Saturday, October 5, 2024

पहली बार प्राइम बुक का उपयोग किया

मेरे क्लस्टर का नाम “हौसलों की उड़ान” है। मुझे जब मेरे क्लस्टर से प्राइम बुक मिलने वाली थी तब मैं बहुत खुश थी, बहुत उत्सुक भी थी। साथ ही साथ थोड़े असमंजस में भी थी क्योंकि मुझे पता नहीं था कि इसमें क्या करना है? इसका उपयोग कैसे होगा? 

इसकी समझ बनाने के लिए मैंने अपनी बडी (राधा दीदी) से मदद ली। उन्होंने मुझे बताया कि मैं इसमें अपना परिचय, टूल्स में से रंग भरना, चित्र बनाना, कहानी इत्यादि चीजों के बारे में जान सकती हूँ।


दस-बारह दिन लगातार उपयोग करने के बाद मैंने प्राइम बुक में अपना परिचय लिखना सीख लिया है। शब्दों को बोल्ड, इटैलिक, हैडिंग देना, फ़ॉन्ट्स में रंग भरना, टेक्स्ट को कॉपी-पेस्ट करना, फॉन्ट्स की भाषा और साइज़ छोटा-बड़ा करना भी सीखा है। 


मुझे नहीं लगा था कि मैं इतना जल्दी प्राइम बुक का उपयोग करना सीख जाउंगी और मुझे यह भी पता चला कि प्राइम बुक एक छोटा सा कंप्यूटर टाइप ही है।



नुसरत खातून 

बैच-10, मुज़फ्फरपुर


नीतू की कोशिशों को शिक्षिका ने सराहा

जब मैं मनिका मुर्रा विद्यालय में गई, तो मेरी मुलाकात संजना मैडम से हुई। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि पहले नीतू अपने कक्षा में बच्चों से गतिविधियों के माध्यम से कम जुड़ पाती थीं। लेकिन अब नीतू बच्चों को विभिन्न प्रकार की गतिविधियों से जोड़ रही हैं। गतिविधियों में कुछ बालगीत अहम हैं, जैसे "बारिश आई छम-छम," "हाथी राजा बहुत बड़े," "मम्मी मुझसे प्यार करती, कितना गहरा" जैसी कविताओं के माध्यम से बच्चों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं।

नीतू अब गणित के पाठ को और अधिक रोचक बनाने के लिए जमीन पर डिब्बे बनाकर बच्चों को गिनती सिखाने का प्रयास करती हैं। संजना मैडम ने बताया कि नीतू अब पहले से कहीं अधिक उत्साहित रहती हैं और उनका जुड़ाव बच्चों से गहरा हुआ है। साथ ही, नीतू और संजना मैडम के बीच भी बेहतर तालमेल बन गया है, जिससे नीतू के प्रयास और अधिक प्रभावशाली हो गए हैं।

स्वाति
बडी, मुजफ्फरपुर 


Thursday, October 3, 2024

"मेरी गांधी फेलोशिप यात्रा"

मेरा नाम अनन्या है और मैं गांधी फेलोशिप की एक छात्रा हूँ। मैं अपने गांव की पहली लड़की हूँ जो मध्यमवर्गीय परिवार से होकर गांव में रहकर ही गांधी फेलोशिप करने के लिए दूसरे राज्य में गई हूँ। मेरे लिए यह रास्ता चुनना आसान नहीं था, लेकिन मैंने हिम्मत की और आज मैं छत्तीसगढ़ में एक गांधी फेलो हूँ।

मैंने गांधी फेलोशिप का फॉर्म भरा और ऑनलाइन इंटरव्यू दिया। मुझे फाइनल राउंड इंटरव्यू के लिए पटना जाना था, जो मेरे लिए थोड़ा मुश्किल लग रहा था। लेकिन मैंने हिम्मत की और इंटरव्यू दिया। कुछ समय बीतने के बाद, मुझे पता चला कि मेरा सिलेक्शन हो गया है और मुझे छत्तीसगढ़ राज्य मिला है।

मैं घर गई और अपने माता-पिता को बताई, लेकिन मेरी मम्मी ने साफ मना कर दिया कि उतना दूर नहीं जाना है। मैं बहुत उदास हो गई, लेकिन मैंने हिम्मत की और अपने पापा को समझाया। पापा तो मान गए, लेकिन मेरे लिए मम्मी को मनाना बहुत मुश्किल हो रहा था। लेकिन आखिरकार, मम्मी भी मान गईं।


मैं श्रवण सर से बात की और उनसे अपने सारे सवालों का जवाब मिल गया। श्रवण सर ने मुझे बहुत हिम्मत दी और कहा कि अगर मन नहीं लगा तो वापस i-सक्षम चली आना। तुम i-सक्षम की सदस्य हो, तुम लिए i-सक्षम हमेशा रहेगा।


अब मुझे इंडक्शन सेशन के लिए राजस्थान जाना था। मैंने i-सक्षम में जो भी चीजें सीखी हैं, उससे मुझे गांधी फेलोशिप के सेशन को समझने में बहुत आसानी हो रही थी। मैं राजस्थान में असेंबली के दौरान 120 लोगों को चेतना गीत और एक्टिविटी करवाई। मुझे एक बात याद आ गई कि जब मैं जमुई में अपने बैच में एक बार मैत्री वाले एडु लीडर  को फैलोशिप के बारे में बताने के लिए सेशन में खड़ी हुई थी, तो तब मेरे हाथ पैर बहुत काप रहे थे और अब मैं 120 लोगों के बीच भी आत्मविश्वास के साथ बोल भी लेती हूँ, एक्टिविटी भी करवा लेती हूँ। मेरे जीवन में यह सारे बदलाव i-सक्षम की वजह से आया हैं। मैं i-सक्षम को दिल से बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहूंगी।

अनन्या 

बडी इन्टर्न 


Friday, September 6, 2024

अपने परिवार और भविष्य के लिए मेरी योजना- निशा

नमस्ते साथियों, 

मैं, पिछले एक वर्ष से क्या कर रही हूँ और आने वाले तीन-चार वर्षों में अपने आप को कहाँ देखना चाहूँगी- इन विषयों पर अपनी वर्तमान की योजना और मनोभाव साझा कर रही हूँ।

साथियों, मैं एक मिडिल क्लास (middle class) परिवार से हूँ। घर में मेरे माता-पिता के अलावा मेरे दो छोटे भाई और अंकल हैं, कुल मिलाकर घर में 10 लोग हैं। कमाने वाले सिर्फ मेरे पापा ही हैं। दोनों भाई अभी पढ़ाई कर रहे हैं। पापा, जम्मू-कश्मीर में एक गैर-सरकारी जॉब में कार्यरत हैं। अंकल की तबियत खराब रहने से वो कोई जॉब नहीं करते हैं। मैं करीब एक वर्ष से ज्यादा समय से i-सक्षम के साथ जुड़ी हूँ। 

मुझे i-सक्षम के सहयोग से कुछ आर्थिक मदद भी मिलती है और बहुत सारे ऐसे कौशल भी सीखने को मिलते हैं जो मेरे लिए सीखना बहुत आवश्यक है। यहाँ पर सिखाई जाने वाली चीजें मुझे आगे बढ़ने में मदद कर रही हैं। जैसे- आत्मनिर्भर बनना, बेझिझक किसी से प्रश्न करना, स्वयं के साथ कुछ गलत हो उससे पहले आवाज़ उठाना आदि। मैंने अपने मम्मी-पापा को भी इतना विश्वास दिला दिया है कि अकेले घर से बाहर आने-जाने पर भी उनके मन में मेरे लिए कोई नकारात्मक विचार ना आये और ना ही कोई उन्हें मेरे विरुद्ध भड़का सके।

मुझे विश्वास है कि जैसे ही मेरे अंकल की तबियत ठीक हो जायेगी तो हमारी आर्थिक दशा थोड़ी सुधरेगी। अभी तो बहुत सारा रुपया उनकी दवाइयों में ही लग जाता है। मैं आगे आने वाले तीन-चार वर्षों में खुद को परिवार में एक अहम भूमिका के रूप में देख रही हूँ। अपने कार्यक्षेत्र में भी मुझे अपनी पहचान बनानी है। मैं सरकारी, गैर-सरकारी किसी भी क्षेत्र में अपनी सेवा देने के लिए तैयार हूँ। मैंने घर में ही बहुत स्ट्रगल (struggle) देखा है। मैं अपनी कम्युनिटी की लड़कियों के लिए एक रोल-मॉडल बनना चाहती हूँ, उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहती हूँ। मैं उन सभी लड़कियों को बताना चाहती हूँ कि आपको यदि कुछ आगे बढ़ा सकता है तो वो है सिर्फ और सिर्फ मेहनत और कड़ी मेहनत! बिना मेहनत के कुछ भी संभव नहीं है। आप जितना मेहनत करेंगे उतना ही आगे बढ़ेंगे।


एक चेतना गीत की पंक्तियाँ भी हैं: 

कड़ी मेहनत से ही इन्सान का चेहरा चमकता है, 

कि सोना आग में तप कर ही कुंदन सा दमकता है 

करें वैसे हीं मेहनत....

सवाँरे रूप भारत का...


कि जैसे चाँद आकर चाँदनी के फूल बरसाता,

के जैसे मेघ आ करके घड़ों में नीर भर जाता

करें वैसे हीं हम मेहनत....

सवाँरे रूप भारत का...

निशा कुमारी 

बैच 10, गया 


अब पापा ने शादी के लिए दबाव बनाना छोड़ दिया है- रूचि

नमस्ते साथियों, 

आज मैं आप सभी के साथ मुंगेर के फरदा गाँव की रहने वाली ‘रूचि’ के बारे में कुछ साझा करना चाहती हूँ। रूचि, बहुत ही शर्मीली और खुशनुमा लड़की हैं जो वर्तमान में i-सक्षम संस्था में बैच-दस की एडु-लीडर हैं। उनकी पढ़ाई में विशेष रूचि है। 


रूचि के घर में रूचि के अलावा उनके पापा, दो भाई और एक बड़ी बहन है। बड़ी बहन की शादी हो चुकी है और पापा शहर में काम करके परिवार का पालन-पोषण करते हैं।


जब रूचि बारहवीं कक्षा (2022) में थी, तब उनकी माँ का देहावसान हो गया। उनकी माँ का गुज़र जाना उनके लिए असहनीय और भयावह था। अपने अंधेरे भविष्य की कल्पना मात्र से रुचि के रोंगटे खड़े हो जाते और आत्मा थर्रा उठती थी। ऐसी विकट परिस्थिति में किसी भी व्यक्ति के लिए खुद को संभाल पाना मुश्किल ही होता है। रूचि ने किसी तरह अपना साहस कायम रखा और पढाई को जीवन जीने का हथियार बनाते हुए, बारहवीं की परीक्षा दी। वो प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण भी हुई। 


रुचि की माँ के गुजर जाने के बाद पूरे घर की जिम्मेवारी रुचि पर आ गई। उन्होंने अपने छोटे भाइयों और घर की देखभाल के साथ अपनी पढ़ाई भी ज़ारी रखी। रूचि वर्तमान में (2024) बी. ए. पार्ट-II की पढ़ाई कर रही हैं। 


घर में बिन माँ की अकेली लड़की होने के कारण समाज, परिवार और सगे-सम्बन्धियों का रूचि की शादी को लेकर दबाव बनाना शुरू हो गया था। लोग तरह-तरह से यही बात रूचि के और उनके पिता जी के सामने रखते थे। जैसे- घर में बिना माँ के लड़की कैसे रहेगी? कौन देखेगा? कैसे सबकुछ हो पाएगा? कुछ हो गया तो? इन्हीं सब बातों का रूचि के मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगा। जिसके कारण रुचि हमेशा परेशान रहने लगी और अन्दर ही अन्दर रोती भी रहती थी। 


एक दिन रुचि ने सोचा कि अब खुद के लिए निर्णय लेना ही पड़ेगा। उसने मन बनाया कि मैं अपने भविष्य को ध्यान में रखते हुए, अपनी आगे की पढ़ाई को लेकर पापा से खुद बात करूंगी। उनके सामने बात रखूंगी कि मुझे अभी शादी नहीं करनी है! क्योंकि मेरा मन पढाई में लगता है, मुझे अपनी पढ़ाई पूरी करनी है, जिसके लिए मुझे दो साल का समय चाहिए ताकि मैं अपने अपने पैरों पर खड़ी हो सकूँ। 


रुचि को इस बात का डर भी था कि मेरी बात तो घर में सुनी नहीं जाती है। मैं पापा के सामने कैसे बोलूँगी? यह सब मन में लेकर रूचि ने ठाना कि यदि अब मैं खुद के हक़ के लिए नहीं बोली तो शायद मैं हमेशा के लिए अपने अधिकारों से वंचित रह जाऊँगी। मुझे हमेशा ही दबाया जाएगा।


कुछ दिनों बाद जब रूचि के पापा शहर से वापस आये तो उसने अपने मन की बात पापा के सामने रखी। पापा उसकी बातों को सुनने से भी मना कर रहे थे। मानना तो बहुत दूर की बात थी। रूचि ने बार-बार अनेकों तरीकों से अपनी बात पापा को समझाने की कोशिश की। 

वो अपने पापा से बोली कि “मैं शादी तो करुँगी पापा, परन्तु आप मुझे दो वर्ष का समय दीजिये। ताकि मैं खुद सक्षम हो पाऊं। और शादी के बाद यह भी हो सकता है कि मुझे पढ़ने ही ना दिया जाए। मेरे छोटे भाइयों, इस घर को देखने का मौका तक भी ना दिया जाए। यदि ऐसा हुआ तो सबकुछ बिखर भी सकता है”! 

रूचि ने यह भी बोला कि, “पापा यदि आप मुझे अभी समय देकर सक्षम होने देंगे तो मैं भविष्य में अपने भाइयों के लिए भी कुछ अच्छा कर पाऊँगी”।

आखिरकार रूचि की ज़िद रंग लायी। उनके पापा ने उनकी बात समझी और पढ़ाई करने की अनुमति दे दी। 

अब यदि उनके पापा से कोई गाँव-समाज का व्यक्ति इस बात को लेकर कुछ बोलता भी है तो पापा खुद उत्तर देतें हैं कि बड़ी बेटी की शादी कर देने से क्या ही हो गया? वो हमारे घर आकर यहाँ की देख-रेख तो नहीं कर सकती है ना अब! 

हालाँकि रूचि की बड़ी बहन उनसे नाराज़ है और फ़ोन पर बात तक नहीं कर रही हैं। कारण साधारण सा है- वो चाहती हैं कि रूचि चुपचाप अपनी पढ़ाई करने की इच्छा को मारकर शादी के लिए हाँ करदे। रूचि को विश्वास है कि उनकी दीदी भी एक दिन मान जायेंगी और उनका सहयोग करेंगीं। फिलहाल रूचि के घर में शादी को लेकर कोई दबाव नहीं हैं और रूचि मन लगाकर अपनी पढ़ाई कर पा रही है।

साक्षी,

बडी, मुंगेर