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Friday, October 18, 2024

प्राइवेट स्कूल में नामांकन होने की आशंका से सरकारी स्कूल से नामांकन कटा

आज मैं तीन स्कूलों और गांवों में गई, जहाँ का अनुभव साझा करना चाहूंगी। सबसे पहले, मैं महापुर गांव गई और सीमा दीदी को साथ लेकर गई क्योंकि यहाँ दो लड़कियाँ थीं जो बिल्कुल भी सुनने को तैयार नहीं थीं। जब भी उन्हें स्कूल ले जाने की कोशिश की जाती, वे या तो जंगल चली जातीं, या कहीं छिप जातीं, या फिर घर में ही रहतीं। उनके माता-पिता भी अब थक चुके थे क्योंकि वे भी उन्हें समझाने की कोशिश करते, लेकिन लड़कियाँ सुनती ही नहीं थीं।

जब हमने उनकी माँ से बात की, तो वह बोलीं कि उन्होंने कई बार बच्चियों को स्कूल भेजने की कोशिश की है, लेकिन वे नहीं सुनतीं और उल्टा लड़ने लगती हैं। इस स्थिति को देख हम भी असमंजस में थे कि अब क्या किया जाए!

आज जब हम वहाँ गए तो एक लड़की जिसका नाम काजल कुमारी था, की भाभी से बात की। उन्होंने बताया कि काजल धान की रोपाई के लिए दूसरे गांव गई है और आठ दिन बाद वापस आएगी। हमने उनसे कहा कि आप काजल को स्कूल क्यों नहीं भेजतीं, तो भाभी ने जवाब दिया कि हम उसे समझाते हैं लेकिन वह नहीं मानती।

फिर हम दूसरी लड़की के घर गए। उसकी माँ ने बताया कि वह प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई कर रही है। हमने कहा, "ठीक है, लेकिन कम से कम हफ्ते में दो दिन तो उसे सरकारी स्कूल भेज सकते हैं, ताकि उसका नामांकन कटा न हो।" इस पर उनकी माँ ने हामी भरी, लेकिन आधार कार्ड में गलती की वजह से समस्या थी। हमने उन्हें आधार कार्ड लेकर नाम चढ़वाने को कहा, लेकिन उन्होंने समय की कमी का हवाला दिया।


इसके बाद हम M.S. वृंदावन स्कूल गए, जहाँ प्रिंसिपल से बात की। उन्होंने बताया कि एक बच्ची का नाम उन्होंने काट दिया है क्योंकि वह प्राइवेट स्कूल में पढ़ने जाती है। हमने उनसे कहा कि बच्ची अब से नियमित रूप से सरकारी स्कूल आएगी, इसलिए उसका नामांकन वापस चढ़ा दें। लेकिन प्रिंसिपल ने कहा कि जब तक वह लगातार दो महीने स्कूल नहीं आएगी, तब तक नामांकन नहीं होगा। हमने बच्ची के अभिभावकों को भी बुलाया, लेकिन प्रिंसिपल नहीं माने। हमने दो घंटे तक बैठकर उनसे रिक्वेस्ट (request) की, लेकिन कोई हल नहीं निकला। अंत में, हमने वहाँ दो अन्य बच्चों का रिटेंशन किया।

इसके बाद, P.S. महापुर स्कूल में दो बच्चों का रिटेंशन हुआ। फिर हम सांवला गए, जहाँ एक बच्ची का रिटेंशन करना था। उसकी माँ ने बताया कि बच्ची बहाने बनाती है कि उसकी कॉपी नहीं है और स्कूल नहीं जाती। जब हम मैडम को लेकर गए, तो पता चला कि वह बच्ची मानसिक रूप से दिव्यांग है। मैडम ने कहा कि वह स्कूल नहीं जा पाएगी, इसलिए हम बेवजह परेशान हो रहे हैं।

अंजना वर्मा
मैत्री प्रोजेक्ट, गया


गया: मैत्री प्रोजेक्ट के तहत रिटेंशन की चुनौतियाँ और प्रयास

मैत्री टीम की ट्रेनिंग के बाद, मैंने और साक्षी दीदी ने मिलकर गया टीम के सदस्यों को रिटेंशन के तरीकों के बारे में सिखाया। सबसे पहले, सभी को PMS सिस्टम में लॉगिन कराया गया और रिटेंशन के नियमों को अच्छे से समझाया गया। नियम यह था कि केवल उन्हीं बच्चों का रिटेंशन किया जाए, जो पहले से ही स्कूल आ रहे थे। जो बच्चे लंबे समय से स्कूल नहीं आ रहे थे, उन्हें बाद में रिटेंशन किया जाएगा, जब वे नियमित रूप से स्कूल आना शुरू कर देंगे।


सभी एडू लीडर्स ने अपने-अपने कक्षाओं में बच्चों की जाँच की और जो बच्चा नियमित रूप से स्कूल आ रहा था, उसका रिटेंशन किया। इस प्रक्रिया में कई चुनौतियाँ सामने आईं। एक दिन, जब सभी एडू लीडर्स स्कूल से ऑफिस आए, तो उन्होंने अपनी-अपनी चुनौतियों को सभी साथियों के सामने रखा। हर किसी की समस्या अलग-अलग थी। इसके बाद, सभी साथियों ने मिलकर इन चुनौतियों का समाधान खोजा।

भालुहार गाँव की चुनौती:

भालुहार गाँव में एक बच्ची थी, जो प्रतिदिन स्कूल जाती थी। जब वहाँ के प्रधानाध्यापक अशुतोष कुमार से हमारे प्रयासों में मदद करने की बात कही गई, तो उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। जब खुशबू दीदी और प्रीति दीदी वहाँ गईं, तो प्रिंसिपल ने कहा कि वे हमें नहीं जानते और उन्होंने डाटा देने से मना कर दिया। प्रमोद भैया भी वहाँ गए, लेकिन स्थिति नहीं सुधरी।

प्रीति दीदी और मैंने मिलकर योजना बनाई कि हम दोनों खुद वहाँ जाएँगे। जब हम पहुँचे, तो प्रिंसिपल ने फिर से वही व्यवहार किया। लेकिन हम धैर्यपूर्वक उनसे बात करते रहे। हमने कक्षा में जाकर सभी बच्चों को बुलाया और प्रिंसिपल को स्थिति समझाई, लेकिन उन्होंने फिर भी डाटा देने से मना कर दिया। अंत में, कक्षा के शिक्षक ने सहयोग किया और हमें डाटा दिया।

B.T. बिगहा की समस्या:

B.T. बिगहा गाँव में चार बच्चे ऐसे थे, जिनमें से दो बच्चे गाँव छोड़ चुके थे, और बाकी दो बच्चे पढ़ाई के लिए तैयार नहीं थे। गया की पूरी टीम ने मिलकर इन बच्चों को प्रेरित करने का प्रयास किया। जब हमने उनकी माँ से बात की, तो उन्होंने कहा कि बच्चे पढ़ाई के लिए तैयार ही नहीं हैं, और उन्होंने भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

जीविका दीदी से मदद:

जब माता-पिता से बात करने पर भी कोई सुधार नहीं हुआ, तो मैं और प्रमोद भैया जीविका दीदी (सुनीता कुमारी) से मदद लेने गए। हम तीनों फिर से बच्चे के घर गए। जब हम पहुँचे, तो बच्ची की माँ घर पर नहीं थी, और पापा ने बात करने से मना कर दिया। फिर बच्ची की दादी ने भी यह कहकर बात टाल दी कि जब बच्ची पढ़ना नहीं चाहती, तो उसे छोड़ दीजिए।
जीविका दीदी ने बच्ची से कहा, "अगर तुम नहीं पढ़ोगी, तो माँ-पापा को पुलिस पकड़कर ले जाएगी।" लेकिन बच्ची ने फिर भी मना कर दिया और बोली, "अगर जेल भी जाना पड़े, तो चले जाएँगे, लेकिन पढ़ने नहीं जाएँगे।" इस पर हम तीनों उदास हो गए, लेकिन हमने हार नहीं मानी।

परिणाम और सीख:

रिटेंशन की अंतिम तिथि आ गई थी, और हमें कुछ बच्चों को छोड़ना पड़ा। इस अनुभव से हमने सीखा कि कुछ बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए लगातार प्रयास करने की आवश्यकता होती है।

श्रृंखला कुमारी
मैत्री प्रोजेक्ट, गया


मैत्री प्रोजेक्ट में दो वर्षों का अनुभव- अभिषेक

नमस्ते साथियों,

मैं बैच पाँच का फेलो था। फेल्लोशिप समाप्त होने के बाद मेरा चयन मैत्री प्रोजेक्ट में हुआ। मुझे अभी भी याद है कि इस प्रोजेक्ट में चयन होने के कारण मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी। शुरूआत में गाँव में सर्वे (survey) करने में कठिनाई हो रही थी परन्तु धीरे-धीरे मुझे यह कार्य करने में मज़ा आने लगा।

मैत्री प्रोजेक्ट: आउट ऑफ़ स्कूल (Out of school) लड़कियों को स्कूल से जोड़ना और उनका रिटेंशन (retention) करना इस प्रोजेक्ट का अहम उद्देश्य है। 

प्रोजेक्ट की अवधि 21 सितम्बर 2022 से 31 अगस्त 2024 थी। मैंने अपनी पञ्चायत तक के सभी गाँव नहीं देखे थे, और मैत्री प्रोजेक्ट के अंतर्गत मैंने मुंगेर जिले के चार ब्लॉक क्रमशः बरियारपुर, धरहरा, मुंगेर सदर, और जमालपुर के लगभग एक सौ गाँवों का सर्वे किया। जमुई के कुछ गाँव भी मेरे सर्वे का हिस्सा रहे। 

समस्याएँ और समाधान: 

सर्वे करने के दौरान हमारी टीम के साथियों को बहुत परेशानियाँ हो रही थी। जैसे- सर्वे के दौरान, सम्मानपूर्वक बात ना करना, डांट कर भगा देना और बदतमीज़ी करना आदि। 

  • परेशानियों के साथ-साथ मदद के हाथ भी आगे आये। मदद करने वाले लोगो में मुखिया, वार्ड सदस्य और आम ग्रामीण लोग थे। 

  • शिक्षा के प्रति बच्चों और अभिभावकों में जागरुकता की कमी भी एक अहम समस्या रही।

  • हम ऐसे गाँवों में भी गए जहाँ तक किसी प्रकार की कोई सड़क नहीं जाती है, पक्के घर नहीं हैं। इस प्रकार के कुछ गाँव मन कोटिया, गोपाली चेक, ब्लॉक धरहरा में है। यहाँ लड़कियों को विद्यालय आने-जाने को लेकर अलग समस्याएँ थी। उनके अभिभावक भी इन समस्याओं के बारे में नहीं जानते थे। जिसको हमने अभिभावकों से लगातार बात करके हल किया।

  • जब हम आर.एन. मुसहरी टोला (बदला हुआ नाम) की दो बच्चियों का नामांकन कराने के लिए उन्हें विद्यालय लेकर गए तो वहाँ के प्रधानाध्यापक का कहना था कि आप दोनों गोरा होने वाली क्रीम (Fair&Lovely) लगा कर ही विद्यालय आ सकते हैं। ऐसे शब्द सुनकर किसी भी बच्ची का मनोबल टूट जाता। हमारी टीम ने दोनों पक्ष के साथ लगातार समय दिया और जातिवाद को किनारे करने के लिए बहुत समझाया।

  • गौरीपुर में हमारे काम करने के तरीके को लेकर भी प्रश्न उठाये गए। हम बच्चियों को स्कूल पहुँचाने के लिए जिस शिद्दत से लगे थे, उसे देखकर ग्रामीणों को लगने लगा कि अवश्य ही इन लोगो को (मैत्री टीम के सदस्यों) बच्चों के नाम पर विद्यालय में आने वाली राशि, अन्य सामान इत्यादि का हिस्सा मिलता होगा। उनका यह भी कहना था कि आधा तो विद्यालय के शिक्षक ही खा जाते हैं। हमने इस मानसिकता पर चोट की। अपने प्रयासों की एक विडियो बनाकर, सभी ग्रामीणों को उसे दिखाया। तब जाकर विश्वास अर्जित किया।

हितधारकों का व्यवहार: 

विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों का अधिकतार बार ऐसा व्यवहार दिखा कि इस कम्युनिटी विशेष के बच्चों का नामांकन नहीं करते हैं। जिसके कई कारण पाए गए- 

  • बच्चे भट्टे पर मजदूरी करने चले जाते थे। अभिभावकों को इससे सहूलियत होती थी। क्योंकि घर पर उनकी देखभाल करने के लिए कोई नहीं बचता था।

  • अभिभावकों को नामांकन कराने हेतु लगने वाले दस्तावेजों का ज्ञान नहीं था।

  • आधार कार्ड ना बना होने के कारण विद्यालय बच्चे का नामांकन नहीं लेते थे।

  • बच्चियों के पास वर्दी ना होने के कारण उन्हें शिक्षक और प्रधानाध्यापक द्वारा कक्षा में बैठने नहीं दिया जाता था। 

  • जब हम किसी गाँव में सर्वे (survey) करने जाते थे तो कभी-कभी हमें आउट ऑफ़ स्कूल गर्ल्स (Out of School Girls) का डाटा देने से मना कर देते थे और तरह-तरह के झूठें आरोप भी हम पर लगाये जाते थे। उदाहरण के लिए जैसे कि हम डेटा बेच देंगें, या हमें कुछ आर्थिक रूप से कोई पैसा मिलने वाला हो!

क्या पद्धतियाँ काम आयीं?

  • गतिविधि के माध्यम से कम्युनिटी के लोगो को जोड़ना काफी कारगर साबित हुआ। 

  • बच्चियों का रिटेंशन (retention) करने में बाल-उत्सव, ग्राम सभा, शिक्षक-अभिभावक बैठक (PTM) जैसे इवेंट्स (events) काम आये।

  • अभिभावकों और ग्रामीणों के साथ ज्यादा समय और शिक्षा की जागरूकता सम्बंधित जानकारी देकर इंटरवेंशन (intervention) करना पड़ा। 

  • गर्मियों की छुट्टियों में जब बिहार सरकार द्वारा मिशन दक्ष चलाया जा रहा था, तब हमारी टीम भी दोपहर में दो घंटे बच्चियों को समुदाय में जाकर पढ़ाते थे।

  • अभिभावकों और विद्यालयों के बीच बातचीत करने से थोड़ा गैप (gap) कम हुआ।

इतना सब करने के बाद भी बच्चों के लिए प्रतिदिन विद्यालय जाना सरल नहीं था। हर गाँव-टोले की अलग-अलग समस्याएँ हैं, रिटेंशन के लिए निरंतर प्रयास करते रहना आवश्यक है। जो मैं और मेरी टीम कर ही रहे हैं।

मैत्री प्रोजेक्ट के दो वर्ष मेरे लिए मेरी लर्निंग जर्नी (learning journey) के अहम वर्ष रहेंगें। इन दो वर्षो में मैंने कम्युनिटी को, कम्युनिटी की समस्याओं को करीब से जाना है, जो मुझे जीवन पर्यंत इनके समाधानों पर विचार करने के लिए प्रेरित करेगा।

अभिषेक

टीम सदस्य, मुंगेर


Thursday, October 19, 2023

Rescuing Dreams: An i-Saksham fellow rekindles hope by bringing girls back to school in Bihar's remote and difficult areas

    Pooja, who joined MAITRI as a fellow, an initiative by Educate Girls implemented on the ground by i-Saksham on September 21, 2022, realized that despite the news headlines showcasing girls advancing and achieving new heights, rural India remains quite distant from the mainstream. Pooja, residing in the Amas block of Gaya, holds a bachelor's degree. When Pooja conducted surveys in 30-40 villages, she uncovered the harsh reality that girls were far from receiving an education. Many times, the girls themselves were reluctant to attend school. Pooja has so far visited 20 schools, facilitating the enrollment of over 100 girls. However, this journey was far from easy.

    n the primary school in the Amas block, there were two twin sisters who had been away from school for several years. It was as if they had never seen a school in their village. After conversing with their parents, Pooja collected all the necessary documents. However, the headmaster of the school denied the enrollment, as he considered the survey to lack legitimacy.

    During that same time, Pooja persuaded the Block Education Officer (BEO) and informed him that pressure was being exerted on her to not enroll children in school. After that, the BEO himself spoke to Pooja, saying that she could not compel anyone to enroll children in these schools. After all of this, Pooja had nothing in sight as to what she could do next. Nevertheless, she went back after a week, and with great persistence, she managed to enroll the twin sisters.

During the survey in villages to identify unenrolled girls, people often asked her various questions, such as, "Will this get us money?" or "What's the use of sending girls to school? They could be helping at home and earning some income." She was also inquired about i-Saksham and why she was conducting the survey.  Although many criticized her, seeing young girls doing household chores and working, Pooja couldn't help but think that if she didn't raise her voice and connect these girls with education, the situation would remain the same for generations to come. Denying girls an education would mean they could never voice their thoughts and stand against injustice. 

Pooja narrated the story of a village in the Amas block, where she met the mother of a girl who did not want to send her daughter to school. The mother was skeptical about the importance of education, as she had never received one. Pooja explained to her, "You don't understand the significance of education, that's why you're saying this. If you were educated, you would also send your daughter to school. But since you didn't receive an education, you're denying your daughter the same opportunity. When she grows up, she will impart the same lesson to her child, and she won't educate her either." After hours of explanation, the mother finally agreed to enroll her daughter in school. Nevertheless, when it came to gathering the necessary documents for admission, Pooja faced a challenge. Some documents were missing. In such a situation, Pooja took it upon herself to assist the girl's family in creating all the required documents, ultimately enabling the girl's enrollment.


Wednesday, June 28, 2023

क्या सीमा का निर्णय सही था? अगर आप उनकी जगह होते, तो आपका निर्णय क्या होता?


नामांकन कराती सीमा


हर दिन की तरह आज भी आमस प्रखंड के नीमा गांव की रहने वाली सीमा सुबह-सुबह बच्चियों के नामांकन हेतु गांवों के निरीक्षण के लिए निकल पड़ी। आज सीमा अकेली नहीं थीं बल्कि उनके साथ उनकी एक सहयोगी भी मौजूद थी इसलिए गंतव्य पर पहुंचने के दौरान दोनों ने आपस में विचार विमर्श किया कि क्यों न समय को ध्यान में रखते हुए दो साथी दो अलग-अलग स्कूलों में चले जाएं। इस बात पर सहमति बनने के बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए मगर मंजिल एक रही अनामांकित बच्चियों का नामांकन। 


सीमा ने शेरघाटी ब्लॉक के बार गांव का सर्वे पहले किया था इसलिए उन्हें जानकारी थी कि वहां पर दो स्कूल हैं। पहला, एक प्राथमिक विद्यालय बार स्कूल और दूसरा मध्य विद्यालय बार हुसैनगंज स्कूल है। सर्वे के दौरान उन्हें पता चला था कि बार के पोषक क्षेत्र वाले बच्चे बार के ही स्कूल में नामांकन करवाते हैं और वार हुसैनगंज वाले पोषक क्षेत्र वाले बच्चे वार हुसैनगंज में ही नामांकन करवाते हैं इसलिए सीमा प्राथमिक विद्यालय बार में बच्चों के नामांकन के लिए चली गई। साथ ही अपने साथ आईं सहयोगी अंजना ने मध्य विद्यालय वार हुसैनगंज में बच्चों के नामांकन की कमान संभाली। 


जब सीमा बच्चों और उनके अभिभावकों को लेकर बार स्कूल में पहुंची तो वहां उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। प्राथमिक विद्यालय बार स्कूल के हेडमास्टर ने कहा, “आज हम नामांकन नहीं लेंगे।” हालांकि ये स्थिति पहली दफा नहीं थी बल्कि कई बार सीमा ने ऐसी चुनौतियों का सामना किया था इसलिए वे स्पष्ट थी कि इन चुनौतियों के बाद नामांकन हो ही जाएगा इसलिए उन्होंने हेडमास्टर को समझाने का प्रयास किया और कहा, “सर, नामांकन ले लीजिए।” सीमा के इतना कहते ही हेडमास्टर ने कहा, “ऐसे कैसे लेंगे नामांकन? क्योंकि अब तो नामांकन ऑनलाइन होता है और जब तक बच्चे का सारा डॉक्यूमेंट हमारे पास उपस्थित नहीं होगा, तब तक नामांकन नहीं लेंगे।” 


इतना सुनने के बाद सीमा ने कहा, सर, मुझे भी एस आर नंबर लेना रहता है। इस पर हेडमास्टर ने तल्ख मिजाज में कहा, कोई बात नहीं। आप किसी दूसरे दिन आकर ले लीजिएगा। इस पर सीमा ने कहा, नहीं सर। आज ही नामांकन करवाएंगे और एस आर नंबर किसी दूसरे दिन लेने आएंगे। मुझे आज ही एस आर नंबर नहीं लेना है बल्कि नामांकन कराना है। इसपर हेडमास्टर ने कहा, ठीक है। आधार कार्ड का फोटो कॉपी करवा कर लाइए। सीमा तुरंत आधार कार्ड की कॉपी करवाकर ले आईं लेकिन तब भी उन्हें 15 मिनट तक इंतजार कराया गया मगर तब भी नामांकन के लिए नहीं बुलाया गया। इस पर सीमा ने हेडमास्टर से मिल कर उन्हें कहा, सर, मैं 20 मिनट तक इंतजार कर लूंगी लेकिन मुझे अब नामांकन और एस आर नंबर आज ही चाहिए। अंततः हेडमास्टर को बच्ची का नामांकन करना पड़ा और सीमा के इतने प्रयास के बाद बच्ची का एस आर नंबर भी मिला। इस प्रकार सीमा ने प्राथमिक विद्यालय बार में दो लड़कियों का नामांकन करवाया। 


इसके बाद सीमा के अंदर आत्मविश्वास जाग उठा और अब वे बार हुसैनगंज स्कूल में नामांकन के लिए चल पड़ी। सीमा जैसे ही स्कूल के पास पहुंची तब अंजना का फोन आया। फोन के दूसरी ओर से आवाज आई, दीदी, आज सर नामांकन नहीं लेंगे। इस पर सीमा ने अंजना से कहा, कोई बात नहीं। मैं अभी स्कूल ही पहुंचने वाली हूं। 


सीमा ने जैसे ही स्कूल में कदम रखा, उन्हें उनकी पहली चुनौती मिल गई। हेडमास्टर गेट के पास ही खड़े थे। सीमा ने उनका अभिवादन किया लेकिन हेडमास्टर ने बिना अभिवादन का जवाब दिए ही प्रश्नों की बौछार कर दी और पूछा, “आप भी आई सक्षम से ही आए हैं?” इस पर सीमा ने हामी भरी। इस पर हेडमास्टर ने कहा, ठीक है। आप अंदर जाकर बैठिए।” इसके बाद सीमा अंदर जाकर बैठ गईं, तभी हेडमास्टर ने कमरे में कदम रखते हुए ही पूछा, आपको भी नामांकन करवाना है? सीमा ने हामी भरी और कहा, जी हां सर। आज ही नामांकन करवाना है। उन्होंने दोबारा सुनिश्चित करने के लिए पूछा कि सच में आज ही नामांकन कराना है, तो सीमा ने ढता से जवाब दिया कि जी हां, आज ही नामांकन कराना है। 


इस पर हेडमास्टर ने कहा, ठीक है। अभी मेरे पास एक भी एडमिशन का फॉर्म नहीं है, तो इसे आप फोटो कॉपी करवा कर लाइए और इसे भरिए तभी एडमिशन आज के डेट में लेंगे। अन्यथा जब तक हमारे पास 5 बच्चे एक साथ उपस्थित होंगे तब तक एडमिशन नहीं लेंगे। इतना सुनने के बाद सीमा ने स्वयं जाकर फॉर्म का फोटो कॉपी करवाया और लाकर उसे भरकर दे दिया। 


सीमा द्वारा इतना कार्य करने के बाद हेडमास्टर ने दोबारा कहा, आप तो एडमिशन करवा कर चले जाइएगा लेकिन बच्चे नहीं आएंगे इसलिए बच्चे के विद्यालय नहीं आने पर जिम्मेदारी आपकी होगी क्योंकि पहली कक्षा में भी आपने कई बच्चों का एडमिशन करवा लेकिन एक भी बच्चे उपस्थित नहीं होते हैं इसलिए आप आवेदन लिखिए और इसमें अपना हस्ताक्षर करिए। इसके साथ ही अपने संस्था का नाम लिखिए और बच्चों के अभिभावक से भी रोज आने के लिए हस्ताक्षर करवाइए, तभी हम आज एडमिशन करेंगे अन्यथा नहीं करेंगे। 


इस पर भी सीमा राजी हो गई और कहा, ठीक है सर। अंततः सीमा ने लिखित आवेदन दे दिया मगर सीमा के मन में उधेड़बुन थी कि ये आजतक की सबसे बड़ी चुनौती थी लेकिन वे खुश थी कि उन्होंने मध्य विद्यालय  हुसैनगंज में 4 बच्चियों का नामांकन करवाया। 


इसके बाद सीमा ने हेडमास्टर को धन्यवाद बोलते कहा और अपने दूसरे गंतव्य की ओर बढ़ गईं। जैसे-जैसे सीमा के कदम आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे मन में सवालों का बवंडर उठ रहा था लेकिन वे समझ नहीं पा रही थी। अचानक सीमा के मन में मन में विचार आया कि दूसरे गांव में भी नामांकन के लिए चले जाते हैं। इसके बाद सीमा महमदपुर गांव में बच्चों के नामांकन के लिए चल पड़ी। यहां भी उन्हें सर्वे करने का फायदा हुआ क्योंकि उनके पास उन बच्चियों के अभिभावकों का नंबर और अन्य जानकारी थी, जिनका नामांकन नहीं हो सका था इसलिए उन्हें तुरंत अपना फोन निकाला और एक नंबर डायल किया।


उन्होंने एक अभिभावक को कॉल करके अपने बच्चे को लेकर महमदपुर स्कूल में लेकर आने के लिए कहा। अभिभावक भी अपने बच्चे को लेकर महमदपुर स्कूल में पहुंच गए। स्कूल पहुंचते ही एक शिक्षक ने पूछा, क्या आप लोगों का भी कोई प्रोग्राम करना है क्योंकि अभी-अभी प्रथम कक्षा वाले प्रोग्राम कर रहे हैं। इस पर सीमा ने कहा, नहीं सर। मुझे तो बच्चे का नामांकन करवाना है। इस पर उन्होंने कहा, ठीक है। आप जाकर हेडमास्टर से बातचीत कीजिए। 


सीमा ने हेडमास्टर से बातचीत करके और सारे कागजात देकर 3 बच्चियों का नामांकन कराया। सीमा और हेडमास्टर के बीच बातचीत चल ही रही थी कि हेडमास्टर ने थोड़ा रूक कर कहा, आप इतनी मेहनत दूसरों की बच्चियों के लिए कर रही हैं क्योंकि ईट-भट्टे पर काम करने वाले अभिभावक आने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि वो शिक्षा के प्रति जागरूक नहीं है और आप ईट-भट्टे पर जाकर माता-पिता का हाथ पकड़ कर उनके बच्चों का नामांकन करवा रहे हैं। इतना कोई भी नहीं कर सकता है। आप इतनी मेहनत कर रही हैं। दूसरे के बच्चे के उज्जवल भविष्य के लिए आपके मेहनत का वर्णन नहीं किया जा सकता है। इतना तो हम लोग टीचर हैं फिर भी नहीं कर सकते हैं, जितना आप कर रही हैं। ठीक इसी प्रकार जैसे आप बच्चियों का नामांकन करवा रही हैं, ठीक उसी प्रकार आप अपना पता और फोन नंबर दीजिए।” 



इतना सुनने के बाद सीमा ने सवालिया निगाहों से देखते हुए पूछा, “लेकिन क्यों सर?” इस पर हेडमास्टर ने कहा, “आप जिस बच्चे का नामांकन करवाए हैं, अगर वह बच्चा विद्यालय में अनुपस्थित रहेगा तो आपके पास तुरंत कॉल जाएगा। जिस तरीका से आप अभी इनके ईट-भट्टे पर से लाकर एडमिशन करवा रहे हैं, ठीक उसी प्रकार विद्यालय के समय बच्चे के विद्यालय में उपस्थित नहीं रहने पर आप आकर बच्चे को स्कूल में उपस्थित करवाइएगा।” 


सीमा मौन रही लेकिन बच्चियों का चेहरा देखकर उन्होंने अपना पता और नंबर तो साझा कर दिया और उन्होंने 3 विद्यालयों में 9 बच्चियों का नामांकन कराया लेकिन अपनी निजी जानकारी साझा करने और लिखित में घोषणा-पत्र देने के कारण सीमा चिंतित हैं क्योंकि अगर कोई बच्ची स्कूल नहीं जाएगी, तो उन्हें दोषी ठहराया जाएगा। भले ही सीमा ने नामांकन और जागरूक करने का बीड़ा उठाया हो लेकिन क्या बार-बार सीमा को कॉल करना और बच्चों के अनुपस्थित रहने पर जिम्मेदार ठहराना सही है और क्या सीमा का निजी जानकारी साझा करना सही है जबकि सीमा ने तो समाज में बदलाव के लिए झंडा उठाया है? 

Monday, June 12, 2023

Captivating City Chronicles: A Tapestry of Stories and Perspectives (Ayush)

Determined to ensure the return of Every Girl to School, our team members are fearlessly facing the sweltering heat of Bihar's summer. They tirelessly traverse numerous villages, extending their support not only within their own assigned locations but also lending a helping hand to their teammates in other areas. One of our team members, Ayush, found himself immersed in profound reflections while carrying out his duties in a new city - Gaya. As he made his way back to the office, he couldn't help but deeply observe the city, leading him to contemplate the following insights.

"It was around 12:00 noon. As I was heading from my workplace (villages) to the office, I suddenly saw an old man of around 70 years selling ice cream on the streets, facing the scorching heat and sunlight. Next to him was a hotel where a 13 or 14-year-old boy was scrubbing and cleaning utensils. Meanwhile, a group of 22 or 25-year-old boys was wandering here and there, listening to loud music in their cars. Sometimes I think about how difficult life is. Different people have different rules to live by. But then I remember that everyone has their own goals. 

    For the past three days, I have been in Gaya. I am observing Gaya deeply, trying to understand it. This city is beyond my comprehension. Not just Gaya, but other cities as well are beyond my comprehension. When our needs are not met in the village, we run towards the cities. With closed eyes, we enter an unfamiliar city. Sometimes we come across familiar faces in these unfamiliar cities, and sometimes these cities remain forever unfamiliar. 

    Nothing is predetermined in life. There is no foundation for anything to be predetermined, such as what a 70-year-old man should do or what tasks are assigned to a 14-year-old boy. What should 25-year-old boys do? We have a path, but it has no set standards. Often, when we are tired, we think that life is not dancing to our tunes. It's not everything we desire. In reality, there is no definition of life. It is an independent entity, with one end bound by our needs and responsibilities and the other end completely free. In this way, it is uncertain when life will take a turn. We all are playing different roles in our stories. Some carry the burden of living at the age of 70, while others bear the weight of responsibilities at the age of 14. There are those who roam without any responsibilities or work at the age of 25. We all have our own characters, and the amazing thing is that we will fulfill our acting until the curtain rises.

    Many times I wonder what is there in the city that attracts everyone. Then suddenly I see the crowd. I see an ice cream shop, a fruit and vegetable cart. I see a rickshaw puller. Later, I observe the entire city. It absorbs everyone within itself. "

- Ayush Babu, Gaya