“दीदी, ये क्या ही बोलेगा? ये तो हमेशा चुप रहता है!”
यह बात क्लास के बच्चों ने तब कही, जब मैंने नीरज से कुछ पढ़ने को कहा। मेरा नाम निभा कुमारी है और मैं i-Saksham की एडू-लीडर हूँ।
नीरज चौथी कक्षा में पढ़ता था और वह बेहद शांत और डरपोक बच्चा था। उसे सबसे बड़ा डर इस बात का था कि अगर उसने कुछ गलत बोल दिया, तो बाकी बच्चे उस पर हँसेंगे। इसी डर की वजह से वह कोई काम नहीं करता था और हमेशा कहता था, "दीदी, हमसे नहीं होगा।"
मैंने तय किया कि यह डर ही उसके सीखने में सबसे बड़ी रुकावट है। सबसे पहले, मैंने क्लास में नियम बनाया कि कोई भी साथी कुछ बोलेगा तो उस पर हँसना नहीं है।
इसके बाद, मैंने नीरज के डर को खत्म करने के लिए
व्यक्तिगत रूप से उससे बात की। मैंने उसे समझाया कि यहाँ कोई गलत या सही नहीं है—जो मन में आता है, उसे पूरे आत्मविश्वास के साथ बोलना है।
मैंने चार-पाँच दिन तक उसे समूह में छोटे-छोटे काम दिए, और खुद उसके साथ बैठकर किताब पढ़ी, जहाँ वह नहीं बोल पाता था, वहाँ मैंने उसकी मदद की।धीरे-धीरे, मेरा यह प्रयास रंग लाया। 25 तारीख को जब हम माइंडफुलनेस और रिवीजन कर रहे थे, अचानक नीरज खुद से आगे आया और बोला, “दीदी, आज हम रक्षाबंधन वाला कहानी पढे?”
मैं उसकी ओर देखती रह गई। जो बच्चा दो शब्द बोलने से डरता था, आज वह खुद आगे आकर पढ़ने की इच्छा जता रहा था।
मैंने मुस्कुराकर कहा, "हाँ नीरज, बिल्कुल! जहाँ नहीं समझोगे, हम साथ में सीखेंगे।" नीरज ने कहानी पढ़ना शुरू किया और अब वह आत्मविश्वास के साथ पढ़ता है। वह बीच-बीच में सवाल भी करता है, और जो समझ में नहीं आता, वह खुलकर बोलता है कि "दीदी, हम यह नहीं समझे।"
आज नीरज आत्मविश्वास से बोलता है, समूह में सक्रिय है, और सबसे खास—अब वह "कर सकते हैं" वाला बच्चा बन गया है।
लेखिका परिचय:
नाम: निभा कुमारी
परिचय: निभा कुमारी बेगूसराय के तेघड़ा प्रखंड से हैं और वर्तमान में बन्हारा गाँव में i-Saksham की Edu-Leader (बैच-12) के तौर पर काम कर रही हैं।
लक्ष्य: निभा का मानना है कि शिक्षा और आत्मनिर्भरता ही समाज में वास्तविक बदलाव ला सकते हैं, और वह इसी दिशा में आगे भी काम करना चाहती हैं।