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Monday, May 29, 2023

एडूलीडर बुलबुल के जीवन में 18 वर्ष बाद लौटी शिक्षा, i-Saksham के प्रशिक्षणों से दृढ़ हुआ आत्मविश्वास

i-Saksham के बैच-7 की एडूलीडर बुलबुल कुमारी ने i-Saksham के साथ अपना अनुभव साझा किया है, जिसमें उन्होंने अपनी यात्रा का वर्णन किया है कि किस तरह से उन्होंने संघर्ष किया और एक बार उम्मीद टूटने के बाद i-Saksham के सहयोग से कैसे उन्होंने अपने आत्मविश्वास को पहचाना और अपने पैरों पर उठ खड़ी हुईं। 

बुलबुल ने i-Saksham को बताया कि उनकी  शादी साल 2003 में ही हो गई थी और उस साल वे 12वीं कक्षा में थीं। उनकी शादी एक ऐसे परिवार में हुई, जहां शिक्षा को लेकर लोगों का रवैया उदासीनता से भरा था। साथ ही गांव-समाज के लोगों में भी शिक्षा का बहुत आभाव था। 

उनके परिवार में कोई भी शिक्षित व्यक्ति नहीं था, जिनसे वे अपने मन की व्यथा बोल पाती और समझा पातीं कि उन्हें पढ़ने की इच्छा है। यही कारण रहा कि उनकी पढ़ाई रुक गई। साथ ही पारिवारिक स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं थी इसलिए उन्होंने भी अपने अरमानों को दबा दिया और चेहरे पर मुस्कान बिखेर कर रहने लगी। 

आसपास के बच्चों को पढ़ाया

इसके बाद घर की जिम्मेदारी बढ़ी और वे घर-गृहस्थी में इस कदर उलझी कि उन्हें पढ़ाई या पढ़ने के बारे में ख्याल ही नहीं आया। उनके अन्दर पढ़ने की ललक खत्म होते चली गई लेकिन पढ़ाने का एक शौक था इसलिए उन्होंने कुछ सालों बाद आसपास के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।

i-Saksham से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि साल 2006 में उन्हें एक निजी विद्यालय में पढ़ने का मौका मिला, जिसमें वे केवल एक साल पढ़ सकीं क्योंकि उसी साल उनकी मां का देहांत हो गया, जिस कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी।

एक लंबे अंतराल के बाद साल 2011 में उन्हें एक आवासीय विद्यालय में पढ़ने का मौका मिला, जो पहाड़ के किनारे पर स्थित था, जिसे आम बोलचाल की भाषा में संथाली इलाका भी कहा जाता है। यह विद्यालय भी केवल 11 महीने ही चला फिर बंद हो गया। राह में आने वाली इन रुकावटों ने कहीं ना कहीं उनके पढ़ने की ललक को तोड़ने का काम किया और उन्हें लगने लगा कि अब वे नहीं पढ़ पाएंगी।

i-Saksham टीम से मुलाकात

एक दिन उन्हें उस स्कूल के शिक्षक का कॉल आया, जिसमें वे शुरुआती दिनों में पढ़ाया करती थी। शिक्षक ने कॉल करके कहा, अगर अभी आप कुछ नहीं कर रहे हैं, तो मेरे विद्यालय में आकर पढ़ाइए। इसके बाद मैंने साल 2017 से पढ़ाना शुरू किया और लगातार 3 सालों तक पढ़ाया। 

उन्होंने आगे बताया कि एक रोज जीवन में एक बड़ा बदलाव आया, जब सबकुछ ठहर सा गया। यह साल 2020 की बात है, जब i-Saksham के टीम के दो सदस्य ‘संजय भैया’ और ‘धरमवीर सर’ उनके घर आए और यही वक्त था, जब वे i-Saksham से जुड़ी। इस वाकये के बारे में उन्होंने कहा, मेरे लिए वो पल शायद मेरी जिंदगी का एक एतिहासिक पल रहा क्योंकि एक ओर मुझे कई बार रुकावटों का सामना करना पड़ा तो वहीं दूसरी ओर मैं अब नया मुकाम हासिल करने की दिशा में बढ़ने वाली थी।”

पति ने भी किया सहयोग

कुछ महीनों के बाद ही उन्हें अपने अन्दर एक बदलाव महसूस हुआ।  i-Saksham के तत्वधान में उन्हें कई तरह के प्रशिक्षण हासिल हुए, जिससे उन्होंने ना केवल शिक्षा बल्कि अन्य हिस्सों पर भी अमल किया। एक रोज i-Saksham के एक सेशन के दौरान उन्हें IGNOU के बारे में पता चला और उनके अन्दर से इक आवाज़ आई कि हां, मैं भी पढ़ सकती हूं लेकिन उन्हें डर भी था क्योंकि पढ़ाई छोड़े हुए उन्हें 18 साल हो गए थे। 

उनके मन में कई सवाल थे कि अब मैं कैसे पढूंगी, मुझे कुछ समझ में भी नहीं आएगा लेकिन जीवन के इस पड़ाव पर उनके पति ने भी उनका सहयोग किया और उनका ढ़ांढस बढ़ाते हुए कहा कि तुम पढ़ो और अपना नामांकन करवा लो। साथ ही इस सफर में i-Saksham के बड्डी ने भी उनका साथ दिया। 

आज बुलबुल बीए बार्ट-2 की विद्यार्थी हैं और i-Saksham के साथ बतौर एडूलीडर कार्य भी कर रही हैं, जिसका उद्देश्य लड़कियों को समाज में पहचान दिलाया और हर एक लड़की को VOICE AND CHOICE से जोड़ना भी है ताकि लड़कियां अपनी जिंदगी के निर्णय स्वयं ले सकें और अपनी आवाज़ उठा सकें। 


नोट- यह अनुभव बुलबुल कुमारी की अनुमति मिलने के बाद साझा की जा रही है।

Tuesday, March 24, 2020

अभी उड़ान बाकी है!


ललिता बताती है की ‘’मैं खुद को बहुत भाग्यवान समझती हूँ की भगवान् ने मुझे एक ऐसा जीवन दिया जिसमें मुझे कई मौके मिले आगे बढ़ने के लिए और मैंने जीवन में कई रुकावटों के बाद भी इन मौकों का बहुत अच्छे से प्रयोग किया और पीछे मुड़ कर नहीं देखा|”

वैसे कहा जाए तो हर किसी के जीवन में आगे बढ़ने के लिए कई मौके आते है लेकिन यह आप पर निर्भर करता है कि है कि आप अपने जीवन को कैसे जीना चाहते हैं? आप चाहे तो, दुःख के समुन्द्र में दुःख का रोना रोकर उसमें डूबते चले जाते हैं , या ख़ुशी की नाव पर सवार होकर उसे पारकर सकते हैं।


ललिता- जीविका आई-सक्षम एडू-लीडर 
ललिता बेगुसराय जिलेके जगदीशपुर गाँव  में पैदा हुईं। वे अपने माता- पिता, नौ बहनो और एक भाई के साथ रहती थी ।पिता रामोतार राय, परिवार के पालने के लिए अपने घर पर ही एक छोटी सी दुकान चलाते थे | ज़ाहिर  सी बात है, लम्बे परिवार होने के कारण आर्थिक तंगी रहती थी,पर ललिताके अंदर पढ़ने  का अलग ही ज़ज्बा था| यह उन दिव्यांग महिलाओं में से हैं जिन्होंने कभी खुद को किसी से कम नही समझा और हमेशा अपने दिल की सुनते हुए आगे बढ़ी| अपने हौसले और जज्बे को बनाये रख उन्होंने खुद को शिक्षित करने का ज़िम्मा उठाया और कम उम्र में ही घर पर बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया | इस तरह वह  अपनी पढाई का खर्च भी निकाल लेती थी और अपने पिताजी की मदद भी किया करती थीं |वह बताती हैं की यह उनके लिए बड़े ही गौरव की बात थी जब उन्होंने अपनी स्नातक की डिग्री हासिल की|

जून 2014 में ललिता का विवाह  मुंगेर जिले के  विजयनगर निवासी श्री जितेन्द्र मंडल से  हुआ। लेकिन उनके आगे बढ़ने और सीखने की चाहत अब  भी बरक़रार थी |कुछ समय पश्चात उन्होंने अपने ससुराल में एक बार फिर से बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया।
ललिता के जीवन में कई  संघर्ष भी आए लेकिन, ललिता ककी दृढ इच्छाशक्ति के सामने  हर समस्या बौनी नजर आती। इसी दौरान वो  जीविका की CM(community mobilizer) सेमिली जिनसे उन्हें आई-सक्षम और जीविका के सहयोग से चलने वाले एडू-लीडर फ़ेलोशिप  कार्यक्रम के बारे में पता चला। उनकी दृढता, कार्य और लगन के कारण उनका इस फ़ेलोशिप में चयन भी हो गया | फ़ेलोशिप के तहत उन्हें शिक्षण पद्धति, सामूहिक नेतृत्व एवं अन्य विषयों पर साप्ताहिक प्रशिक्षण के साथ-साथ अपने गाँव के किसी विद्यालय या सामुदायिक  भवन में पढ़ाना था | जिस गावं में उन्हें पढ़ाना था, उस विद्यालय में पर्याप्त  शिक्षक थे, और कोई भी सामुदायिक भवन नहीं  मिल  रहा था |  प्रारंभ में उन्हें  कई  समस्याओं का सामना  भी करना पड़ा लेकिन वो इनसे पीछे नही हटीं जैसे –पढ़ाने के लिए कमरों की सुविधा  ना होना, बच्चों के बैठने के लिए दरी का न होना , स्कूल के अन्य बच्चों का अनुशासनहीन व्यवहार। इन सभी समस्याओं के कारण शुरुआत में  वह काफी विचलित थीं लेकिन उन्हें पूरा यक़ीन था कि वह अपने परिश्रम , लगन और संस्था की सहायता से इसे जरुर आसान बना देंगी| वह खुद से अपने गाँव के सरकारी विद्यालय में प्रधानाध्यापक से मिली और उन्हें इस एडू-लीडर कार्यक्रम के बारे में बताया| प्रधानाध्यापक द्वारा ललिता को विद्यालय में पढ़ाने के लिए कुछ समय दिया गया| चंद दिनों में ही ललिता द्वारा गतिविधि के साथ पढ़ाने के तरीके से वहाँ के प्रधानाध्यापक और शिक्षक काफी प्रभावित हुए , और उन्हें अलग पढ़ाने के लिए कमरा मुहैया  कराया | आज ललिता उसी विद्यालय में ढाई घंटा बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का काम कर रही हैं|

कहते हैं कि आप के हुनर व् जज्बे से अगर अन्य लोग प्रभावित होते हैं, तो आप वाकई में एक प्रतिभाशाली व् असरदार इंसान हैं| कुछ ऐसा ही हुआ ललिता के विद्यालय में| ललिता ने कक्षा को रोमांचक बनाने के लिए बच्चों द्वारा बनाये गए चित्र, क्राफ्ट, पोस्टर, शिक्षण अधिगम सामग्री आदि कक्षा की दीवारों पर लगाए| कक्षा एक ऐसा बदला स्वरुप देख कर उनके विद्यालय के प्रधानाध्यापक इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने विद्यालय के अन्य कमरों में कारीगर बुलवा कर बच्चों के सीखने के लिए रंग बिरंगी आकृतियां और अन्य प्रकार की कला दीवारों पर बनवा दी|

विद्यालय में बनवाई आकृतियों के साथ ललिता के विद्यालय के प्रधानाध्यापक
“इनकेपढ़ाने का तरीका मुझे काफी अच्छा  लगता है, सबसे अच्छी बात ये है की बच्चे काफी खुश रहते है “
        - लड्डू पासवान (स्कूल प्रिंसिपल मध्य विद्यालय बिजय नगर जमालपुर )


अगर आप अच्छा कार्य करते हैं तो समय समय पर आपकी परीक्षा भी होती है| कुछ ऐसा ही ललिता के साथ हुआ जब एक दिन उनके विद्यालय पर उनके द्वारा लगायी गयी बच्चों की सभी कला बच्चों ने स्वयं ही फाड़ दी| इस समस्या का हल ढूँढ़ते हुए ललिता व् आई-सक्षम से उनके सहयोगी ने शिक्षक अभिभावक बैठक के दौरान यह बात अभिभावकों के सामने रखने की सोची| पर किसे मालूम था कि शिक्षक अभिभावक बैठक से जहाँ एक ओर इस समस्या का सुधार होगा वहीँ दूसरी और ललिता खुद को समाज में एक महत्ववपूर्ण बिंदु की तरह देख पाएंगी| जब उनके विद्यालय में शिक्षक अभिभावक बैठक हुई तो उन्होंने सभी अभिभावकों में उनके बच्चों की शैक्षणिक स्तिथि की समझ बनायी| साथ ही उन्होंने सभी अभिभावकों को अपने द्वारा ट्रेनिंग के अनुसार किये जा रहे नए प्रयोग के बारे में भी बताया| अभिभावकों के लिए किसी का बच्चों को इस तरह से पढ़ाना और विद्यालय में खुद इस तरह बच्चों की सिक्षा को लेकर एकत्रित होना बिलकुल नया था| मानो उनका एक विशवास सा बन उठा कि उनके बच्चे अब एक बेहतर शिक्षा हासिल कर पायेंगे| ललिता बताती हैं की शिक्षक अभिभावक बैठक के बाद उनकी समाज में काफी इज्ज़त की जाती है और लोग उन्हें स्नेह भरी निगाहों से देखते हैं|

अभिभावक शिक्षक बैठक में शिक्षण अधिगम सामग्री की समझ बनाते हुए ललिता|
आज भी ललिता की प्रेरणा बिलकुल वैसे ही बरकरार है| वह हर सप्ताह होने वालेअपने प्रशिक्षण में हमेशा आधा घंटा पहले उपस्तिथ होती हैं और आज तक कभी अनुपस्थित नहीं हुई हैं| वह अपने फ़ेलोशिप के समूह में कई लोगों की प्रेरणा का स्रोत हैं| इस कार्य में एक मुख्य भूमिका ललिता के जीवन साथी भी निभा रहे हैं जो कि ललिता को ट्रेन से प्रशिक्षण केंद्र आने में कोई समस्या न हो, इसके लिए हर प्रशिक्षण में उनके साथ आते हैं|

ललिता कहती है – एडू-लीडर प्रोग्राम का हिस्सा होने के कारण मेरा सम्मान समाज में बढ़ा है , समाज के लोग मुझे हर काम में सहयोग करते हैं और मैं अपने समय को सही से प्रबंध कर पाती हूँ | वह अपने अन्दर अब अधिक उत्साह भी पाती हैं और उनके हौसलों को बनाए रखने के लिए आई-सक्षम परिवार सदैव उनके साथ खड़ा है| अब वह बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर रही हैं।

ललिता कहती हैं – “ यह  तो बस शुरुआत है अभी  तो  बहुत कुछ करना है।अभी तो पंख लगे हैं, अभी उड़ान बाकी है| ”




Tuesday, November 27, 2018

क्या मैं भी?


एक भीड़, दौड़ते-खेलते उत्साह से भरे बच्चे जो हर गतिविधि में भाग लेने के लिए पूरे जोश से भरे है और अपनी बारी के इंतज़ार में लगे हैं |

 स्कूल के हर थोड़ी दूर पर बनी अलग-अलग गतिविधि के काउंटर पर अपना रजिस्ट्रेशन कराने के लिए लाइन में खड़े बाल उत्सव का आनंद ले रहे |

उस भीड़ में एक बच्ची सामने आकर बोलती है “भैया, हम भी भाग लेंगे”, मैंने पूछा “किसमें भाग लोगे?” तब तक पास खड़े एक बच्चे ने कहा “सर ई पागल है, आप जाइये” मुझे लगा ये मजाक कर रहा है या इसे चिढ़ा रहा है “मैंने फिर उससे पूछा “बोलो किस्में भाग लोगे?” फिर उस बच्चे ने बोला “सर इसका दिमाग ख़राब है, इसको रहने दीजिये” मुझे थोडा गुस्सा सा आया “मैंने उससे कहा, तुम ठीक हो ना-जाओ अपने काउंटर पर जाओ” | फिर जब मैंने उससे अलग-अलग गतिविधि के बारे में पूछा तो उसने चित्रकारिता में भाग लेने में अपनी रूचि दिखाई, उसे उस रूम में ले गया जिसमें चित्रकारिता हो रही थी | जब मैंने शिक्षिका से उसका नाम लिखने को कहा, वहां भी उपस्थित 4-5 बच्चे एक साथ उसे पागल-पागल कहने लगे और मुझे सलाह देने लगे की “सर ई तो पागल है इसका दिमाग ख़राब है- ये नहीं बना पायेगी इसको नहीं आता है|” मुझे बहुत गुस्सा आया मैंने सब को शांत रहने को और अपना पेंटिंग पर ध्यान देने को कहा | फिर उसे पेंटिंग बनाने के सारे-साधन दिए और मैं वहां से अपने गतिविधि के काउंटर पर चला आया|


मुझे आश्चर्य तो तब हुआ जब प्रदर्शनी के समय सब बच्चे अपना-अपना चित्र दिखा रहे थे मैं भी देख रहा था और जो बच्चे उसे पागल और न जाने क्या-क्या कह रहे थे उन सबसे उस बच्चे की पेंटिंग अच्छी दिख रही थी (तुलना एक सोच मात्र का था) और वहां पर भी उसके पेंटिंग को देख वे बच्चे हंस रहे थे |

इस पूरे दृश्य ने मुझे बहुत सोचने पर मजबूर किया, बच्चे जो आगे चल कर समाज की एक मजबूत कड़ी बनते है उनमें ये कैसी भावना जागृत हो रही है, कैसे समाज में सहभागिता की सोच को विकसित किया जायगा, कैसे हम बच्चों में फर्क न कर सभी के अन्दर की प्रतिभा को सराहा जा सकेगा | इसमें कोई शक नहीं की हर बच्चे के अन्दर अपनी एक अलग प्रतिभा है जिसे बस मौका देने की जरुरत है उसकी भागिता को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है |

पंचायत सरारी गाँव में “i -Saksham द्वारा कराये जा रहे  बाल उत्सव के अनुभव पर आधारित


अमन प्रताप सिंह
सदस्य I-Saksham

Tuesday, July 24, 2018

Prince writes about fellowship session 01th July 2018, with 2nd Batch of Fellows


Experience of 10th Fellowship session with 2nd batch of i-Saksham Fellows


इस सप्ताह सत्र -१० की प्रशिक्षण हुई  | इस सत्र में बच्चों के  Baseline  कक्षा १ जांच के प्रश्न पुस्तिका पर चर्चा हुई  कि किन –किन तरह के सवाल बच्चों को हल करनी है एवं शिक्षक अपने बच्चों को किन –किन तरह के प्रश्नों को अभ्यास करवा सकते है | पिछली सत्र में, मैंने साथियों (Fellows) के साथ MG( Multigrade) एवं  ML(Multilevel) कक्षा  पर बातचीत की थी एवं साथ ही साथ इस कक्षा में समूह में कैसे पढ़ाएंगे| इस कक्षा में उन्हें समझनी है कि अलग –अलग स्तर के बच्चों को समूह में किन –किन ट्रक के सवाल का अभ्यास करवाया जा सकता है |

सभी साथी (Fellow ) समय पर प्रशिक्षण केंद्र पर उपस्तिथ हो गए थे | कुछ साथी देरी से पहुचें क्यूंकि उन्हें ट्रेन से आना पड़ता है | हमेशा की तरह , मैंने प्रशिक्षण का आरम्भ गतिविधि से किया | गतिविधि _”कुम्हार और मिटटी” से साथियों को अवगत किया | इस गतिविधि को जोड़े में खेलनी थी, जिसमे से एक साथी को  मूर्ति बननी थी एवं दुसरे को कुम्हार | अब सभी साथी को एक दुसरे के मूर्ति को देखकर अनुमान लगानी  है कि मूर्तिकार ने क्या बनाया है ?



हम सब ने साथ में २ मिनट का ध्यान किया | प्रतिभागियों के कहने पर, मैंने इस सत्र में एक गाना  Play  किया था | गाने के बोल थे- एक तू ही भरोसा है | हर सत्र में गाने के धून को बजाया जाता था| इस बार कुछ विचार आया कि क्यों ना कुछ नया किया जाए एवं साथियों की प्रतिक्रिया समझा जाए | प्रतिभागियों को भी अच्छा लगा | मैंने साथियों से कहा कि अब आने वाले सप्ताह से आप में से ही किसी को करना है |मैंने साथियों से पुछा कि कौन Volunteer करना चाहेंगे | एक साथी(शहर  बानो) ने हामी भरी और कहा कि अगले सप्ताह वो इसे  अपने साथियों के साथ करेंगी|      

मै अब साथियों के साथ सत्र को आगे बढाया – अब समय था कि पिछले सप्ताह के अनुभव पर चर्चा हो| मैंने सभी साथियों का तीन  अलग –अलग समूह बनाया और सभी समूह  के लिए एक प्रश्न दिया| अब सभी साथियों को समूह में सोचना है एवं आपस में चर्चा कर presentation देना है |

इन सभी  सवाल पर चर्चा हो रहे  थे :-
·         अभी तक,जो भी सत्र हुए है , उनका क्रम क्या था ? पहले सत्र से अभी तक क्या –क्या हुआ ?
·         अभी तक के सत्र में कौन –कौन ऐसी ५ विषय है जिसे आप बेहतर रूप से सीखे है एवं कौन ऐसी ५ चीज़ें है जिसे आप समझ नहीं पाए है और उसे फिर से समझना चाहते है ?
·         ट्रेनिंग में सीखी हुई ऐसी कौन सी ऐसी ५ चीज़ें है, जिसे आप बच्चों के साथ  लागू कर दिए है ? कौन-कौन  सी ऐसी चीज़े है जिसे आप अपने केंद्र के बच्चों के साथ करना चाहते है ?

        सभी साथियों ने अपने समूह में चर्चा कर Present किया |
मैंने सभी साथियों को उनके केंद्र के बच्चों का असर टेस्ट का जांच कॉपी दिया |अब उन्हें अपने केंद्र के बच्चों का उनके स्तर के हिसाब से समूह बनाना है एवं सभी के सामने पेश करना है | सभी प्रतिभागी अपने –अपने समूह में चर्चा कर विषयवार समूह बनाए और उसे सभी लोगो के सामने पेश किया |


 अब सत्र का आधा से समय बीत गए थे | मैंने महसूस किया कि साथी अब break लेना चाह  रहे है | मैंने सभी साथियों से पुछा कि अब क्या break लेना चाहिए | अचानक एक साथी ने कहा , कि break होनी चाहिए | सभी  साथी को 15 मिनट का  break मिला| कुछ साथी अपने घर से लेकर आए हुए  Lunch  करने लगे तो कुछ  अपने दोस्तों से बात करते हुए इधर –उधर विचरण कर रहे थे|

Break के बाद सभी साथी पुनः प्रशिक्षण कक्ष में बैठ गए| मैंने फिर से  3 समूह बनाए , सभी समूह में एक mentor भी बैठे हुए थे| अब मैंने सभी साथियों को  Baseline Class-1 Hindi Test Paper  दिया | सभी साथियों को  Test Paper में सवाल देखने थे –उन्हें भाषा के स्तम्भ –सुनना ,बोलना ,लिखना  एवं पढना के सवाल को समझना था | सभी साथी अपने समूह में चर्चा करने लगे | साथियो को बताने थे कि इनमे से कौन –कौन से सवाल पढने वाले,बोलने वाले और कौन –कौन से पढने और लिखने वाले है |





मैंने बोर्ड पर चार खंड बनाए जहाँ १.सुनना २. बोलना ३.पढना ४. लिखना | सभी प्रतिभागियों से प्रत्येक सवाल के बारे में पूछ रहा था कि ये सवाल भाषा में किस सूचक को प्रदर्शित कर रहा है | सभी साथी अपना मत रख रहे थे | कुछ समूह का कहना था कि सभी सवाल में बहुत सारी  चीज़े समान है जैसे कि अगर कोई सवाल लिखने वाला है | फिर भी पहले बच्चा पढ़ेगा, तभी लिखेगा | लेकिन पढने के साथ –साथ समझेगा फिर ही वो लिख पाएगा | एक साथी के अनुसार सुनना फिर बोलना एक समझना भी है | क्या हम  इसे भी भाषा के सूचक के रूप में देख सकते है | अगर हम कुछ बोलते है तो बच्चा समझता है तभी वो समझ कर अपनी बात रख पाता  है | मै उनसे सहमत था और काफी बेहतर महसोस कर रहा था कि साथी चीजों को गहराइयों में जाकर समझ पा रहे थे |



 अब हम सवाल संख्या ५ की बात करे तो यहाँ साथियों का कहना था कि ये सवाल का केंद्र बिंदु  “बोलने” वाला है , लेकिन  बच्चा यहाँ सुनने का भी काम कर रहा है तो पहले यहाँ सुनना है फिर बोलने की क्रिया हो रही है |
सवाल संख्या १३ में, ये सवाल लिखने वाले है , लेकिन इससे पहले बच्चा या शिक्षक पहले पढेंगे ,समझेंगे तब लिखेंगे | एक साथी के अनुसार , कुछ सवाल को  स्तिथिजन्य तरीकों से भी करवा सकते है क्यूंकि कक्षा -१ के सभी बच्चें को सही तरीकों से पढने में कठिनाई होती है | तो यहाँ शिक्षक को सवाल खुद पढ़ कर समझाना पड़ेगा, फिर बच्चें सवाल को हल कर पायेंगे|
कुछ साथियों के अनुसार (काजल ,रूपा ,मीनाक्षी ,शबनम ,प्रशांत) कि हम बच्चों के स्तर के अनुसार समूह में इस तरीको के सवालों का प्रयास भी करवा सकते है | इस तरीकों का सवाल हम खुद से भी कहानी और कविता पढ़ाने  के समय बना कर अभ्यास करा सकते है |
अब सत्र का समापन का समय हो चूका था | सभी साथियों को अंग्रेजी एवं गणीत का  Baseline Test Paper दिया गया  कि वो अगले सत्र में इसे बच्चों के स्तर के अनुसार समझ के आएंगे कि अलग-अलग स्तर के बच्चों को विषयवार किन –किन तरह के सवालों का अभ्यास करवाया जा सकता है | अगले सप्ताह ,हम सभी  साथी पुनः इसपर चर्चा जारी रखेंगे |

Feedback from mentor:-

·         Wakil Ji – कुछ साथियों को  Confusion हो रहा था ,लेकिन वो गहराइयों में जाकर समझ पा रहे थे | पहले मुझे भी   कुछ  Confusion  था | लेकिन चर्चा के बाद काफी कुछ स्पष्टता के साथ समझ बन पाई | कुछ साथी पिछले सत्र में अनुपस्तिथ थे, उन्हें MG और ML की समझ नहीं थी |

·         Dharmveer – एक प्रतिभागी (सिन्धु) ‘कुम्हार और मिटटी” की गतिविधि को करने में असहजता महसूस कर रही थी | मुझे काफी बेहतर लगा कि पिछले सप्ताह के अनुभव के समय सभी साथियों का अभ्यास हो गया और वे शुरू से लेकर अभी तक के सत्र का अभ्यास कर पाए |Meditation में Volunteer  साथियों द्वारा करने का तरीका काफी बेहतर लगा |सभी साथी Aser  के अनुसार समूह बनाना बेहतर रूप में समझ पाए | एक साथी (रूपा) शुरू में Participate कर रही थी , लेकिन सत्र के अंत में  Involve  नहीं थी |हम इस बैच में भी  Session  Symbol  बनाना बोल सकते है |

·         Kaifee –ये एक  Tough Discussion  है | इसे कोई भी एक बार में नहीं समझ सकता | लेकिन प्रतिभागी अलग-अलग सवालों को गहराइयों में जाकर समझ पा रहे थे| एक प्रतिभागी (प्रशांत) ट्रेनर को अगले सवाल पर चले जाने के बाद, पहले सवाल पर वापस आकर चर्चा कर रहे थे|

Particpants -11
Buddy’s from team-4