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Friday, July 25, 2025

सपनों की सीढियाँ , संकल्प की सींच

किसने सोचा था ? की बिहार के ग्रामीण क्षेत्र (बड़गाव) के मध्य वर्गीय परिवार की एक साधारण सी लड़की कभी भोपाल जा कर उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाएगी। क्योंकि ,  वर्षों तक सामाजिक रूढ़ियों, आर्थिक सीमाओं, और सुविधाओं की कमी ने ग्रामीण लड़कियों की शिक्षा को बाधित किया है।  लेकिन अब परिस्थितियां धीरे-धीरे बदल रही है।
 
ऐसी ही कहानी है - कल्पना की। कल्पना का बचपन से ही सपना था की वो कुछ अलग करें। परिवार की स्थिति दयनीय होने के बावजूद भी उसके मन में अपने सपने को पूरा करने की चाह लगी हुई थी। जहाँ लड़कियों के लिए बुनियादी शिक्षा पाना भी मुश्किल होता है वहां उच्च शिक्षा तक पहुंचने की चाह रखना तो सच में ही एक संघर्ष से कम नहीं है। 


कल्पना के सपनो को तब पंख मिल गई जब उसे आई - सक्षम फ़ेलोशिप का साथ मिला। जो उनके सपने को पाने में उनका एक मजबूत हथियार बना। कल्पना पहले सिर्फ अपने सपने को देख रही थी , लेकिन जब कल्पना को आई - सक्षम में "अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी " के बारे में पता चला , तो वो अपने सपने को जीने लगी। कल्पना ने ये कब सोचा था की उसके सपनो को नई उड़ान मिल जाएगी।

उन्होंने अपनी पढाई शुरू की जिसमे आई-सक्षम के टीम ने उनकी काफी मदद की और मार्गदर्शन किया। फ़ेलोशिप के सेशन और प्रक्रियाओं द्वारा कल्पना को प्रेरणा मिली और वो अपने सपनो के राश्ते पर आगे बढ़ी। आई-सक्षम ने उन्हें वित्तीय रूप से भी सहायता प्रदान किया।  अपने आत्म-विश्वास और आई-सक्षम के सहायता से कल्पना सौ प्रतिशत स्कॉलरशिप के साथ अपना एग्जाम और इंटरव्यू पास की।


जिस दिन कल्पना का चयन "अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी" में हुआ और स्कॉलरशिप की पुष्टि मिली, वह दिन उसके जीवन का सबसे खास दिन बन गया। ग्रामीण क्षेत्र की एक साधारण लड़की के लिए यह केवल एक अकादमिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि वर्षों से देखे गए उस सपने की पहली झलक थी — बिना किसी आर्थिक बोझ के, देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में पढ़ने का मौका।

जब घर से बाहर जाकर पढ़ने की बात आई, तो परिवार की चिंता ने एक बार फिर परंपराओं का जाल बुन दिया — "एक लड़की अकेली शहर में कैसे रह पाएगी?", "लोग क्या कहेंगे?"

कल्पना का आत्मविश्वास धीरे-धीरे डगमगाने लगा। उसने खुद को उन लड़कियों की कतार में खड़ा पाया जिनकी दुनिया रसोई और आँगन से आगे नहीं जाती। वह सोचने लगी, शायद मेरा भी जीवन बुनियादी शिक्षा और घरेलू जिम्मेदारियों तक ही सीमित रहेगा।


पर उसने चुप रहना नहीं चुना। उसने अपना दिल खोलकर आई-सक्षम टीम से बात की। उन्होंने न सिर्फ उसकी बातों को सहानुभूति से सुना, बल्कि उसके परिवार तक पहुँचकर उन्हें समझाया कि बदलते दौर में लड़कियों को भी आगे बढ़ने का हक है। उन्होंने शिक्षा की ताकत, आत्मनिर्भरता और समाज के बदलते नज़रों को बड़ी सहजता और सच्चाई से सामने रखा।

कल्पना की जिद और आई-सक्षम टीम के विश्वासपूर्ण प्रयासों ने आखिरकार परिवार की सोच को बदल दिया। जिस बेटी को लेकर कल तक सवाल उठाए जा रहे थे, आज उसी पर गर्व किया जा रहा था।

हाल ही में कल्पना ने भोपाल चली गई — अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ओर, जहाँ अब उसका नया अध्याय शुरू हो चुका है।
यह सिर्फ कल्पना का कॉलेज जाना नहीं है — यह उस जज़्बे की उड़ान है, जिसने समाज की तमाम बंदिशों को पार कर अपने सपनो को पाया है। 

कल्पना 

बैच-10,मुजफ्फरपुर


मुझे सिर्फ़ एक मौका चाहिए

कुछ दिन पहले मेरी मुलाक़ात स्वाति नाम की एक किशोरी से हुई, जिसकी उम्र लगभग 14-15 साल है। वह नया सुभानपुर, बछवाड़ा की रहने वाली है। स्वाति पहले स्कूल जाया करती थी, लेकिन अब कुछ समय से वह शांत और सहमी-सहमी सी रहने लगी थी।

जब मैंने धीरे से उससे बात की, तो उसने बताया – "दीदी, मेरी शादी तय कर दी गई है। मैं पढ़ना चाहती हूं, लेकिन मेरे घर में मेरी बात कोई नहीं सुनता।" स्वाति के गांव में ज़्यादातर लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाती है। यही कारण था कि उसके माता-पिता ने भी उसकी शादी तय कर दी थी।

स्वाति ने उन्हें समझाने की कोशिश की – कि वो अभी पढ़ना चाहती है, शादी नहीं – लेकिन जवाब में यही सुना: "इतना पढ़ा दिया, अब और क्या करेगी? जहां जाएगी, वहीं के लोग पढ़ा देंगे, नहीं तो घर का काम करेगी। लड़कियों का तो यही होता है।


"जब मैंने स्वाति के माता-पिता से बात की, तो वही पुरानी सोच सामने आई – "मैंने अपनी ओर से बहुत समझाया, लेकिन नहीं समझ पा रहे थे। "तब मैंने उनसे बस एक बात कही – "क्या आपने कभी अपनी बेटी से पूछा कि वो क्या करना चाहती है? क्या वो कुछ बनना चाहती है या सिर्फ घर का काम करना?

एक बार उससे पूछकर तो देखिए।" जब सामने से स्वाति से पूछा गया, तो वो डरते-डरते बोली – "मैं पढ़ना चाहती हूं, अभी शादी नहीं करना चाहती। आप बस मुझे एक मौका दीजिए।" स्वाति की बात सुनकर मैंने भी उन लोगों को अपनी कहानी सुनाई – मेरे गांव में भी यही होता था

जब मेरी शादी की बात चल रही थी, मैंने अपने पापा से सिर्फ इतना कहा – "क्या आप नहीं चाहते कि मैं पढ़-लिखकर कुछ बनूं?" बस, उस दिन से मेरी एक छोटी-सी कोशिश से मै आज पढ़ कर आगे बढ़ रही हूँ और आपलोग से भी मिलने आई हूँ। मेरी कहानी सुनकर उसके माता-पिता कुछ देर शांत रहे... फिर उसके पापा बोले – "अगर तू पढ़ना चाहती है तो ठीक है, अभी तेरी शादी नहीं करेंगे।" यह सुनकर स्वाति के चेहरे पर एक अलग ही चमक आ गई। उसे खुश देखकर मेरे दिल को बहुत ख़ुशी हुई।

प्रियंका, बड्डी 
बेगुसराई 


Wednesday, July 2, 2025

"सोच में बदलाव" – एक बहू, एक सास और तीन पीढ़ियों की कहानी

सुनिए  साथियों, जमाना कितना बदल रहा है ना... लेकिन असली बदलाव तब दिखता है जब घर-परिवार के लोग अपनी सोच बदलें। ऐसा ही कुछ मैंने खुद अपनी आँखों से देखा और दिल से महसूस किया।

हमलोग हाल ही में जमुई में i-सक्षम में “बडी प्रशिक्षण” में गए थे। चार दिन का प्रशिक्षण था। बहुत कुछ नया सीखने को मिला। लेकिन सबसे बड़ी सीख तो एक कहानी ने दी... एक सास, एक बहू और एक प्यारी सी पोती की।
हमारी साथी नेहा दी भी वहाँ आई थीं। लेकिन अकेली नहीं — अपनी सासू माँ और बेटी रूपम के साथ। पहले तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मन में सवाल उठा कि अरे, नेहा दी की सासू माँ भी यहाँ? वो भी ट्रेनिंग में?

क्योंकि मैं नेहा दी की कहानी पहले से जानती थी। याद है, 2024 के फाउंडेशन डे पर मैंनें उनके जीवन पर नाटक लिखा था। तब जान पाई थी कि नेहा दी की पढ़ाई एक वक्त पर रोक दी गई थी। दसवीं में थीं तब उनकी सासू माँ ने साफ कहा थे,

"दसवीं पढ़कर क्या करेगी? बकरी ही तो चराएगी!"
सोचिए, कैसी तकलीफ हुई होगी नेहा दी को। लेकिन वक़्त बदला... हालात बदले... और सबसे बड़ी बात — सोच बदली।
अब वही सासू माँ... अपनी बहू का हाथ पकड़कर जमुई ले आईं। बोलीं
"तू सीख, मैं रूपम को संभाल लूंगी।"

ये सिर्फ साथ आना नहीं था दीदी... ये था तीन पीढ़ियों का बदलाव। सासू माँ ने पूरे मन से नेहा दी का साथ दिया। पोती रूपम उनके गोद में खेलती रही और नेहा दी सारा ध्यान लगाकर ट्रेनिंग में सीखती रहीं।


ट्रेनिंग खत्म होने के बाद मैं उनके पास गई। धीरे-धीरे बातें होने लगीं। और उनकी बात सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। वो बोलीं —
"हाँ, पहले गलती हुई हमसे। सोचा था पढ़ाई से क्या होगा। पर अब समझ आई है। चाहे बेटी हो या बहू, पढ़ाई सबसे जरूरी है। आज गांव में लोग कहते हैं — देखो, आपकी बहू समाज में काम करती है, लड़कियों को समझाती है, लोगों की मदद करती है। तो मन गर्व से भर जाता है।"

नेहा की सासु माँ ने पिछले बातो को कहते-कहते उनकी आँखें भर आईं। फिर बोलीं —
"नेहा ने हमारे घर की सोच बदल दी है।"
सच कहूँ साथियों, उस दिन मैंने महसूस किया कि बदलाव सिर्फ किताबों में नहीं होता। जब हम किसी की कहानी को जीते हैं, उसे अपने आस-पास होते हुए देखते हैं, तब असली असर होता है।
ये सिर्फ नेहा दी का सफर नहीं था... ये हर उस लड़की की कहानी है जो लड़ती है, सीखती है और समाज की सोच बदल देती है।
"जब सोच बदले, तब ही असली बदलाव आता है"
स्मृति, टीम मुंगेर।

Thursday, April 10, 2025

गाँव की ओर लौटती राह – शीतल

यह कहानी शीतल की है, जो शहर में पली-बढ़ी थी, लेकिन उसके मन में हमेशा गांव की सादगी और अपनापन बसा हुआ था। उसके लिए गांव एक खुली किताब की तरह था, जिसमें वह अपने सपनों की नई कहानी लिखना चाहती थी।

जब वह अपने गांव (कुमरडीह) लौटी, तब वह बहुत छोटी थी और दुनिया की कठिनाइयों से अनजान थी। उसके मन में एक ही सपना था—अपने घर का बड़ा सहारा बनना। पढ़ाई में होशियार होने के बावजूद आर्थिक तंगी उसके रास्ते में सबसे बड़ी बाधा थी। उसके पापा की तबीयत अक्सर खराब रहने लगी, जिससे घर की आर्थिक स्थिति और भी कमजोर हो गई।
कुछ दिन के बाद
हालांकि, मुश्किलों ने उसे तोड़ने के बजाय मजबूत बनाया। एक दिन उसे याद आया कि एक आंटी अपनी बेटी के लिए ट्यूशन की तलाश कर रही थीं। उसने यह अवसर हाथ से नहीं जाने दिया और ट्यूशन पढ़ाने का निर्णय लिया। यह उसकी पहली कमाई थी, जो उसके आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए काफी थी।
शुरुआत में उसकी मम्मी को चिंता थी कि कहीं पढ़ाने की वजह से उसकी पढ़ाई पर असर न पड़े। लेकिन उसने मेहनत और अनुशासन से दोनों जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। सुबह अपनी पढ़ाई करती और शाम को बच्चों को पढ़ाती। जब 12वीं के परीक्षा परिणाम आए, तो उसने न केवल अच्छे अंक प्राप्त किए बल्कि अपने पापा का भरोसा भी जीत लिया।
आज की स्थिति:

अब वही शीतल I-Saksham  में काम कर रही है और साथ ही 25 बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रही है। वह B.A (सेमेस्टर 3) की विद्यार्थी भी है। उसकी मेहनत और लगन ने न केवल उसके परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर किया बल्कि उसे आत्मनिर्भर भी बनाया।

"उम्मीद की किरण"यह कहानी दिखाती है कि अगर इंसान में कुछ कर दिखाने का जज्बा हो, तो कोई भी चुनौती उसे रोक नहीं सकती

शीतल 

बैच 10 

जमुई





Tuesday, March 18, 2025

"सीता की आत्मनिर्भरता की कहानी"

सीता नवादा गाँव  (कोइरी टोला) के एक ऐसी लड़की थी, जो आत्मविश्वास की कमी के कारण अपनी बात ठीक से नहीं रख पाती थी। उसके पापा उसे घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं देते थे, जिससे उसकी स्वतंत्रता सीमित थी।
एक दिन, उसने सुना कि आई-सक्षम के लिए फॉर्म भरा जा सकता है, जिससे उसे एक नया अवसर मिल सकता था। यह उसके लिए पहली चुनौती थी—क्या वह बिना पापा की अनुमति लिए खुद के लिए कोई निर्णय ले सकती है?
शुरुआत में, उसे डर लगा कि पापा मना कर देंगे या नाराज़ होंगे। उसे लगा कि शायद वह यह कदम नहीं उठा पाएगी। किसी भरोसेमंद व्यक्ति (शिक्षक/मित्र) ने उसे प्रेरित किया कि उसे अपने जीवन के फैसले खुद लेने चाहिए। इसने उसमें आत्मविश्वास जगाया।
उसने हिम्मत जुटाकर बिना पापा से पूछे आई-सक्षम का फॉर्म भर दिया और परीक्षा दी। यह उसकी पहली बड़ी परीक्षा थी। परीक्षा पास करने के बाद भी, सबसे बड़ी चुनौती थी—क्या पापा उसे वहां काम करने देंगे? यह उसकी यात्रा की सबसे कठिन बाधा थी।
पापा ने उसकी मेहनत और आत्मनिर्भरता को देखते हुए उसे आई-सक्षम में काम करने की अनुमति दे दी। यह उसकी पहली बड़ी जीत थी। अब सीता न केवल अपनी राय खुलकर रख पाती थी बल्कि अपने पसंद को भी परिवार, समुदाय और विद्यालय में आत्मविश्वास से प्रस्तुत कर सकती थी।

उसने न केवल अपने आत्मविश्वास में बल्कि अपने लक्ष्य में भी स्पष्टता पाई। अब वह B.Ed करके शिक्षिका बनने का सपना देख रही थी, ताकि वह दूसरों को भी सशक्त बना सके।

सीता की यह यात्रा न केवल उसके लिए बल्कि उन सभी लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गई, जो आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की राह पर बढ़ना चाहती थीं। अब सीता अपनी पहचान खुद बना चुकी थी। वह अपने विचारों को मजबूती से व्यक्त कर सकती थी और अपने भविष्य के लिए खुद फैसले लेने में सक्षम थी।

सीता कुमारी,एडू लीडर
मुजफ्फरपुर


हलीमपुर गाँव की पहली झलक

आज मैं आप सभी के साथ अपने समुदाय के काम (हलीमपुर) के अनुभव को साझा करना चाहती हूँ, जहाँ मैं एडु लीडर रश्मि (बैच 10A) के साथ गई थी।
जैसे ही हम उस गाँव में पहुँचे, वहाँ की कई चीज़ों ने मेरा मन मोह लिया—मिट्टी के घरों पर बनी सुंदर पेंटिंग, पुराने जमाने में उपयोग होने वाली चीज़ें, खेतों के बीच से गुजरती कच्ची-पक्की सड़कें, और हर ओर फैली हरियाली। गाँव का यह सरल, पर मनमोहक दृश्य मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था।
शिवम के परिवार से मुलाकात:- आज के समुदाय में काम के दौरान, हमें एडु लीडर द्वारा पढ़ाए जाने वाले एक छात्र, शिवम, के अभिभावकों से मिलने का अवसर मिला। सबसे पहले, हमें शिवम के दादा जी मिले, जिन्होंने बड़े ही स्नेह से हमें घर के अंदर बुलाया और बैठने के लिए कहा। कुछ देर बाद, शिवम की माँ और दादी भी आ गईं।
एडु लीडर, शिवम की माँ से उनकी पढ़ाई को लेकर बात कर रही थीं। उसी दौरान, उनकी दादी, कमला देवी जी, मुझसे बहुत आत्मीयता से बातचीत करने लगीं। उन्होंने मुझसे पूछा—
"बेटी, तुम कहाँ से आई हो?" "तुम्हारा नाम क्या है?" "तुम क्या करती हो, क्या पढ़ाई कर रही हो?"
उनका बात करने का आत्मीय अंदाज मुझे बहुत अच्छा लगा। बातचीत के दौरान, उन्होंने अपने पोते की पढ़ाई को लेकर अपनी इच्छाएँ और विचार साझा किए, जिससे उनकी शिक्षा के प्रति जागरूकता स्पष्ट झलक रही थी।
बातचीत के दौरान, कमला देवी जी ने अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण अनुभव साझा किए, जो मुझे बहुत प्रेरणादायक लगे। उन्होंने बताया कि उनकी शादी 1968 में हो गई थी, लेकिन उससे पहले वे 7वीं कक्षा में फर्स्ट डिवीजन से पास हुई थीं। इसके लिए उन्हें छात्रवृत्ति (scholarship) भी मिली थी, जिससे उन्होंने अपने लिए एक नोज़ पिन खरीदी थी, जिसे वे आज भी पहनती हैं।

उन्होंने आगे बताया कि उनका सरकारी शिक्षिका के पद पर चयन भी हो गया था, लेकिन उनके पति ने उन्हें नौकरी करने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि उस समय घर की बहूओं का बाहर जाकर काम करना समाज में स्वीकार्य नहीं था। हालाँकि, उन्होंने अपने बच्चों और बहू की पढ़ाई को हमेशा प्राथमिकता दी।

उनकी बहू ने शादी के बाद स्नातक पूरा किया और बिहार पुलिस तथा एसएससी की परीक्षाओं के लिए आवेदन भी किया, लेकिन सफल नहीं हो सकीं। इसके बाद, पारिवारिक जिम्मेदारियों में व्यस्त होने के कारण उनकी पढ़ाई छूट गई।

शिक्षा के प्रति जागरूकता और आत्मनिर्भरता

कमला देवी जी की बातचीत में कई अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग सुनकर मैं हैरान रह गई, जैसे अंडरलाइन, सब्जेक्ट आदि। जब मैंने जिज्ञासावश पूछा, तो उन्होंने बताया कि 1980 में जब एक साक्षरता कार्यक्रम आया था, तो वे भी उसमें शामिल हुई थीं। वे गाँव की महिलाओं को घर बुलाकर पढ़ाती थीं, जिससे उन्हें बहुत खुशी मिलती थी।
उनकी सोच, शिक्षा के प्रति जागरूकता, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास ने मुझे बहुत प्रभावित किया। बातचीत के अंत में, उन्होंने मुझसे कहा—
"बहुत दिनों बाद मैंने खुलकर अपने मन की बात की,"
जो सुनकर मेरे मन में उनके प्रति और भी सम्मान बढ़ गया।

जब हम वहाँ से जाने लगे, तो उन्होंने प्यार भरे शब्दों में कहा—
"बेटी, फिर जरूर आइएगा,"

जिससे मुझे बहुत अपनापन और आत्मीयता का एहसास हुआ, जैसे कोई हमारे दोबारा लौटने का बेसब्री से इंतजार कर रहा हो। इस पूरे अनुभव ने मुझे शिक्षा के महत्व और उसके प्रभाव को गहराई से समझने का अवसर दिया। कमला देवी जी जैसी प्रेरणादायक महिलाओं से मिलकर मुझे महसूस हुआ कि सच्ची शिक्षा केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि सोच और जागरूकता में होती है।


स्मृति कुमारी
बड़ी इंटर्न, मुंगेर

Friday, January 31, 2025

मेरा बदलाव और सफलता की यात्रा: खुशबू की कहानी

i-सक्षम से जुड़ने बाद मुझेमें बहुत बदलाव आया है। शुरुआत में मुझे बहुत चुनौतिया आई क्योंकि मै एक बहु हूँ और मेरे घर से निकलना भी नहीं होता था। लेकिन अब मैं समुदाय के हर वर्ग के अभिभावक से मिल रही हूँ और उनसे जुड़ पा रही हूँ। पहले बहुत डर लगता था कि लोग क्या बोलेंगे और अभिभवाक कैसी प्रतिक्रिया देंगे। लेकिन अब यह डर नहीं रहता क्योंकि मुझे लगता है की हर प्रतिक्रिया से कुछ सिखने को मिलेगा।

स्कूल में भी जब हेडमास्टर सर से बात करनी होती थी, तब डर लगता था। सोचती थी कि सर क्या कह देंगे और मैं क्या जवाब दूँगी। लेकिन अब यह डर खत्म हो गया है और मैं बेझिझक सर से बात कर पाती हूँ। अपने परिवार में भी अब मैं अपनी बात रख पाती हूँ। पहले जमुई जाना होता था तो बिना किसी घर के सदस्य के नहीं जा सकती थी। लेकिन अब अकेले जमुई जाना और लौट आना मेरे लिए सामान्य हो गया है, भले घर वाले सहमत न हों।

सेशन में भी अब अपनी बात रखने का आत्मविश्वास आ गया है। पहले डरती थी कि कहीं कुछ गलत न बोल दूँ, लेकिन अब यह सोचती हूँ कि गलती से भी कुछ नया सीखने को मिलेगा। अब मेरी पहचान मेरे पति के नाम से नहीं, बल्कि मेरी अपनी मेहनत से है। यह मेरे लिए गर्व की बात है।
मेरे काम के कारण समुदाय में मुझे साफ-सफाई के लिए सम्मान मिला। जब हमारे गाँव में 65वां पंचायत समारोह हुआ, तो मुझे वहाँ सम्मानित किया गया। यह मेरे जीवन का गर्वपूर्ण क्षण था।
मैं आई-सक्षम का धन्यवाद करती हूँ जिसने मुझे यह मौका दिया और मेरे जीवन में यह बदलाव लाया।

खुशबू 

बैच-11 

जमुई



“हर मुश्किल के बाद सफलता की नई शुरुआत”

साक्षी मुंगेर जिले के एक छोटे से गांव (फरदा) की लड़की है, जिसका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। पिताजी ईंट-भट्टे में मजदूरी करते थे, लेकिन काम बंद हो जाने के कारण उन्हें परदेस (जयपुर) जाना पड़ा। शुरुआत में उन्होंने घर पैसे भेजे, जिससे परिवार का खर्च चलने लगा। लेकिन धीरे-धीरे फैक्ट्री मालिक ने उनका शोषण करना शुरू कर दिया, और उनका परिवार से संपर्क टूट गया।
माँ ने बच्चों के साथ मायके जाकर खेतों में काम किया और कठिन परिस्थितियों का सामना किया। इस बीच एक पुजारी की भविष्यवाणी के बाद साक्षी के पिताजी घर लौट आए, जिससे परिवार फिर से एकजुट हो गया।

लेकिन जीवन की परीक्षाएँ यहीं खत्म नहीं हुईं। साक्षी की बहन सिमरन की बीमारी से मौत हो गई, और पिताजी का दुर्घटना में गंभीर चोट लगने से कामकाज ठप हो गया। इन कठिनाइयों ने साक्षी को प्रेरित किया कि वह अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाए।

साक्षी ने पढ़ाई जारी रखी और संघर्ष करते हुए i-सक्षम जैसे संगठन से जुड़कर अपने जीवन में बदलाव लाने की कोशिश की।

यह कहानी हमें सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी परिवार की एकजुटता, संघर्ष और कभी हार न मानने का साहस सफलता की कुंजी है। जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, हौसला और मेहनत से उन्हें पार किया जा सकता है।

साक्षी कुमारी
बैच-11
मुंगेर

Tuesday, December 31, 2024

परिवार की जिम्मेदारियों को संभालना और खुद में बदलाव लाना

 परिवार की जिम्मेदारियों को संभालना और खुद में बदलाव लाना

 i-सक्षम से जुड़ने के बाद मेरी जिंदगी में जो बदलाव आए, उन्हें मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। यह सफर न केवल मेरे व्यक्तित्व को निखारने का रहा है, बल्कि मुझे आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने का भी रहा है।

शुरुआत और बदलाव की ओर पहला कदम

डेढ़ साल पहले, जब मैंने i-सक्षम से जुड़ने का फैसला किया, तब मैं एक साधारण लड़की थी, जो घर और स्कूल की चारदीवारी तक सीमित थी। मुझे यह भी नहीं पता था कि किसी के साथ बातचीत कैसे की जाती है। धीरे-धीरे मैंने सीखा कि कैसे किसी से संवाद करना है, अपनी बातों को आत्मविश्वास के साथ रखना है और दूसरों की मदद के लिए आगे आना है।


पहले मैं अपने ही जिले, बेगूसराय, जाने से डरती थी। अगर कहीं जाना होता था, तो मां या भाई का साथ जरूरी था। लेकिन i-सक्षम ने मुझे वह आत्मविश्वास दिया, जो मुझे अपनी सीमाओं को पार करने में मदद करता है। आज मैं अकेले दिल्ली जैसे बड़े शहर में चार बार आ-जा चुकी हूं। यह अनुभव मेरे लिए किसी सपने से कम नहीं था।

मेरे भाई और पापा बाहर जॉब(Job) करते हैं। जिसके वजह से घर पर नहीं रहते हैं। जो काम लोगों के घरों में पापा या भाई करते हैं, वो सब 

मैंने किया है, जैसे कि राशन कार्ड में नाम जुड़ना, ब्लॉक जाना, हिसाब-किताब और खेतों के कामकाज तक, हर जिम्मेदारी निभाई। जब पापा और भाई कहते हैं, "तुम हमारा दायां हाथ हो," तो मेरा दिल गर्व से भर जाता है। 

स्कूल में बदलाव
मैंने अपने घर के साथ-साथ स्कूल में भी बदलाव लाने की कोशिश की। मैंने बच्चों को साफ कपड़े पहनकर आने, बैग चेक करके लाने, बाल अच्छे से बांधने और रोज़ चप्पल पहनने जैसी आदतें सिखाईं। मैंने उन्हें सिखाया कि कचरा कूड़ेदान में डालें और एक-दूसरे की मदद करें। आज, जब मैं स्कूल नहीं जाती, तो भी वहां वही अनुशासन और आदतें देखने को मिलती हैं, जो मैंने वहां विकसित की थीं। शिक्षक के साथ जुड़ पाए एक-दुसरे पे विश्वास करना

चुनौतियों का सामना
इस सफर में मुझे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अकेले कहीं जाने का डर मुझे हमेशा सताता था। मैं बहुत दूर तक पैदल चल जाती, लेकिन उस गाड़ी में कभी नहीं बैठती, जिसमें महिलाएं नहीं होतीं। धीरे-धीरे मैंने अपने डर को हराना सीखा। स्कूल में भी, जब मैंने बदलाव का कोई कदम उठाया, तो हेडमास्टर सर कई बार रोक देते थे। लेकिन मेरे काम को देखकर उन्होंने भी मुझ पर भरोसा करना शुरू कर दिया।
आत्मनिर्भरता और गर्व
आज मैं जो कुछ भी कर रही हूं, वह न केवल मेरे लिए, बल्कि मेरे परिवार, गांव और स्कूल के लिए भी गर्व का विषय है। i-सक्षम ने मुझे वह सशक्त पहचान दी, जो हर लड़की का सपना होती है। अब मुझे लगता है कि कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती, बस हमें अपनी सोच और आत्मविश्वास को मजबूत रखना होता है।

अंशु 

बैच-9, बेगूसराय