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Monday, September 8, 2025

"एक दिन कोई बेच देगा तुम लोगों को"

"पापा, हम वाराणसी जाएंगे। छोटी बहन का B.Ed का एग्जाम है। सोच रही हूँ, परीक्षा भी हो जाएगी और घूम भी लेंगे।”

यह कहानी उस दिन शुरू हुई जब मैंने अपनी माँ और बहन के साथ वाराणसी जाने का एक छोटा-सा प्लान बनाया। मेरी छोटी बहन की B.Ed की परीक्षा थी और हमने सोचा कि इसी बहाने हम सब साथ घूम भी लेंगे।

जब मैंने यह बात अपने ससुर जी को बताई, तो मुझे एक ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी जो मेरे आत्मविश्वास को हिलाकर रख दे। मैंने उत्साह से कहा, “पापा, हम सब वाराणसी जा रहे हैं। टिकट भी करवा लिए हैं।”

उन्होंने बिना किसी भाव के पूछा, “तुम, तुम्हारी माँ, तुम्हारी बहन... बस! कोई मर्द साथ नहीं जाएगा? कैसे हिम्मत हो जाती है तुम्हारी बिना मर्द के जाने की? एक दिन कोई बेच देगा तुम लोगों को।”

एक सवाल जो दिल में चुभ गया

उनके शब्द मेरे कानों में तीर की तरह चुभे। उनके सवाल में चिंता नहीं, बल्कि अविश्वास था। वह मेरे पिता समान थे, लेकिन उन्होंने एक बार भी यह नहीं पूछा कि हम किस ट्रेन से जा रहे हैं, या हमें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं।

उस रात मैं बहुत रोई। मेरे मन में बार-बार यही ख्याल आ रहा था – "क्या मैं सच में कुछ गलत कर रही हूँ? क्या मुझे टिकट कैंसिल करवा देने चाहिए?"

हिम्मत का एक छोटा-सा फैसला

लेकिन आँसुओं के बीच मेरे अंदर से एक आवाज़ आई – “मैं एक औरत हूँ, लेकिन कमज़ोर नहीं। मेरी हिम्मत मेरी अपनी है, किसी पुरुष की परछाई नहीं।”

मैंने टिकट कैंसिल नहीं कराए। मैंने न सिर्फ जाने का फैसला किया, बल्कि अपनी माँ, बहन और अपने चार साल के बेटे के साथ एक सुरक्षित यात्रा पूरी की। हमने वाराणसी घूमा भी और मेरी बहन ने सफलतापूर्वक अपनी परीक्षा भी दी।

लीडरशिप का असली मतलब

कुछ समय बाद, एक ट्रेनिंग सेशन में जब ‘जेंडर स्टीरियोटाइप’ यानी लिंग के आधार पर बनी पुरानी सोच पर बात हो रही थी, तो मुझे अपना यह अनुभव याद आ गया। मेरे ससुर जी की वह बात, कि “औरत मर्द के बिना यात्रा नहीं कर सकती,” इसी गलत सोच का एक उदाहरण थी।

उस दिन मैंने बहस करके नहीं, बल्कि अपने फैसले पर टिककर उस सोच को तोड़ा था।

इस यात्रा ने मुझे सिखाया कि असली सुरक्षा किसी के साथ होने में नहीं, बल्कि खुद पर विश्वास करने में है। अब मेरा बस एक ही सपना है - अपनी बेटी को यह डर कभी महसूस न होने देना। मैं उसे सिखाऊँगी कि तुम्हारी हिम्मत ही तुम्हारी सबसे बड़ी साथी है।


लेखिका :

काजल,  B11 Edu-Leader, Munger  

Friday, January 31, 2025

मेरा बदलाव और सफलता की यात्रा: खुशबू की कहानी

i-सक्षम से जुड़ने बाद मुझेमें बहुत बदलाव आया है। शुरुआत में मुझे बहुत चुनौतिया आई क्योंकि मै एक बहु हूँ और मेरे घर से निकलना भी नहीं होता था। लेकिन अब मैं समुदाय के हर वर्ग के अभिभावक से मिल रही हूँ और उनसे जुड़ पा रही हूँ। पहले बहुत डर लगता था कि लोग क्या बोलेंगे और अभिभवाक कैसी प्रतिक्रिया देंगे। लेकिन अब यह डर नहीं रहता क्योंकि मुझे लगता है की हर प्रतिक्रिया से कुछ सिखने को मिलेगा।

स्कूल में भी जब हेडमास्टर सर से बात करनी होती थी, तब डर लगता था। सोचती थी कि सर क्या कह देंगे और मैं क्या जवाब दूँगी। लेकिन अब यह डर खत्म हो गया है और मैं बेझिझक सर से बात कर पाती हूँ। अपने परिवार में भी अब मैं अपनी बात रख पाती हूँ। पहले जमुई जाना होता था तो बिना किसी घर के सदस्य के नहीं जा सकती थी। लेकिन अब अकेले जमुई जाना और लौट आना मेरे लिए सामान्य हो गया है, भले घर वाले सहमत न हों।

सेशन में भी अब अपनी बात रखने का आत्मविश्वास आ गया है। पहले डरती थी कि कहीं कुछ गलत न बोल दूँ, लेकिन अब यह सोचती हूँ कि गलती से भी कुछ नया सीखने को मिलेगा। अब मेरी पहचान मेरे पति के नाम से नहीं, बल्कि मेरी अपनी मेहनत से है। यह मेरे लिए गर्व की बात है।
मेरे काम के कारण समुदाय में मुझे साफ-सफाई के लिए सम्मान मिला। जब हमारे गाँव में 65वां पंचायत समारोह हुआ, तो मुझे वहाँ सम्मानित किया गया। यह मेरे जीवन का गर्वपूर्ण क्षण था।
मैं आई-सक्षम का धन्यवाद करती हूँ जिसने मुझे यह मौका दिया और मेरे जीवन में यह बदलाव लाया।

खुशबू 

बैच-11 

जमुई



शिक्षक का असली उद्देश्य: आरती दीदी की प्रेरणादायक कहानी

यह कहानी इस बात को बेहतरीन उदाहरण है की शिक्षक केवल किताबों तक सिमित नहीं होते, बल्कि वे समाज के हर उम्र और वर्ग के व्यक्ति की मदद ले सकते हैं। आरती दीदी ने जिस तरह से एक जागरुकतमंद महिला की मदद की ओर उसे आत्मनिर्भर बनाया, वह शिक्षा के वास्तविक उदेश्य को दर्शाता है। शिक्षा न केवल ज्ञान देना है, बल्कि आत्मविश्वास और आत्मनिर्भर का निर्माण करना भी है।

आरती दीदी ने उस महिला को न कवक जीवन की नई दिशा दी, बल्कि यह भी सिखाया की किसी भी उम्र में सिखने की प्रकिया समाप्त नहीं होती। यह प्रयास दिखाता है की शिक्षा का दायरा केवल बच्चो तक सिमित नहीं हैं, बल्कि यह जीवन के हर पहलू में व्याप्त है।



इस प्रयास से यह भी समझ आता है की एक छोटी सी मदद किसी के जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकती है। आरती दीदी की यह प्रेरक कहानी हमें यद् दिलाती है की समाज में शिक्षक सिर्फ कक्षा तक ही सिमित नहीं रहती, बल्कि वे बदलाव लाने मार्गदर्शक भी होती हैं। 


इस तरह के प्रयास हमें प्रेरणा देते हैं की हर व्यक्ति के पास समाज में बदलाव लाने की क्षमता होती है, बस जरूरत है हौसले और सही दृष्टिकोण की।

मौसम कुमारी
बडी, मुजफ्फरपुर