"तू सीख, मैं रूपम को संभाल लूंगी।"
"नेहा ने हमारे घर की सोच बदल दी है।"
i-सक्षम की सीख:- i-सक्षम में जो भी नियम और प्रक्रियाएँ हैं, उन्होंने मुझे जीवन के महत्वपूर्ण सबक सिखाए हैं। मंथली बॉडी टॉक के दौरान हम अपनी परेशानियाँ साझा करते हैं और बॉडी हमें उन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रक्रिया से मुझे अपनी कमजोरियों और खूबियों का पता चला।
मंथ में होने वाले सेशन्स ने मुझे यह सिखाया कि हिंसा के खिलाफ आवाज उठाना और अपनी पहचान बनाना कितना महत्वपूर्ण है। इसके अलावा क्लस्टर मीटिंग्स के माध्यम से हमने एक-दूसरे से विचार साझा किए और कम्युनिटी में आने वाली चुनौतियों का समाधान पाया।एक छोटे से गाँव मुहमदपुर की i-सक्षम में बैच-10 की एडू-लीडर रंगीला हैं। जो खुद में और अपने समुदाय में सकारत्मक प्रभाव छोड़ रही है। उनका आत्मविश्वास बढ़ना, अपने आवाज को अपनाना और दूसरों के साथ स्नेहपूर्ण संबंध बनाना सच में एक बड़ी उपलब्धि है।
महिलाओं को जागरूक करने की पहल
रंगीला ने अपने समुदाय में जाकर महिलाओं को मासिक धर्म में स्वच्छता से जुड़ी जरूरी जानकारी प्रदान की।
उन्होंने लगभग 10 महिलाओं से मिलकर इस विषय पर गहरी बातचीत की। इसके अलावा, वह अपनी स्थानीय समुदाय की दो महिलाओं को हस्ताक्षर सिखाने में भी मदद की। यह उनको दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसमें एक सशक्त लीडर केवल ज्ञान बांटने तक समित नहीं रहता, बल्कि अपने जीवन के संघर्ष और व्यक्तिगत गुणों से भी लोगों को प्रेरित करता है।चुनौतियों का सामना और प्रेरणा
राधा, बड़ी
मुजफ्फरपुरयह कहानी रुकशाना खातून की है, जो बिहार के उत्क्रमित मध्य विद्यालय, बुधनगरा में पढ़ाती हैं। अपने छोटे-छोटे लेकिन प्रभावशाली प्रयासों से रुकशाना ने न केवल अपने समुदाय में बदलाव लाया, बल्कि पढ़ाई के प्रति एक नई सोच भी पैदा की।
रुकशाना के लिए उनका काम सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं है। वे अपने गाँव के चाचा-चाचियों से जुड़कर उनके जीवन में भी शिक्षा का उजाला फैलाने का प्रयास कर रही हैं। एक दिन जब वे गाँव में गईं, तो एक चाचा ने पूछा, "रुकशाना, क्या तुम्हें सरकारी नौकरी मिल गई?"
रुकशाना मुस्कुराते हुए बोलीं, "नहीं चाचा, मैं आई-सक्षम संस्था से जुड़ी हूँ। यह संस्था हमें बच्चों और समुदाय की बेहतरी के लिए काम करने का मौका देती है।" जब चाचा-चाचियों ने यह सुना, तो वे बहुत खुश हुए।
एक दिन रुकशाना ने अपने गाँव के एक चाचा से पूछा, "क्या आपको हस्ताक्षर करना आता है?" चाचा ने शर्माते हुए कहा, "थोड़ा बहुत आता है।"
रुकशाना ने तुरंत उन्हें हस्ताक्षर करना सिखाया। अगले दिन, वही चाचा उनके घर आए और बोले, "रुकशाना, क्या तुम मुझे रोज एक घंटा पढ़ा सकती हो?"
रुकशाना ने खुशी-खुशी यह प्रस्ताव स्वीकार किया। उन्होंने चाचा को अक्षर, गिनती, और पढ़ाई का पहला
सिर्फ 10 दिनों में चाचा ने:
'अ' से 'ज्ञ' तक पढ़ना और लिखना।
'A' से 'Z' तक अंग्रेजी अक्षरों को समझना।
'1' से '100' तक की गिनती सीख ली।
रुकशाना को अब पूरा विश्वास है कि चाचा जल्द ही किताबें भी पढ़ने लगेंगे।
पढ़ाई का असर पूरे समुदाय पर
रुकशाना के इस छोटे से प्रयास ने उनके गाँव में एक नई लहर पैदा कर दी। चाचा के अलावा, तीन और गाँव के बुजुर्ग अब रुकशाना से पढ़ाई कर रहे हैं। यहाँ तक कि उनकी दादी, खतीजा खातून, जो कभी स्कूल नहीं गईं, उन्होंने भी पढ़ाई शुरू कर दी।
रुकशाना रात में सोने से पहले अपनी दादी को पढ़ाई में मदद करती हैं। अब दादी न केवल अक्षरों को पहचान रही हैं, बल्कि खुद पर गर्व महसूस करती हैं।
एक छोटे प्रयास का बड़ा प्रभाव
रुकशाना की मेहनत ने यह साबित किया कि शिक्षा की लौ जलाने के लिए केवल एक सही शुरुआत की जरूरत होती है। उन्होंने अपने समुदाय के लोगों को पढ़ाई की अहमियत समझाई और उन्हें इस सफर पर साथ ले आईं।
आज रुकशाना के गाँव में हर कोई कहता है:छोटी कोशिश का बड़ा असर: सामुदायिक बदलाव की कहानी"
एक छोटे से गाँव में, जहां ज्यादातर लोग पढ़ाई-लिखाई से दूर थे, वहां एक युवा लड़की ने ठान लिया कि वो लोगों की जिंदगी में बदलाव लाएगी। उसका नाम रानी था। रानी गाँव के बच्चों और अभिभावकों के साथ काम करती थी, उन्हें नई चीजें सिखाती और उनके जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करती है।
एक दिन, रानी ने सोचा कि गाँव के लोगों से मुलाकात की जाए और उनसे बातचीत की जाए। उसने सबसे पहले दो अभिभावकों से मिलने का फैसला किया। ये वही अभिभावक थे, जिन्हें रानी ने कुछ समय पहले सिग्नेचर करना सिखाया था।
रानी ने मुस्कुराते हुए पूछा, "तो बताइए, सिग्नेचर करना याद है या भूल गए?" अभिभावकों ने गर्व से जवाब दिया, "हाँ, बिलकुल याद है! देखिए!" उन्होंने कागज पर सिग्नेचर करके दिखाया।
रानी का दिल खुशी से भर गया। उन्होंने आगे बताया, "आपके सिखाने की वजह से हम बैंक गए थे और वहां अपने दस्तख़त से पैसे निकाले। वो दिन हमारे लिए बहुत खास था।"
रानी ने उनकी आँखों में आत्मविश्वास की चमक देखी और महसूस किया कि उसका छोटा-सा प्रयास उनकी जिंदगी में कितना बड़ा बदलाव ला चुका है।
इसके बाद, रानी एक महिला के घर गई। उसने पूछा, "आप अभिभावक मीटिंग में क्यों नहीं आतीं?"
महिला ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "बहुत काम रहता है, इसलिए समय नही मिल पाता है।
रानी ने समझाते हुए कहा, "मीटिंग में आप सबके लिए नई बातें सिखाई जाती हैं। बच्चों की परवरिश के बारे में चर्चा होती है, और साथ में खेल-कूद भी होता है। आपको मै अभी हस्ताक्षर करने के लिए सिखा रही हूँ।"
महिला ने आश्वासन दिया, "अगली बार जब मीटिंग होगी, तो मुझे जरूर बताइएगा। मैं आऊंगी। रानी ने खुश हो कर बोली जरुर आइएगा।"
फिर रानी ने रास्ते में एक लड़की को देखा। उसका नाम मुस्कान था। मुस्कान ट्यूशन जा रही थी। रानी ने मुस्कुराते
हुए कहा, "जाओ, अच्छे से पढ़ाई करना।" मुस्कान ने सिर हिलाकर जवाब दिया और आगे बढ़ गई।
उस दिन रानी को महसूस हुआ कि उसके प्रयास धीरे-धीरे लोगों के जीवन में बदलाव ला रहे हैं। चाहे वो सिग्नेचर सिखाना हो, मीटिंग में शामिल होने की प्रेरणा देना, या बच्चों को प्रोत्साहित करना—हर छोटी-सी कोशिश का बड़ा असर हो रहा था।
रानी ने मन ही मन सोचा, "शायद इसी को असली खुशी कहते हैं—दूसरों की जिंदगी में रोशनी भरना।"
रानी कुमारी
बैच-10, एडू-लीडर
गया