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Friday, July 25, 2025

सपनों की सीढियाँ , संकल्प की सींच

किसने सोचा था ? की बिहार के ग्रामीण क्षेत्र (बड़गाव) के मध्य वर्गीय परिवार की एक साधारण सी लड़की कभी भोपाल जा कर उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाएगी। क्योंकि ,  वर्षों तक सामाजिक रूढ़ियों, आर्थिक सीमाओं, और सुविधाओं की कमी ने ग्रामीण लड़कियों की शिक्षा को बाधित किया है।  लेकिन अब परिस्थितियां धीरे-धीरे बदल रही है।
 
ऐसी ही कहानी है - कल्पना की। कल्पना का बचपन से ही सपना था की वो कुछ अलग करें। परिवार की स्थिति दयनीय होने के बावजूद भी उसके मन में अपने सपने को पूरा करने की चाह लगी हुई थी। जहाँ लड़कियों के लिए बुनियादी शिक्षा पाना भी मुश्किल होता है वहां उच्च शिक्षा तक पहुंचने की चाह रखना तो सच में ही एक संघर्ष से कम नहीं है। 


कल्पना के सपनो को तब पंख मिल गई जब उसे आई - सक्षम फ़ेलोशिप का साथ मिला। जो उनके सपने को पाने में उनका एक मजबूत हथियार बना। कल्पना पहले सिर्फ अपने सपने को देख रही थी , लेकिन जब कल्पना को आई - सक्षम में "अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी " के बारे में पता चला , तो वो अपने सपने को जीने लगी। कल्पना ने ये कब सोचा था की उसके सपनो को नई उड़ान मिल जाएगी।

उन्होंने अपनी पढाई शुरू की जिसमे आई-सक्षम के टीम ने उनकी काफी मदद की और मार्गदर्शन किया। फ़ेलोशिप के सेशन और प्रक्रियाओं द्वारा कल्पना को प्रेरणा मिली और वो अपने सपनो के राश्ते पर आगे बढ़ी। आई-सक्षम ने उन्हें वित्तीय रूप से भी सहायता प्रदान किया।  अपने आत्म-विश्वास और आई-सक्षम के सहायता से कल्पना सौ प्रतिशत स्कॉलरशिप के साथ अपना एग्जाम और इंटरव्यू पास की।


जिस दिन कल्पना का चयन "अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी" में हुआ और स्कॉलरशिप की पुष्टि मिली, वह दिन उसके जीवन का सबसे खास दिन बन गया। ग्रामीण क्षेत्र की एक साधारण लड़की के लिए यह केवल एक अकादमिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि वर्षों से देखे गए उस सपने की पहली झलक थी — बिना किसी आर्थिक बोझ के, देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में पढ़ने का मौका।

जब घर से बाहर जाकर पढ़ने की बात आई, तो परिवार की चिंता ने एक बार फिर परंपराओं का जाल बुन दिया — "एक लड़की अकेली शहर में कैसे रह पाएगी?", "लोग क्या कहेंगे?"

कल्पना का आत्मविश्वास धीरे-धीरे डगमगाने लगा। उसने खुद को उन लड़कियों की कतार में खड़ा पाया जिनकी दुनिया रसोई और आँगन से आगे नहीं जाती। वह सोचने लगी, शायद मेरा भी जीवन बुनियादी शिक्षा और घरेलू जिम्मेदारियों तक ही सीमित रहेगा।


पर उसने चुप रहना नहीं चुना। उसने अपना दिल खोलकर आई-सक्षम टीम से बात की। उन्होंने न सिर्फ उसकी बातों को सहानुभूति से सुना, बल्कि उसके परिवार तक पहुँचकर उन्हें समझाया कि बदलते दौर में लड़कियों को भी आगे बढ़ने का हक है। उन्होंने शिक्षा की ताकत, आत्मनिर्भरता और समाज के बदलते नज़रों को बड़ी सहजता और सच्चाई से सामने रखा।

कल्पना की जिद और आई-सक्षम टीम के विश्वासपूर्ण प्रयासों ने आखिरकार परिवार की सोच को बदल दिया। जिस बेटी को लेकर कल तक सवाल उठाए जा रहे थे, आज उसी पर गर्व किया जा रहा था।

हाल ही में कल्पना ने भोपाल चली गई — अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ओर, जहाँ अब उसका नया अध्याय शुरू हो चुका है।
यह सिर्फ कल्पना का कॉलेज जाना नहीं है — यह उस जज़्बे की उड़ान है, जिसने समाज की तमाम बंदिशों को पार कर अपने सपनो को पाया है। 

कल्पना 

बैच-10,मुजफ्फरपुर


मुझे सिर्फ़ एक मौका चाहिए

कुछ दिन पहले मेरी मुलाक़ात स्वाति नाम की एक किशोरी से हुई, जिसकी उम्र लगभग 14-15 साल है। वह नया सुभानपुर, बछवाड़ा की रहने वाली है। स्वाति पहले स्कूल जाया करती थी, लेकिन अब कुछ समय से वह शांत और सहमी-सहमी सी रहने लगी थी।

जब मैंने धीरे से उससे बात की, तो उसने बताया – "दीदी, मेरी शादी तय कर दी गई है। मैं पढ़ना चाहती हूं, लेकिन मेरे घर में मेरी बात कोई नहीं सुनता।" स्वाति के गांव में ज़्यादातर लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाती है। यही कारण था कि उसके माता-पिता ने भी उसकी शादी तय कर दी थी।

स्वाति ने उन्हें समझाने की कोशिश की – कि वो अभी पढ़ना चाहती है, शादी नहीं – लेकिन जवाब में यही सुना: "इतना पढ़ा दिया, अब और क्या करेगी? जहां जाएगी, वहीं के लोग पढ़ा देंगे, नहीं तो घर का काम करेगी। लड़कियों का तो यही होता है।


"जब मैंने स्वाति के माता-पिता से बात की, तो वही पुरानी सोच सामने आई – "मैंने अपनी ओर से बहुत समझाया, लेकिन नहीं समझ पा रहे थे। "तब मैंने उनसे बस एक बात कही – "क्या आपने कभी अपनी बेटी से पूछा कि वो क्या करना चाहती है? क्या वो कुछ बनना चाहती है या सिर्फ घर का काम करना?

एक बार उससे पूछकर तो देखिए।" जब सामने से स्वाति से पूछा गया, तो वो डरते-डरते बोली – "मैं पढ़ना चाहती हूं, अभी शादी नहीं करना चाहती। आप बस मुझे एक मौका दीजिए।" स्वाति की बात सुनकर मैंने भी उन लोगों को अपनी कहानी सुनाई – मेरे गांव में भी यही होता था।

जब मेरी शादी की बात चल रही थी, मैंने अपने पापा से सिर्फ इतना कहा – "क्या आप नहीं चाहते कि मैं पढ़-लिखकर कुछ बनूं?" बस, उस दिन से मेरी एक छोटी-सी कोशिश से मै आज पढ़ कर आगे बढ़ रही हूँ और आपलोग से भी मिलने आई हूँ। मेरी कहानी सुनकर उसके माता-पिता कुछ देर शांत रहे... फिर उसके पापा बोले – "अगर तू पढ़ना चाहती है तो ठीक है, अभी तेरी शादी नहीं करेंगे।" यह सुनकर स्वाति के चेहरे पर एक अलग ही चमक आ गई। उसे खुश देखकर मेरे दिल को बहुत ख़ुशी हुई।

प्रियंका, बड्डी 
बेगुसराई 


Wednesday, July 2, 2025

"सोच में बदलाव" – एक बहू, एक सास और तीन पीढ़ियों की कहानी

सुनिए  साथियों, जमाना कितना बदल रहा है ना... लेकिन असली बदलाव तब दिखता है जब घर-परिवार के लोग अपनी सोच बदलें। ऐसा ही कुछ मैंने खुद अपनी आँखों से देखा और दिल से महसूस किया।

हमलोग हाल ही में जमुई में i-सक्षम में “बडी प्रशिक्षण” में गए थे। चार दिन का प्रशिक्षण था। बहुत कुछ नया सीखने को मिला। लेकिन सबसे बड़ी सीख तो एक कहानी ने दी... एक सास, एक बहू और एक प्यारी सी पोती की।
हमारी साथी नेहा दी भी वहाँ आई थीं। लेकिन अकेली नहीं — अपनी सासू माँ और बेटी रूपम के साथ। पहले तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मन में सवाल उठा कि अरे, नेहा दी की सासू माँ भी यहाँ? वो भी ट्रेनिंग में?

क्योंकि मैं नेहा दी की कहानी पहले से जानती थी। याद है, 2024 के फाउंडेशन डे पर मैंनें उनके जीवन पर नाटक लिखा था। तब जान पाई थी कि नेहा दी की पढ़ाई एक वक्त पर रोक दी गई थी। दसवीं में थीं तब उनकी सासू माँ ने साफ कहा थे,

"दसवीं पढ़कर क्या करेगी? बकरी ही तो चराएगी!"
सोचिए, कैसी तकलीफ हुई होगी नेहा दी को। लेकिन वक़्त बदला... हालात बदले... और सबसे बड़ी बात — सोच बदली।
अब वही सासू माँ... अपनी बहू का हाथ पकड़कर जमुई ले आईं। बोलीं —
"तू सीख, मैं रूपम को संभाल लूंगी।"

ये सिर्फ साथ आना नहीं था दीदी... ये था तीन पीढ़ियों का बदलाव। सासू माँ ने पूरे मन से नेहा दी का साथ दिया। पोती रूपम उनके गोद में खेलती रही और नेहा दी सारा ध्यान लगाकर ट्रेनिंग में सीखती रहीं।


ट्रेनिंग खत्म होने के बाद मैं उनके पास गई। धीरे-धीरे बातें होने लगीं। और उनकी बात सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। वो बोलीं —
"हाँ, पहले गलती हुई हमसे। सोचा था पढ़ाई से क्या होगा। पर अब समझ आई है। चाहे बेटी हो या बहू, पढ़ाई सबसे जरूरी है। आज गांव में लोग कहते हैं — देखो, आपकी बहू समाज में काम करती है, लड़कियों को समझाती है, लोगों की मदद करती है। तो मन गर्व से भर जाता है।"

नेहा की सासु माँ ने पिछले बातो को कहते-कहते उनकी आँखें भर आईं। फिर बोलीं —
"नेहा ने हमारे घर की सोच बदल दी है।"
सच कहूँ साथियों, उस दिन मैंने महसूस किया कि बदलाव सिर्फ किताबों में नहीं होता। जब हम किसी की कहानी को जीते हैं, उसे अपने आस-पास होते हुए देखते हैं, तब असली असर होता है।
ये सिर्फ नेहा दी का सफर नहीं था... ये हर उस लड़की की कहानी है जो लड़ती है, सीखती है और समाज की सोच बदल देती है।
"जब सोच बदले, तब ही असली बदलाव आता है"
– स्मृति, टीम मुंगेर।

Thursday, June 5, 2025

"पहले खुद जागी, अब पूरे गांव को जगा रही है"

हर गांव की गलियों में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं
जो चुपचाप अपनी राह बनाते हैं —
न कोई शोर, न कोई शिकायत।
लेकिन उनके कदम इतने मजबूत होते हैं कि पीछे आने वालों को रास्ता साफ दिखने लगता है।
हमारे फरदा गांव की ऐसी ही एक शख्सियत हैं — प्रेरणा कुमारी।
एक आम-सी लड़की, जो एक छोटे से गांव से निकल कर आई थी,
जिसने दुनिया को वैसा ही देखा था जैसा उसके घरवालों ने दिखाया था।

उसकी सोच की सीमाएं भी वहीं तक थीं, जहां तक उसने अपने घर के आंगन से झांका था।

मगर आज प्रेरणा वहां है, जहां वो अकेले ही 60 से ज़्यादा बच्चों को अपने शिक्षण केंद्र में उनके हुनर और  आत्मविश्वास के लिए तैयार कर रही हैं।

जब मैं पहली बार उनके लर्निंग सेंटर पहुंची, तो मन में एक साधारण-सी छवि थी —
सोचा था, एक छोटा-सा कमरा होगा, कुछ कुर्सियाँ होंगी, और कुछ बच्चे पढ़ते मिलेंगे।

लेकिन जो वहां देखा... वो दिल को छू गया।
वो सिर्फ एक क्लासरूम नहीं था —
वो एक ऐसी जगह थी, जहां हर बच्चा खुलकर सोच रहा था,
अपने मन की कह रहा था, और
जहां एक लड़की — प्रेरणा — चुपचाप हर दिल को छू रही थी।


मैंने एक ऐसी लड़की को देखा, जो दिखने में तो बिल्कुल साधारण थी, लेकिन उसके भीतर
आत्मविश्वास और समझ की एक खास चमक थी। वह जिस सादगी से बच्चों से जुड़ती, उन्हें सिखाती, और हर बच्चे की छिपी क्षमता को पहचानती थी — उसे देखकर लगा, ये सिर्फ पढ़ाना नहीं, बल्कि ज़िंदगी को एक नई दिशा देना है।
आज प्रेरणा कुमारी, FEA (Freedom Employability Academy) संस्था के साथ मिलकर फरदा गांव में एक शिक्षण केंद्र चला रही हैं। यहां केवल अंग्रेज़ी बोलना नहीं सिखाया जाता, बल्कि ये सिखाया जाता है कि खुद पर भरोसा कैसे किया जाए, और दुनिया के सामने खड़े होकर अपने हक की बात कैसे कही जाए। प्रेरणा हर बच्चे के भीतर कुछ खास देखती हैं — और उसी हुनर को निखारने में जी-जान लगा देती हैं।


लेकिन प्रेरणा का यह सफर कभी आसान नहीं रहा।
सीमित संसाधन, घरेलू जिम्मेदारियां और समाज की संकीर्ण सोच — इन सबके बीच उन्होंने पढ़ाई का दामन थामे रखा।जब आसपास की दुनिया लड़कियों को सिर्फ रसोई और चौखट तक सीमित रखने की बातें कर रही थी,तब प्रेरणा ने i-Saksham से जुड़कर न सिर्फ खुद को बदला,बल्कि यह ठान लिया कि अब अपने गांव में भी बदलाव लाना है —और आज, वो वही कर रही हैं... पूरे संकल्प और सच्ची नीयत के साथ।


प्रेरणा से मिलकर मुझे महसूस हुआ कि असली बदलाव भाषणों से नहीं, बल्कि अपने काम से आता है।
उनकी हर छोटी कोशिश, हर एक शब्द गांव के युवाओं में आत्मविश्वास जगाता है।
अब लड़कियां खुलकर सपने देखती हैं, और लड़के अपने भविष्य को लेकर जागरूक होते जा रहे हैं —
क्योंकि किसी ने उन्हें दिखा दिया है कि ये सच में मुमकिन है।


प्रेरणा — एक उम्मीद की मिसाल हैं।
वो हमारे गांव की वह पहली लड़की हैं, जिसने हिम्मत जुटाई, अपनी राह बनाई —

और आज उसी राह पर कई और कदम बढ़ाने लगे हैं।

प्रेरणा की तरह, फरदा गांव की कई महिलाएं और लड़कियां भी अब आगे बढ़ रही हैं।
हमें पूरा विश्वास है कि ये बदलाव हमारे समाज के लिए एक नया सूरज लेकर आएगा —
जो हर अंधेरे को दूर करेगा, और नई रोशनी बिखेरेगा।

प्रेरणा कुमारी
जिला- मुंगेर

Tuesday, June 3, 2025

आत्मविश्वास और हिम्मत

8 मार्च को गॉव (भाटचक) में आयोजित पैदल यात्रा इवेंट में मैंने अभिभावकों और ग्रामीणों को शामिल करने के लिए घर-घर जाकर निमंत्रण दिया। मुझे लगता था कि लोग नहीं आएंगे, लेकिन मैंने जिम्मेदारी को पूरा करने का फैसला किया। एक अभिभावक के घर पर, जो बीड़ी बना रहे थे, मैंने उन्हें समझाया कि महिला दिवस पर एक साथ मिलकर अपनी आवाज उठाने से ही
हमें पहचाना जाएगा। वे मेरी बात से सहमत हुए और इवेंट में शामिल हुए।

18 मार्च को गांव (सरारी) में आयोजित नुक्कड़ नाटक इवेंट में मैंने पहली बार एंकरिंग की। मुझे डर था कि मैं इतने लोगों के बीच बोल पाऊंगी या नहीं। लेकिन मेरी बड़ी स्नेहा दी ने मुझे हिम्मत दी और मैं इवेंट में सफलतापूर्वक बोली। इवेंट के बाद, एक महिला ने मुझे रोककर तारीफ की और कहा कि मैंने बहुत अच्छा बोला। मुझे खुद पर गर्व हुआ कि मेरे बोलने के कारण मुझे पहचाना गया।


फाउंडेशन डे में मैंने नाटक में भाग लिया और एक बेटी का रोल किया। मुझे पहले लगता था कि मैं नहीं कर पाऊंगी, लेकिन ड्रामा ग्रुप के सदस्यों ने मुझे हिम्मत दी। मैंने घर पर प्रैक्टिस की और फाउंडेशन डे के दिन अपना पूरा बेस्ट देने की कोशिश की। मैं उतने लोगों के बीच बोल सकी और अपने डर को दूर किया।

इन अनुभवों से मैंने सीखा कि डर को दूर करने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हिम्मत और प्रयास की आवश्यकता होती है। मैं अपनी बड़ी स्नेहा दी, जूली दी, खुशबू दी और अन्य साथियों को धन्यवाद देती हूं जिन्होंने मुझे हिम्मत दी और समर्थन किया।


रिया 
बैच 11 
जमुई 


Monday, June 2, 2025

"मेरे संग बच्चे भी मुस्कुराने लगे"

जब मैं पहली बार इस विद्यालय  में आई तो यहां के बच्चे पढ़ाई में रुचि नहीं लेते थे वे केवल खेल कूद में ज्यादा व्यस्त रहते थे और किताबों से दूर भागते थे l विद्यालय का वातावरण भी कुछ खास नहीं था l मैं धीरे-धीरे बच्चों को साथ दोस्ती करनी शुरू की मैं उन्हें खेल में रुचि दिखाई और उनके साथ  समय बिताकर अपना रिश्ता मजबूत किया l

रिश्ता मजबूत होने के बाद मैं पढ़ाई को खेल की तरफ प्रस्तुत किया मैंने छोटे-छोटे कहानी और एक्टिविटी के माध्यम से उन्हें पढ़ाई में रुचि लाने के लिए प्रेरित की बच्चों ने एक्टिविटी से अधिक प्रेरित हुए और उन्होंने देखा की पढ़ाई में भी खेल हो सकती है,तो उन्होंने पढ़ाई में भी रुचि लेनी शुरू कर दी l

विद्यालय का वातावरण धीरे-धीरे बदलने लगा l मेरे गांव से शिक्षक अभिभावक बैठक से यह निकल कर आ रहे हैं,कि इस विद्यालय में बच्चे अब पहले के जैसे विद्यालय में बैग रखकर बाहर घूमते नहीं रहते हैं l उनकी बातचीत में रहन-सहन में भी परिवर्तन हुआ है l "मेरा विद्यालय से जुड़ने का उद्देश्य यह था कि मैं विद्यालय के बच्चों को एक अच्छे नागरिक की दिशा में आगे बढ़ते हुए देख सकूं।" 

पहले हमारे विद्यालय में बच्चे प्रार्थना संगीत के बाजे के साथ करते थे, लेकिन अब चार से पाँच बच्चे मिलकर खुद ही यह प्रार्थना सस्वर गाते हैं—
"तू ही राम है, तू रहीम है,
तू करीम, कृष्ण, खुदा हुआ,
तू ही वाहे गुरु, तू यशु मसीह,
हर नाम में तू समाया हुआ।"


पहले जब भी विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस मनाया जाता था, बच्चे उसमें खास रुचि नहीं दिखाते थे। वे न तो किसी गतिविधि में भाग लेते थे और न ही आगे बढ़कर कोई पहल करते थे। यह देखकर मन उदास हो जाता था। लेकिन इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मैंने बच्चों से उनके ही पुराने अनुभवों की बात की—कैसे पहले उन्हें पढ़ाई में भी मन नहीं लगता था, लेकिन अब वे मन लगाकर पढ़ रहे हैं। मैंने कहा, “जिस तरह पढ़ाई अब आसान लगती है, वैसे ही मंच पर बोलना, नारे लगाना और भाग लेना भी आसान हो सकता है।” मेरी बातों ने बच्चों को अंदर तक छू लिया।

फिर क्या था—लगातार प्रयास और प्रोत्साहन से बच्चों में धीरे-धीरे आत्मविश्वास जागा। अब वे खुद से प्रार्थना कराते हैं, नारे लगाते हैं और मंच पर गाना गाने के लिए उत्साहित रहते हैं। यह देखकर मुझे भी एक नई ऊर्जा मिली, और मेरा आत्मविश्वास पहले से कहीं अधिक बढ़ गया।

मेरे इन छोटे-छोटे प्रयासों से बच्चों में आया यह सकारात्मक बदलाव मेरे लिए एक बड़ी सफलता है। जब कोई इस बदलाव को देखता है, तो उसे न केवल आश्चर्य होता है, बल्कि गर्व भी होता है कि सही दिशा में किया गया छोटा प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकता है।

नाम- मुस्कान कुमारी 

बैच-10 , मुजफ्फरपुर


Friday, April 18, 2025

गाँव की लड़की, और अब समुदाय की उम्मीद

मै उस गॉव की लड़की हूँ, जिसने कभी सोचा भी नहीं था की शिक्षा एक माध्यम बन सकती है- खुद को जानने, समझने और समाज में बदलाव लाने का। लेकिन आई-सक्षम फैलोशिप ने मुझे यही अवसर दिया। 
इन दो वर्षो में मैंने केवल शिक्षिका की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि एक सुनने वाली साथी, सिखने वाली छात्रा, और नेतृत्व करने वाली दीदी के रूप में भी खुद को ढाला। बच्चो के साथ दिन के शुरुआत, मोहल्ला कक्षाओं में रचनात्मक गतिविधियाँ, और समुदाय के साथ सार्थक सवांद – ये मेरी प्रतिदिन की दिनचर्या का हिस्सा बन गए।

फेलोशिप के दौरान मैंने यह जाना की आत्मा-विश्लेषण और आत्मचिंतन कितने जरुरी हैं। “बढ़ते कदम” जैसे चिंतन-पत्रकों ने मुझे अपने विचारों को शव्द देने की कला सिखाई। जब मेरे साथी मेरी बातो को पढ़ते और सुझाव देते, तो लगता जैसे हम सब मिलकर एक-दुसरे को आगे बढ़ा रहे हैं।
मेरे गाँव में अब लोग मुझे सम्मान से ‘दीदी’ कहते है – वह दीदी जो सुनती है और साथ चलती है। आज मै पुरे विश्वास से कह सकती हूँ की यह यात्रा केवल शिक्षण की नहीं, बल्कि एक सशक्त स्त्री बनने की यात्रा थी।

तनु प्रिय

बैच -10  

बेगुसराई



Tuesday, March 18, 2025

हलीमपुर गाँव की पहली झलक

आज मैं आप सभी के साथ अपने समुदाय के काम (हलीमपुर) के अनुभव को साझा करना चाहती हूँ, जहाँ मैं एडु लीडर रश्मि (बैच 10A) के साथ गई थी।
जैसे ही हम उस गाँव में पहुँचे, वहाँ की कई चीज़ों ने मेरा मन मोह लिया—मिट्टी के घरों पर बनी सुंदर पेंटिंग, पुराने जमाने में उपयोग होने वाली चीज़ें, खेतों के बीच से गुजरती कच्ची-पक्की सड़कें, और हर ओर फैली हरियाली। गाँव का यह सरल, पर मनमोहक दृश्य मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था।
शिवम के परिवार से मुलाकात:- आज के समुदाय में काम के दौरान, हमें एडु लीडर द्वारा पढ़ाए जाने वाले एक छात्र, शिवम, के अभिभावकों से मिलने का अवसर मिला। सबसे पहले, हमें शिवम के दादा जी मिले, जिन्होंने बड़े ही स्नेह से हमें घर के अंदर बुलाया और बैठने के लिए कहा। कुछ देर बाद, शिवम की माँ और दादी भी आ गईं।
एडु लीडर, शिवम की माँ से उनकी पढ़ाई को लेकर बात कर रही थीं। उसी दौरान, उनकी दादी, कमला देवी जी, मुझसे बहुत आत्मीयता से बातचीत करने लगीं। उन्होंने मुझसे पूछा—
"बेटी, तुम कहाँ से आई हो?" "तुम्हारा नाम क्या है?" "तुम क्या करती हो, क्या पढ़ाई कर रही हो?"
उनका बात करने का आत्मीय अंदाज मुझे बहुत अच्छा लगा। बातचीत के दौरान, उन्होंने अपने पोते की पढ़ाई को लेकर अपनी इच्छाएँ और विचार साझा किए, जिससे उनकी शिक्षा के प्रति जागरूकता स्पष्ट झलक रही थी।
बातचीत के दौरान, कमला देवी जी ने अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण अनुभव साझा किए, जो मुझे बहुत प्रेरणादायक लगे। उन्होंने बताया कि उनकी शादी 1968 में हो गई थी, लेकिन उससे पहले वे 7वीं कक्षा में फर्स्ट डिवीजन से पास हुई थीं। इसके लिए उन्हें छात्रवृत्ति (scholarship) भी मिली थी, जिससे उन्होंने अपने लिए एक नोज़ पिन खरीदी थी, जिसे वे आज भी पहनती हैं।

उन्होंने आगे बताया कि उनका सरकारी शिक्षिका के पद पर चयन भी हो गया था, लेकिन उनके पति ने उन्हें नौकरी करने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि उस समय घर की बहूओं का बाहर जाकर काम करना समाज में स्वीकार्य नहीं था। हालाँकि, उन्होंने अपने बच्चों और बहू की पढ़ाई को हमेशा प्राथमिकता दी।

उनकी बहू ने शादी के बाद स्नातक पूरा किया और बिहार पुलिस तथा एसएससी की परीक्षाओं के लिए आवेदन भी किया, लेकिन सफल नहीं हो सकीं। इसके बाद, पारिवारिक जिम्मेदारियों में व्यस्त होने के कारण उनकी पढ़ाई छूट गई।

शिक्षा के प्रति जागरूकता और आत्मनिर्भरता

कमला देवी जी की बातचीत में कई अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग सुनकर मैं हैरान रह गई, जैसे अंडरलाइन, सब्जेक्ट आदि। जब मैंने जिज्ञासावश पूछा, तो उन्होंने बताया कि 1980 में जब एक साक्षरता कार्यक्रम आया था, तो वे भी उसमें शामिल हुई थीं। वे गाँव की महिलाओं को घर बुलाकर पढ़ाती थीं, जिससे उन्हें बहुत खुशी मिलती थी।
उनकी सोच, शिक्षा के प्रति जागरूकता, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास ने मुझे बहुत प्रभावित किया। बातचीत के अंत में, उन्होंने मुझसे कहा—
"बहुत दिनों बाद मैंने खुलकर अपने मन की बात की,"
जो सुनकर मेरे मन में उनके प्रति और भी सम्मान बढ़ गया।

जब हम वहाँ से जाने लगे, तो उन्होंने प्यार भरे शब्दों में कहा—
"बेटी, फिर जरूर आइएगा,"

जिससे मुझे बहुत अपनापन और आत्मीयता का एहसास हुआ, जैसे कोई हमारे दोबारा लौटने का बेसब्री से इंतजार कर रहा हो। इस पूरे अनुभव ने मुझे शिक्षा के महत्व और उसके प्रभाव को गहराई से समझने का अवसर दिया। कमला देवी जी जैसी प्रेरणादायक महिलाओं से मिलकर मुझे महसूस हुआ कि सच्ची शिक्षा केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि सोच और जागरूकता में होती है।


स्मृति कुमारी
बड़ी इंटर्न, मुंगेर