठी कक्षा में नामांकन कराया और पढ़ाई जारी रखी।


रिंकी नौवीं कक्षा तक अपनी नानी के घर में पढ़ती रहीं। लेकिन उनके पिता की तबीयत खराब हो गई, जिससे उन्हें घर लौटना पड़ा। कुछ समय के लिए उनकी पढ़ाई रुक गई। परिवार की आर्थिक तंगी और कठिन हालातों के बावजूद, रिंकी ने हार नहीं मानी। दोबारा नानी के घर जाकर पढ़ाई शुरू की और 2020 में मैट्रिक परीक्षा पास कर ली।


इसके बाद, रिंकी की पढ़ाई आगे नहीं बढ़ सकी क्योंकि उनके पिता की तबीयत लगातार खराब रहती थी। परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। अपनी छोटी बहन को पढ़ाई का मौका देने के लिए उन्होंने नानी के घर भेज दिया। रिंकी का गांव काफी दुर्गम क्षेत्र में है,जहां से स्कूल जाने के लिए 15 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। ऐसे कठिन हालात में भी, रिंकी ने खुद को शिक्षा के प्रति समर्पित रखा।


कुछ दिन बाद 


रिंकी 2023 में i-सक्षम फेलोशिप बैच-10 कार्यक्रम से जुड़ी , उन्होंने अपने गांव में शिक्षा का अलख जगाने का बीड़ा उठाया है। रिंकी अपने समुदाय में भी काम किये हैं। कुछ दिन पहले रिंकी के गाँव में लडकियों की शादी नहीं हो पा रही थी क्योंकी लडकियों को नाम और अपना परिचय नहीं लिखने आता था। रिंकी अपने समुदाय में वैसे लडकियों को चुने जिन्हें अपना और अपना परिचय नहीं लिखने आता था। उसके बाद रिंकी उन लडकियों के साथ काम किये। वे 10 लड़कियों को अपना नाम और परिचय लिखना सिखा चुकी हैं। इन लड़कियों में से दो की शादी भी ठीक हो गई, क्योंकि वे अब खुद का परिचय लिखने में सक्षम थीं। 


रिंकी का संघर्ष यहीं खत्म नहीं होता। अपने पिता की देखभाल, परिवार की जिम्मेदारियों और खेतों में काम करने के बावजूद, वे स्कूल जाती हैं और दूसरों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करती हैं। वे उन लड़कियों के लिए एक प्रेरणा बन गई हैं, जो शिक्षा की रोशनी से अब तक दूर थीं।


रिंकी की कहानी हमें सिखाती है कि यदि हमारे अंदर कुछ कर दिखाने का जज्बा हो, तो कोई भी कठिनाई हमें आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।


श्रृंखला कुमारी 

बडी, गया


Monday, December 23, 2024

छोटी कोशिश का बड़ा असर: सामुदायिक बदलाव की कहानी"

छोटी कोशिश का बड़ा असर: सामुदायिक बदलाव की कहानी"

एक छोटे से गाँव में, जहां ज्यादातर लोग पढ़ाई-लिखाई से दूर थे, वहां एक युवा लड़की ने ठान लिया कि वो लोगों की जिंदगी में बदलाव लाएगी। उसका नाम रानी था। रानी गाँव के बच्चों और अभिभावकों के साथ काम करती थी, उन्हें नई चीजें सिखाती और उनके जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करती है।


एक दिन, रानी ने सोचा कि गाँव के लोगों से मुलाकात की जाए और उनसे बातचीत की जाए। उसने सबसे पहले दो अभिभावकों से मिलने का फैसला किया। ये वही अभिभावक थे, जिन्हें रानी ने कुछ समय पहले सिग्नेचर करना सिखाया था।


रानी ने मुस्कुराते हुए पूछा, "तो बताइए, सिग्नेचर करना याद है या भूल गए?" अभिभावकों ने गर्व से जवाब दिया, "हाँ, बिलकुल याद है! देखिए!" उन्होंने कागज पर सिग्नेचर करके दिखाया।

रानी का दिल खुशी से भर गया। उन्होंने आगे बताया, "आपके सिखाने की वजह से हम बैंक गए थे और वहां अपने दस्तख़त से पैसे निकाले। वो दिन हमारे लिए बहुत खास था।"



रानी ने उनकी आँखों में आत्मविश्वास की चमक देखी और महसूस किया कि उसका छोटा-सा प्रयास उनकी जिंदगी में कितना बड़ा बदलाव ला चुका है।

इसके बाद, रानी एक महिला के घर गई। उसने पूछा, "आप अभिभावक मीटिंग में क्यों नहीं आतीं?"

महिला ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "बहुत काम रहता है, इसलिए समय नही मिल पाता है

          


रानी ने समझाते हुए कहा, "मीटिंग में आप सबके लिए नई बातें सिखाई जाती हैं। बच्चों की परवरिश के बारे में चर्चा होती है, और साथ में खेल-कूद भी होता है। आपको मै अभी हस्ताक्षर करने के लिए सिखा रही हूँ।"

महिला ने आश्वासन दिया, "अगली बार जब मीटिंग होगी, तो मुझे जरूर बताइएगा। मैं आऊंगी। रानी ने खुश हो कर बोली जरुर आइएगा।"


फिर रानी ने रास्ते में एक लड़की को देखा। उसका नाम मुस्कान था। मुस्कान ट्यूशन जा रही थी। रानी ने मुस्कुराते 

हुए कहा, "जाओ, अच्छे से पढ़ाई करना।" मुस्कान ने सिर हिलाकर जवाब दिया और आगे बढ़ गई।


उस दिन रानी को महसूस हुआ कि उसके प्रयास धीरे-धीरे लोगों के जीवन में बदलाव ला रहे हैं। चाहे वो सिग्नेचर सिखाना हो, मीटिंग में शामिल होने की प्रेरणा देना, या बच्चों को प्रोत्साहित करना—हर छोटी-सी कोशिश का बड़ा असर हो रहा था।


रानी ने मन ही मन सोचा, "शायद इसी को असली खुशी कहते हैं—दूसरों की जिंदगी में रोशनी भरना।"


रानी कुमारी 

बैच-10, एडू-लीडर

गया


(रानी कुमारी, गया जिला, आमस प्रखंड के पथरा गाँव से सम्बन्ध रखते हैं। आपने आपनी स्नातक की डिग्री गणित ओनर्स, श्री महंथ शतानंद गर्ल कॉलेज शेरघाटी गया (मगध इन्वेर्सिटी विश्वविधायल ) से मान्यता प्राप्त ली है। आपके घर के एक बड़े भाई, तीन बहन और माता-पिता हैं। 
आप i-सक्षम में जुड़ने से पहले जेनरल की पढाई कर रहे थे और KYC किये हुए हैं। आपको i-सक्षम के बारे में अपनी माँ से जानकारी मिली, और 2023 में संस्था के साथ जुड़े हैं। i-सक्षम में एडू-लीडर के नाम से आपको समाज और संस्था में नयी पहचान मिली हैं। आप अपने जीवन में बिहार कर्मचारी बनाना चाहते है।)

Wednesday, October 23, 2024

2030 तक 10,000 महिला लीडर्स का सशक्तिकरण: i-सक्षम का मिशन

2030 तक 10,000 महिला लीडर्स का सशक्तिकरण: i-सक्षम का मिशन

27 सितंबर 2024 को i-सक्षम एजुकेशन एंड लर्निंग फाउंडेशन ने PTEC (प्राइमरी टीचर एजुकेशन कॉलेज) के मैदान में क्लस्टर सेलिब्रेशन का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में गाँव से आई कई महिलाओं, अभिभावकों, PRI (पंचायत राज्य संस्था) सदस्यों और शिक्षकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। इसका उद्देश्य पिछले डेढ़ साल में क्लस्टर द्वारा किए गए कार्यों की उपलब्धियों को साझा करना और उनका जश्न मनाना था।


कार्यक्रम की शुरुआत एक स्वागत गीत के साथ हुई, जिसे हमारे एडु-लीडर्स ने प्रस्तुत कियाइसके बाद संस्था के उद्देश्य और विजन पर चर्चा की गई, जिसमें "Voice & Choice for Every Woman" के प्रति हमारा संकल्प साझा किया गया। i-सक्षम का मिशन 2030 तक 10,000 महिला लीडरों को सशक्त करना है, जो शैक्षिक, सामुदायिक और व्यक्तिगत नेतृत्व के क्षेत्रों में काम करेंगी।


एडु-लीडर्स अंजली, सारिका, चंचला, काजल, पम्मी, चांदनी, काजल, बबिता, निशा और शालू ने अपनी कहानियां और अनुभव साझा किए। सामुदायिक नेतृत्व के अंतर्गत महिलाओं को हस्ताक्षर करना सिखाने, सरकारी सेवाओं के बारे में जागरूकता फैलाने, गांवों में सफाई और वृक्षारोपण अभियान चलाने, और सरकारी स्कूलों में ड्रॉपआउट बच्चों के पुनः नामांकन पर कार्य किया गया। महिलाओं को आयुष्मान कार्ड, आधार कार्ड जैसे लाभ समझाने और मासिक धर्म जागरूकता पर विशेष जोर दिया गया।


खेल और गतिविधियों में म्यूजिकल चेयर और गुत्तम-गुत्था जैसी पारंपरिक खेल शामिल थीं, जिन्होंने कार्यक्रम में जोश भरा और सभी प्रतिभागियों को एक साथ लाने का कार्य किया।



सहयोग की अपील PRI सदस्यों से उनके समर्थन की अपील की गई, और सभी ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए भविष्य में भी जुड़ने की इच्छा जताई।


अंत में, सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद दिया गया और सुझाव मांगे गए कि हम अगली बार कार्यक्रम को और बेहतर कैसे बना सकते हैं। उनके विचारों ने हमें आगे के लिए प्रेरित किया।


इस कार्यक्रम की सफलता में i-सक्षम टीम के सदस्य अंकिता और अदीबा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 


i-सक्षम का उद्देश्य स्थानीय महिलाओं को लीडर के रूप में विकसित करना है, ताकि वे अपने गांवों में बदलाव ला सकें और अन्य महिलाओं को भी सशक्त कर सकें। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि जब महिलाएं एकजुट होती हैं, तो वे समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं।


आदिबा 

बडी,गया


(आमना हुसैन, गया जिला, आमस प्रखंड के हमजापुर गॉव से सम्बन्ध रखते हैं। आपने आपनी स्नातक की डिग्री इतिहास ओनर्स में उतर प्रदेश कॉलेज (अलिग्रह मुस्लिम विश्वविधायल  से मान्यता प्राप्त कॉलेज) से ली है। आपके घर के एक भाई, तीन बहन और माता-पिता हैं। 

आप i-सक्षम में जुड़ने से पहले घर पे रह कर पढाई करते थे। आपको i-सक्षम के बारे में whatsapp स्टेटस से जानकारी मिली, और वर्ष 2023 में संस्था के साथ जुड़े हैं। i-सक्षम में बड्डी के नाम से आपको समाज और संस्था में नयी पहचान मिली है। आप अपने जीवन में पुलिस बनाना चाहते है। )


एडू-लीडर्स के आत्मविश्वास की नई दिशा

एडू-लीडर्स के आत्मविश्वास की नई दिशा

झरी पंचायत एक छोटा सा गाँव है, जहाँ आज एक खास दिन की तैयारी चल रही थी। गांव के छोटे से पंचायत भवन में क्लस्टर आयोजन होना था।

सोमवार को, स्नेहा (बैच 10 की एडु लीडर) और मैं दोनों मिलकर पंचायत के मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति के सदस्यों, वार्ड मेंबर्स, गांव के प्रमुख लोगों और विद्यालय के प्रिंसिपल को आमंत्रित करने की योजना बनाई। सभी ने आश्वासन दिया कि वे प्रतियोगिता में जरूर शामिल होंगे।


क्लस्टर प्रतियोगिता का दिन आया। ब हम झरी पंचायत भवन पहुंचे, तो मन में कई सवाल उठ रहे थे:

क्या आयोजन सफल होगा?

क्या सभी लोग आएंगे?


जैसे ही प्रतियोगिता का समय आया, गांव के मुखिया, सरपंच और अन्य प्रमुख सदस्य समय पर 11 बजे आ गए। इसने हमें आश्वस्त किया कि हमारा प्रयास सही दिशा में है।


प्रतियोगिता की शुरुआत दीप प्रज्वलन और स्वागत गीत से हुई। इसके बाद मैंने i-सक्षम और क्लस्टर के उद्देश्य और अनुभवों के बारे में सभी को जानकारी दी। रानी, सविता और मनीता दीदी ने भी अपने अनुभव साझा किए, जिन्होंने सभी को प्रेरित किया।



सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उपस्थित PRI (पंचायत राज संस्था) सदस्य, प्रिंसिपल और अभिभावकों ने अपने विचार और सुझाव दिए। यह मेरे लिए बेहद सकारात्मक अनुभव था। PRI सदस्यों ने न केवल हमारी पहल की सराहना की, बल्कि इसे और व्यापक स्तर पर ले जाने का वादा भी किया।


हमने पहले से योजना बनाई थी कि कार्यक्रम के अंत में हम गाँव के प्रमुख और PRI सदस्यों से सहयोग मांगेंगे, लेकिन ऐसा करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। वे खुद ही हमें सहयोग देने के लिए तैयार हो गए।


कार्यक्रम का समापन "चेतना" गीत से हुआ, और सभी ने इस प्रतियोगिता के लिए आभार व्यक्त किया। झरी पंचायत के मुखिया ने खास तौर पर कहा, "आप जो काम कर रहे हैं, हम चाहते हैं कि यह और बड़े स्तर पर हो। जितनी मदद चाहिए, हम सभी प्रतिनिधियों से लें।" यह बात न सिर्फ हमारे लिए, बल्कि पूरे क्लस्टर के लिए बेहद उत्साहजनक थी।


यह प्रतियोगिता न केवल सक्षम, बल्कि सशक्त बनाने में भी मदद करेगी और हमारे एडु लीडर्स को अपने कार्य में आत्मविश्वास प्रदान करेगी। इस आयोजन ने हमें यह महसूस कराया कि जब सामुदायिक सहयोग मिलता है, तो किसी भी चुनौती को आसानी से पार किया जा सकता है।


निकी कुमारी  

बडी, गया


Friday, October 18, 2024

एडु-लीडर के भविष्य को संवारने के लिए, दोस्त ने उसकी माँ को मनाया

मेरा नाम खुशबू है। मैं प्रीति की दोस्त हूँ और मैं यह लेख प्रीति के बारे में साझा कर रही हूँ। प्रीति एक चौगाईन गाँव की लड़की है। उसने i-सक्षम संस्था में दो वर्ष की फेलोशिप पूरी की है। फ़ेलोशिप के उपरांत वो कुछ समय घर में रह रही थी। वह कोई जॉब इत्यादि नहीं कर रही थी परन्तु अपनी आगे की पढ़ाई जरुर कर रही थी।

एक शाम की बात है। वह शाम मेरे जीवन की सबसे परेशानी वाला रात में से एक थी। अचानक मेरे फ़ोन में आदित्य सर का कॉल आया। उनके कॉल का मतलब हमेशा किसी न किसी नई चुनौती से होता है। मैंने जैसे ही कॉल उठायी, सर ने मेरी तारीफ की। मुझे एहसास हुआ कि मेरे कार्यों ने उनका विश्वास जीत लिया है।  


उसके बाद सर ने अपनी बात रखी। उन्होंने बोला कि ‘प्रीति को किशनगंज भेजना है’ किसी भी तरह से उसे गाँव से बाहर निकालना हैं। 


आदित्य सर की बातों से मुझे समझ आ रहा था कि वो बहुत चिंतित हैं। मैंने उन्हें अपनी तरफ से हर संभव कोशिश करने का आश्वासन दिया।


मैंने सर को आश्वस्त तो कर दिया परन्तु मैं पूरी रात सो नहीं पायी। क्योंकि मैं भी प्रीति के घरवालों को जानती हूँ। 

पूरी रात मेरा मन बस यही सोचता रहा कि प्रीति की माँ को कैसे मनाया जाए? उन्हें कैसे समझाया जाए?


मैं सुबह 4 बजे ही उठ गयी और प्रीति के घर जाने के लिए तैयार हो गयी। प्रीति की माँ मुझे देखते ही बोली कि आप आ ही गयी! परन्तु उनकी आँखें नम थी और चेहरा उदास था। मैंने उन्हें समझाया कि देखिये आंटी, यदि आज आप प्रीति को मौका देती हैं तो वह जरुर कुछ बड़ा कर सकती है। 

पर वो मान ही नहीं रही थीं। उनके आँसुओ ने मुझे भी हिला कर रख दिया।



जब मैंने देखा की प्रीति की माँ को मनाना इतना आसान नहीं है, तो मैंने आदित्य सर को कॉल किया। सर ने उन्हें समझाने के लिए बहुत तरीकों से प्रयत्न किया। 


उन्होंने यह तक कहा कि याद कीजिये जब प्रीति पेट में थी तब आपने कितने कष्ट सहे? 

कुछ अच्छा करने के लिए थोड़ा-बहुत सहन तो करना पड़ता ही है। आखिरकार सर की बातों का प्रीति की माँ पर प्रभाव पड़ा और प्रीति की माँ मान गई। 


उसी दिन प्रीति और मैं बस में बैठ गए। प्रीति बार-बार पीछे मुड़कर अपनी माँ को देख रही थी, मानो उसका दिल वहाँ छूट गया हो। मुझे डर था कि कहीं वह अपना मन न बदल ले और वापस घर न चली जाए। जब ट्रेन चल पड़ी और मैंने प्रीति को ट्रेन में बैठा हुआ देखा, तब जाकर मुझे संतोष हुआ। 


मैं खुद भूखी-प्यासी थी, लेकिन दिल में एक अजीब सा सुकून था। मुझे खुद पर गर्व महसूस हो रहा था कि मैंने वह काम कर दिखाया, जिसके लिए सर ने मुझ पर भरोसा किया था। 


अगले दिन मुझे यह सुनकर बहुत ख़ुशी हुई कि प्रीति ने वह हासिल कर लिया जिसके लिए हम तीन-चार दिनों से प्रयासरत थे मेरे लिए यह गर्व का पल था कि मैं इस यात्रा में उसकी मदद कर पायी


खुशबू कुमारी 

बडी इंटर्न, गया


प्राइवेट स्कूल में नामांकन होने की आशंका से सरकारी स्कूल से नामांकन कटा

आज मैं तीन स्कूलों और गांवों में गई, जहाँ का अनुभव साझा करना चाहूंगी। सबसे पहले, मैं महापुर गांव गई और सीमा दीदी को साथ लेकर गई क्योंकि यहाँ दो लड़कियाँ थीं जो बिल्कुल भी सुनने को तैयार नहीं थीं। जब भी उन्हें स्कूल ले जाने की कोशिश की जाती, वे या तो जंगल चली जातीं, या कहीं छिप जातीं, या फिर घर में ही रहतीं। उनके माता-पिता भी अब थक चुके थे क्योंकि वे भी उन्हें समझाने की कोशिश करते, लेकिन लड़कियाँ सुनती ही नहीं थीं।

जब हमने उनकी माँ से बात की, तो वह बोलीं कि उन्होंने कई बार बच्चियों को स्कूल भेजने की कोशिश की है, लेकिन वे नहीं सुनतीं और उल्टा लड़ने लगती हैं। इस स्थिति को देख हम भी असमंजस में थे कि अब क्या किया जाए!

आज जब हम वहाँ गए तो एक लड़की जिसका नाम काजल कुमारी था, की भाभी से बात की। उन्होंने बताया कि काजल धान की रोपाई के लिए दूसरे गांव गई है और आठ दिन बाद वापस आएगी। हमने उनसे कहा कि आप काजल को स्कूल क्यों नहीं भेजतीं, तो भाभी ने जवाब दिया कि हम उसे समझाते हैं लेकिन वह नहीं मानती।

फिर हम दूसरी लड़की के घर गए। उसकी माँ ने बताया कि वह प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई कर रही है। हमने कहा, "ठीक है, लेकिन कम से कम हफ्ते में दो दिन तो उसे सरकारी स्कूल भेज सकते हैं, ताकि उसका नामांकन कटा न हो।" इस पर उनकी माँ ने हामी भरी, लेकिन आधार कार्ड में गलती की वजह से समस्या थी। हमने उन्हें आधार कार्ड लेकर नाम चढ़वाने को कहा, लेकिन उन्होंने समय की कमी का हवाला दिया।


इसके बाद हम M.S. वृंदावन स्कूल गए, जहाँ प्रिंसिपल से बात की। उन्होंने बताया कि एक बच्ची का नाम उन्होंने काट दिया है क्योंकि वह प्राइवेट स्कूल में पढ़ने जाती है। हमने उनसे कहा कि बच्ची अब से नियमित रूप से सरकारी स्कूल आएगी, इसलिए उसका नामांकन वापस चढ़ा दें। लेकिन प्रिंसिपल ने कहा कि जब तक वह लगातार दो महीने स्कूल नहीं आएगी, तब तक नामांकन नहीं होगा। हमने बच्ची के अभिभावकों को भी बुलाया, लेकिन प्रिंसिपल नहीं माने। हमने दो घंटे तक बैठकर उनसे रिक्वेस्ट (request) की, लेकिन कोई हल नहीं निकला। अंत में, हमने वहाँ दो अन्य बच्चों का रिटेंशन किया।

इसके बाद, P.S. महापुर स्कूल में दो बच्चों का रिटेंशन हुआ। फिर हम सांवला गए, जहाँ एक बच्ची का रिटेंशन करना था। उसकी माँ ने बताया कि बच्ची बहाने बनाती है कि उसकी कॉपी नहीं है और स्कूल नहीं जाती। जब हम मैडम को लेकर गए, तो पता चला कि वह बच्ची मानसिक रूप से दिव्यांग है। मैडम ने कहा कि वह स्कूल नहीं जा पाएगी, इसलिए हम बेवजह परेशान हो रहे हैं।

अंजना वर्मा
मैत्री प्रोजेक्ट, गया