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Thursday, October 17, 2024

i-सक्षम में एक वर्ष की यात्रा- MG-ML से ट्यूशन पढ़ाना हुआ आसान

मुझे i-सक्षम से जुड़े हुए लगभग एक वर्ष पूरा होने वाला है। इस एक वर्ष में मैंने बहुत कुछ सीखा है, स्वयं में बहुत से बदलाव से बदलाव देखें हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं।

  • अब मैं हजारों की भीड़ में खुद को सबसे अलग महसूस करती हूँ।

  • दस लोगों के सामने अपनी बातों को रख पाती हूँ और उन्हें समझा पाती हूँ। 

  • सामने वाले व्यक्ति की भावनाओं को समझ पाती हूँ और अपनी भावनाएँ समझा पाती हूँ।

  • स्वयं के लिए सही-गलत का चुनाव कर पाना।

  • खुद की गलतियों में सुधार कर पाना।


जब मैं इन चीजों को खुद में देख पा रही हूँ तो मुझे खुद पर बहुत गर्व महसूस हो रहा है। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।


मैं एक-दो महीने पहले का एक छोटा सा अनुभव आपके साथ शेयर कर रही हूँ। पहले जब मैं छ:-सात बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी तब मैं उनके दो घंटे के ट्यूशन के समय को सही से मैनेज (manage) नहीं कर पाती थी। मुझे खुद ही लगता था कि मैं उन बच्चों को ठीक से नहीं पढ़ा पाती हूँ। हालाँकि मेरे पास विषय (हिन्दी, अंग्रेजी और गणित) का ज्ञान तो था परन्तु पढ़ाने का सही तरीका नहीं पता था। 


ट्यूशन वाले बच्चों की कक्षा भी अलग-अलग होती है और उनका स्तर भी अलग-अलग होता है। जिस कारण मैं समझ नहीं पाती थी कि दो घंटे में एक साथ उन्हें कैसे पढ़ाऊँ?


फिर एक दिन हमारा Multi-grade Multi-level Class (MG-ML) का सेशन हुआ और सेशन से मेरी समझ काफी बेहतर बन पाई कि मैं इसे अपने ट्यूशन में सभी बच्चों को बेहतर ढंग से कैसे पढ़ा सकती हूँ। मैंने MG-ML के सभी नियम अपनी कक्षा में फ़ॉलो (follow) किए और आज मेरे पास 15 बच्चे ट्यूशन पढ़ रहें हैं। अब मुझे भी कोई समस्या नहीं होती और बच्चे भी मेरे पढ़ाने के तरीकों को पसंद करते हैं। मैं अपनी इस प्रोग्रेस (progress) से बहुत खुश हूँ और इसे सीखने से मेरा जीवन थोड़ा आसान हुआ है।


“जीवन में हर चीज आसान नहीं होती बल्कि हमें आसान बनानी पड़ती है”। मुझे अपने जीवन में क्या, कब, और कैसे करना है यह सवालों के जवाब मैं दूसरों से पूछती थी, लेकिन जब से i-सक्षम संस्था मेरे जीवन में आयी है तब से मुझे इन सवालों के जवाब स्वयं ही मिल जाते हैं।


शीतल कुमारी 

बैच 10, जमुई


Saturday, October 5, 2024

क्या हम सभी 21वीं सदी में हैं या सिर्फ कुछ चुनिन्दा लोग?

नमस्ते साथियों,

मैं पायल, 17 अगस्त 2024 का फील्ड कार्य का अनुभव साझा कर रही हूँ। इस दौरान मैंने किशोरियों और उनके अभिभावकों से मुलाकात की और उनके साथ संवाद स्थापित किया। इस संवाद के दौरान कुछ ऐसे मुद्दे सामने आए, जिन पर विचार-विमर्श करना आवश्यक है।

अनुपस्थित किशोरियों से मुलाकात:

एक विशेष सत्र के दौरान, मैंने उन 19 किशोरियों से मिलने का प्रयास किया जो सत्र में उपस्थित नहीं हो पायी थीं। जब मैंने उनसे उनकी अनुपस्थिति का कारण पूछा तो उन्होंने खुद ही बताया कि उनमें से आठ किशोरियों का मासिक धर्म चल रहा था और इस कारण वो मंदिर के अंदर प्रवेश जा सकती थीं। जहाँ हमारा सत्र आयोजित किया गया था। 

यह सुनकर मुझे बहुत दु:ख हुआ कि हमारे समाज में आज भी मासिक धर्म को पाप या अपवित्रता का प्रतीक माना जाता है। यह धारणा न केवल रुढ़िग्रस्त है, बल्कि अत्यंत हानिकारक भी है।

19 किशोरियों में से कुछ किशोरियाँ स्कूल गयी थीं। कुछ रोपा (कृषि पद्धति) के लिए गयी थीं और कुछ मासिक धर्म के कारण सत्र में नहीं आ सकी। पहले दो कारण तो हम समझ सकते हैं, परन्तु तीसरे कारण से यह स्पष्ट होता है कि हमारे समाज में मासिक धर्म के प्रति जागरूकता की कितनी कमी है। मुझे यह देखकर फिर से बहुत निकृष्ट महसूस हुआ।


मैंने पहले भी एक सत्र में ऐसी ही स्थिति का सामना किया था। रायपुरा में 8 अगस्त को आयोजित सत्र के दौरान तीन किशोरियों का मासिक धर्म चल रहा था और वे भी मंदिर में जाने से मना कर रही थीं। लेकिन एक किशोरी जिसका नाम राधा था, ने एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाया। 

उसने कहा, "दीदी, हम रोज़ शाम को देखते हैं कि मंदिर में कुछ लोग दारू पीते हैं, गांजा जैसे तरह-तरह के नशे करते हैं, गाली देते हैं, गंदी बातें करते हैं। 

तो क्या हम लोग इनसे भी बड़ा पाप कर रहे हैं जो मंदिर में नहीं जा सकते?"

यह सवाल हर उस व्यक्ति के लिए विचारणीय है, जो मासिक धर्म को पाप मानता है। जो मासिक धर्म को अछूत की दृष्टि से देखता है। 

ध्यान देने की बात तो यह है कि ये व्यक्ति कोई और नहीं अधिकतर महिलाएँ ही हैं।


राधा के इस सवाल ने वहाँ उपस्थित सभी किशोरियों को झकझोर कर रख दिया। इसके बाद हम सभी मंदिर के अंदर गए, और इस मिथक को तोड़ने का प्रयास किया। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि यदि सही तरीके से संवाद किया जाए, तो समाज की धारणाएं बदल सकती हैं।

मासिक धर्म: एक नई सोच 

मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो महिलाओं के जीवन में सामान्य है। इसे लेकर समाज में अनेक प्रकार की गलत धारणाएं और मिथक व्याप्त हैं। इन्हें तोड़ने के लिए जागरूकता की बहुत आवश्यकता है। मासिक धर्म को अपवित्र या पाप मानने की मानसिकता न केवल महिलाओं के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती है, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है।

हमारे समाज में ऐसी कई प्रथाएं हैं, जो मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के अधिकारों और उनके स्वाभिमान को प्रभावित करती हैं। मंदिर में प्रवेश न कर पाना, खाना न बना पाना, या अन्य धार्मिक गतिविधियों में भाग न ले पाना, इत्यादि। ये सभी समाज की उन धारणाओं का हिस्सा हैं जो महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करती हैं।

हमें इन धारणाओं को बदलने की जरूरत है। मासिक धर्म के प्रति समाज की सोच को बदलने के लिए शिक्षा और जागरूकता अभियान चलाना आवश्यक है। हमें यह समझना होगा कि मासिक धर्म न तो कोई पाप है और न ही कोई अपवित्रता। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे 21वीं सदी में सम्मान और संवेदनशीलता के साथ देखा जाना चाहिए।

समाज को इस दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है, ताकि महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान किसी भी प्रकार की भेदभावपूर्ण प्रथाओं का सामना न करना पड़े। हमें एक ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ मासिक धर्म के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण हो, और महिलाएँ सम्मान और स्वाभिमान के साथ अपने जीवन को जी सकें।


अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (APU), भोपाल Chapter 1- डर और आशंकाएँ

नमस्ते साथियों,


मैं आरती कुमारी i-सक्षम संस्था में एडु-लीडर रह चुकी हूँ। आज मैं आप सभी के साथ अपनी शुरूआती यात्रा और अनुभव को साझा करना चाहती हूँ।  


मेरी इस यात्रा में कई उतार-चढ़ाव रहे हैं, लेकिन यह एक ऐसा अनुभव साबित हुआ जिसने मेरी सोच और आत्मविश्वास को हमेशा के लिए बदल दिया। APU में आने से पहले मेरे मन में बहुत सी आशंकाएँ थीं। पहली बार अपने घर, और शहर से बाहर निकलना मेरे लिए बहुत बड़ा कदम था। 

मुझे हमेशा से यह चिंता सताती रहती थी कि क्या मैं इस नए माहौल में खुद को ढाल पाऊंगी?

क्या मैं नए लोगों के साथ तालमेल बिठा पाऊंगी? 

क्या मैं इस नई शिक्षा को समझ पाऊंगी?



जब APU में एडमिशन मिला, तो मुझे खुशी तो हुई लेकिन इसके साथ ही एक अनजाना सा डर भी मन में था। यह डर और चिंता मेरे मन में तब तक घर किये रहा, जब तक कि मैंने APU में कदम नहीं रखा। 


APU में नया माहौल और नए व्यक्तियों से मिलने के बाद मेरी सारी आशंकाएँ धीरे-धीरे दूर होने लगीं। मैंने महसूस किया कि यह एक ऐसा स्थान है, जहाँ सभी को समान रूप से देखा जाता है। चाहे उनकी जाति, भाषा, या विचारधारा कुछ भी हो। 


यहाँ के लोगों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। जिससे मेरे अंदर का डर धीरे-धीरे खत्म होने लगा। यहाँ, सहपाठियों ने भी मुझे बहुत प्रोत्साहित किया। सभी छात्र यहाँ सीखने के लिए उत्सुक और खुले दिमाग (open-minded) वाले हैं। मैंने देखा कि हर किसी के पास अपनी एक कहानी और अनुभव है और वे सभी एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने को तैयार हैं। मेरी भी कोशिश रहती है कि उनसे कुछ नया सीखूं।


यहाँ के फैकल्टी मेंबर्स (faculty members) न केवल विषय के विशेषज्ञ हैं, बल्कि वे छात्रों के साथ जिस तरीके से बात करते हैं वो भी है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि वो सिर्फ हमें पढ़ाते नहीं हैं, बल्कि हमें सोचने, सवाल करने और खुद से उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके पढ़ाने का तरीका बाकी जगहों से बिल्कुल भिन्न है। 

शिक्षक हमें सिर्फ जानकारी नहीं देते, बल्कि हमें उन जानकारियों को अपने जीवन और समाज के संदर्भ में समझने और लागू करने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने मुझे यह सिखाया कि शिक्षा का असली मतलब केवल किताबों तक सीमित नहीं होता बल्कि किताबें हमें जीवन और समाज के बारे में भी समझाती हैं। शिक्षकों के साथ संवाद करना भी बेहद आसान है। वो हमेशा हमारी समस्याओं को सुनने और उनके समाधान में मदद करने के लिए तैयार रहते हैं।


APU में आए हुए मुझे एक महीने से अधिक समय हो चुका है, लेकिन यह समय इतनी जल्दी बीत गया कि मुझे इसका अहसास भी नहीं हुआ। इस एक महीने में मैंने न केवल अपने विषयों के बारे में बहुत कुछ सीखा है बल्कि खुद के बारे में भी मैंने कुछ बातें जानी हैं। मैंने यहाँ सीखा कि असली शिक्षा केवल किताबों में नहीं होती, बल्कि हमारे आस-पास के लोगों, हमारे अनुभवों और हमारे विचारों में भी होती है। APU ने मुझे यह सिखाया है कि शिक्षा का मतलब केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं है, बल्कि उस ज्ञान को समझना और उसका सही उपयोग करना भी है।


इस यात्रा को संभव बनाने के लिए मैं i-सक्षम के सभी सदस्यों की आभारी हूँ। जिन्होंने मुझे यहाँ तक पहुँचाने में सहायता की। आपके समर्थन और मार्गदर्शन के बिना यह संभव नहीं हो पाता। आप सभी का सहृदय धन्यवाद।


आरती कुमारी

बैच-10 (बी), बेगूसराय