Wednesday, May 31, 2023

Bulbul proves that the pursuit of knowledge is limitless, irrespective of age! (Back to studies after 18 years)


"I am Bulbul Kumari, Batch-7 Edu-leader. I wanted to share my journey of education and empowerment. I got married in 2003, the same year I completed my 12th grade. My marriage took place in a family and society where education was lacking. No one in my family understood the importance of education when I expressed my desire to study. As a result, my studies were interrupted, and the family situation was not favorable. So, I suppressed my aspirations and became involved in household responsibilities, cutting off my connection with education. The desire to learn within me faded, but I still had a passion for teaching, so I started teaching the children around me.

In 2006, I got an opportunity to teach in a private school where I worked for a year. During that year, my mother passed away, which caused me immense sorrow. I left everything behind and isolated myself at home, disconnecting from the outside world.

In 2011, I had the chance to study in a residential school located in the mountains (Santhal region). However, the school only operated for 11 months before closing down. I found myself in the same situation as before, with no significant changes. Then one day, I received a call from a teacher at the school where I initially started teaching, suggesting that if I wasn't engaged in anything else, I should come and teach at their school. In 2017, I resumed teaching and continued for three years.


A significant change occurred in my life when everything seemed to come to a standstill. In 2020, Sanjay Bhaiya and Dharamveer Sir visited my house, and I joined i-Saksham. That was the most transformative moment of my life! After a few months, I noticed a change within myself. Teaching the children has always brought me happiness and contentment, something I had been doing for many years. However, I realized that my teaching methods were not correct. As I received intensive training during my fellowship, my self-confidence started to grow.

One day, during a session, I learned about IGNOU (Indira Gandhi National Open University), and a voice from within me said that I could start studying again. But I was afraid. It had been 18  long years since I left my studies, and I didn't know how I would resume my education. However, my husband encouraged me to study and pursue my certification. Along with him, my sister-in-law (elder to my husband) became my friend and provided great support. I would also like to express my gratitude to i-Saksham for becoming a platform that allowed me to restart my studies after almost 18 years. Currently, I am doing my graduation and I am enrolled in the second year of my Bachelor's degree."

- Bulbul Kumari, Gaya Bihar


i-Saksham Edu-leader Fellowship for the community change leaders like Bulbul Kumari is active in five districts of Bihar. The fellows undergo two years of transformative journey that builds their skills in three tracks - Personal, Educational, and Community Leadership. The program's three-pronged approach is well-rounded and comprehensive. Firstly, it focuses on enhancing the personal leadership capabilities of the selected fellows, which will not only empower them individually but also enable them to inspire others and lead effectively. This emphasis on personal growth and development is crucial for building strong leaders. Bulbul Kumari is an edu-leader from the 7th Cohort and they are going to graduate soon from the fellowship. Bulbul and other change leaders from the 7th and 8th cohort are fully equipped to create change in their communities and beyond. 

Monday, May 29, 2023

एडूलीडर बुलबुल के जीवन में 18 वर्ष बाद लौटी शिक्षा, i-Saksham के प्रशिक्षणों से दृढ़ हुआ आत्मविश्वास

i-Saksham के बैच-7 की एडूलीडर बुलबुल कुमारी ने i-Saksham के साथ अपना अनुभव साझा किया है, जिसमें उन्होंने अपनी यात्रा का वर्णन किया है कि किस तरह से उन्होंने संघर्ष किया और एक बार उम्मीद टूटने के बाद i-Saksham के सहयोग से कैसे उन्होंने अपने आत्मविश्वास को पहचाना और अपने पैरों पर उठ खड़ी हुईं। 

बुलबुल ने i-Saksham को बताया कि उनकी  शादी साल 2003 में ही हो गई थी और उस साल वे 12वीं कक्षा में थीं। उनकी शादी एक ऐसे परिवार में हुई, जहां शिक्षा को लेकर लोगों का रवैया उदासीनता से भरा था। साथ ही गांव-समाज के लोगों में भी शिक्षा का बहुत आभाव था। 

उनके परिवार में कोई भी शिक्षित व्यक्ति नहीं था, जिनसे वे अपने मन की व्यथा बोल पाती और समझा पातीं कि उन्हें पढ़ने की इच्छा है। यही कारण रहा कि उनकी पढ़ाई रुक गई। साथ ही पारिवारिक स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं थी इसलिए उन्होंने भी अपने अरमानों को दबा दिया और चेहरे पर मुस्कान बिखेर कर रहने लगी। 

आसपास के बच्चों को पढ़ाया

इसके बाद घर की जिम्मेदारी बढ़ी और वे घर-गृहस्थी में इस कदर उलझी कि उन्हें पढ़ाई या पढ़ने के बारे में ख्याल ही नहीं आया। उनके अन्दर पढ़ने की ललक खत्म होते चली गई लेकिन पढ़ाने का एक शौक था इसलिए उन्होंने कुछ सालों बाद आसपास के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।

i-Saksham से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि साल 2006 में उन्हें एक निजी विद्यालय में पढ़ने का मौका मिला, जिसमें वे केवल एक साल पढ़ सकीं क्योंकि उसी साल उनकी मां का देहांत हो गया, जिस कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी।

एक लंबे अंतराल के बाद साल 2011 में उन्हें एक आवासीय विद्यालय में पढ़ने का मौका मिला, जो पहाड़ के किनारे पर स्थित था, जिसे आम बोलचाल की भाषा में संथाली इलाका भी कहा जाता है। यह विद्यालय भी केवल 11 महीने ही चला फिर बंद हो गया। राह में आने वाली इन रुकावटों ने कहीं ना कहीं उनके पढ़ने की ललक को तोड़ने का काम किया और उन्हें लगने लगा कि अब वे नहीं पढ़ पाएंगी।

i-Saksham टीम से मुलाकात

एक दिन उन्हें उस स्कूल के शिक्षक का कॉल आया, जिसमें वे शुरुआती दिनों में पढ़ाया करती थी। शिक्षक ने कॉल करके कहा, अगर अभी आप कुछ नहीं कर रहे हैं, तो मेरे विद्यालय में आकर पढ़ाइए। इसके बाद मैंने साल 2017 से पढ़ाना शुरू किया और लगातार 3 सालों तक पढ़ाया। 

उन्होंने आगे बताया कि एक रोज जीवन में एक बड़ा बदलाव आया, जब सबकुछ ठहर सा गया। यह साल 2020 की बात है, जब i-Saksham के टीम के दो सदस्य ‘संजय भैया’ और ‘धरमवीर सर’ उनके घर आए और यही वक्त था, जब वे i-Saksham से जुड़ी। इस वाकये के बारे में उन्होंने कहा, मेरे लिए वो पल शायद मेरी जिंदगी का एक एतिहासिक पल रहा क्योंकि एक ओर मुझे कई बार रुकावटों का सामना करना पड़ा तो वहीं दूसरी ओर मैं अब नया मुकाम हासिल करने की दिशा में बढ़ने वाली थी।”

पति ने भी किया सहयोग

कुछ महीनों के बाद ही उन्हें अपने अन्दर एक बदलाव महसूस हुआ।  i-Saksham के तत्वधान में उन्हें कई तरह के प्रशिक्षण हासिल हुए, जिससे उन्होंने ना केवल शिक्षा बल्कि अन्य हिस्सों पर भी अमल किया। एक रोज i-Saksham के एक सेशन के दौरान उन्हें IGNOU के बारे में पता चला और उनके अन्दर से इक आवाज़ आई कि हां, मैं भी पढ़ सकती हूं लेकिन उन्हें डर भी था क्योंकि पढ़ाई छोड़े हुए उन्हें 18 साल हो गए थे। 

उनके मन में कई सवाल थे कि अब मैं कैसे पढूंगी, मुझे कुछ समझ में भी नहीं आएगा लेकिन जीवन के इस पड़ाव पर उनके पति ने भी उनका सहयोग किया और उनका ढ़ांढस बढ़ाते हुए कहा कि तुम पढ़ो और अपना नामांकन करवा लो। साथ ही इस सफर में i-Saksham के बड्डी ने भी उनका साथ दिया। 

आज बुलबुल बीए बार्ट-2 की विद्यार्थी हैं और i-Saksham के साथ बतौर एडूलीडर कार्य भी कर रही हैं, जिसका उद्देश्य लड़कियों को समाज में पहचान दिलाया और हर एक लड़की को VOICE AND CHOICE से जोड़ना भी है ताकि लड़कियां अपनी जिंदगी के निर्णय स्वयं ले सकें और अपनी आवाज़ उठा सकें। 


नोट- यह अनुभव बुलबुल कुमारी की अनुमति मिलने के बाद साझा की जा रही है।

Monday, April 17, 2023

एडुलीडर स्मृति के प्रयासों से अन्य लड़कियों को मिलती है आसमान में उड़ने की ताकत

फोटो क्रेडिट- आई सक्षम


मैं स्मृति कुमारी बैच-9 की एडुलीडर हूं। मैं आज आप लोगों के साथ आज की कक्षा का अनुभव साझा करने जा रहीं हूं।

आज मेरे स्कूल में कक्षा अवलोकन के लिए रागिनी दी, अनुप्रिया दी और दीपा दी आई हुई थी। कक्षा अवलोकन के लिए जब दीदी ने बच्चों से पूछा कि उनकी फिलिंग क्या है? तब बच्चों ने उन्हें बताया कि वे उत्साहित हैं लेकिन कुछ बच्चे उदास थे। उनकी उदासी का कारण था कि रास्ते में आते वक्त उनकी साइकिल खराब हो गई थी।

इसके बाद जब मैंने एक दूसरे से उनकी पसंद की सब्जी का नाम पूछा, तब उन्होंने कुछ सब्जियों के नाम बताए फिर इसी को मोड़ते हुए मैंने बच्चों से सब्जियों के नाम पूछे और उन्हें पढ़ाया। आज मैंने अंग्रेजी में बच्चों को सब्जी का नाम पढ़ाया। कलात्मक तरह से बच्चों को समझाने के कारण बच्चे काफी बेहतर तरीके से समझ पा रहे थे। साथ ही हम दोनों के बीच संवाद भी बेहतर हो पा रहा था। 

 

अनेक पहलूओं पर होता है विकास


एडुलीडर स्मृति जब बच्चों को शिक्षित करने के लिए निकलती हैं, तब केवल बच्चों के जीवन में नहीं बल्कि स्मृति के जीवन में भी कई बदलावों की शुरुआत होती है। जैसे- जब वे कक्षा की कमियों को देखते हुए, अपने तरीकों पर काम करती है, इससे उनके अंदर किसी समस्या को समाप्त करने एवं समस्या से जूझने की प्रवृत्ति विकसित होती है, जो उनके आने वाले जीवन के लिए एक सबक की तरह हो सकती है। 


लड़कियों को मिलता है खुला आसमान

साथ ही उनका अपने घरों से निकलना अन्य लड़कियों के लिए प्रेरणा का काम करता है, जो स्वयं की पहचान बनाना चाहती हैं। बतौर एडुलीडर लोगों से मुलाकात करना, उनकी समस्याओं पर बात करना, अभिभावकों को सही-गलत की पहचान कराना एक अच्छे नेतृत्वकर्ता का विकास करता है, जो लोगों की बातों को सलीके से सुनकर उसके निदान की ओर अग्रसर होता है। वे जहां एक ओर अपनी पहचान बुलंद कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर वे आत्मविश्वास से निर्णय ले रही हैं। स्वच्छंद होकर निर्णय लेने की क्षमता उनके आने वाले जीवन में उन्हें सही गलत की परख करना सिखाएगा ताकि वे सही निर्णय ले सकें। 


विद्यालयों में जाकर बच्चों को शिक्षित करना एवं शिक्षा के प्रति अभिभावकों समेत बच्चों को जागरुक करना, साफ-सफाई, नामांकन, लड़कियों की शिक्षा के महत्व को जन-जन तक पहुंचाना मात्र एक जरिया है, जो उन्हें कल के नेतृत्वकर्ता की तरह खड़ा करेगा। 





   


Thursday, April 13, 2023

राजमणि ने क्यों दी देवराज को रिपोर्टर की संज्ञा?

 

फोटो क्रेडिट- आई सक्षम


मैं काजल के स्कूल प्रेम टोला फ़रदा गई थी। मैंने वहां देखा कि काजल पढ़ा रही है इसलिए मैं सबसे पीछे जाकर दरी पर बच्चों के साथ बैठ गई। मैं जहां बैठी थी, वहीं मेरे बगल में देवराज बैठा हुआ था। पहले जब उसने मुझे देखा, तो वह थोड़ा डरा हुआ था। बहुत समय तक मुझे देखते ही रहा और कुछ नहीं बोल रहा था इसलिए मुझे थोड़ी शंका हुई कि यह बच्चा इतना शांत क्यों है? मैंने बातचीत शुरु करने के लिए उससे पूछा, “आपका नाम क्या है? आप इतने शांत क्यों हैं?” 


मेरे इतना पूछते ही धीरे-धीरे उसने मुझसे बात करना शुरु किया और महज 15 मिनट में ही मेरे साथ इतना घुल-मिल गया कि इतना बोलने लगा कि मुझे मजा आ गया। वह केवल 7-8 साल का ही लेकिन बोलते वक्त थोड़ा लड़खड़ाता है मगर  उसकी आवाज बहुत प्यारी है इसलिए उसे सुनने में काफी अच्छा लगा। 


मैं केवल दो घंटे ही उस क्लास रूम में बैठी थी मगर देवराज ने मुझे उन दो घंटों में ही क्लास रुम और उसके अनुभवों से जुड़ी लगभग 15 के आसपास  घटनाएं बता दीं। जैसे- अपने दोस्तों के बारे में, अपने आसपास में बैठने वाले बच्चों के बारे में, अपने घर के बारे में, अपने गाँव के बारे में, अपने बारे में। उसके बोलने के तरीके से मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, मानों मेरे पास कोई न्यूज रिपोर्टर बैठा है, जो मुझे आसपास की खबरें सुना रहा है। 


जैसे-


  • दीदी, हिमांशु पढ़ता नहीं है। दिन भर खाली खेलते रहता है। हम रोज बुलाने जाते हैं, तब ही वह स्कूल आता है। 

  • दीदी, प्रिया पिछले साल भी दूसरा क्लास में ही थी। एकदम नहीं पढ़ती है, अगर नहीं पढ़ेगी तो आगे की क्लास में कैसे जाएगी? दिन भर खाली घर का काम करती है और खेलते रहती है। 

  • दीदी, आपको पता है, शिवानी ना बहुत गंदी लड़की है। हमेशा अपनी छोटी बहन को मारते रहती है। आप बताइए कि बड़ी बहन कहीं छोटी बहन को मारती है! 

  • यहां के लोग ना दीदी बहुत गंदे हैं। जब होली आया था ना तो मेरा झरना चुरा कर लेकर चले गए थे। अब बताइए कि झरना चुरा लिया तो मेरी गाय किसमें रहेंगी? बताइए, अभी इतना धूप किया है। इस समय गाय धूप में रहेंगी तो उनका तबीयत खराब हो जाएगा। अब आप बताइये कि हम पटिया किससे बनाएंगे? 

  • आप बताइये दीदी कि अगर सब बच्चा स्कूल के बाहर गाना बजाएगा, तो स्कूल के अंदर जो बच्चा बैठकर पढ़ रहा होगा, उसको पढ़ने का मन करेगा? हमेशा स्कूल के बाहर खड़ा होकर गाने बजाते रहता है। कोई नहीं पढ़ता है। 


जानें क्या है कक्षा अवलोकन (क्लासरूम ऑब्जर्वेशन)- 


कक्षा अवलोकन का उद्देश्य- 


  • कक्षा के विज़न को पाने में एक साथी के रूम में एडू-लीडर को सपोर्ट करना। 

  • एडू लीडर के निर्देशात्मक कौशल (पढ़ाने का तरीका), शिक्षात्मक नज़रिया (Educational vision), विषय ज्ञान का निरंतर मूल्यांकन कर उनके उपलब्धियों को सराहना और चुनौतियों पर उन्हें प्रशिक्षित करना।

  • छात्रों के विभिन्न समूहों के बीच निर्देश में संभावित असमानताओं की जांच करना और उनके बीच समानता बनाना। 

  • कक्षा निर्देशन और सीखने का सर्वोत्तम माहौल बनाने में एडू लीडर को प्रशिक्षित करना।



वहीं दूसरी ओर इस अनुभव से एक बात प्रतीत हो रही है कि बड्डी के साथ बच्चों का रिश्ता। राजमणि ने जिस प्रकार संवाद शुरु किया और देवराज परत-दर-परत मुखर होते गया, यह बताता है कि बच्चों के अंदर अनेक कहानियां होती हैं, जरुरत बस किसी सुनने वाले की होती है।


Tuesday, April 11, 2023

कक्षा साफ ना होने पर अनन्या ने किया समस्या समाधान कौशल का प्रयोग

फोटो क्रेडिट- आई सक्षम

सामान्यतः जब हमारे जीवन में कोई समस्या आती है या हमारी कोई इच्छा पूरी नहीं होती, तब हम उसे अपनी नियति मान लेते हैं और परिस्थिति से समझौता कर लेते हैं, जो कहीं ना कहीं दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है जबकि हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम अंत कर प्रयास करें क्योंकि सबकुछ जीत लेने में और अंत तक हार ना मानने में कोई अंतर नहीं है। इस मंतव्य को हमारी एडु लीडर अनन्या ने साबित करके दिखाया है। वे लिखती हैं-  

मेरा नाम अनन्या है और मैं जमुई की रहने वाली हूं। मैं बैच-9 की एडु लीडर हूं। मैं आप लोगों के साथ आज के क्लास रूम का अनुभव साझा करने जा रही हूं। 


इस बार सेशन में मुझे बहुत सारे TLM मिले।  TLM का मतलब Teaching Learning Method है, जिसके जरिए कलात्मक तरीकों से बच्चों को पढ़ाया जाता है इसलिए मुझे TLM बहुत अच्छे लगते हैं। यही कारण था कि TLM मिलने से मुझे बहुत खुशी हुई। मेरी इच्छा था कि मैं रंग-बिरंगे TLM को साफ-सुथरी कक्षा में लगाऊं लेकिन कक्षा अब तक साफ नहीं हुई थी। 



जब नहीं हुई साफ-सफाई


हालांकि मैंने कुछ दिन पहले अपने स्कूल के प्रिंसिपल सर से बात भी किया था कि सर अगर क्लास रूम की साफ-सफाई हो जाती, तो बढ़िया होता। इस पर प्रिंसिपल सर ने कहा था कि हां कक्षा की सफाई भी करवानी थी और पेंट भी करवाना था लेकिन अभी तक काम शुरु भी नहीं हुआ था।  


फोटो क्रेडिट- आई सक्षम

इस पर मैंने सोचा कि बार-बार गुजारिश की लेकिन काम शुरु नहीं हुआ तो क्यों ना मैं खुद ही क्लास रुम की सफाई कर लूं। इसके लिए मैंने एडु लीडर आस्था की अनुमति ली क्योंकि मुझे क्लास को साफ करने में कुछ बड़े बच्चों की आवश्यकता थी, जो मेरी मदद कर सकें। आस्था मेरी बगल की कक्षा में ही क्लास ले रही थीं। आस्था से बात करने के बाद उन्होंने हामी भर दी और क्लास समाप्त होने के बाद बच्चों ने रुक कर क्लास रुम को साफ किया। 


बच्चों के साथ की सफाई 


कुछ बच्चों ने दीवारों पर लगे मकड़ी के जालों को साफ किया, तो कुछ बच्चों ने बेंच-डेस्क आदि को कपड़ों से पोंछा, कुछ बच्चों ने मिल कर फर्श को धोया। यहां सबसे अच्छी बात यह लगी कि जो बच्चे साफ-सफाई नहीं कर पा रहे थे, उन्होंने ऊंचाई पर खड़े बच्चों के बेंच-डेस्क को थामा हुआ था। तकरीबन दो-तीन घंटों की मेहनत के बाद हमारी कक्षा साफ-सुथरी हो गई। अब बारी TLM लगाने की थी। 


एडु लीडर अनन्या ने जिस प्रकार कक्षा की सफाई करने का बीड़ा उठाया, यह उनकी नेतृत्व क्षमता की ओर इंगित करता है। साथ ही परेशानी से भागने या उसे स्वीकार ना करने की इच्छाशक्ति भी क्योंकि TLM लगाने के लिए उन्हें साफ-सफाई की जरुरत थी और साफ-सफाई ना होने की स्थिति में उन्होंने इस परेशानी को स्वयं दूर करने का सोचा, जो उनके समस्या समाधान विधि की ओर इंगित करता है। 


देखा जाए, तो एडुलीडर्स ना केवल शिक्षा के प्रति बल्कि अन्य हिस्सों में भी उभर कर सामने आ रहे हैं क्योंकि कक्षा में पढ़ाने के साथ-साथ जहां एक ओर उनके शिक्षण के कौशल का विकास हो रहा है, वहीं वे नेतृत्व करने और निणर्य लेने में भी आगे आ रही हैं, जिसे ऊपर दिए गए अनुभव द्वारा समझा जा सकता है।