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Monday, September 29, 2025

“मैं करना तो बहुत कुछ चाहती हूँ, पर अकेली क्या करूँ?”

“मैं करना तो बहुत कुछ चाहती हूँ, पर अकेली क्या करूँ?”

यह सवाल अक्सर मेरे मन में आता था। 

मेरा नाम रंगीला है और मैं बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मोहम्मदपुर कोठी नया टोला गाँव की रहने वाली हूँ। मैं हमेशा से अपने समुदाय में कुछ बदलना चाहती थी, लेकिन अकेले होने और सही रास्ते की जानकारी न होने के कारण मेरे छोटे-छोटे प्रयास अक्सर नाकाफी रह जाते थे।

मेरे गाँव में कई समस्याएँ थीं—बच्चे नियमित रूप से स्कूल नहीं जाते थे, PTM (अभिभावक-शिक्षक बैठक) में माता-पिता की भागीदारी न के बराबर थी, और मेरी हमउम्र लड़कियाँ उच्च शिक्षा के बारे में सोचती तक नहीं थीं। यह सब देखकर मुझे लगता था कि बदलाव बहुत ज़रूरी है, पर कैसे करूँ, यह समझ नहीं आता था।

यह स्थिति तब बदली जब मैं i-सक्षम फेलोशिप से जुड़ी। यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मेरे लिए वह मंच था जिसकी मुझे तलाश थी। एडू-लीडर के रूप में जब मैंने स्कूल और समुदाय में काम करना शुरू किया, तो मैंने सबसे पहले इन्हीं समस्याओं को अपनी चुनौती बनाया।

मैंने एक-एक कर इन समस्याओं को हल करने के लिए लक्ष्य बनाना और उस पर काम करना शुरू किया। यह मेरे नेतृत्व की पहली परीक्षा थी। जो बच्चे स्कूल नहीं आ रहे थे, मैं उनके घर गई और उनके माता-पिता से मिलकर उन्हें शिक्षा का महत्व समझाया। PTM में भागीदारी बढ़ाने के लिए, मैंने अभिभावकों को इसकी अहमियत बताई और उन्हें स्कूल से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। गाँव की लड़कियों तक उच्च शिक्षा की जानकारी पहुँचाने के लिए, मैंने अपने जैसे अन्य साथियों के साथ मिलकर उन्हें जागरूक करने का काम किया।

मेरी इन कोशिशों का नतीजा धीरे-धीरे सामने आने लगा। स्कूल में बच्चों की उपस्थिति 50% तक बढ़ गई। जिन PTM में कभी कोई नहीं आता था, अब वहाँ हर कक्षा से 20-25 अभिभावक नियमित रूप से शामिल हो रहे हैं। और सबसे बड़ी खुशी यह है कि मेरे समुदाय की लड़कियाँ अब उच्च शिक्षा के सपने देख रही हैं और उस दिशा में कदम भी बढ़ा रही हैं।

जब मैंने इन सपनों को अपनी आँखों के सामने सच होते देखा, तब मुझे 'सक्षम' होने का असली मतलब समझ आया। सक्षम होने का मतलब सिर्फ कुछ जानना नहीं, बल्कि यह है कि—मैं जो सोचूँ, वो कर पाऊँ।


लेखिका के बारे में:

  • नाम: रंगीला कुमारी

  • परिचय: रंगीला धर्मागतपुर, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-11 की एक एडू-लीडर हैं।

  • i-सक्षम से जुड़ाव: रंगीला वर्ष 2024 में i-Saksham से जुड़ी हैं।

  • लक्ष्य: रंगीला अभी ग्रेजुएशन कर रही हैं और भविष्य में अपने समाज के लिए एक रोल मॉडल बनना चाहती हैं।

Wednesday, September 24, 2025

“क्या मेरी अपनी कोई पहचान नहीं?”

 “क्या मेरी अपनी कोई पहचान नहीं?”

यह सवाल खुशबू दी के मन में अक्सर गूंजता था। प्रह्लादपुर की रहने वाली, उनकी शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी। किस्मत से ससुराल अच्छा मिला, लेकिन वह 14 सदस्यों का एक बड़ा परिवार था। दिन भर घर की जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते, उनकी अपनी पहचान कहीं खो गई थी। लोग उन्हें केवल "किसी की पत्नी" और "किसी की बहू" के रूप में जानते थे। 

पढ़ाई की इच्छा दिल में हमेशा ज़िंदा रही। बड़ी मेहनत से उन्होंने घर संभालते हुए स्नातक (B.A.) की डिग्री भी हासिल की, लेकिन डिग्री के बाद भी ज़िंदगी वापस उसी ढर्रे पर लौट आई—रसोई, बच्चे और घर का काम।

इस सवाल का जवाब और ज़िंदगी में एक नया मोड़ उन्हें शादी के 13 साल बाद मिला, जब वह i-सक्षम फेलोशिप से जुड़ीं। यह मौका उनके लिए एक नई शुरुआत जैसा था। यहाँ ट्रेनिंग, दोस्तों जैसे माहौल और रोचक गतिविधियों ने उनकी खोई हुई खुशियों को लौटा दिया।


धीरे-धीरे, उनके नेतृत्व ने एक नई शक्ल लेनी शुरू की। उन्हें विद्यालय और समुदाय में बच्चों को पढ़ाने का अवसर मिला। शुरुआत में यह सिर्फ एक काम लगा, लेकिन जब बच्चों की आँखों में उनकी पहचान चमकने लगी और वे मुस्कुराते हुए “खुशबू मैम” कहकर बुलाने लगे - एक नई पहचान मिली।

आज गाँव के लोग भी उन्हें सम्मान से “मैडम” कहकर पुकारते हैं। समुदाय में उन पर इतना विश्वास है कि लोग कहते हैं—“अगर मैडम ने कहा है, तो यह ज़रूर होगा।” यह सिर्फ एक सम्मान नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

खुशबू दी मानती हैं कि यह फेलोशिप खत्म होने के बाद भी, वह अपने समुदाय के बच्चों को पढ़ाकर हमेशा “मैडम” कहलाती रहेंगी। अब उनकी पहचान किसी रिश्ते तक सीमित नहीं है। वह आज एक शिक्षिका हैं, एक लीडर हैं और कई लोगों के लिए एक प्रेरणा हैं।


......

लेखिका के बारे में:

नाम: खुशबू कुमारी

परिचय: खुशबू प्रह्लादपुर, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं और i-Saksham बैच-11 की एक एडू-लीडर हैं।

i-सक्षम से जुड़ाव: खुशबू वर्ष 2024 में i-Saksham से जुड़ी हैं।

लक्ष्य: खुशबू भविष्य में एक नौकरी करके आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं और अपनी पहचान को और मज़बूत करना चाहती हैं।

Monday, September 22, 2025

“नहीं दीदी, आप ही कर दीजिए।”

“नहीं दीदी, आप ही कर दीजिए।”

यह रानी का जवाब होता था, जब भी मैं उसे सेशन में कुछ करने के लिए आगे बुलाती थी। मेरा नाम पायल कुमारी है और मैं i-सक्षम की एक एडू-लीडर हूँ। जब मैंने फेलोशिप की शुरुआत की, तो किशोरियों के साथ हर महीने सेशन लेना मेरी ज़िम्मेदारी थी। लेकिन शुरू में बहुत कम लड़कियाँ आती थीं, और जो आती थीं, उनमें से ज़्यादातर चुपचाप बैठी रहती थीं।

रानी भी उन्हीं में से एक थी। मलयपुर की रहने वाली, वह हमेशा सहमी-सहमी और चुप रहती थी। उसके अंदर आत्मविश्वास की इतनी कमी थी कि वह किसी भी गतिविधि में हिस्सा लेने से साफ़ मना कर देती थी।

मुझे समझ आ गया था कि सिर्फ जानकारी देना काफी नहीं है; मुझे कुछ ऐसा करना होगा जिससे ये लड़कियाँ खुलें और अपनी आवाज़ को पहचानें। यह मेरे लिए एक लीडर के तौर पर पहली चुनौती थी।

मैंने तय किया कि सेशन को थोड़ा मज़ेदार और एक्टिव बनाऊँगी। मैंने लड़कियों को छोटे-छोटे ग्रुप में बाँटा और उन्हें आसान सी गतिविधियाँ और चैलेंज दिए। मेरा मकसद था कि वे पहले एक-दूसरे के साथ सहज हों। धीरे-धीरे जब उन्होंने छोटे समूहों में भाग लेना शुरू किया, तो मैंने उन्हें बड़े ग्रुप में भी मौके दिए। 

इसका असर दिखना शुरू हो गया। लड़कियाँ अब अपनी राय रखने लगी थीं। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव रानी में आया। जो लड़की पहले एक शब्द भी नहीं बोलती थी, अब वह छोटे-छोटे कामों में हिस्सा लेने लगी।

आज रानी को देखकर कोई कह नहीं सकता कि यह वही लड़की है। अब वह बिना डरे बोलती है, सवाल पूछती है और सेशन को बेहतर बनाने के लिए मुझे सुझाव भी देती है। उसकी सबसे अच्छी बात यह है कि वह अब एक भी सेशन मिस नहीं करती और हर गतिविधि में सबसे आगे रहती है। मैंने उसके माता-पिता से भी बात की, और यह जानकर अच्छा लगा कि वे भी रानी में आए इस बदलाव को देख रहे हैं और उसे पूरा सपोर्ट कर रहे हैं।

यह बदलाव सिर्फ रानी में ही नहीं, बल्कि बाकी किशोरियों में भी आया है। लेकिन रानी की प्रगति देखकर मुझे जो खुशी होती है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। यह मेरे लिए भी गर्व की बात है कि मेरे एक छोटे-से प्रयास ने किसी के आत्मविश्वास को जगा दिया।


लेखिका के बारे में:

  • नाम: पायल कुमारी

  • परिचय: पायल कुमारी i-Saksham फेलोशिप के बैच-11 की एक एडू-लीडर हैं, जो अपने समुदाय की किशोरियों के बीच आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का विकास करने के लिए काम कर रही हैं।

  • लक्ष्य: पायल का सपना है कि वह अपने समुदाय की हर लड़की को इतना सशक्त बनाएं कि वे अपनी आवाज़ बिना किसी डर के उठा सकें।

Monday, September 15, 2025

"अगर बेटा होता, तो क्या तब भी रोकते?"

"यही अवसर अगर बेटा होता, तो क्या तब भी आप उसे रोकते?"

यह एक सवाल नहीं, बल्कि एक माँ की अपनी बेटी के सपनों के लिए उठाई गई आवाज़ थी। यह सवाल मुस्कान की माँ ने उसके पिता से तब पूछा, जब मुस्कान को भोपाल की प्रतिष्ठित अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में स्कॉलरशिप पर पढ़ने का मौका मिला, और उसके पिता ने अपनी रूढ़िवादी सोच के कारण उसे इतनी दूर भेजने से साफ़ इनकार कर दिया।

यह सवाल मुस्कान के पिता को अंदर तक झकझोर गया। उन्होंने धीमी-सी आवाज़ में कहा, "नहीं!"

यह सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक पिता की सालों पुरानी सोच में आया बदलाव था। नतीजा? वह खुद मुस्कान को भोपाल, "अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी" छोड़ने गए।

आज मुस्कान अपने गाँव और राज्य की सीमाओं से निकलकर भोपाल में पोस्ट-ग्रेजुएशन कर रही है। उसकी यह यात्रा सिर्फ उसकी अपनी जीत नहीं है; यह उस गाँव के लिए भी एक मिसाल है, जहाँ अब और भी पिता अपनी बेटियों के सपनों को गंभीरता से लेने लगे हैं।

लेकिन मुस्कान मे क्षमता कहाँ से विकसित हुई?

कुछ साल पहले तक, मुस्कान बिहार के मुज़फ्फरपुर जिले के हसनपुर गाँव की वही साधारण लड़की थी, जिसकी अपनी कोई आवाज़ नहीं थी। उसका नेतृत्व शून्य था—वह फैसले लेती नहीं, सिर्फ मानती थी।

यह परिवर्तन i-सक्षम फेलोशिप के साथ शुरू हुआ। दो वर्षों तक एडू-लीडर के रूप में काम करते हुए उसने गाँव की महिलाओं और किशोरियों के साथ बैठकर सामाजिक मुद्दों पर चर्चा की कभी एक सूत्रधार (facilitator) बनकर दूसरों को बोलने के लिए प्रेरित भी की। धीरे-धीरे, दूसरों को आवाज़ देने की कोशिश में, उसे अपनी आवाज़ मिल गई।

फेलोशिप खत्म होने पर, अपनी मेहनत और क्षमता से उसके सामने तीन रास्ते थे—एक बैंक की नौकरी और दो प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई का मौका। 

यह उसकी ज़िंदगी का पहला बड़ा नेतृत्व परीक्षण था। उसने नौकरी से मिलने वाली तत्काल सुरक्षा के बजाय सीखने के लंबे रास्ते को चुना। उसने आने वाला कल को देखा।

उसने अवसर का सदुपयोग दिया, और अपने अंदर छिपी एक लीडर को पहचाना और उसे निखारा। इसी हिम्मत का परिणाम है कि वह आज अपने और अपने जैसी कई और लड़कियों के सपनों को पूरा करने की ताकत रखती है।

लेखिका के बारे में:

  • नाम: मुस्कान

  • परिचय: मुस्कान मुज़फ्फरपुर, बिहार से हैं। वह i-Saksham की पूर्व फेलो (Edu-Leader) हैं।

  • वर्तमान: वह वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, भोपाल से स्कॉलरशिप पर अपनी पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही हैं।

  • लक्ष्य: मुस्कान का सपना है कि वह शिक्षा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में काम करके अपने जैसी और भी लड़कियों को आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करें।

Wednesday, September 10, 2025

"आगे पढ़कर क्या करोगी?"

मेरा नाम निशा है और मैं जमुई के ढेवरि गाँव से हूँ। आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रही हूँ, जहाँ कुछ किशोरियों की पहचान और सम्मान की तलाश ने मुझे भी एक नया रास्ता दिखाया।

"मेरी पहचान, मेरा सम्मान" समूह की शुरुआत

मैंने लखनपुर गाँव में 15 से 20 किशोरियों का एक समूह बनाया, जिसका नाम था “मेरी पहचान, मेरा सम्मान”। इस समूह में तीन ऐसी किशोरियाँ थीं – निशा, पारो और क्रांति – जिन्होंने 8वीं तक पढ़ाई करने के बाद स्कूल छोड़ दिया था। उनके घरवाले कहते थे, "आगे पढ़कर क्या करोगी?"

जब ये किशोरियाँ हमारे सेशन में आतीं, तो उन्हें पढ़ा
ई छोड़े लगभग एक साल हो चुका था। लेकिन जब वे बाकी लड़कियों के स्कूल जाने के अनुभव सुनतीं, तो उनके मन में हमेशा एक सवाल उठता – "मैं क्यों नहीं जाती हूँ?" वे यह बात मुझसे साझा भी करती थीं, "दीदी, मुझे भी स्कूल जाना है।" उनकी आँखों में स्कूल जाने की चाहत साफ़ दिखती थी।

उम्मीद की किरण: नंदनी का उदाहरण

उनकी यह चाहत देखकर, मैंने उनके माता-पिता से बातचीत शुरू की और लगातार उनके घर जाती रही। कई दिनों तक मैं निशा, पारो और क्रांति के एडमिशन को लेकर उनके पेरेंट्स से बात करती रही। हर बार मैं यही कहती – "अपने बच्चों को पढ़ने का पूरा मौका दीजिए, पढ़ाई से ही उनका भविष्य संवरेगा।"

कई बार माता-पिता की ओर से आर्थिक स्थिति की बातें सामने आतीं, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। यह मेरे लिए एक लीडरशिप की चुनौती थी, जहाँ मुझे न सिर्फ समझाना था, बल्कि उन्हें एक रास्ता भी दिखाना था। मैंने हमेशा नंदनी का उदाहरण दिया – उसी गाँव की SC समुदाय की लड़की, जो अपनी परेशानियों को पीछे छोड़कर आज बिहार पुलिस की तैयारी कर रही है। मैं कहती थी, "देखिए, अगर नंदनी कर सकती है, तो आपकी बेटी भी जरूर कर सकती है।"

कभी-कभी लगता था कि शायद मेरी बातें अनसुनी रह जाएंगी, लेकिन दिल के किसी कोने में विश्वास था कि एक दिन वे जरूर समझेंगे।

जब मेहनत रंग लाई: स्कूल का दरवाज़ा खुला

और फिर वो दिन आया। किशोरी के पापा को मेरी बातें समझ आईं। उन्हें भी लगा कि अगर उनकी बेटी नहीं पढ़ेगी, तो आगे चलकर वह सिर्फ शादी करके घर के कामों तक ही सीमित रह जाएगी और हमेशा दूसरों पर निर्भर रहना पड़ेगा। एक दिन वे खुद अपनी बेटी को स्कूल ले गए और उसका एडमिशन करवा दिया।

हालाँकि एडमिशन के बाद वह किशोरी तुरंत सेशन में नहीं आ रही थी। मेरा मन थोड़ा परेशान था। मैं खुद उसके पेरेंट्स से मिलने गई। वहाँ उन्होंने मुझे बताया, "हाँ दीदी, अब हमारी बेटी स्कूल जा रही है।"

उस पल मेरे चेहरे पर जो मुस्कान थी, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

खुशी का अनमोल पल

आज, जब मैंने पारो, क्रांति और निशा से मिलकर देखा कि वे लड़कियाँ अब स्कूल जा रही हैं और पढ़ाई कर रही हैं, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उनकी आँखों में चमक थी, उनके शब्दों में आत्मविश्वास था – "मैं स्कूल जाकर बहुत खुश हूँ।"

वह पल मेरे लिए अनमोल था। जैसे मेरी मेहनत रंग लाई हो। यह कहानी सिर्फ एक बच्ची की नहीं है, यह हर उस लड़की की कहानी है, जो सिर्फ एक मौके की तलाश में है। और यह हर उस इंसान की कहानी भी है, जो बिना थके, बिना रुके, उनके लिए वह मौका बनाने की कोशिश कर रहा है।


लेखिका के बारे में: 

  • नाम: निशा कुमारी

  • परिचय: निशा ढेवरी गाँव की रहने वाली हैं और i- saksham में एक बडी के रूप में का काम कर रही हैं।

  • i-सक्षम से जुड़ाव: निशा वर्ष 2021 में i-saksham सें बैच 7 की एडु लीडर के रूप में जुड़ी हैं 

  • लक्ष्य: निशा का सपना है कि वह अपने समुदाय की हर लड़की को शिक्षा का अधिकार दिला सकें, ताकि वे अपनी पहचान और सम्मान के साथ जी सकें। इसलिए वह आगे पढ़ाई करके एक शिक्षिका बनना चाहती हैं |

Tuesday, March 18, 2025

"सीता की आत्मनिर्भरता की कहानी"

सीता नवादा गाँव  (कोइरी टोला) के एक ऐसी लड़की थी, जो आत्मविश्वास की कमी के कारण अपनी बात ठीक से नहीं रख पाती थी। उसके पापा उसे घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं देते थे, जिससे उसकी स्वतंत्रता सीमित थी।
एक दिन, उसने सुना कि आई-सक्षम के लिए फॉर्म भरा जा सकता है, जिससे उसे एक नया अवसर मिल सकता था। यह उसके लिए पहली चुनौती थी—क्या वह बिना पापा की अनुमति लिए खुद के लिए कोई निर्णय ले सकती है?
शुरुआत में, उसे डर लगा कि पापा मना कर देंगे या नाराज़ होंगे। उसे लगा कि शायद वह यह कदम नहीं उठा पाएगी। किसी भरोसेमंद व्यक्ति (शिक्षक/मित्र) ने उसे प्रेरित किया कि उसे अपने जीवन के फैसले खुद लेने चाहिए। इसने उसमें आत्मविश्वास जगाया।
उसने हिम्मत जुटाकर बिना पापा से पूछे आई-सक्षम का फॉर्म भर दिया और परीक्षा दी। यह उसकी पहली बड़ी परीक्षा थी। परीक्षा पास करने के बाद भी, सबसे बड़ी चुनौती थी—क्या पापा उसे वहां काम करने देंगे? यह उसकी यात्रा की सबसे कठिन बाधा थी।
पापा ने उसकी मेहनत और आत्मनिर्भरता को देखते हुए उसे आई-सक्षम में काम करने की अनुमति दे दी। यह उसकी पहली बड़ी जीत थी। अब सीता न केवल अपनी राय खुलकर रख पाती थी बल्कि अपने पसंद को भी परिवार, समुदाय और विद्यालय में आत्मविश्वास से प्रस्तुत कर सकती थी।

उसने न केवल अपने आत्मविश्वास में बल्कि अपने लक्ष्य में भी स्पष्टता पाई। अब वह B.Ed करके शिक्षिका बनने का सपना देख रही थी, ताकि वह दूसरों को भी सशक्त बना सके।

सीता की यह यात्रा न केवल उसके लिए बल्कि उन सभी लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गई, जो आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की राह पर बढ़ना चाहती थीं। अब सीता अपनी पहचान खुद बना चुकी थी। वह अपने विचारों को मजबूती से व्यक्त कर सकती थी और अपने भविष्य के लिए खुद फैसले लेने में सक्षम थी।

सीता कुमारी,एडू लीडर
मुजफ्फरपुर


हलीमपुर गाँव की पहली झलक

आज मैं आप सभी के साथ अपने समुदाय के काम (हलीमपुर) के अनुभव को साझा करना चाहती हूँ, जहाँ मैं एडु लीडर रश्मि (बैच 10A) के साथ गई थी।
जैसे ही हम उस गाँव में पहुँचे, वहाँ की कई चीज़ों ने मेरा मन मोह लिया—मिट्टी के घरों पर बनी सुंदर पेंटिंग, पुराने जमाने में उपयोग होने वाली चीज़ें, खेतों के बीच से गुजरती कच्ची-पक्की सड़कें, और हर ओर फैली हरियाली। गाँव का यह सरल, पर मनमोहक दृश्य मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था।
शिवम के परिवार से मुलाकात:- आज के समुदाय में काम के दौरान, हमें एडु लीडर द्वारा पढ़ाए जाने वाले एक छात्र, शिवम, के अभिभावकों से मिलने का अवसर मिला। सबसे पहले, हमें शिवम के दादा जी मिले, जिन्होंने बड़े ही स्नेह से हमें घर के अंदर बुलाया और बैठने के लिए कहा। कुछ देर बाद, शिवम की माँ और दादी भी आ गईं।
एडु लीडर, शिवम की माँ से उनकी पढ़ाई को लेकर बात कर रही थीं। उसी दौरान, उनकी दादी, कमला देवी जी, मुझसे बहुत आत्मीयता से बातचीत करने लगीं। उन्होंने मुझसे पूछा—
"बेटी, तुम कहाँ से आई हो?" "तुम्हारा नाम क्या है?" "तुम क्या करती हो, क्या पढ़ाई कर रही हो?"
उनका बात करने का आत्मीय अंदाज मुझे बहुत अच्छा लगा। बातचीत के दौरान, उन्होंने अपने पोते की पढ़ाई को लेकर अपनी इच्छाएँ और विचार साझा किए, जिससे उनकी शिक्षा के प्रति जागरूकता स्पष्ट झलक रही थी।
बातचीत के दौरान, कमला देवी जी ने अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण अनुभव साझा किए, जो मुझे बहुत प्रेरणादायक लगे। उन्होंने बताया कि उनकी शादी 1968 में हो गई थी, लेकिन उससे पहले वे 7वीं कक्षा में फर्स्ट डिवीजन से पास हुई थीं। इसके लिए उन्हें छात्रवृत्ति (scholarship) भी मिली थी, जिससे उन्होंने अपने लिए एक नोज़ पिन खरीदी थी, जिसे वे आज भी पहनती हैं।

उन्होंने आगे बताया कि उनका सरकारी शिक्षिका के पद पर चयन भी हो गया था, लेकिन उनके पति ने उन्हें नौकरी करने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि उस समय घर की बहूओं का बाहर जाकर काम करना समाज में स्वीकार्य नहीं था। हालाँकि, उन्होंने अपने बच्चों और बहू की पढ़ाई को हमेशा प्राथमिकता दी।

उनकी बहू ने शादी के बाद स्नातक पूरा किया और बिहार पुलिस तथा एसएससी की परीक्षाओं के लिए आवेदन भी किया, लेकिन सफल नहीं हो सकीं। इसके बाद, पारिवारिक जिम्मेदारियों में व्यस्त होने के कारण उनकी पढ़ाई छूट गई।

शिक्षा के प्रति जागरूकता और आत्मनिर्भरता

कमला देवी जी की बातचीत में कई अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग सुनकर मैं हैरान रह गई, जैसे अंडरलाइन, सब्जेक्ट आदि। जब मैंने जिज्ञासावश पूछा, तो उन्होंने बताया कि 1980 में जब एक साक्षरता कार्यक्रम आया था, तो वे भी उसमें शामिल हुई थीं। वे गाँव की महिलाओं को घर बुलाकर पढ़ाती थीं, जिससे उन्हें बहुत खुशी मिलती थी।
उनकी सोच, शिक्षा के प्रति जागरूकता, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास ने मुझे बहुत प्रभावित किया। बातचीत के अंत में, उन्होंने मुझसे कहा—
"बहुत दिनों बाद मैंने खुलकर अपने मन की बात की,"
जो सुनकर मेरे मन में उनके प्रति और भी सम्मान बढ़ गया।

जब हम वहाँ से जाने लगे, तो उन्होंने प्यार भरे शब्दों में कहा—
"बेटी, फिर जरूर आइएगा,"

जिससे मुझे बहुत अपनापन और आत्मीयता का एहसास हुआ, जैसे कोई हमारे दोबारा लौटने का बेसब्री से इंतजार कर रहा हो। इस पूरे अनुभव ने मुझे शिक्षा के महत्व और उसके प्रभाव को गहराई से समझने का अवसर दिया। कमला देवी जी जैसी प्रेरणादायक महिलाओं से मिलकर मुझे महसूस हुआ कि सच्ची शिक्षा केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि सोच और जागरूकता में होती है।


स्मृति कुमारी
बड़ी इंटर्न, मुंगेर

Friday, January 31, 2025

शिक्षक का असली उद्देश्य: आरती दीदी की प्रेरणादायक कहानी

यह कहानी इस बात को बेहतरीन उदाहरण है की शिक्षक केवल किताबों तक सिमित नहीं होते, बल्कि वे समाज के हर उम्र और वर्ग के व्यक्ति की मदद ले सकते हैं। आरती दीदी ने जिस तरह से एक जागरुकतमंद महिला की मदद की ओर उसे आत्मनिर्भर बनाया, वह शिक्षा के वास्तविक उदेश्य को दर्शाता है। शिक्षा न केवल ज्ञान देना है, बल्कि आत्मविश्वास और आत्मनिर्भर का निर्माण करना भी है।

आरती दीदी ने उस महिला को न कवक जीवन की नई दिशा दी, बल्कि यह भी सिखाया की किसी भी उम्र में सिखने की प्रकिया समाप्त नहीं होती। यह प्रयास दिखाता है की शिक्षा का दायरा केवल बच्चो तक सिमित नहीं हैं, बल्कि यह जीवन के हर पहलू में व्याप्त है।



इस प्रयास से यह भी समझ आता है की एक छोटी सी मदद किसी के जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकती है। आरती दीदी की यह प्रेरक कहानी हमें यद् दिलाती है की समाज में शिक्षक सिर्फ कक्षा तक ही सिमित नहीं रहती, बल्कि वे बदलाव लाने मार्गदर्शक भी होती हैं। 


इस तरह के प्रयास हमें प्रेरणा देते हैं की हर व्यक्ति के पास समाज में बदलाव लाने की क्षमता होती है, बस जरूरत है हौसले और सही दृष्टिकोण की।

मौसम कुमारी
बडी, मुजफ्फरपुर