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Monday, September 15, 2025

"अगर बेटा होता, तो क्या तब भी रोकते?"

"यही अवसर अगर बेटा होता, तो क्या तब भी आप उसे रोकते?"

यह एक सवाल नहीं, बल्कि एक माँ की अपनी बेटी के सपनों के लिए उठाई गई आवाज़ थी। यह सवाल मुस्कान की माँ ने उसके पिता से तब पूछा, जब मुस्कान को भोपाल की प्रतिष्ठित अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में स्कॉलरशिप पर पढ़ने का मौका मिला, और उसके पिता ने अपनी रूढ़िवादी सोच के कारण उसे इतनी दूर भेजने से साफ़ इनकार कर दिया।

यह सवाल मुस्कान के पिता को अंदर तक झकझोर गया। उन्होंने धीमी-सी आवाज़ में कहा, "नहीं!"

यह सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक पिता की सालों पुरानी सोच में आया बदलाव था। नतीजा? वह खुद मुस्कान को भोपाल, "अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी" छोड़ने गए।

आज मुस्कान अपने गाँव और राज्य की सीमाओं से निकलकर भोपाल में पोस्ट-ग्रेजुएशन कर रही है। उसकी यह यात्रा सिर्फ उसकी अपनी जीत नहीं है; यह उस गाँव के लिए भी एक मिसाल है, जहाँ अब और भी पिता अपनी बेटियों के सपनों को गंभीरता से लेने लगे हैं।

लेकिन मुस्कान मे क्षमता कहाँ से विकसित हुई?

कुछ साल पहले तक, मुस्कान बिहार के मुज़फ्फरपुर जिले के हसनपुर गाँव की वही साधारण लड़की थी, जिसकी अपनी कोई आवाज़ नहीं थी। उसका नेतृत्व शून्य था—वह फैसले लेती नहीं, सिर्फ मानती थी।

यह परिवर्तन i-सक्षम फेलोशिप के साथ शुरू हुआ। दो वर्षों तक एडू-लीडर के रूप में काम करते हुए उसने गाँव की महिलाओं और किशोरियों के साथ बैठकर सामाजिक मुद्दों पर चर्चा की कभी एक सूत्रधार (facilitator) बनकर दूसरों को बोलने के लिए प्रेरित भी की। धीरे-धीरे, दूसरों को आवाज़ देने की कोशिश में, उसे अपनी आवाज़ मिल गई।

फेलोशिप खत्म होने पर, अपनी मेहनत और क्षमता से उसके सामने तीन रास्ते थे—एक बैंक की नौकरी और दो प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई का मौका। 

यह उसकी ज़िंदगी का पहला बड़ा नेतृत्व परीक्षण था। उसने नौकरी से मिलने वाली तत्काल सुरक्षा के बजाय सीखने के लंबे रास्ते को चुना। उसने आने वाला कल को देखा।

उसने अवसर का सदुपयोग दिया, और अपने अंदर छिपी एक लीडर को पहचाना और उसे निखारा। इसी हिम्मत का परिणाम है कि वह आज अपने और अपने जैसी कई और लड़कियों के सपनों को पूरा करने की ताकत रखती है।

लेखिका के बारे में:

  • नाम: मुस्कान

  • परिचय: मुस्कान मुज़फ्फरपुर, बिहार से हैं। वह i-Saksham की पूर्व फेलो (Edu-Leader) हैं।

  • वर्तमान: वह वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, भोपाल से स्कॉलरशिप पर अपनी पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही हैं।

  • लक्ष्य: मुस्कान का सपना है कि वह शिक्षा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में काम करके अपने जैसी और भी लड़कियों को आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करें।

Friday, July 25, 2025

मुझे सिर्फ़ एक मौका चाहिए

कुछ दिन पहले मेरी मुलाक़ात स्वाति नाम की एक किशोरी से हुई, जिसकी उम्र लगभग 14-15 साल है। वह नया सुभानपुर, बछवाड़ा की रहने वाली है। स्वाति पहले स्कूल जाया करती थी, लेकिन अब कुछ समय से वह शांत और सहमी-सहमी सी रहने लगी थी।

जब मैंने धीरे से उससे बात की, तो उसने बताया – "दीदी, मेरी शादी तय कर दी गई है। मैं पढ़ना चाहती हूं, लेकिन मेरे घर में मेरी बात कोई नहीं सुनता।" स्वाति के गांव में ज़्यादातर लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाती है। यही कारण था कि उसके माता-पिता ने भी उसकी शादी तय कर दी थी।

स्वाति ने उन्हें समझाने की कोशिश की – कि वो अभी पढ़ना चाहती है, शादी नहीं – लेकिन जवाब में यही सुना: "इतना पढ़ा दिया, अब और क्या करेगी? जहां जाएगी, वहीं के लोग पढ़ा देंगे, नहीं तो घर का काम करेगी। लड़कियों का तो यही होता है।


"जब मैंने स्वाति के माता-पिता से बात की, तो वही पुरानी सोच सामने आई – "मैंने अपनी ओर से बहुत समझाया, लेकिन नहीं समझ पा रहे थे। "तब मैंने उनसे बस एक बात कही – "क्या आपने कभी अपनी बेटी से पूछा कि वो क्या करना चाहती है? क्या वो कुछ बनना चाहती है या सिर्फ घर का काम करना?

एक बार उससे पूछकर तो देखिए।" जब सामने से स्वाति से पूछा गया, तो वो डरते-डरते बोली – "मैं पढ़ना चाहती हूं, अभी शादी नहीं करना चाहती। आप बस मुझे एक मौका दीजिए।" स्वाति की बात सुनकर मैंने भी उन लोगों को अपनी कहानी सुनाई – मेरे गांव में भी यही होता था

जब मेरी शादी की बात चल रही थी, मैंने अपने पापा से सिर्फ इतना कहा – "क्या आप नहीं चाहते कि मैं पढ़-लिखकर कुछ बनूं?" बस, उस दिन से मेरी एक छोटी-सी कोशिश से मै आज पढ़ कर आगे बढ़ रही हूँ और आपलोग से भी मिलने आई हूँ। मेरी कहानी सुनकर उसके माता-पिता कुछ देर शांत रहे... फिर उसके पापा बोले – "अगर तू पढ़ना चाहती है तो ठीक है, अभी तेरी शादी नहीं करेंगे।" यह सुनकर स्वाति के चेहरे पर एक अलग ही चमक आ गई। उसे खुश देखकर मेरे दिल को बहुत ख़ुशी हुई।

प्रियंका, बड्डी 
बेगुसराई 


Wednesday, July 16, 2025

"ख़ुशी की जिद और वर्षा की जीत"

आज सुबह मै हमेशा की तरह ऑफिस के लिए निकली थी। टोटो में बैठकर अपने-अपने ख्यालों में थी की तभी मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी, वो साईकिल चला कर स्कूल जा रही थी। पर वो कोई साधारण लड़की नहीं थी। वो थी वर्षा।

आप पूछेंगे - वर्षा कौन हैं ? - तो सुनिए , वर्षा की कहानी है, जिसने हालातो से हार मान ली थी। लेकिन फिर किसी और लड़की की हिम्मत ने उसे दोबारा खड़ा कर दिया। 

वर्षा , मुंगेर के एक गॉव रामनगर (भागिचक) की लड़की है। सातवीं कक्षा के बाद उसकी पढाई छुट गई थी। उसी समय वर्षा के पिता का देहांत हो गया था ,घर में बस माँ और दो बहनें थी। माँ एक छोटी सी दुकान चलाकर जैसे-तैसे घर चलाते थे। पढाई फिर से शुरू करने का न तो हौसला था न ही कोई सहारा। 

और फिर उसकी जिंदगी में आई-सक्षम की एडू-लीडर ख़ुशी जो बैच-11 की है, यह आई-सक्षम संस्था में काम करती हैं। ख़ुशी बहुत ही मेहनती और जिद्दी लड़की, जिस काम को ले कर ठान लेती है, तो पीछे नहीं हटती हैं। 

अक्टूबर-नवंबर का महीना था। हमारे क्लस्टर में तय हुआ कि हम उन किशोरियों को फिर से स्कूल भेजेंगे, जिन्होंने किसी कारण से पढ़ाई छोड़ दी है। उसी अभियान के दौरान खुशी को वर्षा मिली।
जब खुशी ने वर्षा की माँ से बात की तो जवाब साफ थी। अब क्या पढ़ेगी? सात साल हो गए। मुश्किल से घर चलता है, पढ़ाई के लिए समय और पैसे कहाँ हैं?
लेकिन खुशी हार मानने वालों में से नहीं थी। उसने समझाया कि सरकार की तरफ़ से लड़कियों को छात्रवृत्तियाँ मिलती हैं, कई योजनाएं हैं। फिर उसने वर्षा से सीधा पूछा। क्या तुम फिर से पढ़ना चाहती हो?
वर्षा की आँखों में हल्की-सी चमक आई। वो बोली। मन तो है दीदी, पर स्कूल में दाखिला मिलेगा क्या? मेरे पास तो टीसी भी नहीं है। खुशी मुस्कराई और कहा , तुम साथ दो, बाकी मै आपको मदद करूंगी। खुशी ने स्कूल से लेकर DRCC ऑफिस और कोर्ट तक पहुँची । चार दिन DRCC के ऑफिस में, तीन दिन कोर्ट में — वो तब तक नहीं रुकी जब तक वर्षा की टीसी नहीं मिल गई। कुछ दिन बाद मिलने के बाद ख़ुशी ने वर्षा का मई में स्कूल में दाख़िला करवाए , तो जून की गर्मियों में, सात साल बाद, वर्षा फिर से स्कूल गई। 
आज जब मैंने उसे साइकिल से स्कूल जाते देखा, तो ऐसा लगा जैसे उम्मीद सचमुच साइकिल चला रही है। खुशी ने सिर्फ़ एक बच्ची की पढ़ाई शुरू नहीं करवाई। उसने उसके भविष्य का रास्ता खोला।
हम एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ हर लड़की के पास अपनी आवाज़ हो, अपनी पसंद हो, और वह किसी दूसरी लड़की की ताक़त भी बन सके।
स्मृति , बड्डी
मुंगेर





Wednesday, July 2, 2025

"सोच में बदलाव" – एक बहू, एक सास और तीन पीढ़ियों की कहानी

सुनिए  साथियों, जमाना कितना बदल रहा है ना... लेकिन असली बदलाव तब दिखता है जब घर-परिवार के लोग अपनी सोच बदलें। ऐसा ही कुछ मैंने खुद अपनी आँखों से देखा और दिल से महसूस किया।

हमलोग हाल ही में जमुई में i-सक्षम में “बडी प्रशिक्षण” में गए थे। चार दिन का प्रशिक्षण था। बहुत कुछ नया सीखने को मिला। लेकिन सबसे बड़ी सीख तो एक कहानी ने दी... एक सास, एक बहू और एक प्यारी सी पोती की।
हमारी साथी नेहा दी भी वहाँ आई थीं। लेकिन अकेली नहीं — अपनी सासू माँ और बेटी रूपम के साथ। पहले तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मन में सवाल उठा कि अरे, नेहा दी की सासू माँ भी यहाँ? वो भी ट्रेनिंग में?

क्योंकि मैं नेहा दी की कहानी पहले से जानती थी। याद है, 2024 के फाउंडेशन डे पर मैंनें उनके जीवन पर नाटक लिखा था। तब जान पाई थी कि नेहा दी की पढ़ाई एक वक्त पर रोक दी गई थी। दसवीं में थीं तब उनकी सासू माँ ने साफ कहा थे,

"दसवीं पढ़कर क्या करेगी? बकरी ही तो चराएगी!"
सोचिए, कैसी तकलीफ हुई होगी नेहा दी को। लेकिन वक़्त बदला... हालात बदले... और सबसे बड़ी बात — सोच बदली।
अब वही सासू माँ... अपनी बहू का हाथ पकड़कर जमुई ले आईं। बोलीं
"तू सीख, मैं रूपम को संभाल लूंगी।"

ये सिर्फ साथ आना नहीं था दीदी... ये था तीन पीढ़ियों का बदलाव। सासू माँ ने पूरे मन से नेहा दी का साथ दिया। पोती रूपम उनके गोद में खेलती रही और नेहा दी सारा ध्यान लगाकर ट्रेनिंग में सीखती रहीं।


ट्रेनिंग खत्म होने के बाद मैं उनके पास गई। धीरे-धीरे बातें होने लगीं। और उनकी बात सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। वो बोलीं —
"हाँ, पहले गलती हुई हमसे। सोचा था पढ़ाई से क्या होगा। पर अब समझ आई है। चाहे बेटी हो या बहू, पढ़ाई सबसे जरूरी है। आज गांव में लोग कहते हैं — देखो, आपकी बहू समाज में काम करती है, लड़कियों को समझाती है, लोगों की मदद करती है। तो मन गर्व से भर जाता है।"

नेहा की सासु माँ ने पिछले बातो को कहते-कहते उनकी आँखें भर आईं। फिर बोलीं —
"नेहा ने हमारे घर की सोच बदल दी है।"
सच कहूँ साथियों, उस दिन मैंने महसूस किया कि बदलाव सिर्फ किताबों में नहीं होता। जब हम किसी की कहानी को जीते हैं, उसे अपने आस-पास होते हुए देखते हैं, तब असली असर होता है।
ये सिर्फ नेहा दी का सफर नहीं था... ये हर उस लड़की की कहानी है जो लड़ती है, सीखती है और समाज की सोच बदल देती है।
"जब सोच बदले, तब ही असली बदलाव आता है"
स्मृति, टीम मुंगेर।

Wednesday, January 29, 2025

i-सक्षम से जुड़ने के बाद जीवन में आए बदलाव

आज मैं आप लोगों के साथ i-सक्षम में जुड़ने के बाद खुद में आए बदलाव को साझा करने वाली हूँ। i -सक्षम से जुड़े मुझे छह महीने होने वाले हैं, इस बीच मैंने खुद में कई नए बदलावों को महसूस किया।

बहार जाने का आत्मविश्वास 

i-सक्षम से जुड़ने से पहले हम घर से बाहर बहुत कम जाते थे। अकेले बाहर जाने में डर सा लगता था। कि लोग क्या सोचेंगे। अगर कुछ सामान लाना होता तो मैं अपने पति से या घर के किसी अन्य सदस्य से बोलती थी। क्योंकि हमें घर से बाहर निकलने में भीड़ और भरी सड़कों को पार करने में हिचकिचाहट सी होती थी। लेकिन अब हम घर के बाहर के अपने काम को खुद ही जाकर कर निपटाने लगी हूँ।

सपनो की पहचान की यात्रा 

पहले मुझे लगता था की घर और बच्चा ही जीवन के केंद्रे हैं। लेकिन जब मै i-सक्षम से जुडी, तो मुझे एहसास हुआ की खुद के भी सपना होते हैं। जिन्हें पूरा कर सकते हैं। 


आत्मविश्वास और बातचीत में सुधार

मुझे लोगों से बात करने में हिचकिचाहट होती और डर लगता था। बातचीत के दौरान मेरा आई कांटेक्ट (Eye Contact) नहीं हो पता था। जिससे मै अपनी बात  बेहतर तरीके से नहीं रख पाती थी। लेकिन अब यह डर काफी हद तक कम हो गया है।


शिक्षा के लिए वॉइस एंड चॉइस का उपयोग

मैंने अपने आगे की पढाई के लिए अपने वॉइस एंड चॉइस का उपयोग किया। मैंने अपने पति से बिना हिचकिचाहट के कहा मुझे आगे पढाई करना है। मुझे कंप्यूटर सिखने का बहुत मन था, लेकिन मेरे पति कहते थे, “तुम क्या करोगी सीखकर?” जब मुझे क्लस्टर में प्राइम बुक मिला, तो मै बहुत खुश हुई। मैंने पति से कहा “देखिए, अब मै कंप्यूटर भी सिख सकती हूँ और अपने सपने को पूरा भी कर सकती हूँ। 

क्लस्टर मीटिंग का अनुभव  

जब मै पहली बार क्लस्टर मीटिंग में गई। तो मुझे आजादी का अनुभव हुआ। मुझे हर महीने के आखिरी गुरुवार का विश्ववारी इंतज़ार रहता है, क्युकी वहां की खुली हवाएं और ऊँचे-ऊँचे पहाड़ मुझे प्रेरणा देते हैं।


समाज के प्रति जागरूकता

क्लस्टर में सामिल होने के बाद मै यह सोचने लगी की हमारे समाज में क्या अच्छा हो रहा है और ऐसा क्या किया जाये जिससे लोग जागरूक हो सकें। अब मै अपने समाज के लिए बेहतर सोचने औए कदम उठाने में सक्षम हूँ। 

निर्णय लेने की क्षमता

i-सक्षम से जुड़ने के बाद मेरे अंदर इतना बदलाव आए हैं की अब मै सही और गलत के बिच अंतर कर पाती हूँ,अपने जीवन से जुड़े सही निर्णय ले पाती हूँ, जो पहले नहीं कर पाती थी।

जुली कुमारी 

बैच-11 

जमुई 


Tuesday, December 31, 2024

परिवार की जिम्मेदारियों को संभालना और खुद में बदलाव लाना

 परिवार की जिम्मेदारियों को संभालना और खुद में बदलाव लाना

 i-सक्षम से जुड़ने के बाद मेरी जिंदगी में जो बदलाव आए, उन्हें मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। यह सफर न केवल मेरे व्यक्तित्व को निखारने का रहा है, बल्कि मुझे आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने का भी रहा है।

शुरुआत और बदलाव की ओर पहला कदम

डेढ़ साल पहले, जब मैंने i-सक्षम से जुड़ने का फैसला किया, तब मैं एक साधारण लड़की थी, जो घर और स्कूल की चारदीवारी तक सीमित थी। मुझे यह भी नहीं पता था कि किसी के साथ बातचीत कैसे की जाती है। धीरे-धीरे मैंने सीखा कि कैसे किसी से संवाद करना है, अपनी बातों को आत्मविश्वास के साथ रखना है और दूसरों की मदद के लिए आगे आना है।


पहले मैं अपने ही जिले, बेगूसराय, जाने से डरती थी। अगर कहीं जाना होता था, तो मां या भाई का साथ जरूरी था। लेकिन i-सक्षम ने मुझे वह आत्मविश्वास दिया, जो मुझे अपनी सीमाओं को पार करने में मदद करता है। आज मैं अकेले दिल्ली जैसे बड़े शहर में चार बार आ-जा चुकी हूं। यह अनुभव मेरे लिए किसी सपने से कम नहीं था।

मेरे भाई और पापा बाहर जॉब(Job) करते हैं। जिसके वजह से घर पर नहीं रहते हैं। जो काम लोगों के घरों में पापा या भाई करते हैं, वो सब 

मैंने किया है, जैसे कि राशन कार्ड में नाम जुड़ना, ब्लॉक जाना, हिसाब-किताब और खेतों के कामकाज तक, हर जिम्मेदारी निभाई। जब पापा और भाई कहते हैं, "तुम हमारा दायां हाथ हो," तो मेरा दिल गर्व से भर जाता है। 

स्कूल में बदलाव
मैंने अपने घर के साथ-साथ स्कूल में भी बदलाव लाने की कोशिश की। मैंने बच्चों को साफ कपड़े पहनकर आने, बैग चेक करके लाने, बाल अच्छे से बांधने और रोज़ चप्पल पहनने जैसी आदतें सिखाईं। मैंने उन्हें सिखाया कि कचरा कूड़ेदान में डालें और एक-दूसरे की मदद करें। आज, जब मैं स्कूल नहीं जाती, तो भी वहां वही अनुशासन और आदतें देखने को मिलती हैं, जो मैंने वहां विकसित की थीं। शिक्षक के साथ जुड़ पाए एक-दुसरे पे विश्वास करना

चुनौतियों का सामना
इस सफर में मुझे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अकेले कहीं जाने का डर मुझे हमेशा सताता था। मैं बहुत दूर तक पैदल चल जाती, लेकिन उस गाड़ी में कभी नहीं बैठती, जिसमें महिलाएं नहीं होतीं। धीरे-धीरे मैंने अपने डर को हराना सीखा। स्कूल में भी, जब मैंने बदलाव का कोई कदम उठाया, तो हेडमास्टर सर कई बार रोक देते थे। लेकिन मेरे काम को देखकर उन्होंने भी मुझ पर भरोसा करना शुरू कर दिया।
आत्मनिर्भरता और गर्व
आज मैं जो कुछ भी कर रही हूं, वह न केवल मेरे लिए, बल्कि मेरे परिवार, गांव और स्कूल के लिए भी गर्व का विषय है। i-सक्षम ने मुझे वह सशक्त पहचान दी, जो हर लड़की का सपना होती है। अब मुझे लगता है कि कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती, बस हमें अपनी सोच और आत्मविश्वास को मजबूत रखना होता है।

अंशु 

बैच-9, बेगूसराय