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Tuesday, March 18, 2025

हलीमपुर गाँव की पहली झलक

आज मैं आप सभी के साथ अपने समुदाय के काम (हलीमपुर) के अनुभव को साझा करना चाहती हूँ, जहाँ मैं एडु लीडर रश्मि (बैच 10A) के साथ गई थी।
जैसे ही हम उस गाँव में पहुँचे, वहाँ की कई चीज़ों ने मेरा मन मोह लिया—मिट्टी के घरों पर बनी सुंदर पेंटिंग, पुराने जमाने में उपयोग होने वाली चीज़ें, खेतों के बीच से गुजरती कच्ची-पक्की सड़कें, और हर ओर फैली हरियाली। गाँव का यह सरल, पर मनमोहक दृश्य मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था।
शिवम के परिवार से मुलाकात:- आज के समुदाय में काम के दौरान, हमें एडु लीडर द्वारा पढ़ाए जाने वाले एक छात्र, शिवम, के अभिभावकों से मिलने का अवसर मिला। सबसे पहले, हमें शिवम के दादा जी मिले, जिन्होंने बड़े ही स्नेह से हमें घर के अंदर बुलाया और बैठने के लिए कहा। कुछ देर बाद, शिवम की माँ और दादी भी आ गईं।
एडु लीडर, शिवम की माँ से उनकी पढ़ाई को लेकर बात कर रही थीं। उसी दौरान, उनकी दादी, कमला देवी जी, मुझसे बहुत आत्मीयता से बातचीत करने लगीं। उन्होंने मुझसे पूछा—
"बेटी, तुम कहाँ से आई हो?" "तुम्हारा नाम क्या है?" "तुम क्या करती हो, क्या पढ़ाई कर रही हो?"
उनका बात करने का आत्मीय अंदाज मुझे बहुत अच्छा लगा। बातचीत के दौरान, उन्होंने अपने पोते की पढ़ाई को लेकर अपनी इच्छाएँ और विचार साझा किए, जिससे उनकी शिक्षा के प्रति जागरूकता स्पष्ट झलक रही थी।
बातचीत के दौरान, कमला देवी जी ने अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण अनुभव साझा किए, जो मुझे बहुत प्रेरणादायक लगे। उन्होंने बताया कि उनकी शादी 1968 में हो गई थी, लेकिन उससे पहले वे 7वीं कक्षा में फर्स्ट डिवीजन से पास हुई थीं। इसके लिए उन्हें छात्रवृत्ति (scholarship) भी मिली थी, जिससे उन्होंने अपने लिए एक नोज़ पिन खरीदी थी, जिसे वे आज भी पहनती हैं।

उन्होंने आगे बताया कि उनका सरकारी शिक्षिका के पद पर चयन भी हो गया था, लेकिन उनके पति ने उन्हें नौकरी करने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि उस समय घर की बहूओं का बाहर जाकर काम करना समाज में स्वीकार्य नहीं था। हालाँकि, उन्होंने अपने बच्चों और बहू की पढ़ाई को हमेशा प्राथमिकता दी।

उनकी बहू ने शादी के बाद स्नातक पूरा किया और बिहार पुलिस तथा एसएससी की परीक्षाओं के लिए आवेदन भी किया, लेकिन सफल नहीं हो सकीं। इसके बाद, पारिवारिक जिम्मेदारियों में व्यस्त होने के कारण उनकी पढ़ाई छूट गई।

शिक्षा के प्रति जागरूकता और आत्मनिर्भरता

कमला देवी जी की बातचीत में कई अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग सुनकर मैं हैरान रह गई, जैसे अंडरलाइन, सब्जेक्ट आदि। जब मैंने जिज्ञासावश पूछा, तो उन्होंने बताया कि 1980 में जब एक साक्षरता कार्यक्रम आया था, तो वे भी उसमें शामिल हुई थीं। वे गाँव की महिलाओं को घर बुलाकर पढ़ाती थीं, जिससे उन्हें बहुत खुशी मिलती थी।
उनकी सोच, शिक्षा के प्रति जागरूकता, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास ने मुझे बहुत प्रभावित किया। बातचीत के अंत में, उन्होंने मुझसे कहा—
"बहुत दिनों बाद मैंने खुलकर अपने मन की बात की,"
जो सुनकर मेरे मन में उनके प्रति और भी सम्मान बढ़ गया।

जब हम वहाँ से जाने लगे, तो उन्होंने प्यार भरे शब्दों में कहा—
"बेटी, फिर जरूर आइएगा,"

जिससे मुझे बहुत अपनापन और आत्मीयता का एहसास हुआ, जैसे कोई हमारे दोबारा लौटने का बेसब्री से इंतजार कर रहा हो। इस पूरे अनुभव ने मुझे शिक्षा के महत्व और उसके प्रभाव को गहराई से समझने का अवसर दिया। कमला देवी जी जैसी प्रेरणादायक महिलाओं से मिलकर मुझे महसूस हुआ कि सच्ची शिक्षा केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि सोच और जागरूकता में होती है।


स्मृति कुमारी
बड़ी इंटर्न, मुंगेर

Friday, January 31, 2025

शिक्षक का असली उद्देश्य: आरती दीदी की प्रेरणादायक कहानी

यह कहानी इस बात को बेहतरीन उदाहरण है की शिक्षक केवल किताबों तक सिमित नहीं होते, बल्कि वे समाज के हर उम्र और वर्ग के व्यक्ति की मदद ले सकते हैं। आरती दीदी ने जिस तरह से एक जागरुकतमंद महिला की मदद की ओर उसे आत्मनिर्भर बनाया, वह शिक्षा के वास्तविक उदेश्य को दर्शाता है। शिक्षा न केवल ज्ञान देना है, बल्कि आत्मविश्वास और आत्मनिर्भर का निर्माण करना भी है।

आरती दीदी ने उस महिला को न कवक जीवन की नई दिशा दी, बल्कि यह भी सिखाया की किसी भी उम्र में सिखने की प्रकिया समाप्त नहीं होती। यह प्रयास दिखाता है की शिक्षा का दायरा केवल बच्चो तक सिमित नहीं हैं, बल्कि यह जीवन के हर पहलू में व्याप्त है।



इस प्रयास से यह भी समझ आता है की एक छोटी सी मदद किसी के जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकती है। आरती दीदी की यह प्रेरक कहानी हमें यद् दिलाती है की समाज में शिक्षक सिर्फ कक्षा तक ही सिमित नहीं रहती, बल्कि वे बदलाव लाने मार्गदर्शक भी होती हैं। 


इस तरह के प्रयास हमें प्रेरणा देते हैं की हर व्यक्ति के पास समाज में बदलाव लाने की क्षमता होती है, बस जरूरत है हौसले और सही दृष्टिकोण की।

मौसम कुमारी
बडी, मुजफ्फरपुर

Wednesday, January 29, 2025

अपनी आवाज़ को अपनाई और पहचान बनाई : रंगीला

एक छोटे से गाँव मुहमदपुर की i-सक्षम में बैच-10 की एडू-लीडर रंगीला हैं। जो खुद में और अपने समुदाय में सकारत्मक प्रभाव छोड़ रही है। उनका आत्मविश्वास बढ़ना, अपने आवाज को अपनाना और दूसरों के साथ स्नेहपूर्ण संबंध बनाना सच में एक बड़ी उपलब्धि है।

महिलाओं को जागरूक करने की पहल


रंगीला ने अपने समुदाय में जाकर महिलाओं को मासिक धर्म में स्वच्छता से जुड़ी जरूरी जानकारी प्रदान की।

उन्होंने लगभग 10 महिलाओं से मिलकर इस विषय पर गहरी बातचीत की। इसके अलावा, वह अपनी स्थानीय समुदाय की दो महिलाओं को हस्ताक्षर सिखाने में भी मदद की। यह उनको दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसमें एक सशक्त लीडर केवल ज्ञान बांटने तक समित नहीं रहता, बल्कि अपने जीवन के संघर्ष और व्यक्तिगत गुणों से भी लोगों को प्रेरित करता है।


चुनौतियों का सामना और प्रेरणा 


रंगीला का अपने पहचान बनान और कठिनाइयों का सामना करते हुए आगे बढ़ना यह दिखता है की कैसे धैर्य, शांति और आत्मविश्वास के साथ किसी भी चुनौती को पर किया जा सकता है। उनको यह प्रयास से यह स्पष्ट होता है की शिक्षा और जागरूकता का दायरा सिर्फ व्यक्ति विशेष तक समित नहीं रहता, बल्कि यह समाज में व्यापक बदलाव लाने की क्षमता रखता है। 

समुदाय में लीडरशिप की भूमिका 
एक एडू लीडर का प्रभाव सिर्फ विद्यालय या कार्यक्षेत्र तक समित नहीं होती, बल्कि वह अपने समुदाय और परिवार में भी सकारत्मक परिवर्तन लाता है। रंगीला ने इस बात को पूरी तरह प्रमाणित किया है। उनको यह प्रयास न केवल प्रेरणादायक है बल्कि यह दिखता है की छोटे कदम भी बड़े बदलाव की नींव रख सकते हैं।


  

शिक्षा के प्रति दृढ़ संकल्प
रंगीला अपने गाँव की पहली लड़की हैं जो घर से बाहर जाकर पढाई करने की इच्छा रखती हैं। यह न केवल उनके लिए बल्कि पूरे समुदाय के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने छपरा के अखंड ज्योति आँख अस्पताल के त्योहार में भी भाग ले कर अपनी सहभागिता दिखाई।
अंतर्मन से नेतृत्व की सीख
उनकी कहानी यह सिखाती है कि जब कोई व्यक्ति अपने आत्मविश्वास और जुनून के साथ आगे बढ़ता है, तो वह न केवल अपने जीवन में बदलाव लाता है बल्कि अपने आसपास के समाज को भी प्रेरित करता है। रंगीला जैसे लोग यह सिद्ध करते हैं कि सच्चा नेतृत्व दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने से परिभाषित होता है।

राधा, बड़ी

मुजफ्फरपुर







Tuesday, January 28, 2025

शादी के बाद शिक्षा की जरूरत पर सवाल

आज मैं अपनी चाची के लिए "वॉइस एंड चॉइस" का उपयोग कर उनके प्रेरणादायक अनुभव को साझा करना चाहती हूँ। यह कहानी एक ऐसे सपने की है, जिसे समाज ने नामुमकिन बना दिया था, लेकिन चाची की लगन और हमारे प्रयासों ने इसे हकीकत में बदल दिया।

मेरी चाची का हमेशा से सपना था कि वे पढ़ाई करें और अपनी शिक्षा पूरी करें। लेकिन उनकी शादी के बाद, उनके परिवार ने यह कहकर उनका सपना तोड़ दिया कि "अब पढ़ाई का कोई मतलब नहीं। शादी के बाद शिक्षा की जरूरत किसे है?" उनके दिल में कहीं यह बात घर कर गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

जब मैंने उनके मन में छिपी इस इच्छा को देखा, तो मैंने ठान लिया कि उनकी पढ़ाई को लेकर मैं उनका साथ दूँगी। मैंने उन्हें समझाया, "पहले आप अपने पति से बात करें और अपनी पढ़ाई की इच्छा जाहिर करें। यह आपका अधिकार है।"



उन्होंने हिम्मत करके अपने पति (मेरे चाचा) से बात की, लेकिन उन्हें भी मना कर दिया गया। चाचा ने साफ कहा, "अब पढ़ाई का क्या फायदा? शादी के बाद पढ़ाई की जरूरत ही क्या है?"
यह सुनकर मैं चुप नहीं बैठी। मैंने चाचा से व्यक्तिगत रूप से बात करने का फैसला किया। मैं उनके पास गई और कहा, "चाचा, आपकी बेटी अभी सिर्फ दो साल की है। जब वह बड़ी होकर आपसे पूछेगी कि 'पापा, आप कितनी पढ़ाई किए हैं?' तो आप गर्व से कहेंगे, 'हम इंटर तक पढ़े हैं।' लेकिन जब वह मम्मी से पूछेगी, 'मम्मी, आप कितनी पढ़ी हैं?' और मम्मी सिर्फ 9वीं तक पढ़ी होंगी, तो इसका क्या जवाब देंगे? क्या आप नहीं चाहेंगे कि चाची अपनी बेटी के लिए एक प्रेरणा बनें? क्या आप नहीं चाहेंगे कि आपकी बेटी अपनी माँ को भी पढ़ा-लिखा और आत्मनिर्भर देखे?"
मेरी इन बातों ने चाचा को सोचने पर मजबूर कर दिया। कुछ दिनों बाद, उन्होंने बात मान गए। उसके मैं चाची को एक स्कूल में नामांकन कराया।

शुरुआत में यह सफर चाची के लिए आसान नहीं था। घर के कामों और पढ़ाई के बीच तालमेल बैठाना एक बड़ा संघर्ष था। लेकिन उनकी मेहनत और जज़्बे ने हर मुश्किल को आसान बना दिया।


आज, मैं गर्व से कह सकती हूँ कि मेरी चाची ने 10वीं की परीक्षा पास कर ली है। यह सिर्फ एक परीक्षा पास करना नहीं था, बल्कि उनके सपनों की पहली सीढ़ी थी। अब हम उन्हें आगे पढ़ाई के लिए प्रेरित कर रहे हैं ताकि वे अपने सपनों को पूरी तरह से साकार कर सकें।
चाची की यह कहानी सिर्फ उनके सपनों की नहीं, बल्कि हर उस महिला की है, जो अपने हक के लिए खड़ी होती है। जब उन्हें सही समर्थन और मौका मिलता है, तो वे हर असंभव को संभव बना सकती हैं।

मोंटी कुमारी 
बैच 10 
मुंगेर