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Friday, July 25, 2025

सपनों की सीढियाँ , संकल्प की सींच

किसने सोचा था ? की बिहार के ग्रामीण क्षेत्र (बड़गाव) के मध्य वर्गीय परिवार की एक साधारण सी लड़की कभी भोपाल जा कर उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाएगी। क्योंकि ,  वर्षों तक सामाजिक रूढ़ियों, आर्थिक सीमाओं, और सुविधाओं की कमी ने ग्रामीण लड़कियों की शिक्षा को बाधित किया है।  लेकिन अब परिस्थितियां धीरे-धीरे बदल रही है।
 
ऐसी ही कहानी है - कल्पना की। कल्पना का बचपन से ही सपना था की वो कुछ अलग करें। परिवार की स्थिति दयनीय होने के बावजूद भी उसके मन में अपने सपने को पूरा करने की चाह लगी हुई थी। जहाँ लड़कियों के लिए बुनियादी शिक्षा पाना भी मुश्किल होता है वहां उच्च शिक्षा तक पहुंचने की चाह रखना तो सच में ही एक संघर्ष से कम नहीं है। 


कल्पना के सपनो को तब पंख मिल गई जब उसे आई - सक्षम फ़ेलोशिप का साथ मिला। जो उनके सपने को पाने में उनका एक मजबूत हथियार बना। कल्पना पहले सिर्फ अपने सपने को देख रही थी , लेकिन जब कल्पना को आई - सक्षम में "अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी " के बारे में पता चला , तो वो अपने सपने को जीने लगी। कल्पना ने ये कब सोचा था की उसके सपनो को नई उड़ान मिल जाएगी।

उन्होंने अपनी पढाई शुरू की जिसमे आई-सक्षम के टीम ने उनकी काफी मदद की और मार्गदर्शन किया। फ़ेलोशिप के सेशन और प्रक्रियाओं द्वारा कल्पना को प्रेरणा मिली और वो अपने सपनो के राश्ते पर आगे बढ़ी। आई-सक्षम ने उन्हें वित्तीय रूप से भी सहायता प्रदान किया।  अपने आत्म-विश्वास और आई-सक्षम के सहायता से कल्पना सौ प्रतिशत स्कॉलरशिप के साथ अपना एग्जाम और इंटरव्यू पास की।


जिस दिन कल्पना का चयन "अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी" में हुआ और स्कॉलरशिप की पुष्टि मिली, वह दिन उसके जीवन का सबसे खास दिन बन गया। ग्रामीण क्षेत्र की एक साधारण लड़की के लिए यह केवल एक अकादमिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि वर्षों से देखे गए उस सपने की पहली झलक थी — बिना किसी आर्थिक बोझ के, देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में पढ़ने का मौका।

जब घर से बाहर जाकर पढ़ने की बात आई, तो परिवार की चिंता ने एक बार फिर परंपराओं का जाल बुन दिया — "एक लड़की अकेली शहर में कैसे रह पाएगी?", "लोग क्या कहेंगे?"

कल्पना का आत्मविश्वास धीरे-धीरे डगमगाने लगा। उसने खुद को उन लड़कियों की कतार में खड़ा पाया जिनकी दुनिया रसोई और आँगन से आगे नहीं जाती। वह सोचने लगी, शायद मेरा भी जीवन बुनियादी शिक्षा और घरेलू जिम्मेदारियों तक ही सीमित रहेगा।


पर उसने चुप रहना नहीं चुना। उसने अपना दिल खोलकर आई-सक्षम टीम से बात की। उन्होंने न सिर्फ उसकी बातों को सहानुभूति से सुना, बल्कि उसके परिवार तक पहुँचकर उन्हें समझाया कि बदलते दौर में लड़कियों को भी आगे बढ़ने का हक है। उन्होंने शिक्षा की ताकत, आत्मनिर्भरता और समाज के बदलते नज़रों को बड़ी सहजता और सच्चाई से सामने रखा।

कल्पना की जिद और आई-सक्षम टीम के विश्वासपूर्ण प्रयासों ने आखिरकार परिवार की सोच को बदल दिया। जिस बेटी को लेकर कल तक सवाल उठाए जा रहे थे, आज उसी पर गर्व किया जा रहा था।

हाल ही में कल्पना ने भोपाल चली गई — अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ओर, जहाँ अब उसका नया अध्याय शुरू हो चुका है।
यह सिर्फ कल्पना का कॉलेज जाना नहीं है — यह उस जज़्बे की उड़ान है, जिसने समाज की तमाम बंदिशों को पार कर अपने सपनो को पाया है। 

कल्पना 

बैच-10,मुजफ्फरपुर


Monday, June 16, 2025

मुज़फ्फरपुर की गलियों से जयपुर तक: मेरी उड़ान की शुरुआत

मुज़फ्फरपुर की गलियों से शुरू हुई मेरी कहानी, एक साधारण-सी ज़िंदगी से निकलकर एक नई दिशा की ओर बढ़ी। घर-परिवार, बच्चों की देखभाल और अपने छोटे से संसार में ही सारा समय बीतता था। लेकिन मन के एक कोने में हमेशा कुछ नया जानने, कुछ बड़ा करने की एक हल्की सी टिमटिमाहट थी।
और फिर एक दिन, जैसे वो टिमटिमाहट एक रोशनी बन गई—जब मुझे जयपुर जाने का मौका मिला।
इस खबर ने मन को दो हिस्सों में बाँट दिया—एक तरफ उत्साह, क्योंकि पहली बार बिहार से बाहर जाकर कुछ सीखने को मिलेगा, और दूसरी ओर भावनाओं की लहर, क्योंकि बच्चों से दूर जाना था।
लेकिन दिल ने समझाया—  “अगर कुछ नया करना है, तो इस एक कदम से शुरुआत करनी होगी।” तैयारी बहुत पहले से शुरू हो गई थी, लेकिन जैसे ही यात्रा की तारीख नज़दीक आई, ट्रेन टिकट कन्फर्म नहीं हुई। मन में असमंजस था—जाऊं या न जाऊं? लेकिन जैसे ज़िंदगी हर बार रास्ता देती है, वैसे ही आखिरी वक्त पर टिकट मिल गया, और मैंने डर को पीछे छोड़ सफ़र शुरू कर दिया।
पाटलिपुत्र स्टेशन पर जब ट्रेन में बैठी, तो पहली बार बिल्कुल अकेली थी। पर परिवार की आवाज़ें फोन पर मेरे साथ थीं। और बच्चों ने जिस प्यार से मुझे टीका लगाकर विदा किया, उसने मेरी हिम्मत को कई गुना बढ़ा दिया।
जो आशीर्वाद मैं उन्हें देती थी, आज वही मुझसे कह रहे थे—“बेस्ट ऑफ लक, मम्मी!”
नई दिल्ली से जयपुर का सफर रात के अंधेरे में था, लेकिन मन के भीतर एक नई रोशनी थी। शहर अजनबी था, रास्ता अनजाना, लेकिन मन कह रहा था—  “डर के आगे जीत है।” ओला बुक की, और पति की आवाज़ कॉल पर मेरे साथ थी। होटल पहुंचते ही जब रिसेप्शन पर किसी ने मुस्कुराकर कहा— “आप बिहार से हैं? मैं भी वहीं से हूं”, तो एक अजनबी शहर में जैसे कोई अपना मिल गया।
मीटिंग का पहला दिन बेहद खास था।
वहां देश के अलग-अलग कोनों से लोग आए थे—हर कोई अपने समुदाय, बच्चों और समाज के लिए कुछ न कुछ कर रहा था। सबकी बातें सुनकर लगा, “कितना कुछ है जो हम मिलकर कर सकते हैं।” भाषा अलग थी, पर दिलों की बातें एक जैसी थीं। अपनापन, इज़्ज़त और सहयोग ने हम सबको एक धागे में बाँध दिया।
जो वहां सीखा—वो सिर्फ जानकारी नहीं थी, वो जीवन का अनुभव था। लोगों की सोच, उनका काम, और उनका जज़्बा देखकर मुझे लगा— “मैं भी इससे कम नहीं हूं।” मेरे भीतर के आत्मविश्वास ने जैसे एक नई उड़ान भर ली।
वापसी की यात्रा आसान थी, क्योंकि इस बार मैं अकेली नहीं थी— मेरे साथ था नया आत्मविश्वास, नई सोच और कई ऐसे साथी, जिनसे अब गहरा जुड़ाव था। उनमें से एक रवि सर थे, जो मानो अंधेरे में एक चिराग की तरह मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे।
"आई-सक्षम" मेरे लिए सिर्फ एक संस्था नहीं रही, वो मेरे पंख बन गई। पहले जहां मैं सिर्फ अपने जिले तक सोचती थी,अब राज्य पार करने का हौसला रखती हूं। मैंने खुद को एक नए रूप में जाना— मजबूत, आत्मनिर्भर और उम्मीद से भरी। अब मेरा सपना है—  जो कुछ भी मैंने सीखा, वो अपने साथियों तक पहुंचाऊं। क्योंकि बदलाव की शुरुआत हमसे होती है।
एक कदम, एक हिम्मत, और फिर वही उड़ान जो ज़िंदगी को एक नई ऊँचाई देती है।
लवली सिंह
बडी (मुज़फ्फरपुर)

Monday, June 2, 2025

"मेरे संग बच्चे भी मुस्कुराने लगे"

जब मैं पहली बार इस विद्यालय  में आई तो यहां के बच्चे पढ़ाई में रुचि नहीं लेते थे वे केवल खेल कूद में ज्यादा व्यस्त रहते थे और किताबों से दूर भागते थे l विद्यालय का वातावरण भी कुछ खास नहीं था l मैं धीरे-धीरे बच्चों को साथ दोस्ती करनी शुरू की मैं उन्हें खेल में रुचि दिखाई और उनके साथ  समय बिताकर अपना रिश्ता मजबूत किया l

रिश्ता मजबूत होने के बाद मैं पढ़ाई को खेल की तरफ प्रस्तुत किया मैंने छोटे-छोटे कहानी और एक्टिविटी के माध्यम से उन्हें पढ़ाई में रुचि लाने के लिए प्रेरित की बच्चों ने एक्टिविटी से अधिक प्रेरित हुए और उन्होंने देखा की पढ़ाई में भी खेल हो सकती है,तो उन्होंने पढ़ाई में भी रुचि लेनी शुरू कर दी l

विद्यालय का वातावरण धीरे-धीरे बदलने लगा l मेरे गांव से शिक्षक अभिभावक बैठक से यह निकल कर आ रहे हैं,कि इस विद्यालय में बच्चे अब पहले के जैसे विद्यालय में बैग रखकर बाहर घूमते नहीं रहते हैं l उनकी बातचीत में रहन-सहन में भी परिवर्तन हुआ है l "मेरा विद्यालय से जुड़ने का उद्देश्य यह था कि मैं विद्यालय के बच्चों को एक अच्छे नागरिक की दिशा में आगे बढ़ते हुए देख सकूं।" 

पहले हमारे विद्यालय में बच्चे प्रार्थना संगीत के बाजे के साथ करते थे, लेकिन अब चार से पाँच बच्चे मिलकर खुद ही यह प्रार्थना सस्वर गाते हैं—
"तू ही राम है, तू रहीम है,
तू करीम, कृष्ण, खुदा हुआ,
तू ही वाहे गुरु, तू यशु मसीह,
हर नाम में तू समाया हुआ।"


पहले जब भी विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस मनाया जाता था, बच्चे उसमें खास रुचि नहीं दिखाते थे। वे न तो किसी गतिविधि में भाग लेते थे और न ही आगे बढ़कर कोई पहल करते थे। यह देखकर मन उदास हो जाता था। लेकिन इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मैंने बच्चों से उनके ही पुराने अनुभवों की बात की—कैसे पहले उन्हें पढ़ाई में भी मन नहीं लगता था, लेकिन अब वे मन लगाकर पढ़ रहे हैं। मैंने कहा, “जिस तरह पढ़ाई अब आसान लगती है, वैसे ही मंच पर बोलना, नारे लगाना और भाग लेना भी आसान हो सकता है।” मेरी बातों ने बच्चों को अंदर तक छू लिया।

फिर क्या था—लगातार प्रयास और प्रोत्साहन से बच्चों में धीरे-धीरे आत्मविश्वास जागा। अब वे खुद से प्रार्थना कराते हैं, नारे लगाते हैं और मंच पर गाना गाने के लिए उत्साहित रहते हैं। यह देखकर मुझे भी एक नई ऊर्जा मिली, और मेरा आत्मविश्वास पहले से कहीं अधिक बढ़ गया।

मेरे इन छोटे-छोटे प्रयासों से बच्चों में आया यह सकारात्मक बदलाव मेरे लिए एक बड़ी सफलता है। जब कोई इस बदलाव को देखता है, तो उसे न केवल आश्चर्य होता है, बल्कि गर्व भी होता है कि सही दिशा में किया गया छोटा प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकता है।

नाम- मुस्कान कुमारी 

बैच-10 , मुजफ्फरपुर


Tuesday, March 18, 2025

"सीता की आत्मनिर्भरता की कहानी"

सीता नवादा गाँव  (कोइरी टोला) के एक ऐसी लड़की थी, जो आत्मविश्वास की कमी के कारण अपनी बात ठीक से नहीं रख पाती थी। उसके पापा उसे घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं देते थे, जिससे उसकी स्वतंत्रता सीमित थी।
एक दिन, उसने सुना कि आई-सक्षम के लिए फॉर्म भरा जा सकता है, जिससे उसे एक नया अवसर मिल सकता था। यह उसके लिए पहली चुनौती थी—क्या वह बिना पापा की अनुमति लिए खुद के लिए कोई निर्णय ले सकती है?
शुरुआत में, उसे डर लगा कि पापा मना कर देंगे या नाराज़ होंगे। उसे लगा कि शायद वह यह कदम नहीं उठा पाएगी। किसी भरोसेमंद व्यक्ति (शिक्षक/मित्र) ने उसे प्रेरित किया कि उसे अपने जीवन के फैसले खुद लेने चाहिए। इसने उसमें आत्मविश्वास जगाया।
उसने हिम्मत जुटाकर बिना पापा से पूछे आई-सक्षम का फॉर्म भर दिया और परीक्षा दी। यह उसकी पहली बड़ी परीक्षा थी। परीक्षा पास करने के बाद भी, सबसे बड़ी चुनौती थी—क्या पापा उसे वहां काम करने देंगे? यह उसकी यात्रा की सबसे कठिन बाधा थी।
पापा ने उसकी मेहनत और आत्मनिर्भरता को देखते हुए उसे आई-सक्षम में काम करने की अनुमति दे दी। यह उसकी पहली बड़ी जीत थी। अब सीता न केवल अपनी राय खुलकर रख पाती थी बल्कि अपने पसंद को भी परिवार, समुदाय और विद्यालय में आत्मविश्वास से प्रस्तुत कर सकती थी।

उसने न केवल अपने आत्मविश्वास में बल्कि अपने लक्ष्य में भी स्पष्टता पाई। अब वह B.Ed करके शिक्षिका बनने का सपना देख रही थी, ताकि वह दूसरों को भी सशक्त बना सके।

सीता की यह यात्रा न केवल उसके लिए बल्कि उन सभी लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गई, जो आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की राह पर बढ़ना चाहती थीं। अब सीता अपनी पहचान खुद बना चुकी थी। वह अपने विचारों को मजबूती से व्यक्त कर सकती थी और अपने भविष्य के लिए खुद फैसले लेने में सक्षम थी।

सीता कुमारी,एडू लीडर
मुजफ्फरपुर


Wednesday, January 29, 2025

अपनी आवाज़ को अपनाई और पहचान बनाई : रंगीला

एक छोटे से गाँव मुहमदपुर की i-सक्षम में बैच-10 की एडू-लीडर रंगीला हैं। जो खुद में और अपने समुदाय में सकारत्मक प्रभाव छोड़ रही है। उनका आत्मविश्वास बढ़ना, अपने आवाज को अपनाना और दूसरों के साथ स्नेहपूर्ण संबंध बनाना सच में एक बड़ी उपलब्धि है।

महिलाओं को जागरूक करने की पहल


रंगीला ने अपने समुदाय में जाकर महिलाओं को मासिक धर्म में स्वच्छता से जुड़ी जरूरी जानकारी प्रदान की।

उन्होंने लगभग 10 महिलाओं से मिलकर इस विषय पर गहरी बातचीत की। इसके अलावा, वह अपनी स्थानीय समुदाय की दो महिलाओं को हस्ताक्षर सिखाने में भी मदद की। यह उनको दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसमें एक सशक्त लीडर केवल ज्ञान बांटने तक समित नहीं रहता, बल्कि अपने जीवन के संघर्ष और व्यक्तिगत गुणों से भी लोगों को प्रेरित करता है।


चुनौतियों का सामना और प्रेरणा 


रंगीला का अपने पहचान बनान और कठिनाइयों का सामना करते हुए आगे बढ़ना यह दिखता है की कैसे धैर्य, शांति और आत्मविश्वास के साथ किसी भी चुनौती को पर किया जा सकता है। उनको यह प्रयास से यह स्पष्ट होता है की शिक्षा और जागरूकता का दायरा सिर्फ व्यक्ति विशेष तक समित नहीं रहता, बल्कि यह समाज में व्यापक बदलाव लाने की क्षमता रखता है। 

समुदाय में लीडरशिप की भूमिका 
एक एडू लीडर का प्रभाव सिर्फ विद्यालय या कार्यक्षेत्र तक समित नहीं होती, बल्कि वह अपने समुदाय और परिवार में भी सकारत्मक परिवर्तन लाता है। रंगीला ने इस बात को पूरी तरह प्रमाणित किया है। उनको यह प्रयास न केवल प्रेरणादायक है बल्कि यह दिखता है की छोटे कदम भी बड़े बदलाव की नींव रख सकते हैं।


  

शिक्षा के प्रति दृढ़ संकल्प
रंगीला अपने गाँव की पहली लड़की हैं जो घर से बाहर जाकर पढाई करने की इच्छा रखती हैं। यह न केवल उनके लिए बल्कि पूरे समुदाय के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने छपरा के अखंड ज्योति आँख अस्पताल के त्योहार में भी भाग ले कर अपनी सहभागिता दिखाई।
अंतर्मन से नेतृत्व की सीख
उनकी कहानी यह सिखाती है कि जब कोई व्यक्ति अपने आत्मविश्वास और जुनून के साथ आगे बढ़ता है, तो वह न केवल अपने जीवन में बदलाव लाता है बल्कि अपने आसपास के समाज को भी प्रेरित करता है। रंगीला जैसे लोग यह सिद्ध करते हैं कि सच्चा नेतृत्व दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने से परिभाषित होता है।

राधा, बड़ी

मुजफ्फरपुर







Tuesday, December 31, 2024

मीडिया की दुनिया में पहला कदम: डर और हिम्मत की जंग

 मीडिया की दुनिया में पहला कदम: डर और हिम्मत की जंग

आज मैं आप लोगों से सोशल मीडिया और कम्युनिकेशन टीम के साथ जुड़े अपने अनुभवों को साझा करना चाहती हूं। यह एक ऐसी कहानी है, जिसमें डर, संघर्ष, लगातार प्रयास और अंततः सफलता का संगम है।

शुरुआत: जब मिली बड़ी चुनौती
लगभग चार महीने पहले की बात है, एक मीटिंग के दौरान मुझे एक जिम्मेदारी सौंपी गई। मुझे अपने जिले की न्यूज़ को स्थानीय अखबारों में प्रकाशित करवाने और i-सक्षम से जुड़ी लाइव न्यूज़ दिखाने का लक्ष्य दिया गया। सुनने में तो यह काम आसान लग सकता था, लेकिन मेरे लिए यह किसी पहाड़ पर चढ़ने जैसा था।
क्योंकि मैं ना किसी मीडिया पर्सन को जानती थी, ना कभी किसी रिपोर्टर से बात की थी। मेरे पास उनका कोई नंबर नहीं था। मुझे बस अखबार के ऑफिसों के नाम और उनके जानकारी मालूम थे—दैनिक जागरण, प्रभात खबर, दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान। लेकिन यह सब जानकारी तब तक बेकार थी, जब तक मैं कोई ठोस कदम नहीं उठाती।

डर के आगे जीत है
मैंने तय किया कि डर से भागने के बजाय इसे हराने की कोशिश करूंगी। सबसे पहले मैं दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर के ऑफिस गई। वह दिन मैं कभी नहीं भूल सकती, जब मैं पहली बार दैनिक जागरण के संपादक से मिलने गई। दिल तेजी से धड़क रहा था, मन में बहुत सारा सवाल चल रहा था और डर लग रहा था कि क्या मैं अपनी बात सही तरीके से रख पाऊंगी?
लेकिन मैं तैयार थी। मैंने i-सक्षम के बारे में PPT बनाकर ले गई थी और लैपटॉप भी साथ में ले कर गई, ताकि मैं उन्हें अपनी बात बेहतर तरीके से समझा सकूं। यह मेरी पहली जीत थी—मैंने डर पर काबू पाया और खुद को एक नई दिशा में धकेल दिया।

लगातार प्रयास: सुबह 9 से रात 9 की दौड़
अगले दो-ढाई महीने तक मेरा यही रूटीन बन गया। कभी सुबह नौ बजे तो कभी शाम छह बजे, जब भी संपादक या रिपोर्टर से मिलने का समय मिला, मैं तुरंत पहुंच जाती। कई बार पांच-दस मिनट की देरी से मिलने का मौका छूट जाता। लेकिन मैंने हार नहीं मानी।
मैंने धीरे-धीरे उन्हें i-सक्षम से जुड़ी सफलताओं, मैसेज, वीडियो और तस्वीरें भेजनी शुरू कीं। इस दौरान, दैनिक भास्कर के एक रिपोर्टर से मुलाकात हुई। मैंने प्रियंका दी और प्रिंस सर को दिखाया और रूपल दी बात कर के न्यूज़ तैयार की और उसे जमा कर दिया।
पहली सफलता: पहला न्यूज़ प्रकाशित हुआ
जब मेरा पहला न्यूज़ प्रकाशित हुआ, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। यह मेरे लिए सिर्फ एक खबर नहीं थी, यह मेरे प्रयासों का पहला ठोस परिणाम था। मैंने महसूस किया कि मेहनत और धैर्य के साथ कुछ भी संभव है।
इसके बाद मैंने दैनिक जागरण के ऑफिस को और विकसित करना शुरू किया। मेरी मेहनत रंग लाई और एक दिन वहां के रिपोर्टर का नंबर मिल गया। मैंने उन्हें कॉल करके i-सक्षम के बारे में बताया। वह बहुत खुश हुए और उन्होंने मेरी खबर को प्रकाशित करने का वादा किया।
यह मेरी दूसरी बड़ी जीत थी। यह एहसास हुआ कि जब आप प्रयास करते हैं, तो चीजें अपने आप आपके पक्ष में आने लगती हैं।
उसके बाद,
अब मेरा अगला लक्ष्य था i-सक्षम का लाइव न्यूज़ दिखाना। मुझे अपनी टीम के साथ मिलकर एक वीडियो तैयार करना था। जब मेरे सभी साथी अपने-अपने क्लस्टर को सेलिब्रेट कर रहे थे, मैंने भी अपनी टीम के साथ इस अवसर का उपयोग किया।
हमने वीडियो बनाया और मुजफ्फरपुर वाव के संस्थापक सर को भेजा। उन्होंने इसे बहुत पसंद किया और मुझे एक रिपोर्टर का नंबर दिया। मैंने उनसे बात की और i-सक्षम का विजुअल न्यूज़ (Visual News) भी प्रकाशित हो गया।
साझा सफलता और धन्यवाद,
यह सबकुछ संभव हो पाया क्योंकि मेरी टीम, एडु लीडर, मेंटर और कम्युनिकेशन टीम ने मुझे हर कदम पर प्रेरित किया। मैंने सीखा कि डर को जीतने का सबसे अच्छा तरीका है, उसे सीधे चुनौती देना।
मैं अपने प्रयासों और सफलता की इस यात्रा को सभी के साथ साझा करके बहुत खुश हूं। आशा है कि मेरी कहानी आपको भी अपने सपनों की ओर बढ़ने की प्रेरणा देगी।
आप सभी का सहयोग और विश्वास के लिए दिल से धन्यवाद।

राधा 

बडी 

मुजफ्फरपुर



Friday, December 27, 2024

रुकशाना खातून: एक शिक्षक की प्रेरणादायक कहानी

रुकशाना खातून: एक शिक्षक की प्रेरणादायक कहानी

यह कहानी रुकशाना खातून की है, जो बिहार के उत्क्रमित मध्य विद्यालय, बुधनगरा में पढ़ाती हैं। अपने छोटे-छोटे लेकिन प्रभावशाली प्रयासों से रुकशाना ने न केवल अपने समुदाय में बदलाव लाया, बल्कि पढ़ाई के प्रति एक नई सोच भी पैदा की। 


गाँव के चाचा-चाची और आई-सक्षम का परिचय

रुकशाना के लिए उनका काम सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं है। वे अपने गाँव के चाचा-चाचियों से जुड़कर उनके जीवन में भी शिक्षा का उजाला फैलाने का प्रयास कर रही हैं। एक दिन जब वे गाँव में गईं, तो एक चाचा ने पूछा, "रुकशाना, क्या तुम्हें सरकारी नौकरी मिल गई?"

रुकशाना मुस्कुराते हुए बोलीं, "नहीं चाचा, मैं आई-सक्षम संस्था से जुड़ी हूँ। यह संस्था हमें बच्चों और समुदाय की बेहतरी के लिए काम करने का मौका देती है।" जब चाचा-चाचियों ने यह सुना, तो वे बहुत खुश हुए।

हस्ताक्षर से शुरू हुआ बदलाव

एक दिन रुकशाना ने अपने गाँव के एक चाचा से पूछा, "क्या आपको हस्ताक्षर करना आता है?" चाचा ने शर्माते हुए कहा, "थोड़ा बहुत आता है।"

रुकशाना ने तुरंत उन्हें हस्ताक्षर करना सिखाया। अगले दिन, वही चाचा उनके घर आए और बोले, "रुकशाना, क्या तुम मुझे रोज एक घंटा पढ़ा सकती हो?"

रुकशाना ने खुशी-खुशी यह प्रस्ताव स्वीकार किया। उन्होंने चाचा को अक्षर, गिनती, और पढ़ाई का पहला


10 दिन में बड़ा बदलाव

सिर्फ 10 दिनों में चाचा ने:

  • 'अ' से 'ज्ञ' तक पढ़ना और लिखना।

  • 'A' से 'Z' तक अंग्रेजी अक्षरों को समझना।

  • '1' से '100' तक की गिनती सीख ली।

रुकशाना को अब पूरा विश्वास है कि चाचा जल्द ही किताबें भी पढ़ने लगेंगे।

पढ़ाई का असर पूरे समुदाय पर

रुकशाना के इस छोटे से प्रयास ने उनके गाँव में एक नई लहर पैदा कर दी। चाचा के अलावा, तीन और गाँव के बुजुर्ग अब रुकशाना से पढ़ाई कर रहे हैं। यहाँ तक कि उनकी दादी, खतीजा खातून, जो कभी स्कूल नहीं गईं, उन्होंने भी पढ़ाई शुरू कर दी।

रुकशाना रात में सोने से पहले अपनी दादी को पढ़ाई में मदद करती हैं। अब दादी न केवल अक्षरों को पहचान रही हैं, बल्कि खुद पर गर्व महसूस करती हैं।

एक छोटे प्रयास का बड़ा प्रभाव

रुकशाना की मेहनत ने यह साबित किया कि शिक्षा की लौ जलाने के लिए केवल एक सही शुरुआत की जरूरत होती है। उन्होंने अपने समुदाय के लोगों को पढ़ाई की अहमियत समझाई और उन्हें इस सफर पर साथ ले आईं।

आज रुकशाना के गाँव में हर कोई कहता है:
"अगर हमें कुछ सीखना है, तो रुकशाना से बेहतर कोई नहीं!"

नेहा कुमारी
बडी, मुजफ्फरपुर