Monday, December 22, 2025

आपकी बेटी भी यही सहेगी, तो कैसा लगेगा?

“अगर आज जो आप सह रहे हैं, वही कल आपकी बेटी भी सहे, तो आपको कैसा लगेगा?”

यह वह निर्णायक सवाल था जो मैंने कौशल्या की माँ से पूछा। मेरा नाम पूजा है, और मैं अपनी साथी एडू-लीडर के साथ धरहरा प्रखंड के अमारी गाँव में किशोरी कौशल्या के घर गई थी।

कौशल्या की पढ़ाई गरीबी और घर की पाबंदियों के कारण रोक दी गई थी। जब मैं उसकी माँ से मिली, तो उन्होंने साफ़ कह दिया, "जितना पढ़ना था, पढ़ ली, अब नहीं पढ़ेगी।"

बातों-बातों में पता चला कि कौशल्या का 11वीं में नामांकन नहीं हो पाया था। उसकी माँ तो उसे पढ़ाना चाहती थीं, लेकिन कौशल्या के पापा और भाई कहते थे, "ज़्यादा पढ़कर क्या करेगी?"

कौशल्या की माँ ने अपना दुख साझा किया—कि उन्हें भी बचपन में पढ़ने नहीं दिया गया था, और उनके बेटे की हालत (शराब पीकर घूमना) भी ठीक नहीं थी। उनकी बातों में एक अधूरी चाह और दबा हुआ सपना साफ़ झलक रहा था।

मैंने खुद को संभाला और उनसे वह निर्णायक सवाल पूछा: “चाची, अगर आज जो आप सह रही हैं, वही कल आपकी बेटी भी सहे, तो आपको कैसा लगेगा?”

उनकी आँखें नम हो गईं और उन्होंने धीरे से कहा, "बेटा, कोई माँ नहीं चाहती कि उसकी बेटी दुख सहे।"

बस, यही वह क्षण था। मैंने अपनी पूरी कोशिश लगा दी उन्हें यह समझाने में कि बेटी की पढ़ाई उसके आत्मविश्वास और भविष्य की कुंजी है। 

काफी समझाने के बाद, कौशल्या की माँ राज़ी हो गईं। उन्होंने अपनी बेटी को किशोरी सेशन में जाने और उसकी पढ़ाई दोबारा शुरू करने की अनुमति दे दी। यह सुनकर कौशल्या बहुत खुश हुई।


आज कौशल्या न केवल 11वीं कक्षा में नामांकित है, बल्कि वह हर हफ्ते किशोरी सेशन में भी भाग लेती है, जहाँ वह आत्मविश्वास से अपनी बात रखती है और सवाल पूछती है।

मुझे उस दिन एहसास हुआ कि जब हम किसी को उसकी खुशी पाने में मदद करते हैं, तो हम सिर्फ़ एक जीवन नहीं बदलते, बल्कि उस माँ के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं, जो अपनी बेटी की खातिर समाज से लड़ने को तैयार हो जाती है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: पूजा कुमारी

  • परिचय: पूजा जगदीशपुर (जमालपुर), मुंगेर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2023 में i-Saksham के बैच-10 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।

  • लक्ष्य: पूजा का लक्ष्य एक शिक्षिका बनना है।

Friday, December 19, 2025

अब महसूस की असली आजादी!

 “मैं अब खुद को आज़ाद महसूस करती हूँ।”

यह आत्मविश्वास मुजज़फ़रपुर की नेहा दीदी का है। जब मैंने, स्वाति (बडी), उनके इस बदलाव को देखा, तो मुझे एहसास हुआ कि छोटे कदम भी जीवन में कितनी बड़ी आज़ादी ला सकते हैं।

नेहा दीदी ने मुझे बताया कि वह पिछले दो सालों से "आई सक्षम" से जुड़ने की कोशिश कर रही थीं। जब वह मायके में थीं, तो कहीं भी बाहर जाने पर उनके साथ हमेशा पापा या भाई होते थे। शादी के बाद भी वह हमेशा अपने पति के साथ ही बाहर जाती थीं। अकेले घर से बाहर निकलना उनके लिए एक असंभव बात थी, और यह डर हमेशा उनके आत्मविश्वास को दबाता रहा।

आखिरकार, उनकी कोशिश सफल हुई और वह "आई सक्षम" का हिस्सा बनीं।

लेकिन असली चुनौती अब शुरू हुई थी। संस्था से जुड़ने के बाद उन्हें अकेले सेशन में आना, विद्यालय जाना, और होम विजिट के लिए निकलना होता था। यह उनके लिए नया और थोड़ा डराने वाला अनुभव था।

नेहा दीदी ने अपनी सारी हिम्मत जुटाई और हर दिन इस डर का सामना किया। उन्होंने हर यात्रा को खुद को मज़बूत करने का एक अवसर बनाया। धीरे-धीरे यह डर खत्म होने लगा।

आज वही नेहा दीदी, जो कभी घर की दहलीज पार करने से डरती थीं, आत्मविश्वास के साथ गाँव के विद्यालयों में जाती हैं, मीटिंग में बोलती हैं और बच्चों के माता-पिता से बात करती हैं।

नेहा दीदी अब खुद यह कहती हैं: “अगर मैं 'आई सक्षम' से नहीं जुड़ती, तो शायद मैं आज भी अपने घर से अकेले बाहर नहीं निकल पाती। मैं अब खुद को आज़ाद महसूस करती हूँ।” उनका यह एहसास दिखाता है कि असली लीडरशिप सीमाओं को नहीं, बल्कि खुद के डर को तोड़ने से आती है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: स्वाति कुमारी

  • परिचय: स्वाति गाँव अघोड़िया बाज़ार, मुशहरी, मुजफ्फरपुर की रहने वाली हैं और पिछले 2 वर्षों से i-Saksham में 'बडी' के रूप में कार्यरत हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2023 में i-Saksham से जुड़ीं।

  • लक्ष्य: स्वाति का लक्ष्य एक टीचर बनना है।

Monday, December 15, 2025

‘पास बैठने’ का मतलब ही क्रांति है

“मुसहर समुदाय के बच्चों को उनकी जाति के कारण भगा देते हैं।”

यह बात मुझे गौरीपुर गाँव में एक स्थानीय व्यक्ति ने बताई। मेरा नाम साक्षी है, और मैं प्राथमिक विद्यालय, मुसहर टोला में अवलोकन (Observation) के लिए पहुँची थी।

रास्ते में मैंने कई बच्चों को खेलते, चूल्हा बनाते देखा, जिससे मन में सवाल उठा कि स्कूल कौन गया होगा? गाँव के एक अंकल ने बताया कि मुसहर समुदाय के बच्चों को उनकी जाति के कारण कभी-कभी अन्य बच्चे और शिक्षक भी भगा देते हैं। यह जानकारी चिंताजनक थी और मुझे लगा कि यहाँ हमारे काम की सख़्त ज़रूरत है।

कोमल, हमारी एडू-लीडर, यहाँ सामाजिक समावेश का प्रयास कर रही थीं।

कक्षा में शोर और अव्यवस्था तो थी, लेकिन मैंने जो बदलाव देखा, वह मेरे लिए प्रेरणादायक था। कोमल ने छात्रों को मेडिटेशन और समूह चर्चा जैसे जीवन कौशल में शामिल किया। उन्होंने रीता और प्रिया जैसी छात्राओं को मेडिटेशन करवाने का अवसर दिया, जिससे उनमें नेतृत्व की भावना विकसित हो रही थी।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह था कि मुसहर समुदाय के बच्चे, जो पहले अलग बैठकर पढ़ाई करते थे, अब धीरे-धीरे मिलकर रहने की कोशिश कर रहे थे। यह सामाजिक समावेश की दिशा में एक बड़ी सफलता थी।

मैंने देखा कि कक्षा पहले से ज्यादा साफ़ दिख रही थी। यह कोमल के प्रयासों और मेहनत को दर्शाता है।

हालांकि, बच्चों की उपस्थिति और कक्षा प्रबंधन (शोर) में सुधार की ज़रूरत थी, पर उस दिन मैंने महसूस किया कि कोमल सिर्फ़ पढ़ा नहीं रहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव की दीवार तोड़कर एक बेहतर समाज की नींव रख रही थीं।


लेखिका परिचय:

  • नाम: साक्षी कुमारी

  • परिचय: साक्षी कुमारी गाँव सर्वोदय टोला फरदा, जमालपुर, मुंगेर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2019 में i-Saksham के बैच-4 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।

  • लक्ष्य: साक्षी का लक्ष्य सोशल सेक्टर (Social Sector) में काम करना है।

Friday, December 12, 2025

हमसे कुछ नहीं होगा

 “दीदी, ये क्या ही बोलेगा? ये तो हमेशा चुप रहता है!”

यह बात क्लास के बच्चों ने तब कही, जब मैंने नीरज से कुछ पढ़ने को कहा। मेरा नाम निभा कुमारी है और मैं i-Saksham की एडू-लीडर हूँ।

नीरज चौथी कक्षा में पढ़ता था और वह बेहद शांत और डरपोक बच्चा था। उसे सबसे बड़ा डर इस बात का था कि अगर उसने कुछ गलत बोल दिया, तो बाकी बच्चे उस पर हँसेंगे। इसी डर की वजह से वह कोई काम नहीं करता था और हमेशा कहता था, "दीदी, हमसे नहीं होगा।"

मैंने तय किया कि यह डर ही उसके सीखने में सबसे बड़ी रुकावट है। सबसे पहले, मैंने क्लास में नियम बनाया कि कोई भी साथी कुछ बोलेगा तो उस पर हँसना नहीं है।

इसके बाद, मैंने नीरज के डर को खत्म करने के लिए
व्यक्तिगत रूप से उससे बात की। मैंने उसे समझाया कि यहाँ कोई गलत या सही नहीं है—जो मन में आता है, उसे पूरे आत्मविश्वास के साथ बोलना है।

मैंने चार-पाँच दिन तक उसे समूह में छोटे-छोटे काम दिए, और खुद उसके साथ बैठकर किताब पढ़ी, जहाँ वह नहीं बोल पाता था, वहाँ मैंने उसकी मदद की।

धीरे-धीरे, मेरा यह प्रयास रंग लाया। 25 तारीख को जब हम माइंडफुलनेस और रिवीजन कर रहे थे, अचानक नीरज खुद से आगे आया और बोला, “दीदी, आज हम रक्षाबंधन वाला कहानी पढे?”

मैं उसकी ओर देखती रह गई। जो बच्चा दो शब्द बोलने से डरता था, आज वह खुद आगे आकर पढ़ने की इच्छा जता रहा था।

मैंने मुस्कुराकर कहा, "हाँ नीरज, बिल्कुल! जहाँ नहीं समझोगे, हम साथ में सीखेंगे।" नीरज ने कहानी पढ़ना शुरू किया और अब वह आत्मविश्वास के साथ पढ़ता है। वह बीच-बीच में सवाल भी करता है, और जो समझ में नहीं आता, वह खुलकर बोलता है कि "दीदी, हम यह नहीं समझे।"

आज नीरज आत्मविश्वास से बोलता है, समूह में सक्रिय है, और सबसे खास—अब वह "कर सकते हैं" वाला बच्चा बन गया है।


लेखिका परिचय:

  • नाम: निभा कुमारी

  • परिचय: निभा कुमारी बेगूसराय के तेघड़ा प्रखंड से हैं और वर्तमान में बन्हारा गाँव में i-Saksham की Edu-Leader (बैच-12) के तौर पर काम कर रही हैं।

  • लक्ष्य: निभा का मानना है कि शिक्षा और आत्मनिर्भरता ही समाज में वास्तविक बदलाव ला सकते हैं, और वह इसी दिशा में आगे भी काम करना चाहती हैं।

Monday, December 8, 2025

“नहीं! घर में ही रहकर पढ़ो

 “नहीं! घर में ही रहकर पढ़ो, बाहर नहीं जाना है।”

यह जवाब साक्षी को उसकी नानी से मिला, जब उसने 11वीं कक्षा के एग्जाम पास आने पर पढ़ने की हिम्मत जुटाई। मेरा नाम सरिता है, और मैं अपनी एडू-लीडर साक्षी की कहानी बता रही हूँ—एक ऐसी लड़की जिसने सबसे बड़े संकट में भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाई और अपने सपने को ज़िंदा रखा।

साक्षी ऐसे परिवार से आती है जहाँ लोग पढ़े-लिखे तो थे, पर घर की महिलाओ या लड़कियों को बोलने की आजादी नहीं थी। उसे खुद को असहज महसूस होता था, और वह जानती थी कि उसे अपनी आवाज़ सुनाने के लिए अपने रास्ते खुद चुनने होंगे।

10वीं तक की पढ़ाई ठीक चली, लेकिन 11वीं में उसके पापा को ब्लड कैंसर हो गया। इस बीमारी ने परिवार की आर्थिक हालत बहुत खराब कर दी, और इसी संकट के बीच साक्षी की पढ़ाई रुक गई। उसे मजबूरी में अपने नाना-नानी के घर जाना पड़ा।

वहाँ उसे खुद को पुराने सामाजिक नजरियों मे घिरा पाया —"लड़की बाहर पढ़ने जाएगी तो बिगड़ जाएगी।"

जब एग्जाम पास आए, उसने साहस जुटाकर नानी से कहा कि उसे पढ़ना है। नानी ने मना कर दिया, और घर पर पढ़ाई का माहौल भी नहीं बन पा रहा था।

साक्षी ने उस दबाव को अपनी हार नहीं बनने दिया। उसके पास खुद का फ़ोन नहीं था, तब उसने नाना का फ़ोन इस्तेमाल करना शुरू किया और अपनी पढ़ाई जारी रखी।

इसी मुश्किल दौर में, उसने घर की बेटी बनकर जिम्मेदारी संभाली। उसकी माँ भी मास्टर्स की डिग्री और बीएड की तैयारी में लगी थीं, इसलिए साक्षी ने पूरे घर को संभाला और अपने छोटे भाई-बहनों को एक माँ की तरह देखभाल की, क्योंकि घर की हालत बहुत नाज़ुक थी।

आज, साक्षी अपने संघर्षों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रही है। वह अपनी हर बात और हर फैसला इतने आत्मविश्वास से लेती है। वह उन सभी लड़कियों के लिए प्रेरणा बनती जा रही है जो थोड़ी परेशानियों में भी अपने लिए फैसले करने से डरती है या हार मान जाती है।
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लेखिका का परिचय:

  • नाम: सरिता

  • परिचय: सरिता गाँव फरदा, ब्लॉक जमालपुर, मुंगेर की रहने वाली हैं।

  • i-Saksham से जुड़ाव: वह वर्ष 2022 में i-Saksham के बैच-9 की एडू-लीडर रह चुकी हैं।

  • लक्ष्य: सरिता का लक्ष्य सामाजिक कार्य (Social Work) करना है।