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Friday, April 18, 2025

गाँव की लड़की, और अब समुदाय की उम्मीद

मै उस गॉव की लड़की हूँ, जिसने कभी सोचा भी नहीं था की शिक्षा एक माध्यम बन सकती है- खुद को जानने, समझने और समाज में बदलाव लाने का। लेकिन आई-सक्षम फैलोशिप ने मुझे यही अवसर दिया। 
इन दो वर्षो में मैंने केवल शिक्षिका की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि एक सुनने वाली साथी, सिखने वाली छात्रा, और नेतृत्व करने वाली दीदी के रूप में भी खुद को ढाला। बच्चो के साथ दिन के शुरुआत, मोहल्ला कक्षाओं में रचनात्मक गतिविधियाँ, और समुदाय के साथ सार्थक सवांद – ये मेरी प्रतिदिन की दिनचर्या का हिस्सा बन गए।

फेलोशिप के दौरान मैंने यह जाना की आत्मा-विश्लेषण और आत्मचिंतन कितने जरुरी हैं। “बढ़ते कदम” जैसे चिंतन-पत्रकों ने मुझे अपने विचारों को शव्द देने की कला सिखाई। जब मेरे साथी मेरी बातो को पढ़ते और सुझाव देते, तो लगता जैसे हम सब मिलकर एक-दुसरे को आगे बढ़ा रहे हैं।
मेरे गाँव में अब लोग मुझे सम्मान से ‘दीदी’ कहते है – वह दीदी जो सुनती है और साथ चलती है। आज मै पुरे विश्वास से कह सकती हूँ की यह यात्रा केवल शिक्षण की नहीं, बल्कि एक सशक्त स्त्री बनने की यात्रा थी।

तनु प्रिय

बैच -10  

बेगुसराई



Friday, October 18, 2024

मैत्री प्रोजेक्ट में दो वर्षों का अनुभव- अभिषेक

नमस्ते साथियों,

मैं बैच पाँच का फेलो था। फेल्लोशिप समाप्त होने के बाद मेरा चयन मैत्री प्रोजेक्ट में हुआ। मुझे अभी भी याद है कि इस प्रोजेक्ट में चयन होने के कारण मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी। शुरूआत में गाँव में सर्वे (survey) करने में कठिनाई हो रही थी परन्तु धीरे-धीरे मुझे यह कार्य करने में मज़ा आने लगा।

मैत्री प्रोजेक्ट: आउट ऑफ़ स्कूल (Out of school) लड़कियों को स्कूल से जोड़ना और उनका रिटेंशन (retention) करना इस प्रोजेक्ट का अहम उद्देश्य है। 

प्रोजेक्ट की अवधि 21 सितम्बर 2022 से 31 अगस्त 2024 थी। मैंने अपनी पञ्चायत तक के सभी गाँव नहीं देखे थे, और मैत्री प्रोजेक्ट के अंतर्गत मैंने मुंगेर जिले के चार ब्लॉक क्रमशः बरियारपुर, धरहरा, मुंगेर सदर, और जमालपुर के लगभग एक सौ गाँवों का सर्वे किया। जमुई के कुछ गाँव भी मेरे सर्वे का हिस्सा रहे। 

समस्याएँ और समाधान: 

सर्वे करने के दौरान हमारी टीम के साथियों को बहुत परेशानियाँ हो रही थी। जैसे- सर्वे के दौरान, सम्मानपूर्वक बात ना करना, डांट कर भगा देना और बदतमीज़ी करना आदि। 

  • परेशानियों के साथ-साथ मदद के हाथ भी आगे आये। मदद करने वाले लोगो में मुखिया, वार्ड सदस्य और आम ग्रामीण लोग थे। 

  • शिक्षा के प्रति बच्चों और अभिभावकों में जागरुकता की कमी भी एक अहम समस्या रही।

  • हम ऐसे गाँवों में भी गए जहाँ तक किसी प्रकार की कोई सड़क नहीं जाती है, पक्के घर नहीं हैं। इस प्रकार के कुछ गाँव मन कोटिया, गोपाली चेक, ब्लॉक धरहरा में है। यहाँ लड़कियों को विद्यालय आने-जाने को लेकर अलग समस्याएँ थी। उनके अभिभावक भी इन समस्याओं के बारे में नहीं जानते थे। जिसको हमने अभिभावकों से लगातार बात करके हल किया।

  • जब हम आर.एन. मुसहरी टोला (बदला हुआ नाम) की दो बच्चियों का नामांकन कराने के लिए उन्हें विद्यालय लेकर गए तो वहाँ के प्रधानाध्यापक का कहना था कि आप दोनों गोरा होने वाली क्रीम (Fair&Lovely) लगा कर ही विद्यालय आ सकते हैं। ऐसे शब्द सुनकर किसी भी बच्ची का मनोबल टूट जाता। हमारी टीम ने दोनों पक्ष के साथ लगातार समय दिया और जातिवाद को किनारे करने के लिए बहुत समझाया।

  • गौरीपुर में हमारे काम करने के तरीके को लेकर भी प्रश्न उठाये गए। हम बच्चियों को स्कूल पहुँचाने के लिए जिस शिद्दत से लगे थे, उसे देखकर ग्रामीणों को लगने लगा कि अवश्य ही इन लोगो को (मैत्री टीम के सदस्यों) बच्चों के नाम पर विद्यालय में आने वाली राशि, अन्य सामान इत्यादि का हिस्सा मिलता होगा। उनका यह भी कहना था कि आधा तो विद्यालय के शिक्षक ही खा जाते हैं। हमने इस मानसिकता पर चोट की। अपने प्रयासों की एक विडियो बनाकर, सभी ग्रामीणों को उसे दिखाया। तब जाकर विश्वास अर्जित किया।

हितधारकों का व्यवहार: 

विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों का अधिकतार बार ऐसा व्यवहार दिखा कि इस कम्युनिटी विशेष के बच्चों का नामांकन नहीं करते हैं। जिसके कई कारण पाए गए- 

  • बच्चे भट्टे पर मजदूरी करने चले जाते थे। अभिभावकों को इससे सहूलियत होती थी। क्योंकि घर पर उनकी देखभाल करने के लिए कोई नहीं बचता था।

  • अभिभावकों को नामांकन कराने हेतु लगने वाले दस्तावेजों का ज्ञान नहीं था।

  • आधार कार्ड ना बना होने के कारण विद्यालय बच्चे का नामांकन नहीं लेते थे।

  • बच्चियों के पास वर्दी ना होने के कारण उन्हें शिक्षक और प्रधानाध्यापक द्वारा कक्षा में बैठने नहीं दिया जाता था। 

  • जब हम किसी गाँव में सर्वे (survey) करने जाते थे तो कभी-कभी हमें आउट ऑफ़ स्कूल गर्ल्स (Out of School Girls) का डाटा देने से मना कर देते थे और तरह-तरह के झूठें आरोप भी हम पर लगाये जाते थे। उदाहरण के लिए जैसे कि हम डेटा बेच देंगें, या हमें कुछ आर्थिक रूप से कोई पैसा मिलने वाला हो!

क्या पद्धतियाँ काम आयीं?

  • गतिविधि के माध्यम से कम्युनिटी के लोगो को जोड़ना काफी कारगर साबित हुआ। 

  • बच्चियों का रिटेंशन (retention) करने में बाल-उत्सव, ग्राम सभा, शिक्षक-अभिभावक बैठक (PTM) जैसे इवेंट्स (events) काम आये।

  • अभिभावकों और ग्रामीणों के साथ ज्यादा समय और शिक्षा की जागरूकता सम्बंधित जानकारी देकर इंटरवेंशन (intervention) करना पड़ा। 

  • गर्मियों की छुट्टियों में जब बिहार सरकार द्वारा मिशन दक्ष चलाया जा रहा था, तब हमारी टीम भी दोपहर में दो घंटे बच्चियों को समुदाय में जाकर पढ़ाते थे।

  • अभिभावकों और विद्यालयों के बीच बातचीत करने से थोड़ा गैप (gap) कम हुआ।

इतना सब करने के बाद भी बच्चों के लिए प्रतिदिन विद्यालय जाना सरल नहीं था। हर गाँव-टोले की अलग-अलग समस्याएँ हैं, रिटेंशन के लिए निरंतर प्रयास करते रहना आवश्यक है। जो मैं और मेरी टीम कर ही रहे हैं।

मैत्री प्रोजेक्ट के दो वर्ष मेरे लिए मेरी लर्निंग जर्नी (learning journey) के अहम वर्ष रहेंगें। इन दो वर्षो में मैंने कम्युनिटी को, कम्युनिटी की समस्याओं को करीब से जाना है, जो मुझे जीवन पर्यंत इनके समाधानों पर विचार करने के लिए प्रेरित करेगा।

अभिषेक

टीम सदस्य, मुंगेर


Thursday, October 17, 2024

i-सक्षम में एक वर्ष की यात्रा- MG-ML से ट्यूशन पढ़ाना हुआ आसान

मुझे i-सक्षम से जुड़े हुए लगभग एक वर्ष पूरा होने वाला है। इस एक वर्ष में मैंने बहुत कुछ सीखा है, स्वयं में बहुत से बदलाव से बदलाव देखें हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं।

  • अब मैं हजारों की भीड़ में खुद को सबसे अलग महसूस करती हूँ।

  • दस लोगों के सामने अपनी बातों को रख पाती हूँ और उन्हें समझा पाती हूँ। 

  • सामने वाले व्यक्ति की भावनाओं को समझ पाती हूँ और अपनी भावनाएँ समझा पाती हूँ।

  • स्वयं के लिए सही-गलत का चुनाव कर पाना।

  • खुद की गलतियों में सुधार कर पाना।


जब मैं इन चीजों को खुद में देख पा रही हूँ तो मुझे खुद पर बहुत गर्व महसूस हो रहा है। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।


मैं एक-दो महीने पहले का एक छोटा सा अनुभव आपके साथ शेयर कर रही हूँ। पहले जब मैं छ:-सात बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी तब मैं उनके दो घंटे के ट्यूशन के समय को सही से मैनेज (manage) नहीं कर पाती थी। मुझे खुद ही लगता था कि मैं उन बच्चों को ठीक से नहीं पढ़ा पाती हूँ। हालाँकि मेरे पास विषय (हिन्दी, अंग्रेजी और गणित) का ज्ञान तो था परन्तु पढ़ाने का सही तरीका नहीं पता था। 


ट्यूशन वाले बच्चों की कक्षा भी अलग-अलग होती है और उनका स्तर भी अलग-अलग होता है। जिस कारण मैं समझ नहीं पाती थी कि दो घंटे में एक साथ उन्हें कैसे पढ़ाऊँ?


फिर एक दिन हमारा Multi-grade Multi-level Class (MG-ML) का सेशन हुआ और सेशन से मेरी समझ काफी बेहतर बन पाई कि मैं इसे अपने ट्यूशन में सभी बच्चों को बेहतर ढंग से कैसे पढ़ा सकती हूँ। मैंने MG-ML के सभी नियम अपनी कक्षा में फ़ॉलो (follow) किए और आज मेरे पास 15 बच्चे ट्यूशन पढ़ रहें हैं। अब मुझे भी कोई समस्या नहीं होती और बच्चे भी मेरे पढ़ाने के तरीकों को पसंद करते हैं। मैं अपनी इस प्रोग्रेस (progress) से बहुत खुश हूँ और इसे सीखने से मेरा जीवन थोड़ा आसान हुआ है।


“जीवन में हर चीज आसान नहीं होती बल्कि हमें आसान बनानी पड़ती है”। मुझे अपने जीवन में क्या, कब, और कैसे करना है यह सवालों के जवाब मैं दूसरों से पूछती थी, लेकिन जब से i-सक्षम संस्था मेरे जीवन में आयी है तब से मुझे इन सवालों के जवाब स्वयं ही मिल जाते हैं।


शीतल कुमारी 

बैच 10, जमुई


Thursday, October 19, 2023

Rescuing Dreams: An i-Saksham fellow rekindles hope by bringing girls back to school in Bihar's remote and difficult areas

    Pooja, who joined MAITRI as a fellow, an initiative by Educate Girls implemented on the ground by i-Saksham on September 21, 2022, realized that despite the news headlines showcasing girls advancing and achieving new heights, rural India remains quite distant from the mainstream. Pooja, residing in the Amas block of Gaya, holds a bachelor's degree. When Pooja conducted surveys in 30-40 villages, she uncovered the harsh reality that girls were far from receiving an education. Many times, the girls themselves were reluctant to attend school. Pooja has so far visited 20 schools, facilitating the enrollment of over 100 girls. However, this journey was far from easy.

    n the primary school in the Amas block, there were two twin sisters who had been away from school for several years. It was as if they had never seen a school in their village. After conversing with their parents, Pooja collected all the necessary documents. However, the headmaster of the school denied the enrollment, as he considered the survey to lack legitimacy.

    During that same time, Pooja persuaded the Block Education Officer (BEO) and informed him that pressure was being exerted on her to not enroll children in school. After that, the BEO himself spoke to Pooja, saying that she could not compel anyone to enroll children in these schools. After all of this, Pooja had nothing in sight as to what she could do next. Nevertheless, she went back after a week, and with great persistence, she managed to enroll the twin sisters.

During the survey in villages to identify unenrolled girls, people often asked her various questions, such as, "Will this get us money?" or "What's the use of sending girls to school? They could be helping at home and earning some income." She was also inquired about i-Saksham and why she was conducting the survey.  Although many criticized her, seeing young girls doing household chores and working, Pooja couldn't help but think that if she didn't raise her voice and connect these girls with education, the situation would remain the same for generations to come. Denying girls an education would mean they could never voice their thoughts and stand against injustice. 

Pooja narrated the story of a village in the Amas block, where she met the mother of a girl who did not want to send her daughter to school. The mother was skeptical about the importance of education, as she had never received one. Pooja explained to her, "You don't understand the significance of education, that's why you're saying this. If you were educated, you would also send your daughter to school. But since you didn't receive an education, you're denying your daughter the same opportunity. When she grows up, she will impart the same lesson to her child, and she won't educate her either." After hours of explanation, the mother finally agreed to enroll her daughter in school. Nevertheless, when it came to gathering the necessary documents for admission, Pooja faced a challenge. Some documents were missing. In such a situation, Pooja took it upon herself to assist the girl's family in creating all the required documents, ultimately enabling the girl's enrollment.