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Friday, July 25, 2025

मुझे सिर्फ़ एक मौका चाहिए

कुछ दिन पहले मेरी मुलाक़ात स्वाति नाम की एक किशोरी से हुई, जिसकी उम्र लगभग 14-15 साल है। वह नया सुभानपुर, बछवाड़ा की रहने वाली है। स्वाति पहले स्कूल जाया करती थी, लेकिन अब कुछ समय से वह शांत और सहमी-सहमी सी रहने लगी थी।

जब मैंने धीरे से उससे बात की, तो उसने बताया – "दीदी, मेरी शादी तय कर दी गई है। मैं पढ़ना चाहती हूं, लेकिन मेरे घर में मेरी बात कोई नहीं सुनता।" स्वाति के गांव में ज़्यादातर लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाती है। यही कारण था कि उसके माता-पिता ने भी उसकी शादी तय कर दी थी।

स्वाति ने उन्हें समझाने की कोशिश की – कि वो अभी पढ़ना चाहती है, शादी नहीं – लेकिन जवाब में यही सुना: "इतना पढ़ा दिया, अब और क्या करेगी? जहां जाएगी, वहीं के लोग पढ़ा देंगे, नहीं तो घर का काम करेगी। लड़कियों का तो यही होता है।


"जब मैंने स्वाति के माता-पिता से बात की, तो वही पुरानी सोच सामने आई – "मैंने अपनी ओर से बहुत समझाया, लेकिन नहीं समझ पा रहे थे। "तब मैंने उनसे बस एक बात कही – "क्या आपने कभी अपनी बेटी से पूछा कि वो क्या करना चाहती है? क्या वो कुछ बनना चाहती है या सिर्फ घर का काम करना?

एक बार उससे पूछकर तो देखिए।" जब सामने से स्वाति से पूछा गया, तो वो डरते-डरते बोली – "मैं पढ़ना चाहती हूं, अभी शादी नहीं करना चाहती। आप बस मुझे एक मौका दीजिए।" स्वाति की बात सुनकर मैंने भी उन लोगों को अपनी कहानी सुनाई – मेरे गांव में भी यही होता था

जब मेरी शादी की बात चल रही थी, मैंने अपने पापा से सिर्फ इतना कहा – "क्या आप नहीं चाहते कि मैं पढ़-लिखकर कुछ बनूं?" बस, उस दिन से मेरी एक छोटी-सी कोशिश से मै आज पढ़ कर आगे बढ़ रही हूँ और आपलोग से भी मिलने आई हूँ। मेरी कहानी सुनकर उसके माता-पिता कुछ देर शांत रहे... फिर उसके पापा बोले – "अगर तू पढ़ना चाहती है तो ठीक है, अभी तेरी शादी नहीं करेंगे।" यह सुनकर स्वाति के चेहरे पर एक अलग ही चमक आ गई। उसे खुश देखकर मेरे दिल को बहुत ख़ुशी हुई।

प्रियंका, बड्डी 
बेगुसराई 


Saturday, June 21, 2025

"माँ बोली — अब हमारी बेटी हमारे से आगे जाएगी"

आज की मदर्स मीटिंग (Mother meeting) कुछ अलग ही रही। कुल 10 किशोरियों की माएँ आई थीं — हर चेहरे पर अपनापन, कुछ झिझक, लेकिन दिल में बहुत कुछ कहने की चाह।
जैसे ही मीटिंग शुरू हुई, मैंने सबसे पहले हाथ जोड़कर सबका स्वागत किया। बोली — "आप सबका आना हमारे लिए बहुत कीमती है।" फिर धीरे-धीरे बातों का सिलसिला शुरू हुआ। हमने पूछा  "आपको क्या करना अच्छा लगता है?" किसी ने कहा – "खाना बनाना", कोई बोली – "सिलाई", तो किसी को बच्चों को पढ़ाने में मज़ा आता है। उस पल मुझे महसूस हुआ, हर माँ के पास एक हुनर है, बस उसे पहचानने और अपनाने की ज़रूरत है।
बात जब उनके सपनों तक पहुँची, तो माहौल थोड़ा भावुक हो गया। कई माओं की आंखों में अधूरे सपनों की चमक थी। एक माँ बोली, “मैं डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन पंद्रह साल में शादी हो गई।” दूसरी बोली, “मुझे टीचर बनना था, पर घर वालों ने पढ़ने ही नहीं दिया।”
लेकिन इस अधूरेपन के बीच एक नई उम्मीद भी दिखी — उन्होंने कहा, “अब हम नहीं चाहते कि हमारी बेटियाँ जल्दी शादी करें। हम उन्हें पढ़ाएंगे, आगे बढ़ाएँगे।”
फिर हमने किशोरी कार्यक्रम और लाइफ स्किल्स के बारे में बताया — कि कैसे अब लड़कियाँ खुद के लिए फैसले लेना सीख रही हैं, और दस लोगों के बीच अपनी बात रखने की हिम्मत जुटा रही हैं। माओं को ये सब जानकर बहुत अच्छा लगा। एक माँ तो मुस्कुरा कर बोली, “अब लगता है कि हमारी बेटी हमारे से भी आगे जाएगी।”

मीटिंग के बीच मैंने अपना परिचय भी दिया। बताया कि मैं “i-सक्षम" से जुड़कर बदली — जो लड़की कभी अकेले घर से बाहर नहीं निकलती थी, वही अब मीटिंग ले रही है, सबके सामने खड़ी होकर बात कर रही है। ये मेरे लिए छोटा नहीं, बहुत बड़ा बदलाव है।

रौशनी कुमारी,
बैच-12 , बेगूसराय
एडू लीडर



Friday, April 18, 2025

गाँव की लड़की, और अब समुदाय की उम्मीद

मै उस गॉव की लड़की हूँ, जिसने कभी सोचा भी नहीं था की शिक्षा एक माध्यम बन सकती है- खुद को जानने, समझने और समाज में बदलाव लाने का। लेकिन आई-सक्षम फैलोशिप ने मुझे यही अवसर दिया। 
इन दो वर्षो में मैंने केवल शिक्षिका की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि एक सुनने वाली साथी, सिखने वाली छात्रा, और नेतृत्व करने वाली दीदी के रूप में भी खुद को ढाला। बच्चो के साथ दिन के शुरुआत, मोहल्ला कक्षाओं में रचनात्मक गतिविधियाँ, और समुदाय के साथ सार्थक सवांद – ये मेरी प्रतिदिन की दिनचर्या का हिस्सा बन गए।

फेलोशिप के दौरान मैंने यह जाना की आत्मा-विश्लेषण और आत्मचिंतन कितने जरुरी हैं। “बढ़ते कदम” जैसे चिंतन-पत्रकों ने मुझे अपने विचारों को शव्द देने की कला सिखाई। जब मेरे साथी मेरी बातो को पढ़ते और सुझाव देते, तो लगता जैसे हम सब मिलकर एक-दुसरे को आगे बढ़ा रहे हैं।
मेरे गाँव में अब लोग मुझे सम्मान से ‘दीदी’ कहते है – वह दीदी जो सुनती है और साथ चलती है। आज मै पुरे विश्वास से कह सकती हूँ की यह यात्रा केवल शिक्षण की नहीं, बल्कि एक सशक्त स्त्री बनने की यात्रा थी।

तनु प्रिय

बैच -10  

बेगुसराई



Saturday, February 1, 2025

दो वर्षों का सीखने और बदलने का सफर: मौसम की प्रेरणादायक कहानी

मुझे बहुत कुछ सिखाया और मेरे जीवन में गहरे बदलाव लाए।  तीन मुख्य बदलाव मेरे जीवन में आए हैं, जिन्हें मैं आपसे साझा करना चाहती हूँ।
व्यक्तिगत विकास: सबसे पहला बदलाव यह है कि अब मैं अपने लक्ष्यों को निर्धारित कर पाती हूँ और उन्हें प्राप्त करने के लिए मेहनत करती हूँ। पहले मैं अपने गोल बनाने और उन्हें पाने के बारे में नहीं सोच पाती थी। यह आत्मविश्वास और लक्ष्य निर्धारण की कला मैंने i-सक्षम के माध्यम से सीखी।
समुदाय में संवाद कौशल: पहले मैं अपने समुदाय के सामने अपनी बात नहीं रख पाती थी। लेकिन जब मैंने समुदाय में काम करना शुरू किया, तो मैं लोगों से जुड़ाव बनाने लगी और अपनी राय खुलकर व्यक्त करने लगी। अब मैं बिना झिझक अपनी बातें सामने रखती हूँ और दूसरों के विचारों को भी महत्व देती हूँ।
विद्यालय में शिक्षण क्षमता: विद्यालय में बच्चों को पढ़ाने के दौरान मैंने कई नई बातें सीखी हैं। अब मैं एक्टिविटी आधारित शिक्षण करती हूँ, जिससे बच्चे न केवल सीखते हैं बल्कि कक्षा में आनंद भी महसूस करते हैं। मैंने सेशन प्लानिंग करना सीखा है, जिसके अनुसार मैं बच्चों को पढ़ाती हूँ। इससे बच्चे कक्षा में कभी बोर नहीं होते।
PTM का नया अनुभव: पहले बच्चों में PTM (Parents-Teacher Meeting) को लेकर डर रहता था। बच्चे अपने माता-पिता को बुलाने से कतराते थे क्योंकि उन्हें शिकायत की आशंका रहती थी। लेकिन मैंने बच्चों और अभिभावकों के साथ संवाद करके यह डर दूर किया। अब बच्चे बिना किसी डर के अपने माता-पिता को PTM के लिए बुलाते हैं। PTM में शिकायत करने के बजाय हम माता-पिता को यह समझाते हैं कि अपने बच्चों को बेहतर तरीके से कैसे प्रोत्साहित करें।

i-सक्षम की सीख:- i-सक्षम में जो भी नियम और प्रक्रियाएँ हैं, उन्होंने मुझे जीवन के महत्वपूर्ण सबक सिखाए हैं। मंथली बॉडी टॉक के दौरान हम अपनी परेशानियाँ साझा करते हैं और बॉडी हमें उन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रक्रिया से मुझे अपनी कमजोरियों और खूबियों का पता चला।

मंथ में होने वाले सेशन्स ने मुझे यह सिखाया कि हिंसा के खिलाफ आवाज उठाना और अपनी पहचान बनाना कितना महत्वपूर्ण है। इसके अलावा क्लस्टर मीटिंग्स के माध्यम से हमने एक-दूसरे से विचार साझा किए और कम्युनिटी में आने वाली चुनौतियों का समाधान पाया।

मौसम कुमारी
बैच-10
बेगुसराई



Tuesday, December 31, 2024

परिवार की जिम्मेदारियों को संभालना और खुद में बदलाव लाना

 परिवार की जिम्मेदारियों को संभालना और खुद में बदलाव लाना

 i-सक्षम से जुड़ने के बाद मेरी जिंदगी में जो बदलाव आए, उन्हें मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। यह सफर न केवल मेरे व्यक्तित्व को निखारने का रहा है, बल्कि मुझे आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने का भी रहा है।

शुरुआत और बदलाव की ओर पहला कदम

डेढ़ साल पहले, जब मैंने i-सक्षम से जुड़ने का फैसला किया, तब मैं एक साधारण लड़की थी, जो घर और स्कूल की चारदीवारी तक सीमित थी। मुझे यह भी नहीं पता था कि किसी के साथ बातचीत कैसे की जाती है। धीरे-धीरे मैंने सीखा कि कैसे किसी से संवाद करना है, अपनी बातों को आत्मविश्वास के साथ रखना है और दूसरों की मदद के लिए आगे आना है।


पहले मैं अपने ही जिले, बेगूसराय, जाने से डरती थी। अगर कहीं जाना होता था, तो मां या भाई का साथ जरूरी था। लेकिन i-सक्षम ने मुझे वह आत्मविश्वास दिया, जो मुझे अपनी सीमाओं को पार करने में मदद करता है। आज मैं अकेले दिल्ली जैसे बड़े शहर में चार बार आ-जा चुकी हूं। यह अनुभव मेरे लिए किसी सपने से कम नहीं था।

मेरे भाई और पापा बाहर जॉब(Job) करते हैं। जिसके वजह से घर पर नहीं रहते हैं। जो काम लोगों के घरों में पापा या भाई करते हैं, वो सब 

मैंने किया है, जैसे कि राशन कार्ड में नाम जुड़ना, ब्लॉक जाना, हिसाब-किताब और खेतों के कामकाज तक, हर जिम्मेदारी निभाई। जब पापा और भाई कहते हैं, "तुम हमारा दायां हाथ हो," तो मेरा दिल गर्व से भर जाता है। 

स्कूल में बदलाव
मैंने अपने घर के साथ-साथ स्कूल में भी बदलाव लाने की कोशिश की। मैंने बच्चों को साफ कपड़े पहनकर आने, बैग चेक करके लाने, बाल अच्छे से बांधने और रोज़ चप्पल पहनने जैसी आदतें सिखाईं। मैंने उन्हें सिखाया कि कचरा कूड़ेदान में डालें और एक-दूसरे की मदद करें। आज, जब मैं स्कूल नहीं जाती, तो भी वहां वही अनुशासन और आदतें देखने को मिलती हैं, जो मैंने वहां विकसित की थीं। शिक्षक के साथ जुड़ पाए एक-दुसरे पे विश्वास करना

चुनौतियों का सामना
इस सफर में मुझे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अकेले कहीं जाने का डर मुझे हमेशा सताता था। मैं बहुत दूर तक पैदल चल जाती, लेकिन उस गाड़ी में कभी नहीं बैठती, जिसमें महिलाएं नहीं होतीं। धीरे-धीरे मैंने अपने डर को हराना सीखा। स्कूल में भी, जब मैंने बदलाव का कोई कदम उठाया, तो हेडमास्टर सर कई बार रोक देते थे। लेकिन मेरे काम को देखकर उन्होंने भी मुझ पर भरोसा करना शुरू कर दिया।
आत्मनिर्भरता और गर्व
आज मैं जो कुछ भी कर रही हूं, वह न केवल मेरे लिए, बल्कि मेरे परिवार, गांव और स्कूल के लिए भी गर्व का विषय है। i-सक्षम ने मुझे वह सशक्त पहचान दी, जो हर लड़की का सपना होती है। अब मुझे लगता है कि कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती, बस हमें अपनी सोच और आत्मविश्वास को मजबूत रखना होता है।

अंशु 

बैच-9, बेगूसराय 


Saturday, October 5, 2024

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (APU), भोपाल Chapter 1- डर और आशंकाएँ

नमस्ते साथियों,


मैं आरती कुमारी i-सक्षम संस्था में एडु-लीडर रह चुकी हूँ। आज मैं आप सभी के साथ अपनी शुरूआती यात्रा और अनुभव को साझा करना चाहती हूँ।  


मेरी इस यात्रा में कई उतार-चढ़ाव रहे हैं, लेकिन यह एक ऐसा अनुभव साबित हुआ जिसने मेरी सोच और आत्मविश्वास को हमेशा के लिए बदल दिया। APU में आने से पहले मेरे मन में बहुत सी आशंकाएँ थीं। पहली बार अपने घर, और शहर से बाहर निकलना मेरे लिए बहुत बड़ा कदम था। 

मुझे हमेशा से यह चिंता सताती रहती थी कि क्या मैं इस नए माहौल में खुद को ढाल पाऊंगी?

क्या मैं नए लोगों के साथ तालमेल बिठा पाऊंगी? 

क्या मैं इस नई शिक्षा को समझ पाऊंगी?



जब APU में एडमिशन मिला, तो मुझे खुशी तो हुई लेकिन इसके साथ ही एक अनजाना सा डर भी मन में था। यह डर और चिंता मेरे मन में तब तक घर किये रहा, जब तक कि मैंने APU में कदम नहीं रखा। 


APU में नया माहौल और नए व्यक्तियों से मिलने के बाद मेरी सारी आशंकाएँ धीरे-धीरे दूर होने लगीं। मैंने महसूस किया कि यह एक ऐसा स्थान है, जहाँ सभी को समान रूप से देखा जाता है। चाहे उनकी जाति, भाषा, या विचारधारा कुछ भी हो। 


यहाँ के लोगों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। जिससे मेरे अंदर का डर धीरे-धीरे खत्म होने लगा। यहाँ, सहपाठियों ने भी मुझे बहुत प्रोत्साहित किया। सभी छात्र यहाँ सीखने के लिए उत्सुक और खुले दिमाग (open-minded) वाले हैं। मैंने देखा कि हर किसी के पास अपनी एक कहानी और अनुभव है और वे सभी एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने को तैयार हैं। मेरी भी कोशिश रहती है कि उनसे कुछ नया सीखूं।


यहाँ के फैकल्टी मेंबर्स (faculty members) न केवल विषय के विशेषज्ञ हैं, बल्कि वे छात्रों के साथ जिस तरीके से बात करते हैं वो भी है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि वो सिर्फ हमें पढ़ाते नहीं हैं, बल्कि हमें सोचने, सवाल करने और खुद से उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके पढ़ाने का तरीका बाकी जगहों से बिल्कुल भिन्न है। 

शिक्षक हमें सिर्फ जानकारी नहीं देते, बल्कि हमें उन जानकारियों को अपने जीवन और समाज के संदर्भ में समझने और लागू करने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने मुझे यह सिखाया कि शिक्षा का असली मतलब केवल किताबों तक सीमित नहीं होता बल्कि किताबें हमें जीवन और समाज के बारे में भी समझाती हैं। शिक्षकों के साथ संवाद करना भी बेहद आसान है। वो हमेशा हमारी समस्याओं को सुनने और उनके समाधान में मदद करने के लिए तैयार रहते हैं।


APU में आए हुए मुझे एक महीने से अधिक समय हो चुका है, लेकिन यह समय इतनी जल्दी बीत गया कि मुझे इसका अहसास भी नहीं हुआ। इस एक महीने में मैंने न केवल अपने विषयों के बारे में बहुत कुछ सीखा है बल्कि खुद के बारे में भी मैंने कुछ बातें जानी हैं। मैंने यहाँ सीखा कि असली शिक्षा केवल किताबों में नहीं होती, बल्कि हमारे आस-पास के लोगों, हमारे अनुभवों और हमारे विचारों में भी होती है। APU ने मुझे यह सिखाया है कि शिक्षा का मतलब केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं है, बल्कि उस ज्ञान को समझना और उसका सही उपयोग करना भी है।


इस यात्रा को संभव बनाने के लिए मैं i-सक्षम के सभी सदस्यों की आभारी हूँ। जिन्होंने मुझे यहाँ तक पहुँचाने में सहायता की। आपके समर्थन और मार्गदर्शन के बिना यह संभव नहीं हो पाता। आप सभी का सहृदय धन्यवाद।


आरती कुमारी

बैच-10 (बी), बेगूसराय 

 

Friday, September 6, 2024

फ़ेलोशिप करने के उपरांत मैं अधिक संवेदनशील, आत्मविश्वासी और एक ज़िम्मेदार नागरिक बनी हूँ- भाग्यश्री

नमस्तें साथियों, 

आज मैं आपलोगों के साथ स्वयं के बारे में कुछ बातें साझा कर रही हूँ। मैं i-सक्षम संस्था में बैच दस की एडु-लीडर हूँ। मैं बेगूसराय के तेघरा ब्लॉक में रहती हूँ। i-सक्षम में जुड़ने के बाद मैंने कई सारे बदलाव महसूस किये हैं, जो इस प्रकार हैं। 


  • शुरू-शुरू में मुझे नए लोगो से बात करने में बहुत संकोच और असहजता होती थी। मैं बिना कुछ सोचे समझे बोल दिया करती थी। ऐसा कह सकते हैं कि मैं सही से बात नहीं कर पाती थी। मैंने फ़ेलोशिप के सेशंस (sessions) अटेंड (attend) करते समय पाया कि अब मैं अपनी बात दूसरों के सामने रखने लगी हूँ। मेरे बात करने के तरीके में भी बदलाव आया है। 

  • लोगो के साथ सहजता से बात करने के लिए मैंने विभिन्न तरीकों को अपनाया और अपने विचारों को स्पष्ट और संक्षिप्त तरीके से प्रस्तुत करना सीखा।

  • पहले मैं अकेले कहीं जाने से कतराती थी। अधिकतर समय मेरे घरवाले (भाई या पापा) ही मेरे साथ जाते थे। अब मेरे लिए अकेले बाहर जाना भी आनंदमय अनुभव होता है। मुझे अपने बारे में यह भी पता चला कि मुझे नयी जगहों की खोज करना स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता का एहसास कराती है।

  • पहले मुझे प्रत्येक छोटी बात पर गुस्सा आता था। बढ़ते कदम में छोटे-छोटे गोल्स (goals) बनाकर, क्लस्टर मीटिंग में प्रस्तुत करने से मुझे लाभ हुआ। मेरे फेलो (fellow) साथियों के द्वारा दिए गए परामर्श, फीडबैक (feedback), योग, ध्यान और स्व-विश्लेषण की मदद से मैंने अपने गुस्से को नियंत्रित करना सीखा। इससे मुझे ना सिर्फ मानसिक शांति मिली बल्कि मैंने खुद के व्यव्हार में भी सुधार किया। 


दूसरों को समझने का प्रयास करना और उनकी भावनाओं को समझना मेरे लिए अब बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। सहानुभूति और समझ वाला सेशन (session), मेरे व्यक्तिगत और पेशेवर रिश्तों को मजबूत करने में सहायक रहा। खुद भी अब लोगो को समझने का प्रयास करती हूँ, और सामने वालों की बातों को ध्यान से सुनती भी हूँ। 

कहते भी हैं ना कि, “किसी की बात को ध्यान से सुनना, उनके लिए सबसे से बड़ा तोहफा होता है”। 


मेरे भीतर आये सभी बदलावों और मेरी खूबियों को पहचानने में मेरी मदद करने का श्रेय मैं i-सक्षम की टीम को देना चाहती हूँ। मेरी फ़ेलोशिप यात्रा ने मुझे पहले से अधिक संवेदनशील, आत्मविश्वासी और एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में उभारा है। 

मैंने अपनी खुद की पहचान भी बनायी। मैं बच्चों, विद्यालय और समाज से भी जुड़ पायी। यह कार्य करने में मुझे मेरे फेलो साथियों और टीम मेम्बेर्स ने कभी मित्र बनकर, तो कभी भाई-बहन बनकर मेरा सहयोग किया। इसके लिए मैं आप सभी का आभार व्यक्त करती हूँ। 


भाग्य श्री,

बैच-10, बेगूसराय 


Wednesday, July 24, 2024

मुझे सक्षम बना रही है फ़ेलोशिप- निभा

आज मैं आप सभी के साथ अपने जीवन की कुछ विशेष बातें, जिनका मुझ पर प्रभाव पड़ा है, साझा रही हूँ। कक्षा एक से पाँच तक मेरी बड़ी बहन ने मेरी पढ़ाई में मदद की। जब मैं कक्षा छः में गयी तो मुझे कोचिंग पढ़ने का मौका मिला जो घर से कुछ दूरी पर था।

 

तीन महीने बाद जब कोचिंग में टेस्ट (test) हुआ तो मैं उसमें टॉप 10 में आयी। जिससे वहाँ के स्टूडेंट मेरे से सही से बातचीत करने लगे और धीरे-धीरे मेरे दोस्त बनने लगे। एक बार मेरी कोचिंग में एक टेस्ट हुआ। जिसमें मैं प्रथम आई और मुझे जूनियर इंग्लिश ग्रामर (English Grammar) की किताब मिली। वहाँ एक लड़की थी जो मुझे पसंद नहीं करती थी, मेरे ऐसे प्रथम आना और पुरस्कार मिलना उसे अच्छा नहीं लगा।


एक दिन मैं कक्षा से बाहर गयी हुई थी। जब वापस आयी तो मैंने देखा कि मेरी चीजें नीचे फेंकी हुई थी। जब मैंने सबसे पूछा कि यह किसने किया है?


वो ज़ोर से चिल्लाने लगी और बोली कि मैंने किया है।


दूसरे दिन उसने अपने पापा को बुलाया और उस कोचिंग के डायरेक्टर से बात करके मुझे कोचिंग से निकलवा दिया। उसके पापा ने इस काम के लिए कुछ पैसे भी दिए। मुझे बहुत बुरा लगा था। कोचिंग से निकाले जाने के बाद मैंने खुद से ही घर में पढ़ाई करना ज़ारी रखा।

 

मैंने दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। ग्यारहवीं में मैंने जीवविज्ञान विषय लेने का सोचा और मन बनाया कि किसी अच्छे बाहर के शिक्षक से जीवविज्ञान पढूंगी। इसी बीच मेरी दीदी की शादी हो गयी और मैं अकेले पड़ गयी। पापा की तबियत भी ज्यादा खराब होने के कारण 20 दिन ता क्वो हॉस्पिटल में ही भर्ती रहे।


घर की आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ गयी कि मैं बाहर जाकर पढ़ना तो दूर, घर में ही पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पायी। इस तरह बिना पढ़े ग्यारहवीं निकल गयी और 2020 में (बारहवीं में) मेरी दीदी और दादी का देहांत कोविड-19 के कारण हो गया था।

 

उस समय घर में बिना किसी के दिशा-निर्देश के पढ़ाई करना मेरे लिए कठिन हो रहा था। मेरे पास स्मार्ट फ़ोन या इन्टरनेट जैसी सुविधाएँ भी नहीं थी जिसके माध्यम से मैं घर में पढ़ाई कर पाती। फरवरी 2021 में मैंने बारहवीं की परीक्षा अछे अंको से उत्तीर्ण की।

 

फिर मैंने बीएससी कोर्स में कॉलेज में नामांकन कराया और घर पर ही रहकर पढ़ने लगी। 2022 में i-सक्षम के कुछ लोग मेरे घर आये तब मुझे फ़ेलोशिप के बारे में जानकर बहुत ख़ुशी हुई थी। आज मैंने अपनी फ़ेलोशिप के डेढ़ वर्ष पूरे कर लिए हैं, मुझे इस बात पर भी गर्व है।

 

पहले मैं अकेले रहना पसंद करती थी। लोगो से बातें करना, हँसना, मिलना-जुलना मुझे पसंद नहीं था। कम्युनिटी में जाकर बात करना तो बहुत बड़ी बात थी। मुझ में आत्म-विश्वास की बहुत कमी थी। मैं अपने लिए आवाज तक नहीं उठा पाती थी।

 

वहीँ आज मैं अपने लिए तो क्या दूसरों के लिए भी पक्ष ले सकती हूँ। घर से बाहर अकेले जा सकती हूँ। ना सिर्फ तेघरा, बेगूसराय या बाज़ार बल्कि पटना तक अपना डी.एल.एड का एग्जाम देने अकेले ही गयी थी। कम्युनिटी के लोगो से किसी भी टॉपिक पर बात कर सकती हूँ। मैं अपने निर्णय खुद लेने में सक्षम हुई हूँ और परिवार के लोग भी मेरी बातें मानने लगे हैं।


मुझे बच्चों को सिखाने का भी एक अवसर मिला, जो मुझे बहुत पसंद भी आया।


 


यह सब बदलाव हो पाए क्योंकि हमारा अलग-अलग तरीकों से क्षमतावर्धन के सेशंस (sessions) होते रहते हैं। जैसे- आइडेंटिटी, ताकत और कमजोरी, आइसबर्ग, एजेंसी आदि। बढ़ते कदम, बडी टॉक और वीकली कॉल्स में छोटे-छोटे गोल बनाकर उनपर आगे बढ़ने से भी मुझे खुद में बहुत सुधार दिख रहे हैं।


अभी फ़ेलोशिप के छ: महीने और बाकी हैं और मैं भी अभी बहुत कुछ सीखने के लिए आतुर हूँ।

 

निभा

बैच-10, बेगूसराय


Friday, August 4, 2023

"Know Yourself, Change the World" - the golden words Anshu Kumari embraced from a session on "Identity" !


 

Anshu's story is about her strong determination and leadership in a rural village in Begusarai, Bihar. Despite facing challenges and traditional expectations, she showed great courage in creating her own path. Anshu is the only girl in her village who completed her graduation before marriage, choosing to pursue higher education despite financial difficulties. Her dreams go beyond the usual roles assigned to women in her community. In her recent reflection sharing, she shared about her village, education levels, aspirations of girls and women and her own ambitions. Through her note, one ca understand how- despite negative comments and pressure from villagers who believed she should marry early and focus on household duties, Anshu remained firm in breaking free from gender stereotypes. She didn't want to end up like her mother, who had an education but ended up working in the fields. Instead, she aimed to be recognized and set an example for other girls.

In 2023, Anshu joined the i-Saksham edu-leaders fellowship programme in Begusarai, which opened up new possibilities for her. Here she learned and gained a fresh understanding of her surroundings.

During a session on "Identity," Anshu's thoughts deeply impacted her fellow participants. She came to realize the importance of understanding one's own likes, dislikes, voice, and choices to set clear goals and remain true to oneself. 


Anshu shared, "It became a way of life for all the edu-leaders to appreciate differences and stay true to ourselves."

"पहचान" सत्र में हमारे अनुभव ने हमें हमारी पसंद और नापसंद को समझने में मदद की। हमारी आवाज़ और चुनौती को भी समझने का मौका मिला। हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण था क्योंकि हमारी पसंदों को समझकर हम स्पष्ट लक्ष्य तय कर सकते हैं। हमारी पसंद दूसरों से अलग हो सकती हैं, और अगर हम समूह के दबाव में आकर अन्यायी काम करते हैं, तो हमारी असली पहचान को नुकसान हो सकता है, जिससे हमारे सफलता में कमी आ सकती है और हमारी आवाज़ और चुनौती का संक्षिप्त होना सकता है।"

[Our experience from the session yesterday on Identity was about understanding our likes and dislikes, including our voice and choice. It was essential for us to know more about ourselves because without knowing our preferences, we cannot set clear goals. Our likes might differ from others, and if we succumb to peer pressure, we may do things that don't align with our true selves, leading to a lack of success and a loss of our voice and choice] writes Anshu in her deep reflection note.

In her village, Anshu recognized the need to challenge harmful beliefs and practices that limit girls' opportunities, such as child marriage and menstrual taboos. Her vision of equality and empowerment resonated deeply with the fellowship, and they pledged to dismantle such customs and foster an inclusive society.

Anshu's leadership traits stand out through her strong determination, dedication to making a difference, and the positive influence she has had in her community in a short time. Her journey from a protected life at home to becoming a source of hope for other girls highlights the power of education and self-awareness to bring about meaningful change.

In the words of Anshu herself, "I aim to challenge harmful practices and beliefs, proving that girls are no less than boys in any aspect and to be the one people give an example of how a girl should be like - audacious, kind and ambitious despite all barriers."

While she was initially disregarded as a naive village girl by teachers and elders there, to be even being placed in the school to assist in teaching as part of her fellowship, she persisted and applied her fellowship learning in the classrooms. Her dedication and passion for education transformed the attitudes of her critics, who now respect her work in the school and community.

Anshu knows how fortunate she is to have her family's backing in her journey of learning, exploring, and growing as a person. Unlike many of her friends, her family doesn't rush to marry her off. Anshu strongly believes that proving the importance of education, freedom, and family support to the community and society around her is so crucial. This belief fuels her determination to make a positive impact and inspire other families with daughters to stand against societal pressures. She wants to influence parental mindsets and create a significant change in the lives of countless girls who face early school dropouts due to early marriages, and other societal expectations from girls. Her reflection reminds us that real leaders emerge when they bravely challenge the status quo and work towards a better future.


Anshu Kumari is from Begusarai Bihar, an Edu-leader from the 10th Cohort (2023) undergoing the i-Saksham edu-leaders' fellowship programme.