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Friday, September 22, 2023

हाथों से छूटा बेलन और हुई Voice & Choice से मुलाकात

आज मैं आप लोगों के साथ एक समर कैंप के अनुभव को साझा करने के लिए आई हूं। यह कैंप शिक्षा के माध्यम से समाज में बदलाव लाने के उद्देश्य से जून माह- 2023 में  हसनपुर गांव में आयोजित किया गया था। हसनपुर NH-2 से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर है, जहां जाने के लिए गाड़ी की भी सुविधा नहीं है क्योंकि यहां 80% SC समुदाय के लोग रहते हैं, जो गया जिले में भुइंया समुदाय से सम्बन्ध रखते हैं।

हमारे संगठन के एडू-लीडर्स द्वारा इस समर कैंप का आयोजन किया था, जिसका “मुख्य उद्देश्य गांव की कक्षा 6-8 के बच्चों में शिक्षा के प्रति रुचि पैदा करना था।”

हाथों में किताबों की जगह बेलन

इस गांव की एक साधारण समस्या थी कि बहुत सी लड़कियां कक्षा के अनुसार पढ़ाई नहीं कर पा रही थीं। इसका मुख्य कारण था कि इन लड़कियों को घर के कामों (खाना बनाना, झाड़ू पोंछा आदि) में लगना पड़ता था। यही कारण है कि उन्हें विद्यालय जाने का अवसर नहीं मिल पाता था, जिस कारण उनमें पढ़ाई के प्रति रुचि नहीं जागृत हो रही थी। 

इस समस्या को समझने के लिए i-Saksham और Pratham ने मिलकर गांव में समर कैंप का आयोजन किया और इसमें एडूलीडर्स की मदद ली गई।

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पता चला शिक्षा का महत्व

सोनाली नामक एक लड़की की माँ एडू-लीडर प्रियांजलि से मिलने आई। सोनाली की माँ ने बताया कि सोनाली को पढ़ने का शौक है, लेकिन सोनाली घर के कामों में इतना व्यस्त रहती है कि उसे पढ़ाई के लिए समय ही नहीं मिलता है। प्रियांजलि ने सोनाली की माँ को समझाते हुए कहा, “एक बेहतर शिक्षा सोनाली के जीवन को समृद्ध बना सकती है, और वो अपने घर के कामों के साथ-साथ अपनी पढ़ाई के लिए भी समय निकाल सकती है।"

इस चर्चा के बाद सोनाली की माँ ने अपने मन में एक नई सोच विकसित की और उन्होंने सोनाली को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया। उसे प्रियांजलि के घर, रोजाना पढ़ने के लिए भेजने का फैसला किया। हालांकि पहले दिन सोनाली एडू-लीडर के सामने काफी झिझक महसूस कर रही थी।

और सोनाली ने सीखा वाक्य निमार्ण

सोनाली को पहले कुछ दिनों तक सिर्फ अक्षर पहचानने में काफी मुश्किल होती थी लेकिन उसकी ईमानदारी और मेहनत से उसका स्तर धीरे-धीरे बढ़ने लगा और वह अक्षर से वाक्य बनाने लगी। धीरे-धीरे वह शब्दों की पहचान करने लगी और वाक्य बनाने में सफल हुई। उसके बाद वह पढ़ने का अभ्यास करने लगी।

इसके बाद प्रियांजलि ने सोनाली की अंग्रेजी विषय में भी मदद की। उसे अल्फाबेट की पहचान करने के लिए विभिन्न गतिविधियों का उपयोग करके अल्फाबेट सीखाया। उसकी प्रगति देखकर प्रियांजलि ने उसे छोटे और बड़े शब्दों की पढ़ाई करवाई, जिससे उसका अधिक विकास हुआ और इसे देख कर सोनाली की मम्मी काफी गर्व महसूस कर रही थी एवं एडू-लीडर के प्रति कृतज्ञ महसूस कर रही थी।

अन्य लड़कियां हुई जागरुक

गणित में भी सोनाली की मदद की गई। उसे गतिविधियों के माध्यम से उसे गिनती, जोड़ और गुणा सीखाया। आज सोनाली गांव की विद्या के प्रति अपने आवश्यक उत्साह और प्रतिबद्धता से स्कूल जाती है। उसका यह प्रयास न केवल उसके जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम बना बल्कि उसने दूसरी गांव की लड़कियों को भी शिक्षा के मार्ग में प्रेरित किया।

इस तरह के प्रतिदिन के अभ्यास से सोनाली की पढ़ाई में सुधार आने लगा और अब वह प्रतिदिन स्कूल जाने लगी है। उसके प्रयासों और समर्पण के बावजूद उसके रास्ते में कुछ बाधाएं थीं लेकिन वह हर मुश्किलों को मात देती रही।

Choice से हुई मुलाकात

एडू-लीडर ने सोनाली को समझाया कि शिक्षा ही उसका भविष्य निर्माण कर सकता है। प्रियांजलि ने उसे समर्थन और प्रेरणा देने में अपना योगदान दिखाया। यह सबकुछ एडू-लीडर के निरंतर संघर्ष के फलस्वरूप हुआ, जो शिक्षा के प्रति एक सकारात्मक रूप से शिक्षिका बनने की भावना से चल रही थी।

इस अनुभव से हमें यह सीखने को मिलता है कि सफलता के लिए उत्साह, समर्पण और मेहनत की आवश्यकता होती है। हम उन प्रत्येक प्रयास को सलाम करते हैं, जो आपको आपकी मंजिल के करीब ले जाते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि आपकी यह सक्रियता और प्रेरणा लड़कियों को शिक्षा की ओर बढ़ाने में मदद करेगी।

इन वाकयों को देखकर मुझे गर्व होता है कि एडू-लीडर पूरी तत्परता के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। इस समर कैंप के माध्यम से समाज के लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता करने का अवसर मिला। हम आशा करते हैं कि इस तरह के और समर्थक कार्यों के माध्यम से हम शिक्षा में सुधार और समाजिक उन्नति को गति देने में योगदान करते रहेंगे।

इस अनुभव को अदिबा ने कलमबद्ध किया है। वे अपने बारे में लिखती हैं- 

मेरा नाम अदिबा है। मैंने इतिहास विषय से साल 2020 में स्नातक पूरा किया है। वर्तमान में मैं आई-सक्षम में बड्डी रोल में काम करती हूं और साथ ही विमेंस डेवलपमेंट में डिप्लोमा भी कर रही हूं। मुझे कार चलाना, मेकअप करना, स्टोरी पढ़ना और चाईनीज़ डिशेज़ बनाना पसंद है। मैं एक IPS ऑफिसर बनना चाहती हूं।


Monday, September 11, 2023

voice & choice के लिए कलम भी बन सकता है एक जरिया

मुजफ्फरपुर बैच 9 की लवली ने अपने कक्षा अवलोकन का अनुभव साझा किया है। वे 17 अगस्त 2023 को बड़ी कोठिया, पंचायत मुशहरी, प्रखंड मुशहरी, जिला मुजफ्फरपुर स्थित ‘उत्क्रमिक मध्य विद्यालय कोठिया दाखिला’ में अपने बैच-9 की एडू-लीडर चुनचुन के स्कूल गई थी। वहां उन्होंने देखा कि एडू-लीडर चुनचुन बच्चों को एक्टिविटी के माध्यम से पढ़ा रही थी। कुछ बच्चे स्वयं आगे आकर अपने साथियों के साथ बोर्ड पर लिखकर चुनचुन द्वारा सिखाए गए गणित विषय में कोणों को बता रहे थे।


जब वे कक्षा अवलोकन कर रही थीं, तो उनकी नज़र लगभग 8 साल की एक बच्ची पर पड़ी। उन्होंने देखा कि चुनचुन उस बच्ची को ऊंगली के इशारों से गिनती सीखा रही थी। वहीं बच्ची अपना सिर हिलाकर "हां" और "ना" में जवाब दे रही थी। लवली उस बच्ची के पास गई और चुनचुन से पहले उस बच्ची का नाम पूछा। चुनचुन ने उन्हें बताया कि उस बच्ची का नाम प्रीती है। 


इशारों के पीछे का रहस्य 


लवली ने फिर चुनचुन से पूछा, “आप इसे इशारों में क्यों पढ़ा रही हैं? इस सवाल के जवाब में चुनचुन ने बताया कि प्रीती बोल नहीं सकती है। इतना सुनने के बाद लवली अचंभित हो गई क्योंकि चुनचुन द्वारा किये जा रहे इशारों को प्रीती बहुत अच्छे से समझ रही थी। साथ ही सलीके से और बिल्कुल सही-सही लिख भी रही थी। लवली भी उस बच्ची के पास जाकर बैठी गईं और प्रीती को 1 से 10 तक की गिनती इशारों में बताया। इसके बाद प्रीती ने लवली द्वारा सीखाये गये गणित की गिनती को कॉपी में लिखकर भी दिखाया। 


प्रीती और लवली एक साथ काफी घुल-मिल गये थे। चुनचुन ने लवली को बताया कि प्रीती प्रतिदिन स्कूल आती है और उसे पढ़ने की बहुत इच्छा है। बातों-बातों में चुनचुन थोड़ी भावुक भी हो गई। उनका कहना था कि कोठिया गांव के सभी बच्चे स्कूल आते हैं मगर यहां बच्चों को घर पर पढ़ने की सुविधा नहीं हैं, क्योंकि इस गांव में अधिकतर बच्चों में किसी ना किसी की मम्मी नहीं हैं, तो किसी के पापा नहीं। साथ ही बच्चों के साथ समय बिताते-बिताते उनके साथ जुड़ाव हो जाना लाजिमी है। 


लवली और प्रीती



आवाज़ उठाने के लिए कलम


लवली ने महसूस किया कि चुनचुन के अंदर नेतृत्व करने और हर परिस्थिति का हल निकालने की दक्षता आ गई है। चुनचुन चाहती हैं कि वे हर बच्चे को ना केवल शिक्षित कर सकें बल्कि स्मार्ट गोल कैसे बनाते हैं, अपनी आवाज़ कैसे रखते हैं, ये सारे गुर सीखा सकें। लवली के अनुसार चुनचुन ने प्रीती के अंदर लेखन का बीज बोया है, जिसकी मदद से प्रीती इतना तो जान गई है कि जो लोग बोल नहीं पाते हैं, वे भी अपनी आवाज़ उठा सकते हैं। इसके लिए कलम ही उनका हथियार है, जिसे चुनचुन को प्रीती को बखूबी समझाया है। 


हम उम्मीद करते हैं कि voice & choice का ये सिलसिला अनवरत चलता रहे। कहीं बोल कर तो कहीं लिख कर लेकिन कारवां रुकना नहीं चाहिए। इक कड़ी में दुष्यंत कुमार की पंक्तियां याद आती हैं, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

Wednesday, June 28, 2023

क्या सीमा का निर्णय सही था? अगर आप उनकी जगह होते, तो आपका निर्णय क्या होता?


नामांकन कराती सीमा


हर दिन की तरह आज भी आमस प्रखंड के नीमा गांव की रहने वाली सीमा सुबह-सुबह बच्चियों के नामांकन हेतु गांवों के निरीक्षण के लिए निकल पड़ी। आज सीमा अकेली नहीं थीं बल्कि उनके साथ उनकी एक सहयोगी भी मौजूद थी इसलिए गंतव्य पर पहुंचने के दौरान दोनों ने आपस में विचार विमर्श किया कि क्यों न समय को ध्यान में रखते हुए दो साथी दो अलग-अलग स्कूलों में चले जाएं। इस बात पर सहमति बनने के बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए मगर मंजिल एक रही अनामांकित बच्चियों का नामांकन। 


सीमा ने शेरघाटी ब्लॉक के बार गांव का सर्वे पहले किया था इसलिए उन्हें जानकारी थी कि वहां पर दो स्कूल हैं। पहला, एक प्राथमिक विद्यालय बार स्कूल और दूसरा मध्य विद्यालय बार हुसैनगंज स्कूल है। सर्वे के दौरान उन्हें पता चला था कि बार के पोषक क्षेत्र वाले बच्चे बार के ही स्कूल में नामांकन करवाते हैं और वार हुसैनगंज वाले पोषक क्षेत्र वाले बच्चे वार हुसैनगंज में ही नामांकन करवाते हैं इसलिए सीमा प्राथमिक विद्यालय बार में बच्चों के नामांकन के लिए चली गई। साथ ही अपने साथ आईं सहयोगी अंजना ने मध्य विद्यालय वार हुसैनगंज में बच्चों के नामांकन की कमान संभाली। 


जब सीमा बच्चों और उनके अभिभावकों को लेकर बार स्कूल में पहुंची तो वहां उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। प्राथमिक विद्यालय बार स्कूल के हेडमास्टर ने कहा, “आज हम नामांकन नहीं लेंगे।” हालांकि ये स्थिति पहली दफा नहीं थी बल्कि कई बार सीमा ने ऐसी चुनौतियों का सामना किया था इसलिए वे स्पष्ट थी कि इन चुनौतियों के बाद नामांकन हो ही जाएगा इसलिए उन्होंने हेडमास्टर को समझाने का प्रयास किया और कहा, “सर, नामांकन ले लीजिए।” सीमा के इतना कहते ही हेडमास्टर ने कहा, “ऐसे कैसे लेंगे नामांकन? क्योंकि अब तो नामांकन ऑनलाइन होता है और जब तक बच्चे का सारा डॉक्यूमेंट हमारे पास उपस्थित नहीं होगा, तब तक नामांकन नहीं लेंगे।” 


इतना सुनने के बाद सीमा ने कहा, सर, मुझे भी एस आर नंबर लेना रहता है। इस पर हेडमास्टर ने तल्ख मिजाज में कहा, कोई बात नहीं। आप किसी दूसरे दिन आकर ले लीजिएगा। इस पर सीमा ने कहा, नहीं सर। आज ही नामांकन करवाएंगे और एस आर नंबर किसी दूसरे दिन लेने आएंगे। मुझे आज ही एस आर नंबर नहीं लेना है बल्कि नामांकन कराना है। इसपर हेडमास्टर ने कहा, ठीक है। आधार कार्ड का फोटो कॉपी करवा कर लाइए। सीमा तुरंत आधार कार्ड की कॉपी करवाकर ले आईं लेकिन तब भी उन्हें 15 मिनट तक इंतजार कराया गया मगर तब भी नामांकन के लिए नहीं बुलाया गया। इस पर सीमा ने हेडमास्टर से मिल कर उन्हें कहा, सर, मैं 20 मिनट तक इंतजार कर लूंगी लेकिन मुझे अब नामांकन और एस आर नंबर आज ही चाहिए। अंततः हेडमास्टर को बच्ची का नामांकन करना पड़ा और सीमा के इतने प्रयास के बाद बच्ची का एस आर नंबर भी मिला। इस प्रकार सीमा ने प्राथमिक विद्यालय बार में दो लड़कियों का नामांकन करवाया। 


इसके बाद सीमा के अंदर आत्मविश्वास जाग उठा और अब वे बार हुसैनगंज स्कूल में नामांकन के लिए चल पड़ी। सीमा जैसे ही स्कूल के पास पहुंची तब अंजना का फोन आया। फोन के दूसरी ओर से आवाज आई, दीदी, आज सर नामांकन नहीं लेंगे। इस पर सीमा ने अंजना से कहा, कोई बात नहीं। मैं अभी स्कूल ही पहुंचने वाली हूं। 


सीमा ने जैसे ही स्कूल में कदम रखा, उन्हें उनकी पहली चुनौती मिल गई। हेडमास्टर गेट के पास ही खड़े थे। सीमा ने उनका अभिवादन किया लेकिन हेडमास्टर ने बिना अभिवादन का जवाब दिए ही प्रश्नों की बौछार कर दी और पूछा, “आप भी आई सक्षम से ही आए हैं?” इस पर सीमा ने हामी भरी। इस पर हेडमास्टर ने कहा, ठीक है। आप अंदर जाकर बैठिए।” इसके बाद सीमा अंदर जाकर बैठ गईं, तभी हेडमास्टर ने कमरे में कदम रखते हुए ही पूछा, आपको भी नामांकन करवाना है? सीमा ने हामी भरी और कहा, जी हां सर। आज ही नामांकन करवाना है। उन्होंने दोबारा सुनिश्चित करने के लिए पूछा कि सच में आज ही नामांकन कराना है, तो सीमा ने ढता से जवाब दिया कि जी हां, आज ही नामांकन कराना है। 


इस पर हेडमास्टर ने कहा, ठीक है। अभी मेरे पास एक भी एडमिशन का फॉर्म नहीं है, तो इसे आप फोटो कॉपी करवा कर लाइए और इसे भरिए तभी एडमिशन आज के डेट में लेंगे। अन्यथा जब तक हमारे पास 5 बच्चे एक साथ उपस्थित होंगे तब तक एडमिशन नहीं लेंगे। इतना सुनने के बाद सीमा ने स्वयं जाकर फॉर्म का फोटो कॉपी करवाया और लाकर उसे भरकर दे दिया। 


सीमा द्वारा इतना कार्य करने के बाद हेडमास्टर ने दोबारा कहा, आप तो एडमिशन करवा कर चले जाइएगा लेकिन बच्चे नहीं आएंगे इसलिए बच्चे के विद्यालय नहीं आने पर जिम्मेदारी आपकी होगी क्योंकि पहली कक्षा में भी आपने कई बच्चों का एडमिशन करवा लेकिन एक भी बच्चे उपस्थित नहीं होते हैं इसलिए आप आवेदन लिखिए और इसमें अपना हस्ताक्षर करिए। इसके साथ ही अपने संस्था का नाम लिखिए और बच्चों के अभिभावक से भी रोज आने के लिए हस्ताक्षर करवाइए, तभी हम आज एडमिशन करेंगे अन्यथा नहीं करेंगे। 


इस पर भी सीमा राजी हो गई और कहा, ठीक है सर। अंततः सीमा ने लिखित आवेदन दे दिया मगर सीमा के मन में उधेड़बुन थी कि ये आजतक की सबसे बड़ी चुनौती थी लेकिन वे खुश थी कि उन्होंने मध्य विद्यालय  हुसैनगंज में 4 बच्चियों का नामांकन करवाया। 


इसके बाद सीमा ने हेडमास्टर को धन्यवाद बोलते कहा और अपने दूसरे गंतव्य की ओर बढ़ गईं। जैसे-जैसे सीमा के कदम आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे मन में सवालों का बवंडर उठ रहा था लेकिन वे समझ नहीं पा रही थी। अचानक सीमा के मन में मन में विचार आया कि दूसरे गांव में भी नामांकन के लिए चले जाते हैं। इसके बाद सीमा महमदपुर गांव में बच्चों के नामांकन के लिए चल पड़ी। यहां भी उन्हें सर्वे करने का फायदा हुआ क्योंकि उनके पास उन बच्चियों के अभिभावकों का नंबर और अन्य जानकारी थी, जिनका नामांकन नहीं हो सका था इसलिए उन्हें तुरंत अपना फोन निकाला और एक नंबर डायल किया।


उन्होंने एक अभिभावक को कॉल करके अपने बच्चे को लेकर महमदपुर स्कूल में लेकर आने के लिए कहा। अभिभावक भी अपने बच्चे को लेकर महमदपुर स्कूल में पहुंच गए। स्कूल पहुंचते ही एक शिक्षक ने पूछा, क्या आप लोगों का भी कोई प्रोग्राम करना है क्योंकि अभी-अभी प्रथम कक्षा वाले प्रोग्राम कर रहे हैं। इस पर सीमा ने कहा, नहीं सर। मुझे तो बच्चे का नामांकन करवाना है। इस पर उन्होंने कहा, ठीक है। आप जाकर हेडमास्टर से बातचीत कीजिए। 


सीमा ने हेडमास्टर से बातचीत करके और सारे कागजात देकर 3 बच्चियों का नामांकन कराया। सीमा और हेडमास्टर के बीच बातचीत चल ही रही थी कि हेडमास्टर ने थोड़ा रूक कर कहा, आप इतनी मेहनत दूसरों की बच्चियों के लिए कर रही हैं क्योंकि ईट-भट्टे पर काम करने वाले अभिभावक आने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि वो शिक्षा के प्रति जागरूक नहीं है और आप ईट-भट्टे पर जाकर माता-पिता का हाथ पकड़ कर उनके बच्चों का नामांकन करवा रहे हैं। इतना कोई भी नहीं कर सकता है। आप इतनी मेहनत कर रही हैं। दूसरे के बच्चे के उज्जवल भविष्य के लिए आपके मेहनत का वर्णन नहीं किया जा सकता है। इतना तो हम लोग टीचर हैं फिर भी नहीं कर सकते हैं, जितना आप कर रही हैं। ठीक इसी प्रकार जैसे आप बच्चियों का नामांकन करवा रही हैं, ठीक उसी प्रकार आप अपना पता और फोन नंबर दीजिए।” 



इतना सुनने के बाद सीमा ने सवालिया निगाहों से देखते हुए पूछा, “लेकिन क्यों सर?” इस पर हेडमास्टर ने कहा, “आप जिस बच्चे का नामांकन करवाए हैं, अगर वह बच्चा विद्यालय में अनुपस्थित रहेगा तो आपके पास तुरंत कॉल जाएगा। जिस तरीका से आप अभी इनके ईट-भट्टे पर से लाकर एडमिशन करवा रहे हैं, ठीक उसी प्रकार विद्यालय के समय बच्चे के विद्यालय में उपस्थित नहीं रहने पर आप आकर बच्चे को स्कूल में उपस्थित करवाइएगा।” 


सीमा मौन रही लेकिन बच्चियों का चेहरा देखकर उन्होंने अपना पता और नंबर तो साझा कर दिया और उन्होंने 3 विद्यालयों में 9 बच्चियों का नामांकन कराया लेकिन अपनी निजी जानकारी साझा करने और लिखित में घोषणा-पत्र देने के कारण सीमा चिंतित हैं क्योंकि अगर कोई बच्ची स्कूल नहीं जाएगी, तो उन्हें दोषी ठहराया जाएगा। भले ही सीमा ने नामांकन और जागरूक करने का बीड़ा उठाया हो लेकिन क्या बार-बार सीमा को कॉल करना और बच्चों के अनुपस्थित रहने पर जिम्मेदार ठहराना सही है और क्या सीमा का निजी जानकारी साझा करना सही है जबकि सीमा ने तो समाज में बदलाव के लिए झंडा उठाया है? 

Wednesday, June 21, 2023

सीमाः ऑटो ना मिलने के कारण पैदल चलना पड़ा लेकिन कम नहीं हुआ हौसला

साल 2023 में NGO प्रथम द्वारा 17वीं वार्षिक शिक्षा रिपोर्ट (ASER), 2022  के अनुसार कोविड-19 के दौरान आर्थिक तंगी के कारण लड़कियां स्कूल जाने से वंचित हो गई और कई लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी गई। साथ ही रिपोर्ट बताती है कि स्कूलों में गैर-नामांकित 11-14 आयु वर्ग की लड़कियों के अनुपात में साल 2018 के 4.1% से 2022 में 2% की कमी एक महत्त्वपूर्ण सुधार और सकारात्मक विकास है। यह इंगित करता है कि शिक्षा में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के प्रयास प्रभावी रहे हैं और इससे स्कूलों में लड़कियों के नामांकन को बढ़ाने में मदद मिली है। 


हालांकि ग्रामीण इलाकों की बात करें तो वहां शिक्षा के स्तर में अब भी व्यापक बदलाव की आवश्यकता है, जिसे MAITRI प्रोजेक्ट के जरिए सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है। i-Saksham के तत्वधान में चलाए जा रहे MAITRI प्रोजेक्ट के जरिए एडूलीडर्स गांवों-कस्बों एवं दुर्लभ परेशानियों का सामना करते हुए अनामांकित बच्चियों का दाखिला सरकारी विद्यालयों में करा रहे हैं। ये एडू-लीडर्स मुंगेर, जमुई एवं गया के ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय हैं, जो विभिन्न चरणों में अनामांकित बच्चियों की पहचान करके उन्हें शिक्षा से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। 


इस कड़ी में वे सबसे पहले सर्वे करते हैं, जिसमें वे घर-घर जाकर अनामांकित बच्चों को चिह्नित करते हैं एवं अभिभावकों को समझाने का प्रयास करते हैं। एडू-लीडर्स उन्हें शिक्षा की महत्ता बताते हैं, सरकारी योजनाओं की जानकारी देते हैं एवं जरूरी कागजातों को इक्ट्ठा करते हुए बच्चियों का नामांकन नजदीक के विद्यालय में कराते हैं। 


नामांकन कराती सीमा



और पैदल चल पड़ी सीमा 


सीमा दिनांक 27/5/2023 दिन शनिवार को सुबह 5:30 बजे दिनचर्या एवं घर के कामों को निपटाकर अनामांकित लड़कियों के नामांकन के लिए ढाबचिरैया के लिए चल पड़ी। जब वे शेरघाटी पहुंची, तो उन्होंने ओटो रिजर्व करने का निर्णय लिया क्योंकि गांव की दूरी अधिक होने के कारण रास्ता काफी कठीन था लेकिन दुर्गम रास्ता होने के कारण ओटो भी वाला तैयार नहीं हुआ। 


ऑटो ना मिलने और रास्ता कठीन होने की बात को दरकिनार करते हुए सीमा ने बिना किसी का इंतजार किए पैदल ही चलने का निर्णय लिया। इतने में कुछ ही दूर जाने के बाद उन्हें एक और ओटो वाला दिखा, जिससे उन्होंने बात करने की कोशिश की और कहा, भईया, ज्यादा दूर नहीं जाना है। आप बीच रास्ते में एक स्कूल पड़ता है। आप मुझे बीच रास्ते में ही उतार दिजिएगा। बार-बार कहने के बाद ऑटो वाले ने हामी भरी और सीमा स्कूल पहुंच गईं।


अनामांकित बच्चों का हुआ नामांकन 


स्कूल पहुंचने के बाद उन्होंने देखा कि उस समय तक एक भी टीचर उपस्थित नहीं थे। स्कूल में केवल बच्चे थे। इस दौरान सीमा ने सोचा कि क्यों न गांव में जाकर बच्चों के अभिभावकों से मिलकर बातचीत की जाए। इसके बाद वे ढाबचिरैया गांव में जाकर बच्चों के अभिभावकों से मिलकर बातें करने लगी और उसके बाद वे टोला कुशी में आ गई। 


वहां भी बच्चों के अभिभावकों से मिलकर बातचीत करके दोबारा स्कूल में पहुंची, तब तक प्रिंसिपल सर भी आ चुके थे। उन्होंने प्रिंसिपल से मिल कर नामांकन के लिए बात चीत की और उन्होंने 8 बच्चों का नामांकन कराया, जिसमें 2 लड़कियां और 4 लड़के शामिल थे। 


सीमा के ऑटो ना मिलने की समस्या यहां भी थी लेकिन उन्होंने हार ना मानते हुए ढाबचिरैया स्कूल से काफी दूरी बसे एक गांव के घुजी स्कूल में पहुंच गई। वहां भी उन्होंने बच्चों के माता-पिता से मिलकर नामांकन के लिए प्रोत्साहित किया और 2 अनामांकित लड़कियों का घुजी स्कूल में नामांकन करवाया गया।  


सीमा ने सुबह-सुबह की अपने घर की चौखट को अनामांकित लड़कियों एवं लड़कों के नामांकन के लिए पार किया था और उनका यह प्रयास दिन ढलते-ढलते यर्थाथ में तब्दील हो रहा था।

 

Monday, May 29, 2023

एडूलीडर बुलबुल के जीवन में 18 वर्ष बाद लौटी शिक्षा, i-Saksham के प्रशिक्षणों से दृढ़ हुआ आत्मविश्वास

i-Saksham के बैच-7 की एडूलीडर बुलबुल कुमारी ने i-Saksham के साथ अपना अनुभव साझा किया है, जिसमें उन्होंने अपनी यात्रा का वर्णन किया है कि किस तरह से उन्होंने संघर्ष किया और एक बार उम्मीद टूटने के बाद i-Saksham के सहयोग से कैसे उन्होंने अपने आत्मविश्वास को पहचाना और अपने पैरों पर उठ खड़ी हुईं। 

बुलबुल ने i-Saksham को बताया कि उनकी  शादी साल 2003 में ही हो गई थी और उस साल वे 12वीं कक्षा में थीं। उनकी शादी एक ऐसे परिवार में हुई, जहां शिक्षा को लेकर लोगों का रवैया उदासीनता से भरा था। साथ ही गांव-समाज के लोगों में भी शिक्षा का बहुत आभाव था। 

उनके परिवार में कोई भी शिक्षित व्यक्ति नहीं था, जिनसे वे अपने मन की व्यथा बोल पाती और समझा पातीं कि उन्हें पढ़ने की इच्छा है। यही कारण रहा कि उनकी पढ़ाई रुक गई। साथ ही पारिवारिक स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं थी इसलिए उन्होंने भी अपने अरमानों को दबा दिया और चेहरे पर मुस्कान बिखेर कर रहने लगी। 

आसपास के बच्चों को पढ़ाया

इसके बाद घर की जिम्मेदारी बढ़ी और वे घर-गृहस्थी में इस कदर उलझी कि उन्हें पढ़ाई या पढ़ने के बारे में ख्याल ही नहीं आया। उनके अन्दर पढ़ने की ललक खत्म होते चली गई लेकिन पढ़ाने का एक शौक था इसलिए उन्होंने कुछ सालों बाद आसपास के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।

i-Saksham से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि साल 2006 में उन्हें एक निजी विद्यालय में पढ़ने का मौका मिला, जिसमें वे केवल एक साल पढ़ सकीं क्योंकि उसी साल उनकी मां का देहांत हो गया, जिस कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी।

एक लंबे अंतराल के बाद साल 2011 में उन्हें एक आवासीय विद्यालय में पढ़ने का मौका मिला, जो पहाड़ के किनारे पर स्थित था, जिसे आम बोलचाल की भाषा में संथाली इलाका भी कहा जाता है। यह विद्यालय भी केवल 11 महीने ही चला फिर बंद हो गया। राह में आने वाली इन रुकावटों ने कहीं ना कहीं उनके पढ़ने की ललक को तोड़ने का काम किया और उन्हें लगने लगा कि अब वे नहीं पढ़ पाएंगी।

i-Saksham टीम से मुलाकात

एक दिन उन्हें उस स्कूल के शिक्षक का कॉल आया, जिसमें वे शुरुआती दिनों में पढ़ाया करती थी। शिक्षक ने कॉल करके कहा, अगर अभी आप कुछ नहीं कर रहे हैं, तो मेरे विद्यालय में आकर पढ़ाइए। इसके बाद मैंने साल 2017 से पढ़ाना शुरू किया और लगातार 3 सालों तक पढ़ाया। 

उन्होंने आगे बताया कि एक रोज जीवन में एक बड़ा बदलाव आया, जब सबकुछ ठहर सा गया। यह साल 2020 की बात है, जब i-Saksham के टीम के दो सदस्य ‘संजय भैया’ और ‘धरमवीर सर’ उनके घर आए और यही वक्त था, जब वे i-Saksham से जुड़ी। इस वाकये के बारे में उन्होंने कहा, मेरे लिए वो पल शायद मेरी जिंदगी का एक एतिहासिक पल रहा क्योंकि एक ओर मुझे कई बार रुकावटों का सामना करना पड़ा तो वहीं दूसरी ओर मैं अब नया मुकाम हासिल करने की दिशा में बढ़ने वाली थी।”

पति ने भी किया सहयोग

कुछ महीनों के बाद ही उन्हें अपने अन्दर एक बदलाव महसूस हुआ।  i-Saksham के तत्वधान में उन्हें कई तरह के प्रशिक्षण हासिल हुए, जिससे उन्होंने ना केवल शिक्षा बल्कि अन्य हिस्सों पर भी अमल किया। एक रोज i-Saksham के एक सेशन के दौरान उन्हें IGNOU के बारे में पता चला और उनके अन्दर से इक आवाज़ आई कि हां, मैं भी पढ़ सकती हूं लेकिन उन्हें डर भी था क्योंकि पढ़ाई छोड़े हुए उन्हें 18 साल हो गए थे। 

उनके मन में कई सवाल थे कि अब मैं कैसे पढूंगी, मुझे कुछ समझ में भी नहीं आएगा लेकिन जीवन के इस पड़ाव पर उनके पति ने भी उनका सहयोग किया और उनका ढ़ांढस बढ़ाते हुए कहा कि तुम पढ़ो और अपना नामांकन करवा लो। साथ ही इस सफर में i-Saksham के बड्डी ने भी उनका साथ दिया। 

आज बुलबुल बीए बार्ट-2 की विद्यार्थी हैं और i-Saksham के साथ बतौर एडूलीडर कार्य भी कर रही हैं, जिसका उद्देश्य लड़कियों को समाज में पहचान दिलाया और हर एक लड़की को VOICE AND CHOICE से जोड़ना भी है ताकि लड़कियां अपनी जिंदगी के निर्णय स्वयं ले सकें और अपनी आवाज़ उठा सकें। 


नोट- यह अनुभव बुलबुल कुमारी की अनुमति मिलने के बाद साझा की जा रही है।